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Tuesday, 14 July, 2026
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मोदी सरकार ने कैसे खत्म किया नर्मदा नदी का दशकों पुराना विवाद

नर्मदा नदी को लेकर दशकों से चला आ रहा विवाद आखिरकार सुलझ गया. यह समझौता सहयोग के जरिए राष्ट्रीय विकास के श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विजन को दर्शाता है.

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पिछले हफ्ते जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती मनाई गई. इस मौके पर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन की ओर से प्रस्तुत एक नाटक में उनके प्रमुख विचारों और सिद्धांतों को दिखाया गया. आज़ाद भारत के पहले उद्योग और आपूर्ति मंत्री के रूप में श्यामा प्रसाद मुखर्जी का मानना था कि किसी भी देश का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपने संसाधनों का कितना समझदारी से विकास करता है. नर्मदा नदी इसी सोच का एक सजीव उदाहरण है. इसके पानी ने उद्योगों को ताकत दी है, खेतों की सिंचाई की है और भारत को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ाया है.

मुखर्जी के इसी विजन के अनुसार, जिसमें देश के अपने संसाधनों का इस्तेमाल राष्ट्रीय विकास के लिए करने की बात कही गई थी, बीजेपी ने नर्मदा के पानी के बंटवारे में वर्षों से चली आ रही रुकावटों को खत्म किया है. इससे उन परियोजनाओं को तेज़ी मिली है, जो लाखों लोगों तक पानी, बिजली और नए अवसर पहुंचाती हैं. आज नर्मदा नदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में निर्णायक शासन और सबको साथ लेकर विकास का प्रतीक बन गई है.

दशकों पुराने नर्मदा नदी अंतरराज्यीय विवाद का समाधान अब आपसी सहमति से हो गया है. मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान ने इस विवाद को खत्म करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. यह समझौता श्यामा प्रसाद मुखर्जी की सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की सोच को दर्शाता है. यह अच्छे शासन का एक अहम उदाहरण है, जिसमें लंबे कानूनी विवाद की बजाय लगातार राजनीतिक बातचीत को प्राथमिकता दी गई. यह वित्तीय समझौता राज्यों के बीच लागत बांटने को लेकर दशकों पुराने विवाद को खत्म करता है. यह टकराव की जगह बातचीत और विवाद की जगह सहमति का उदाहरण है. परियोजनाओं से जुड़े पुराने बकाये का निपटारा होने से क्षेत्रीय विकास को मजबूती मिलेगी और यह “सबका साथ, सबका विकास” के विजन को आगे बढ़ाता है, जिसे डबल इंजन सरकार ने संभव बनाया है.

गृह मंत्री अमित शाह ने चारों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठकों की अध्यक्षता करते हुए कहा, “पानी का इस्तेमाल चाहे जैसे भी हो, उसका लाभ पाने वाला एक भारतीय ही होता है.” इस तरीके से केंद्र सरकार ने खुद को किसी फैसले सुनाने वाले पक्ष की बजाय एक निष्पक्ष और सक्रिय मध्यस्थ के रूप में पेश किया. प्राचीन पशुपति मुहर से जुड़े न्याय और भरोसे के मूल्यों से प्रेरणा लेते हुए यह समझौता नर्मदा नदी की उस पवित्र परंपरा का सम्मान करता है, जिसमें उसे भगवान शिव की पुत्री माना जाता है. सहकारी संघवाद की इसी भावना से आखिरकार एक शांतिपूर्ण और संवेदनशील समाधान निकला है, जिससे चारों राज्यों के किसानों और लाखों लोगों को फायदा होगा.

पद्म पुराण में नारद मुनि के नाम से जुड़े एक श्लोक में कहा गया है—”सरस्वती नदी में लगातार तीन दिन स्नान करने, यमुना में सात दिन स्नान करने और गंगा में एक दिन स्नान करने से मनुष्य के पाप दूर होते हैं, लेकिन केवल नर्मदा नदी के दर्शन मात्र से ही उसके पाप समाप्त हो जाते हैं.”

“नर्म” का मतलब है आनंद या खुशी, और “दा” का मतलब है देने वाली. नर्मदा को भारत की सबसे पवित्र नदियों में से एक माना जाता है. इसका स्थान गंगा के बाद आता है. इसे अक्सर “भारत की आत्मा” भी कहा जाता है. यह भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक प्राकृतिक सीमा का भी काम करती है.

