यह बताता है कि टाटा समूह का सभी भारतीयों की ज़िंदगी पर कितना असर है कि हममें से इतने लोग—यहां तक कि वे लोग भी जिन्हें कॉरपोरेट मामलों में कोई दिलचस्पी नहीं है—टाटा संस, जो समूह की होल्डिंग कंपनी है और टाटा ट्रस्ट्स के बीच चल रही मौजूदा लड़ाई पर नज़र रख रहे हैं. टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस के दो-तिहाई शेयर हैं.
मैं बिजनेस पत्रकार नहीं हूं, मैंने पिछले कुछ सालों में बॉम्बे हाउस में हुए घटनाक्रमों पर नज़र नहीं रखी है और हाल की खबरों में इस विवाद से जुड़ी तकनीकी बातों को लेकर मैं भी आम लोगों की तरह उलझन में हूं. मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन का आर्टिकल 121 क्या कहता है या कंपनी के बोर्ड की बैठकों में वोटिंग के नियम क्या हैं.
लेकिन शायद यह अच्छी बात ही है क्योंकि मुझे लगता है कि जब टाटा समूह की बात आती है तो बहुत ज्यादा जानकारी अक्सर बड़ी तस्वीर को छिपा देती है.
आइए सबसे आम गलतफहमी से शुरू करते हैं: यह मानना कि टाटा परिवार की मालिकाना कंपनी है, जिसमें नेतृत्व ज्यादातर भारतीय कारोबारी घरानों की तरह पिता से बेटे को मिलता है. यह बात सिर्फ गलत नहीं है, बल्कि टाटा परिवार ने भी उत्तराधिकार के सिद्धांत को कभी इस तरह नहीं देखा.
हां, मौजूदा रूप में इस समूह को महान जमशेदजी टाटा ने बनाया था, लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं है कि वह चाहते थे कि सिर्फ उनके सीधे वंशज ही इसे चलाएं. उदाहरण के लिए, नौरोजी सकलातवाला ने 1930 के दशक में टाटा संस के चेयरमैन के रूप में इसे चलाया था.
कुछ हद तक ऐसा इसलिए था क्योंकि परिवार में अक्सर सीधे पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होते थे. नवल टाटा (रतन टाटा के पिता) बहुत दूर के रिश्तेदार थे. उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था और 13 साल की उम्र में उन्हें एक अनाथालय से गोद लिया गया था. उन्होंने टाटा समूह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन कभी समूह का नेतृत्व नहीं किया. यह जिम्मेदारी जेआरडी टाटा को मिली, जो एक शानदार व्यक्ति थे और सीधे उत्तराधिकारी भी नहीं थे. हालांकि, उनके पिता जमशेदजी टाटा के एक चचेरे भाई थे.
इसलिए, 1930 के दशक में भी, टाटा परिवार भले ही पारसियों के एक छोटे समूह से नेतृत्व चुनता था, जिनमें से कुछ दूर के रिश्तेदार थे, लेकिन पिता से बेटे को नेतृत्व मिलना कभी मुख्य सिद्धांत नहीं रहा.
ऐसा इसलिए था क्योंकि टाटा परिवार खुद को इस कारोबारी साम्राज्य का मालिक नहीं, बल्कि उसका संरक्षक मानता था. पैसा धर्मार्थ ट्रस्ट्स को दिया जाता था और हर टाटा के पास अलग निजी संपत्ति होती थी, जिसे वह अपनी मानता था. साथ ही, समूह की संपत्ति और निजी पैसे के बीच फर्क रखा जाता था.
बिना पक्के उत्तराधिकारी के विरासत
जब जेआरडी टाटा टाटा समूह में उत्तराधिकार की योजना बना रहे थे, तब रतन टाटा अपने सरनेम की वजह से भी कोई साफ पसंद नहीं थे. रतन ने खुद मुझे एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्हें लगता था कि रुसी मोदी को यह जिम्मेदारी मिलेगी. या फिर जेआरडी नानी पालखीवाला को चुनेंगे. उस समय नवल टाटा और जेआरडी के बीच भी लगभग बातचीत बंद थी.
जेआरडी ने पहले रतन को टाटा इंडस्ट्रीज का प्रमुख बनाया, उन पर करीब से नज़र रखी और फिर तय किया कि वह इतने युवा हैं कि टाटा समूह को अगली सदी में ले जा सकें, लेकिन इतने परिपक्व भी हैं कि यह जिम्मेदारी संभाल सकें.
टाटा समूह में जन्म के संयोग की वजह से कुछ भी अपने आप तय नहीं होता था. यह बात तब साफ हुई जब रतन को अपना उत्तराधिकारी चुनना था. उन्होंने अपने भाई नोएल टाटा को छोड़कर शापूरजी पालोनजी परिवार के साइरस मिस्त्री को चुना. यह परिवार टाटा समूह में सबसे बड़ा बाहरी निवेशक था. जब मिस्त्री को पद से हटा दिया गया, तो रतन ने अपने परिवार और पारसी समुदाय, दोनों से बाहर जाकर एन चंद्रशेखरन (चंद्रा) को चुना. चंद्रा लंबे समय से टाटा समूह के साथ थे और समूह की सबसे सफल कंपनी चलाते थे. नोएल को एक बार फिर छोड़ दिया गया.
