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Tuesday, 21 July, 2026
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भारत की हाइड्रोजन ट्रेन सिर्फ पर्यावरण के लिए नहीं, यह आत्मनिर्भर भारत की ओर भी एक बड़ा कदम

जिन देशों का रेलवे नेटवर्क बहुत बड़ा है, वहां हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनें सबसे ज्यादा काम आ सकती हैं. इसलिए भारत इस तकनीक को परखने के लिए एक बेहतरीन जगह है.

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पिछले हफ्ते आत्मनिर्भर भारत की यात्रा में एक और नया पड़ाव जुड़ गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की पहली हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन को हरी झंडी दिखाई. इसे हरियाणा के जींद स्टेशन से रवाना किया गया. यह ट्रेन आधुनिक तकनीक की मदद से ट्रेन के अंदर ही अपनी बिजली खुद बनाएगी. इसके लिए इसमें हाइड्रोजन स्टोरेज, रीफ्यूलिंग (हाइड्रोजन भरने) और ऑपरेशन का पूरा अलग सिस्टम बनाया गया है.

भारत खास देशों के क्लब में शामिल

हाइड्रोजन ट्रेनें रेलवे को कार्बन उत्सर्जन से मुक्त बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हैं. इस ट्रेन की शुरुआत के साथ भारत उन पांच देशों के खास समूह में शामिल हो गया है, जिनके पास ऐसी ट्रेनें बनाने और चलाने की इंजीनियरिंग क्षमता और बैटरी सेल तकनीक है.

जर्मनी ने 2018 में सबसे पहले हाइड्रोजन से चलने वाली जीरो-एमिशन (बिना प्रदूषण वाली) यात्री ट्रेन शुरू की थी. इसके बाद जापान, चीन और अमेरिका ने भी इस तकनीक को अपनाया. वहीं ब्रिटेन और फ्रांस समेत कई दूसरे देश भी इस तकनीक का परीक्षण कर रहे हैं. सिर्फ डीजल की जगह हाइड्रोजन इस्तेमाल कर देना ही काफी नहीं होता. इसके लिए कई नई तकनीकों में एक साथ महारत हासिल करनी पड़ती है.

सबसे पहले ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करना ज़रूरी है. इसे बहुत ज्यादा हाई प्रेशर में सुरक्षित रखना पड़ता है. फ्यूल सेल तकनीक अभी शुरुआती दौर में है और ज्यादा क्षमता वाली बैटरियां अभी काफी महंगी हैं. इसके अलावा मजबूत ऊर्जा प्रबंधन प्रणाली, सुरक्षित रेलवे इंजीनियरिंग और सही सुरक्षा प्रमाणन भी ज़रूरी हैं.

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार, इलेक्ट्रिक ट्रेनों से अलग हाइड्रोजन ट्रेनों के लिए पूरी तरह नया ईंधन सिस्टम तैयार करना पड़ता है.

जिन देशों का रेलवे नेटवर्क बहुत बड़ा है, जहां लंबी दूरी के रूट हैं, जहां बिजली पहुंचाना महंगा है और आज भी डीजल का ज्यादा इस्तेमाल होता है, वहां हाइड्रोजन ट्रेनें सबसे ज्यादा उपयोगी हो सकती हैं. इसलिए भारत इस तकनीक को परखने के लिए एक बेहतरीन जगह है. भारत को इंजन, कोच, सिग्नलिंग और ट्रेन चलाने की तकनीक बनाने का कई दशकों का अनुभव है. रिसर्च डिज़ाइन एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गेनाइजेशन (RDSO) जैसी संस्थाओं के पास मजबूत इंजीनियरिंग क्षमता है. इसलिए भारत को इस तकनीक पर काम करने की शुरुआत बिल्कुल नए सिरे से नहीं करनी पड़ी.

इसके अलावा भारत में कोच और इंजन बनाने की मजबूत क्षमता है. इसलिए भारतीय इंजीनियरों को सिर्फ नई तकनीकों को जोड़ना है, पूरी व्यवस्था विदेशों से मंगाने की जरूरत नहीं है.

भारत के पास रेलवे इंजीनियरिंग का भी मजबूत आधार है. BHEL, RITES और IRCON जैसी सरकारी कंपनियों के पास कई दशकों का इंजीनियरिंग एक्सपीरियंस है.