सरदार सरोवर बांध का जलाशय | फोटो: मीनाक्षी लेखी
सरदार सरोवर बांध का जलाशय | फोटो: मीनाक्षी लेखी

नर्मदा नमामी

मार्कंडेय पुराण के समय से ही पूजी जाने वाली नर्मदा नदी का हिंदू परंपरा में बहुत बड़ा धार्मिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व है. महाभारत में भी नर्मदा का उल्लेख मिलता है. इसमें बताया गया है कि देवी नर्मदा का विवाह राजा पुरुकुत्स से हुआ था. नर्मदा को भगवान शिव की पुत्री माना जाता है और दोनों के बीच गहरा आध्यात्मिक और पिता-पुत्री का संबंध बताया जाता है. मान्यता है कि जब भगवान शिव अमरकंटक पर्वत पर कठोर तपस्या कर रहे थे, तब उनके तांडव की तीव्रता से उनके शरीर से पसीने की धाराएं बहने लगीं. इसी पसीने से एक सुंदर स्त्री प्रकट हुई. भगवान शिव ने उनका नाम नर्मदा रखा क्योंकि उन्होंने उनके मन में कोमलता और आनंद का भाव जगाया था. उन्हें शांकरी या जटा शांकरी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है भगवान शिव से उत्पन्न हुई.

यह भी मान्यता है कि साल में एक बार, जब लाखों श्रद्धालुओं के स्नान से गंगा नदी बहुत अधिक प्रदूषित हो जाती है, तो गंगा काली गाय का रूप धारण करके नर्मदा में स्नान करती हैं, ताकि श्रद्धालुओं द्वारा छोड़े गए ‘पापों’ से खुद को शुद्ध कर सकें.

“नर्मदा के कंकर, उत्ते शंकर”—इस कहावत का मतलब है कि नर्मदा नदी का हर कंकड़ स्वयं भगवान शंकर का प्रतीक माना जाता है और एक छोटे शिवलिंग जैसा होता है. इन पत्थरों को बाणलिंग कहा जाता है. माना जाता है कि ये स्वयंभू होते हैं और इन्हें किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान से स्थापित करने की ज़रूरत नहीं होती. इसी दिव्य मान्यता की वजह से पूरा नर्मदा नदी क्षेत्र पवित्र माना जाता है. नर्मदा भारत की इकलौती नदी है, जिसकी पैदल परिक्रमा की जाती है. श्रद्धालु लगभग 3,000 किलोमीटर लंबी नर्मदा परिक्रमा पूरी करते हैं, जिसे बेहद कठिन धार्मिक यात्रा माना जाता है.

नर्मदा नदी विवाद का इतिहास

इतिहास के अनुसार, नर्मदा नदी का विवाद भारत की आज़ादी से ठीक पहले शुरू हुआ था. ब्रिटिश शासन अपने पीछे कई ऐसे विवाद छोड़ गया, जिनका समाधान नहीं हो पाया था. नर्मदा विवाद भी उनमें से एक था. इस विवाद को सुलझने में करीब 75 साल लग गए. ब्रिटिश शासन के दौरान नदियों को भारत की परंपराओं की तरह पवित्र नहीं माना जाता था. इसलिए उनका इस्तेमाल शहरों का सीवर और कचरा बहाने के लिए किया जाता था. दुर्भाग्य से, आजाद भारत में भी कई जगह यह स्थिति बनी हुई है.

नर्मदा नदी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर बहती है और फिर अरब सागर में जाकर मिलती है. यह नदी सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन की बड़ी संभावनाएं रखती है, लेकिन सवाल यह था कि इसके पानी, परियोजनाओं की लागत और उनसे मिलने वाले लाभ को इन राज्यों के बीच कैसे बांटा जाए. इसी को लेकर विवाद शुरू हुआ. 1964 में सरकार ने खोसला समिति बनाई, ताकि वह गुजरात और मध्य प्रदेश के बीच नर्मदा के पानी के बंटवारे पर सुझाव दे सके, लेकिन दोनों राज्यों के बीच सहमति नहीं बन पाई. इसके बाद 1969 में भारत सरकार ने अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (NWDT) का गठन किया. लंबी सुनवाई और विचार-विमर्श के बाद 1979 में न्यायाधिकरण ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया. इस फैसले में मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच पानी और बिजली का बंटवारा तय किया गया.

