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Sunday, 11 October, 2026
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शरजील इमाम 1946 में छूटी बहस को वहीं से आगे बढ़ाना चाहते हैं, एक सिख की इन बारीकियों पर नज़र

मैं पगड़ी पहनने वाला और धर्म का पालन करने वाला सिख हूं. जेल से शरजील इमाम ने जो लंबा इंटरव्यू दिया है, मैं उससे ज़्यादातर बातों पर सहमत नहीं हूं, भले ही वह इंटरव्यू कितना भी गंभीर क्यों न हो.

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शरजील इमाम जनवरी 2020 से मुकदमे का इंतिजार करते हुए जेल में बंद हैं. अगर किसी देश को अपने संविधान पर भरोसा है, तो उसने अब तक या तो उनका मुकदमा पूरा कर लिया होता या उन्हें रिहा कर दिया होता. मैं यह बात सबसे पहले इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि जेल से द क्विंट को दिए गए उनके लंबे इंटरव्यू की ज्यादातर बातों से मैं सहमत नहीं हूं, भले ही यह मामला कितना भी गंभीर क्यों न हो.

उनकी दलील कुछ इस तरह है. वह लिखते हैं कि संविधान ने “सत्ता के केंद्रीकरण को जगह दी, मुसलमानों को प्रतिनिधित्व देने से इनकार किया” और मुसलमानों के लिए आरक्षण पर रोक लगाई. भारत गणराज्य की नींव ही मुसलमानों की मांगों को ठुकराने पर रखी गई थी. इसलिए जो मुसलमान भारत में रह गए, उन्हें “सिर्फ दिखावे के लिए प्रतिनिधित्व” मिलना था और “कानून के तहत कोई गारंटी नहीं” मिलनी थी. इसलिए मुसलमानों को “वहीं से सुधार और लोकतंत्र की उस प्रक्रिया को फिर शुरू करना चाहिए, जो 1947 में रुक गई थी.” इसका मतलब है जिन्ना का कार्यक्रम और 1946 का कैबिनेट मिशन प्लान.

एक छोटा अल्पसंख्यक समुदाय

मैं एक सिख हूं, जो पगड़ी पहनता है और सिख धर्म का पालन करता है. पिछली जनगणना में मेरे समुदाय की आबादी 2.08 करोड़ थी, जो भारत की कुल आबादी का करीब 1.7 फीसदी है. वहीं, मुसलमानों की आबादी 17.22 करोड़ थी, जो 14 फीसदी से ज्यादा है. अगर किसी अल्पसंख्यक समुदाय को इस बात का डर होना चाहिए कि वोटिंग में उसकी संख्या कम पड़ सकती है, तो वह मेरा समुदाय है. मैंने पंजाब के मालेरकोटला में स्कूल जाने से पहले के अपने चार साल बिताए. यह पंजाब का इकलौता मुस्लिम-बहुल शहर है. और 20 सितंबर को मैंने द प्रिंट में एक कॉलम लिखने वाले की इस बात पर आपत्ति जताई थी, जिसमें उसने मुस्लिम राजनीति की आलोचना करते-करते 20 करोड़ लोगों के बारे में फैसला सुना दिया था.

कानूनी गारंटी के बारे में

ये गारंटी मौजूद हैं और संविधान के मौलिक अधिकारों वाले अध्याय में दी गई हैं, जिसका दर्जा किसी भी कानून से ऊपर है. संविधान मुसलमानों को वही सभी अधिकार देता है जो हिंदुओं को देता है. समानता का अधिकार, वोट देने का अधिकार और अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की आजादी. इसके बाद संविधान अल्पसंख्यकों को कुछ अतिरिक्त अधिकार भी देता है.

मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों, जैनियों, बौद्धों और पारसियों, सभी को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान खोलने और चलाने का मौलिक अधिकार है. ऐसा संस्थान अपनी ही समुदाय के लोगों के लिए आधी तक सीटें आरक्षित कर सकता है, भले ही उसे सरकारी सहायता मिलती हो. सरकार दूसरे निजी कॉलेजों पर जाति के आधार पर जो आरक्षण लागू कर सकती है, वह इस तरह के संस्थान पर लागू नहीं होता. इसी तरह, इनके स्कूलों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत 25 फीसदी सीटें आरक्षित रखने की अनिवार्यता से भी छूट मिली हुई है.