आखिर में, भारत सरकार अपनी नीतियों के जरिए स्वच्छ ऊर्जा (क्लीन एनर्जी) को बढ़ावा दे रही है. नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन से स्टील, उर्वरक (फर्टिलाइजर), शिपिंग और भारी परिवहन जैसे क्षेत्रों को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है. इसका मकसद ऊर्जा के आयात पर निर्भरता कम करना और ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना है. पश्चिम एशिया में युद्ध को लेकर हाल की अनिश्चितता ने भी भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में और तेजी से काम करने के लिए प्रेरित किया है.

भारत की यह उपलब्धि क्यों महत्वपूर्ण है?

यह सिर्फ किसी खास देशों के समूह का हिस्सा बनने की बात नहीं है. या फिर उन शुरुआती देशों में शामिल होने की बात नहीं है, जिन्होंने यह उपलब्धि हासिल की. असल मायने में यह तकनीकी आत्मनिर्भरता दिखाने की बात है. यह दिखाने की बात है कि भारत अपने संसाधनों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर सकता है.

हाइड्रोजन फ्यूल सेल, बैटरी सिस्टम और रेलवे इंजीनियरिंग को भारत में विकसित तकनीक के साथ जोड़कर भारत ने दिखाया है कि वह ऐसी आधुनिक तकनीक में भी आगे बढ़ सकता है, जिसे अब तक सिर्फ कुछ ही देशों ने विकसित किया है.

इसका फायदा भारत के हेवी इंडस्ट्री क्षेत्र को भी मिल सकता है, क्योंकि यहां विकसित हुई तकनीक का इस्तेमाल दूसरे क्षेत्रों में भी किया जा सकता है.

नेट जीरो और हाइड्रोजन

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि हाइड्रोजन पूरी तरह नेट जीरो या ग्रीन फ्यूल नहीं है.

उनका कहना है कि ट्रेन चलने के समय तो हाइड्रोजन ट्रेन प्रदूषण नहीं करती, लेकिन जब तक हाइड्रोजन बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली बिजली पूरी तरह सौर ऊर्जा (सोलर) और पवन ऊर्जा (विंड) से नहीं बनेगी, तब तक हाइड्रोजन पूरी तरह ग्रीन नहीं बल्कि ग्रे हाइड्रोजन ही मानी जाएगी.

आलोचकों का यह भी कहना है कि हाइड्रोजन प्राकृतिक रूप से नहीं मिलता. इसे बनाने की प्रक्रिया अभी भी काफी हद तक जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल) पर निर्भर है, जिससे कार्बन उत्सर्जन होता है. हालांकि, MIT के विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे दुनिया हाइड्रोजन ऊर्जा का ज्यादा इस्तेमाल करेगी, वैसे-वैसे इसे बनाने की प्रक्रिया और ज्यादा साफ और पर्यावरण के अनुकूल होती जाएगी.

MIT के प्रमुख रिसर्च वैज्ञानिक एमरे गेंसर कहते हैं, “अगर इलेक्ट्रोलाइज़र सस्ते हो जाएंगे, तो निश्चित रूप से ज्यादा ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन शुरू होगा.” उनका यह भी कहना है कि अगर ऊर्जा को सस्ती कीमत पर स्टोर करना संभव हो जाए, तो 24 घंटे ग्रीन हाइड्रोजन तैयार किया जा सकेगा.

सौर और पवन ऊर्जा भी उतनी पूरी तरह ग्रीन नहीं हैं, जितना कई लोग मानते हैं.

सोलर पैनल बनाने के लिए दुर्लभ खनिज (रेयर अर्थ मटेरियल) की खनन करनी पड़ती है, जिससे भी कार्बन उत्सर्जन होता है. वहीं, पवन ऊर्जा के लिए इस्तेमाल होने वाले बड़े टरबाइन और पंखे हल्के लेकिन ज्यादा कार्बन वाले स्टील से बनाए जाते हैं.

अगर सभी देश मिलकर इस तकनीक से जुड़ा ज्ञान और अनुभव साझा करें, तो हाइड्रोजन ऊर्जा बहुत तेजी से स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा का भविष्य बन सकती है. यह ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनने और 147 करोड़ (1.47 अरब) लोगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए ज़रूरी है.

मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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