साथ ही सरदार सरोवर बांध सहित बड़े परियोजनाओं के निर्माण का ढांचा भी तय किया गया. हालांकि, न्यायाधिकरण ने राज्यों के बीच पानी के बंटवारे का विवाद सुलझा दिया, लेकिन इसके बाद एक नया विवाद शुरू हो गया. यह विवाद बांध बनने से होने वाले सामाजिक और पर्यावरणीय असर को लेकर था. इसी दौरान नर्मदा बचाओ आंदोलन शुरू हुआ. इस आंदोलन में बांध से प्रभावित लोगों के विस्थापन, उनके पुनर्वास और नदी पर बांध बनने से पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर सवाल उठाए गए. इन विरोध प्रदर्शनों के कारण 1993 में विश्व बैंक ने इस परियोजना के लिए अपनी आर्थिक मदद वापस ले ली. इससे कुछ समय के लिए परियोजना की रफ्तार प्रभावित हुई. हालांकि बाद में यह परियोजना देश के अपने पैसों से आगे बढ़ाई गई. यह परियोजना विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की चुनौती का प्रतीक बन गई. साथ ही, सामाजिक न्याय और समानता का सवाल भी नर्मदा विवाद का अहम हिस्सा बना रहा.

नदी सिर्फ एक भौगोलिक संरचना नहीं होती, बल्कि वह किसी भी सभ्यता की जीवनरेखा होती है. भारत के बीचों-बीच बहने वाली नर्मदा ने सिंधु घाटी सभ्यता के समय से ही लोगों का जीवन संवारा है, उनकी आस्था को मजबूत किया है और हमारी सामूहिक सोच को आकार दिया है. इसी वजह से नर्मदा घाटी अपने भीतर प्राचीन इतिहास की गूंज समेटे हुए है. नर्मदा सिर्फ पानी का स्रोत नहीं है, बल्कि यह भारत की सभ्यता की यात्रा का एक जीवंत प्रमाण भी है. यह उस प्राचीन संस्कृति की याद दिलाती है, जो जल प्रबंधन में माहिर थी और आज के उस आधुनिक कल्याणकारी भारत का भी प्रतीक है, जिसकी अपनी आर्थिक और वैश्विक महत्वाकांक्षाएं हैं.

अंतिम समाधान

इसलिए नर्मदा नदी से जुड़े वर्षों पुराने विवाद का समाधान सिर्फ एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं है. यह इसलिए संभव हो पाया क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात की बीजेपी सरकारों के साथ मिलकर काम किया.

7 जुलाई को ऐतिहासिक नर्मदा समझौते पर आधिकारिक तौर पर हस्ताक्षर किए गए. गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, “नर्मदा अवॉर्ड के तहत वित्तीय भुगतान को लेकर चारों राज्यों के बीच चला आ रहा विवाद आपसी सहमति से सुलझ गया है. लंबित भुगतान एकमुश्त (One-Time) किया जाएगा.” इस समझौते के तहत मध्य प्रदेश और राजस्थान दोनों गुजरात को 550-550 करोड़ रुपये देंगे. मध्य प्रदेश की 7,669 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग पर विचार नहीं किया गया. वहीं महाराष्ट्र को अब सिर्फ 27 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा. इसके अलावा महाराष्ट्र को 10 TMC पानी लेने का अधिकार भी मिला है. यह पानी नर्मदा-तापी डायवर्जन परियोजना और उकाई परियोजना के जरिए बराबर-बराबर मिलेगा. इससे नंदुरबार और महाराष्ट्र के अन्य इलाकों को फायदा होगा.

मुझे स्टैच्यू ऑफ यूनिटी जाने का सौभाग्य कई बार मिला है. यह विशाल प्रतिमा एकता नगर में स्थित है और सरदार सरोवर बांध के जलाशय से 3.2 किलोमीटर नीचे की ओर है. इस मानव निर्मित चमत्कार के सामने सूर्यास्त देखना एक शांत और आध्यात्मिक अनुभव था. अगर सरदार वल्लभभाई पटेल ने भारत की राजनीतिक एकता को मजबूत किया, तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपना जीवन भारत की राष्ट्रीय एकता की रक्षा के लिए समर्पित किया. नर्मदा नदी, जिसका पानी कई राज्यों के लाखों लोगों का जीवन चलाता है, एक जीवित देवी और भगवान शिव को समर्पित श्रद्धांजलि मानी जाती है. यह साबित करती है कि भारत की असली ताकत उसके लोगों और उसके प्राकृतिक संसाधनों को राष्ट्रीय विकास के लिए एक साथ जोड़ने में है.

मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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