अब एक ऐसे हिंदू ट्रस्ट की कल्पना कीजिए, जो अपने पूरे पैसे से एक कॉलेज बनाता है. उसे ऐसा कोई मौलिक अधिकार नहीं मिलता. उससे सीटें आरक्षित करने को कहा जा सकता है, उसके स्कूल को भी आरक्षण के तहत बच्चों को दाखिला देना पड़ता है और उसे अपने ही समुदाय के बच्चों को प्राथमिकता देने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है. कुछ ऐसे राज्यों को छोड़कर, जहां हिंदू खुद अल्पसंख्यक हैं. मुझे दुनिया में ऐसे बहुत कम संविधान पता हैं, जो अल्पसंख्यकों को ऐसे अधिकार देते हैं, बल्कि मौलिक अधिकार देते हैं, जो बहुसंख्यकों के पास नहीं हैं. मुझे इन विशेष अधिकारों का लाभ मिला है और इमाम को भी मिला है.

इसके अलावा भी कई बातें हैं. मुसलमानों की शादी, तलाक और विरासत से जुड़े मामले उनके अपने पर्सनल लॉ के हिसाब से चलते हैं. उनकी धार्मिक संपत्तियों और दान की गई जमीनों के लिए वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत अलग कानून है, जिसमें 2025 में संशोधन किया गया. इमाम की शिकायत है कि वक्फ संस्थाओं में लोगों को नामांकन के जरिए नियुक्त किया गया, जबकि समुदाय के लोग उन्हें चुन सकते थे. मैं उनसे सहमत हूं. मैंने भी इन्हीं पन्नों पर लिखा था कि सरकार ने अपनी सुविधा के लिए मुस्लिम बिचौलियों का इस्तेमाल किया.

मुस्लिम शिक्षा के लिए बनाया गया एक केंद्रीय विश्वविद्यालय सरकारी पैसे से चलता है. 8 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की पीठ ने 4-3 के बहुमत से 1967 के अजीज बाशा फैसले को पलट दिया. उस फैसले में विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने से इनकार किया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने अब तय किए गए मानकों के आधार पर यह फैसला करने का जिम्मा एक नियमित पीठ को दिया कि क्या यह विश्वविद्यालय अल्पसंख्यक संस्थान है. यह सवाल अब भी अदालत में लंबित है. 2018 तक कई दशकों तक सरकार ने मक्का की हज यात्रा के लिए आर्थिक सहायता भी दी थी.

किन दो बातों पर शरजील इमाम सही हैं

दो मामलों में इमाम की बात सही है. देश की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी करीब सातवां हिस्सा है, लेकिन लोकसभा की 543 सीटों में से उनके पास सिर्फ करीब दो दर्जन सीटें हैं. आनुपातिक प्रतिनिधित्व पर बहस करना सही है. यह बहस सिर्फ मुसलमानों के लिए ही नहीं, बल्कि दलितों, पिछड़ी जातियों और छोटी राजनीतिक पार्टियों के लिए भी जरूरी है.

वह संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 को लेकर भी सही हैं. यह आदेश मुस्लिम या ईसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं देता. 1956 में सिखों को और 1990 में बौद्धों को इसमें शामिल किया गया था. मेरा समुदाय इस फैसले के फायदे वाली तरफ है और मैं इसका बचाव नहीं कर सकता. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है.

हालांकि, आरक्षण के मामले में इमाम अपनी बात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं. संविधान सिर्फ धर्म के आधार पर आरक्षण देने पर रोक लगाता है और यह रोक सभी धर्मों पर लागू होती है. मंडल आयोग की सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट के 1992 के इंद्रा साहनी फैसले के बाद मुसलमानों की कई सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों को केंद्र की अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) सूची में शामिल किया गया. इन समुदायों को सामूहिक रूप से पसमांदा समुदाय कहा जाता है. इससे उन्हें केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 27 फीसदी आरक्षण का लाभ लेने का मौका मिला. बाकी समुदायों में जो गरीब लोग हैं, वे 2019 में शुरू किए गए आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए 10 फीसदी आरक्षण का लाभ ले सकते हैं.