इसलिए जब मीडिया में इस लड़ाई को मालिकों और मैनेजरों के बीच की लड़ाई के रूप में पेश किया जाता है, तो यह बात को बहुत ज्यादा सरल बना देना है. जैसा कि जेआरडी और रतन अक्सर साफ करते थे, टाटा मालिक नहीं थे, बल्कि एक विरासत के मैनेजर थे.
इसका मतलब यह नहीं है कि नोएल टाटा की उपलब्धियों को कम आंका जाए. उन्होंने जिन कंपनियों को चलाया, उनमें सफल कारोबारी साबित हुए हैं, जिनमें समूह का सफल रिटेल कारोबार भी शामिल है. सिर्फ इसलिए कि रतन उनके लिए ज्यादा समय नहीं निकालते थे, इसका मतलब यह नहीं है कि नोएल बुद्धिमान या सक्षम नहीं हैं.
और फिर भी, ज्यादातर अपने ही कदमों की वजह से, नोएल ने खुद को इस पूरी कहानी का सबसे अहम व्यक्ति बना लिया है. टाटा संस के बोर्ड में वह अकेले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने चंद्रा को पांच साल और देने का विरोध किया. इसके पीछे की वजहें पूरी तरह साफ नहीं हैं.
क्या एयर इंडिया ही असली समस्या है?
चंद्रा को एक और कार्यकाल देने पर मुख्य तौर पर यह आपत्ति जताई गई है कि एयर इंडिया का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा है. यहां चंद्रा की जिम्मेदारी है क्योंकि उन्होंने टाटा समूह के इस कारोबार में छोटे साझेदार सिंगापुर एयरलाइंस को फैसले लेने की छूट दी और कैंपबेल विल्सन को एयरलाइन चलाने के लिए भेजा. विल्सन साफ तौर पर इस जिम्मेदारी के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे और एयर इंडिया को बेहतर स्थिति में लाने में जितना समय लगना चाहिए था, उससे ज्यादा समय लगा है, लेकिन एयर इंडिया को ऐसे कारणों से भी नुकसान हुआ, जिनके लिए विल्सन जिम्मेदार नहीं थे: अहमदाबाद विमान हादसा, ईरान युद्ध, पाकिस्तान के ऊपर से उड़ानों पर रोक, रुपये का लगातार गिरना और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी.
एयर इंडिया को खरीदना जेआरडी का सपना था और रतन ने कई सलाहकारों की सलाह के खिलाफ जाकर इसे पूरा किया था. उन सलाहकारों ने रतन से कहा था कि एयरलाइन को दोबारा खड़ा करने में बहुत ज्यादा पैसा खर्च होगा.
क्या एयर इंडिया को लेकर नोएल की नाराजगी जेआरडी और रतन टाटा से किसी नाराजगी की वजह से है?
मुझे लगता है कि इसकी संभावना बहुत कम है. एयर इंडिया के नुकसान बस चंद्रा पर हमला करने के लिए एक सुविधाजनक मुद्दा हैं. लेकिन रतन के कई दोस्त कहते हैं कि नोएल की निजी नाराज़गी ने उन्हें ट्रस्ट्स के बोर्ड और बॉम्बे हाउस में रतन के पुराने साथियों और समर्थकों के खिलाफ कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है. उनका कहना है कि टाटा समूह में शीर्ष पद के लिए दो बार नजरअंदाज किए जाने के बाद नोएल ट्रस्ट्स में अपनी स्थिति का इस्तेमाल पूरे कारोबारी साम्राज्य पर नियंत्रण लेने के लिए करना चाहते हैं.
यह एक सख्त और नोएल के प्रति काफी कठोर नजरिया है, जिसका समर्थन करने के लिए ज्यादा सबूत नहीं हैं, लेकिन ट्रस्ट्स के अंदर तनाव, झगड़े और समस्याएं हैं. ट्रस्टियों ने ट्रस्ट्स के अंदर लिए गए फैसलों और की गई नियुक्तियों पर आपत्तियां उठाई हैं और चैरिटी कमिश्नर भी इसमें शामिल हुए हैं. हाल ही में ट्रस्टी वेणु श्रीनिवासन ने नोएल की आपत्ति के बावजूद टाटा संस में चंद्रा को एक और कार्यकाल देने के पक्ष में वोट किया.
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नोएल के कई समर्थक कहते हैं कि चूंकि ट्रस्ट्स के पास टाटा संस के दो-तिहाई शेयर हैं, इसलिए ट्रस्ट्स की राय को ही मानना चाहिए.
अगर यह बात सही भी है, तो ट्रस्ट्स की राय क्या है? क्या यह सिर्फ नोएल की राय है? ट्रस्ट्स में मौजूदा समस्याओं को देखते हुए इस बारे में पूरी तरह पक्का होना मुश्किल है.
