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Sunday, 11 October, 2026
होममत-विमतजिन्ना, इकबाल और बंटवारा—शरजील इमाम की राजनीति आज भी अतीत में फंसी हुई है

जिन्ना, इकबाल और बंटवारा—शरजील इमाम की राजनीति आज भी अतीत में फंसी हुई है

मुस्लिमों के अधिकार और मुस्लिमों की राजनीतिक ताकत एक जैसी नहीं हैं. शरजील इमाम इन दोनों के बीच का अंतर मिटा देते हैं.

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यह एक विरोधाभास है, जिसने मुझे हमेशा हैरान किया है कि वामपंथी सोच रखने वाले लोग मुस्लिमों की दक्षिणपंथी राजनीति के लिए इतनी आसानी से अपने दरवाजे कैसे खोल देते हैं. द क्विंट में शरजील इमाम का इंटरव्यू पढ़ते हुए मेरे मन में एक बार फिर यही सवाल आया. जब दो राजनीतिक ताकतों की सोच एक-दूसरे से बिल्कुल अलग दिखाई देती है, तो फिर वे एक जैसी बातों पर सहमत कैसे हो जाती हैं?

लेख पढ़ते समय मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इस पर कुछ लिखना भी चाहिए या नहीं, लेकिन लेख पूरा पढ़ने के बाद, खासकर जिस तरह इमाम खुद को मुस्लिम समुदाय की आवाज़ के रूप में पेश करते दिखाई दिए, मुझे लगा कि मुझे इस पर कुछ लिखना चाहिए.

एक भारतीय मुस्लिम के तौर पर, 21वीं सदी में इस तरह की बातें पढ़कर मैं सोचने लगता हूं कि क्या हमारी मुस्लिम बौद्धिक बहस में पेश करने के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं है?

ये विचार मोहम्मद अली जिन्ना और मुहम्मद इकबाल के पुराने विचारों को दोबारा पेश करने जैसे लगते हैं. ऐसा उस समय हो रहा है, जब अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों वाले समाजों और साझा जगहों ने हमें यह दिखाया है कि धार्मिक पहचान से आगे भी कई संभावनाएं हैं. जब दुनिया के कई हिस्से पहचान की राजनीति की सीमाओं से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, तो हमारे कुछ बुद्धिजीवी अब भी धार्मिक पहचान और राजनीति में अपनी जगह जैसे पुराने सवालों पर क्यों लौट रहे हैं?

मैं इमाम की इस आलोचना को समझ सकती हूं कि सत्ता का बहुत ज्यादा केंद्रीकरण नहीं होना चाहिए. मैं इस चिंता को भी समझ सकती हूं कि मुस्लिमों को उनका उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता. इसी तरह, आनुपातिक प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यकों को संविधान के तहत सुरक्षा देने की उनकी दलीलों को भी समझ सकता हूं. इन सभी मुद्दों पर चर्चा करना सही है और मुझे इन्हें उठाने में कोई गलत बात नहीं लगती.

लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आता कि इन चिंताओं के कारण हमें इस विचार पर वापस लौटने की जरूरत क्यों है कि भारतीय राजनीति मुख्य रूप से अलग-अलग धार्मिक समुदायों के बीच संघर्ष है, जहां हर समुदाय सत्ता में अपना हिस्सा हासिल करने की कोशिश कर रहा है.

बेशक, अल्पसंख्यकों को संविधान के तहत सुरक्षा की जरूरत है. लेकिन धर्म, जाति या पहचान के कारण लोगों के साथ होने वाले भेदभाव से उन्हें बचाने और इन पहचानों को हमारी पूरी राजनीतिक व्यवस्था का केंद्र बना देने में अंतर है. इसी तरह, इन पहचानों के बारे में ऐसे बात करना भी अलग है, जैसे वे मोलभाव करने का कोई साधन हों.