भारत गणराज्य के सह-निर्माता

इमाम लिखते हैं कि भारतीय मुसलमानों को व्यवस्था से बाहर रखा गया. लेकिन इतिहास कुछ और ही बताता है. 1947 में भारत में रहने वाले मुसलमानों ने अपने नाम पर बने देश के बजाय इस गणराज्य को चुना. इसके पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद ने भारत के विश्वविद्यालयों की नींव रखने में अहम भूमिका निभाई.

तीन मुसलमान भारत के राष्ट्रपति रह चुके हैं. डॉ. जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम. 1965 में असल उत्तर की लड़ाई में हवलदार अब्दुल हमीद ने परमवीर चक्र जीता था. उस समय यह इलाका अमृतसर जिले में आता था, जहां बाद में मैंने डिप्टी कमिश्नर के तौर पर काम किया. सिविल सेवा परीक्षा, IIT और सशस्त्र बलों में किसी से उसके धर्म का प्रमाणपत्र नहीं मांगा जाता. हर साल जारी होने वाली मेरिट लिस्ट में मुसलमानों के नाम भी होते हैं.

1947 में क्या रुका था

यहां एक सिख होने के नाते मुझे साफ-साफ बात करनी होगी. इमाम जिस कैबिनेट मिशन प्लान का जिक्र करते हैं, उसमें पूरे पंजाब को मुस्लिम बहुल प्रांतों के एक ऐसे समूह में रखने का प्रस्ताव था, जिसका हिस्सा बनना जरूरी होता. इसमें रहने वाले सिखों को वैसी कोई सुरक्षा नहीं दी गई थी, जैसी मुस्लिम लीग केंद्र में मुसलमानों के लिए मांग रही थी. इसी वजह से सिख नेतृत्व ने जून 1946 में इस योजना को खारिज कर दिया था.

जिन्ना जिस तरह के विकेंद्रीकरण की बात कर रहे थे, उससे एक अल्पसंख्यक समुदाय को सुरक्षा मिलती, लेकिन अगले अल्पसंख्यक समुदाय को नजरअंदाज कर दिया जाता. इतिहासकार इस बात पर बहस करते रहेंगे कि इस योजना को किसने नाकाम किया. लेकिन इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि रैडक्लिफ लाइन सिखों के गढ़ के बीच से होकर गुजरी थी.

अलग चुनावी सीटों के मामले में भी ऐसा नहीं था कि उन्हें बस “नकार दिया गया”. मई 1949 में सरदार पटेल की अध्यक्षता वाली संविधान सभा की अल्पसंख्यक समिति ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था छोड़ने का फैसला किया था. बेगम एजाज रसूल जैसी मुस्लिम सदस्य भी इस बदलाव के पक्ष में थीं.

मैंने 1992 से 1996 तक अमृतसर में काम किया. उस समय पंजाब एक ऐसे दशक की कीमत चुका रहा था, जिसमें लोगों की जायज शिकायतों को एक अलग पहचान और अलग भविष्य की मांग में बदल दिया गया था. सिखों ने वोट, रेजिमेंट, खेती और कारोबार के जरिए फिर से अपना स्थान हासिल किया.

भारतीय मुसलमानों को संविधान के तहत ऐसी गारंटी मिली हुई है, जो पाकिस्तान ने अपने अल्पसंख्यकों को कभी नहीं दीं. इनमें अहमदिया समुदाय भी शामिल है. उन्हें अदालत में अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए और मतदान के जरिए प्रतिनिधित्व में अपना हिस्सा मांगना चाहिए.

केबीएस सिद्धू एक पूर्व IAS अधिकारी हैं जो पंजाब के स्पेशल चीफ सेक्रेटरी के पद से रिटायर हुए हैं. वे @kbssidhu1961 पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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