लिस्टिंग का सवाल
और फिर शेयर बाजार में लिस्ट होने का मामला भी है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) लगातार जोर देता रहा है कि टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट होना चाहिए. टाटा परिवार ने वर्षों तक इस मांग का विरोध किया है, लेकिन हाल ही में उनकी स्थिति को खारिज कर दिया गया. वे अदालतों में याचिका दायर करके शेयर बाजार में लिस्ट होने में देरी कर सकते थे, लेकिन अब एक नई परेशानी है: टाटा संस का बोर्ड अब खुद कहता है कि वह शेयर बाजार में लिस्ट होना चाहता है.
अपनी बात मनवाने के लिए नोएल को शेयरधारकों की बैठक में बोर्ड के कुछ सदस्यों को हटाना होगा. उनके पास ऐसा करने के लिए जरूरी संख्या में वोट हो सकते हैं, लेकिन ट्रस्ट्स की समस्याओं और चैरिटी कमिश्नर की ओर से लगाई गई पाबंदियों को देखते हुए ऐसा करना मुश्किल हो सकता है.
यह समझना आसान है कि टाटा संस के बोर्ड को शेयर बाजार में लिस्ट होने से फायदा क्यों होगा. इसके बाद नोएल के पास बोर्ड के फैसलों को रोकने की प्रभावी ताकत नहीं रहेगी और नियामक उन सभी कामों पर नजर रखेंगे, जो शेयरधारक जिनमें ट्रस्ट्स भी शामिल हैं करेंगे.
ट्रस्ट्स के समर्थकों का कहना है कि शेयर बाजार में लिस्ट होने से टाटा संस की कार्य संस्कृति बदल जाएगी. यह बात सही है, लेकिन टाटा समूह की बड़ी कंपनियां पहले से ही शेयर बाजार में लिस्ट हैं. ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि शेयर बाजार में लिस्ट होने से टाटा समूह को कभी न भर पाने वाला नुकसान होगा.
ताकत बनाम नैतिक अधिकार
कभी-कभी मुझे लगता है कि समस्या यह हो सकती है कि नोएल के पास वह नैतिक अधिकार नहीं है, जो रतन के पास था. युवा लोग रतन को टाटा समूह के निर्विवाद प्रमुख के रूप में याद करते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि अपने कार्यकाल की शुरुआत में ही उन्हें पता चला था कि टाटा समूह की बड़ी कंपनियों के प्रमुख उन्हें गंभीरता से नहीं लेते थे.
उनका समाधान था एक रिटायरमेंट नीति लाना, जिसके तहत कंपनी के प्रमुखों को जल्द रिटायर होना पड़ता. समूह के अंदर से इस नीति का विरोध हुआ, लेकिन जेआरडी ने उनका साथ दिया और एक-एक करके पुराने लोग पद छोड़ते गए. कुछ लोग चुपचाप चले गए, लेकिन रुसी मोदी जैसे कुछ लोगों ने इसका विरोध किया. रतन अपने फैसले पर कायम रहे और जब वह जीत गए, तो उन्होंने पूरे कारोबारी साम्राज्य को नए सिरे से व्यवस्थित किया और सब कुछ बॉम्बे हाउस के नियंत्रण में ले आए.
इस अनुभव ने उन्हें वह अधिकार दिया कि वह जो चाहें, कर सकें. उन्होंने उस ताकत का जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया. यहां तक कि जब उनके फैसले तानाशाही जैसे लगे, जैसे साइरस मिस्त्री को पद से हटाना, तब भी उनका फैसला बड़े स्तर पर स्वीकार किया गया, क्योंकि यह फैसला रतन ने लिया था. जब साइरस को हटाया गया, तब रतन सिर्फ ट्रस्ट्स के चेयरमैन थे, लेकिन टाटा संस के निदेशकों ने वही किया, जो उन्होंने कहा.
दुर्भाग्य से, नोएल के पास अभी रतन की तरह काम करने का नैतिक अधिकार नहीं है. ट्रस्ट्स में खुले तौर पर विवाद हुए हैं और टाटा संस में चंद्रा को दोबारा नियुक्त करने के खिलाफ वोट करने वाले वह अकेले निदेशक थे. बाकी सभी उनके खिलाफ चले गए.
शायद उन्हें यह एहसास नहीं था कि उनके पास रतन का पद और ट्रस्ट्स की हिस्सेदारी तो थी, लेकिन रतन जैसा कद नहीं था.
दुख की बात है कि जिस तरह चीजें आगे बढ़ रही हैं, उससे लगता है कि अब लंबे समय तक कानूनी लड़ाई चल सकती है. यह ऐसा नतीजा नहीं है, जिसका कोई इंतजार करना चाहेगा. टाटा समूह भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. इसलिए पूरे समूह को सिर्फ एक व्यक्ति (नोएल) की दूसरे व्यक्ति (चंद्रा) से दुश्मनी की वजह से ठप नहीं होना चाहिए.
मुझे नहीं पता कि क्या चीजें समझौते के लिए बहुत आगे बढ़ चुकी हैं. लेकिन दुश्मनी खत्म करना टाटा समूह के हित में होगा. और भारत के भी.
वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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