अपनी ही कम्युनिटी की गलतियों को नजरअंदाज करना

सबसे पहले, उन्हें धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था और केंद्र में ज्यादा ताकत वाली सरकार से परेशानी है. उनका मानना है कि इन्हीं वजहों से अल्पसंख्यकों को उनके अधिकार नहीं मिलते. मैं उनके उस बयान का ज़िक्र करना चाहती हूं, जिसमें उन्होंने कहा कि इकबाल के शब्दों में, एक “सांप्रदायिक कुलीनतंत्र” के जरिए “ऊंची जाति के कुछ गिने-चुने लोग बहुसंख्यक समुदाय के नाम पर पूरे दक्षिण एशिया पर शासन कर सकते थे.”

तो अगर उनके मुताबिक, हमारा मौजूदा लोकतंत्र एक सांप्रदायिक कुलीनतंत्र है, तो उनके हिसाब से इसका बेहतर विकल्प क्या है?

उनके साथ न्याय करते हुए कहें, तो वह विकल्प भी सुझाते हैं. वह राष्ट्रवाद को खारिज करते हैं और उसकी जगह संविधान पर आधारित गणतंत्र की बात करते हैं, जिसमें सत्ता का विकेंद्रीकरण ज्यादा हो और समुदायों को अधिकार मिले. यह तो वामपंथ की जानी-पहचानी दलील लगती है.

लेकिन इसके बाद इमाम पारंपरिक मार्क्सवादी या वामपंथी धर्मनिरपेक्षता को भी खारिज कर देते हैं. वह इसे “धर्मनिरपेक्ष बहुसंख्यकवाद” कहते हैं. उनके लिए, समुदाय के अधिकारों का मतलब ऐसा लगता है कि भारतीय मुस्लिमों की अपनी अलग धार्मिक और राजनीतिक पहचान होनी चाहिए, न कि वे एक बड़े धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दायरे का हिस्सा बनें.

इस तरह, वह सत्ता के विकेंद्रीकरण और संवैधानिक अधिकारों की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि इसका मकसद धार्मिक पहचान की राजनीति से आगे बढ़ना हो. इसके बजाय, मुझे ऐसा लगता है कि वह मुस्लिम पहचान के आधार पर एक अलग और ज्यादा स्वतंत्र राजनीतिक जगह चाहते हैं.

मेरे लिए इसमें कुछ खास हैरानी की बात नहीं है. समुदाय के बीच बड़े होते हुए मैंने इस तरह की दलीलें कई बार सुनी हैं. समुदाय के अधिकारों की मांग करने के लिए संविधान, उदारवाद, मानवाधिकार और लोकतंत्र की भाषा का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन जब यही मूल्य समुदाय की अपनी धार्मिक या राजनीतिक सोच पर सवाल उठाते हैं, तो उन्हें स्वीकार करने की इच्छा बहुत कम दिखाई देती है.

इसमें कोई हैरानी नहीं कि वह बार-बार जिन्ना और इकबाल की बात करते हैं.

वह मुस्लिमों के अधिकारों की रक्षा के बारे में विस्तार से बात करते हैं, लेकिन मैं बार-बार सोचती हूं कि अधिकारों से उनका असल मतलब क्या है क्योंकि उनकी ज्यादातर दलीलें आखिरकार राजनीतिक ताकत और मुस्लिम समुदाय की मोलभाव करने की स्थिति पर आकर टिक जाती हैं. क्या यह उसी सांप्रदायिक कुलीनतंत्र का एक और रूप नहीं है, जिसकी वह आलोचना कर रहे हैं? क्या यह मुस्लिम अभिजात वर्ग (अशराफ) की मोलभाव करने की ताकत की बात है?

और जब वह कहते हैं कि जिन्ना और इकबाल की सोच सही थी, तो मैं सोचती हूं कि वह उतना ही समय यह पूछने में क्यों नहीं लगाते कि जब जिन्ना की राजनीतिक सोच के कारण वास्तव में एक अलग देश बना, तो उसके बाद क्या हुआ?

राजनीति को लेकर नकारात्मक सोच

क्या उस सोच ने मुस्लिमों के लिए एक निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और खूबसूरत दुनिया बनाई? पाकिस्तान का बंटा हुआ और खून-खराबे से भरा इतिहास, और उसके बाद भाषा और संस्कृति के आधार पर हुआ वह अत्याचार, जिसके कारण बांग्लादेश बना, इसका साफ जवाब देते हैं—नहीं. पाकिस्तान पर कब्जा करने वाले प्रवासी मुहाजिर और पंजाबी अभिजात वर्ग ने आखिरकार बंगाली मुस्लिमों, अहमदिया और शिया समुदाय के लोगों का उसी बेरहमी से शोषण किया और उन्हें हाशिये पर धकेला, जिस बेरहमी का आरोप इमाम आज नई दिल्ली पर लगाते हैं. जैसे ही धार्मिक पहचान को राज्य की पूरी ताकत मिल गई, “समुदाय के अधिकारों” का सपना खत्म हो गया. उसकी जगह एक नए और क्रूर आंतरिक बहुसंख्यकवाद ने ले ली.

इससे उनकी मुहिम के केंद्र में मौजूद बुनियादी बेईमानी सामने आती है. यह वास्तव में केंद्र में ज्यादा ताकत वाली सरकार के अत्याचार के खिलाफ कोई नेक और प्रगतिशील लड़ाई नहीं है. यह राजनीतिक वर्चस्व हासिल करने की खुली और सीधी लड़ाई है. जब इमाम “अधिकारों” की मांग करते हैं, तो उनका मतलब मानवाधिकारों या नागरिक स्वतंत्रता से नहीं है. वह इन मूल्यों को खुले तौर पर धर्मनिरपेक्षता के जाल का हिस्सा बताकर खारिज करते हैं. उनका मतलब राजनीतिक व्यवस्था में ठोस और बुनियादी ताकत से है.

आखिरकार, इमाम राज्य की अत्याचारी व्यवस्था को खत्म नहीं करना चाहते. वह सिर्फ यह जानना चाहते हैं कि उस व्यवस्था को चलाने की ताकत उनके अभिजात वर्ग के हाथ में क्यों नहीं है. उन्हें सिद्धांत के तौर पर सांप्रदायिक कुलीनतंत्र से आपत्ति नहीं है. उनकी नाराजगी सिर्फ इस बात से है कि मौजूदा सांप्रदायिक कुलीनतंत्र उनके समुदाय के पक्ष में नहीं है.

पूरा लेख सांप्रदायिक विचारों से भरा हुआ है और मैं सोचती हूं कि क्या उन्हें सच में इनमें कोई समस्या नज़र नहीं आती. वह दूसरे वंचित समुदायों की भी बात करते हैं, लेकिन वहां भी ऐसा लगता है कि वे समुदाय राजनीतिक ताकत के ढांचे में इस्तेमाल होने वाले समूह भर हैं, न कि बराबर के अधिकारों और सम्मान वाले हमारे साथी इंसान.

वह कहते हैं कि पहली बार सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार के जीतने वाली चुनाव व्यवस्था में मुस्लिमों को बीजेपी का सहायक नहीं बनना चाहिए. इसलिए वह सुझाव देते हैं कि मुस्लिम राजनीतिक समूहों को मुख्य रूप से उन्हीं निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ना चाहिए, जहां मुस्लिम आबादी 40-50 प्रतिशत या उससे ज्यादा है, या जहां बीजेपी खुद चुनाव नहीं लड़ रही है, भले ही उसका कोई सहयोगी दल चुनाव लड़ रहा हो.

इसके बाद वह कहते हैं कि जिन सीटों पर बीजेपी को ज्यादा वोट मिलते हैं और मुस्लिम अपने दम पर चुनाव नहीं जीत सकते, वहां मुस्लिमों को बीजेपी विरोधी धर्मनिरपेक्ष या क्षेत्रीय दल का समर्थन करना चाहिए.

यह राजनीति को लेकर नकारात्मक सोच का हैरान कर देने वाला उदाहरण है. वह जरूरत पड़ने पर अपनी सुरक्षा के लिए धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र का फायदा उठाना चाहते हैं, लेकिन जैसे ही उनके समुदाय को संख्या के आधार पर बहुमत मिलता है, धर्मनिरपेक्षता को छोड़कर सिर्फ मुस्लिमों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात करने लगते हैं.

मेरी समझ से उनकी दलील में समस्या सांप्रदायिक राजनीति नहीं है. समस्या यह लगती है कि मौजूदा व्यवस्था मुस्लिम समुदाय को वह राजनीतिक ताकत नहीं देती, जिसे इमाम उसके लिए जरूरी मानते हैं.

और मैं इससे आगे जाकर एक बात कहना चाहूंगी. मुझे लगता है कि ऐसी दलील असल में मुस्लिम समुदाय का अपमान करती है. मुस्लिमों से यह उम्मीद क्यों की जानी चाहिए कि वे अपनी दूसरी चिंताओं को छोड़कर मुख्य रूप से मुस्लिम होने के नाते वोट दें, न कि आम नागरिकों की तरह? कोई मुस्लिम ऐसे उम्मीदवार को वोट क्यों न दे, जो उसके इलाके की समस्याएं सुलझा सके, शिक्षा बेहतर बना सके, रोजगार दे सके, सुरक्षा सुनिश्चित कर सके या बस उसका बेहतर तरीके से प्रतिनिधित्व कर सके?

और मुस्लिमों से यह उम्मीद क्यों नहीं की जानी चाहिए कि वे भी न्याय, निष्पक्षता और सभी के लिए समान अधिकारों पर आधारित राजनीति करें? इन मूल्यों का महत्व सिर्फ तभी क्यों होना चाहिए, जब हम अपने ही समुदाय की सुरक्षा के लिए उनकी मांग कर रहे हों?

तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि शरजील इमाम अपने सामने मौजूद आईने में खुद को देख ही नहीं पा रहे हैं. बहुसंख्यकवाद को अपना दुश्मन मानने की धुन में उन्होंने उसकी सोच को पूरी तरह अपना लिया है. वह उन्हीं ताकतों की हूबहू तस्वीर बन गए हैं, जिनके खिलाफ लड़ने का दावा करते हैं. वह भी उसी तरह अलगाव, अपने समूह को दूसरों से ऊपर रखने और लोकतंत्र का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की दलील दे रहे हैं.

आखिरकार, इमाम एक ऐसी अंधेरी दुनिया में काम करते दिखाई देते हैं, जहां हर चीज को फायदे और नुकसान के हिसाब से देखा जाता है और नैतिकता की कोई जगह नहीं है. वहां सिर्फ राजनीतिक ताकत और अपने फायदे के लिए उसका इस्तेमाल करना मायने रखता है. इस सोच के मुताबिक, हर इंसान को सिर्फ इंसान होने के नाते न्याय मिलना चाहिए, ऐसा नहीं है. इसके बजाय, न्याय ऐसी चीज बन जाता है, जिसके लिए किसी समुदाय को मोलभाव करना पड़ता है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह कितनी राजनीतिक ताकत जुटा सकता है. लेकिन इंटरव्यू में सबसे खास बात इतिहास को नए तरीके से पेश करना है. वह बंटवारे के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हैं और इसे ऐसी घटना के रूप में दिखाते हैं, जिसे मुस्लिमों पर थोपा गया था.

यह ऐसा दावा है, जिस पर अपने आप में एक पूरा लेख लिखा जा सकता है. लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि वह भारत में मुस्लिम राजनीति के इतिहास को किस तरह समझते हैं.

इमाम के मुताबिक, मुस्लिम समुदाय और खास तौर पर उसके सामंती और सांप्रदायिक अभिजात वर्ग की ऐतिहासिक जिम्मेदारी बिल्कुल भी नहीं है. सड़कों पर आक्रामक ताकत का इस्तेमाल करना, लोकतांत्रिक सहमति को खारिज करना और चुनिंदा अभिजात वर्ग के विशेषाधिकारों को बचाने के लिए गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा करने की धमकी देना—उनकी नज़र में यह सब पूरी तरह जायज है. इस उलटी-पुलटी कहानी में बंटवारे की त्रासदी इसलिए नहीं हुई कि सांप्रदायिक अभिजात वर्ग ने उपमहाद्वीप को बांटने का फैसला किया था. बल्कि, ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस सरकार ने उनके सामने झुकने से इनकार कर दिया था.

आमना बेगम अंसारी एक कॉलमिस्ट, राइटर और टीवी न्यूज़ पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय अमाना एंड खालिद’ नाम का एक वीकली यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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