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Sunday, 11 October, 2026
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भारत के आपराधिक कानूनों में फेशियल रिकग्निशन का जिक्र नहीं, इन 3 संशोधनों से दूर होगी कमी

कानून में यह नहीं बताया गया है कि क्या फेशियल रिकग्निशन मैच को भरोसेमंद जानकारी माना जाएगा. जो अधिकारी इसके आधार पर कार्रवाई करता है, वह एक तरह से अस्पष्ट स्थिति में काम कर रहा होता है.

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जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने चेहरे पहचानने वाली तकनीक यानी फेशियल रिकग्निशन का इस्तेमाल किया. अगस्त में पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस सिस्टम ने भीड़ में ऐसे 2,873 लोगों की पहचान की, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड था. इसके बाद दिप्रिंट ने पुलिस सूत्रों और जेल के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बताया कि इनमें से 22 लोग विरोध प्रदर्शन के दौरान जेल में बंद थे. सूत्रों ने कहा कि इनमें से कुछ लोग पैरोल या फरलो पर बाहर हो सकते थे, इसलिए इस आंकड़े की जांच करना जरूरी है.

यह घटना कानून में मौजूद एक कमी की ओर इशारा करती है. भारत की तीन नई आपराधिक संहिताएं एक आसान विचार पर आधारित हैं: किसी सबूत पर भरोसा करने से पहले यह दर्ज होना चाहिए कि उसे कैसे जुटाया गया. लेकिन यही कानून उस सॉफ्टवेयर के बारे में कुछ नहीं कहते, जो अब पुलिस को यह तय करने में मदद करता है कि किसकी तलाश करनी है. यह लेख इसी कमी को समझाता है और इसे दूर करने के लिए तीन संशोधनों का सुझाव देता है.

कानून सबूत मांगते हैं

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत पुलिस को हर तलाशी और जब्ती की वीडियो रिकॉर्डिंग करनी होती है और यह रिकॉर्डिंग मजिस्ट्रेट को भेजनी होती है (धारा 105). गंभीर मामलों में फॉरेंसिक विशेषज्ञ को अपराध वाली जगह पर जाना जरूरी है और इस दौरे की वीडियो रिकॉर्डिंग भी करनी होती है (धारा 176(3)). भारतीय न्याय संहिता (BNS) पहले से ही इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को दस्तावेज मानती है (धारा 2(8)).

भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) यह तय करता है कि अदालतें किस चीज को सबूत के रूप में स्वीकार करेंगी. इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के लिए धारा 63(4) के तहत एक प्रमाणपत्र जरूरी है. रिकॉर्ड पेश करने वाला व्यक्ति इसका भाग A भरता है. एक विशेषज्ञ भाग B पर हस्ताक्षर करता है, जिसमें फाइल की हैश वैल्यू भी शामिल होती है. हैश वैल्यू एक डिजिटल फिंगरप्रिंट की तरह होती है. अगर किसी वीडियो में सिर्फ एक पिक्सल भी बदल दिया जाए, तो उसका डिजिटल फिंगरप्रिंट बदल जाता है. मई में सुप्रीम कोर्ट ने पुणे बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ मामले में इस व्यवस्था में बदलाव करने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक के कारण यह साबित करना और मुश्किल हो गया है कि कोई रिकॉर्ड असली है.

यह व्यवस्था पुलिस और आरोपी, दोनों की रक्षा करती है, क्योंकि अगर कोई पुलिस अधिकारी यह बता सकता है कि कोई रिकॉर्ड कहां से आया है, तो मुकदमे की सुनवाई शुरू होने से पहले ही उसकी आधी दलील मजबूत हो जाती है.

पहचान से जुड़े कानून में चेहरों का जिक्र नहीं

फ़ेशियल रिकग्निशन के लिए चेहरों का एक डेटाबेस जरूरी होता है. ‘क्रिमिनल प्रोसीजर (आइडेंटिफिकेशन) एक्ट, 2022 पुलिस को ऐसा डेटाबेस बनाने की अनुमति देता है. इसके तहत पुलिस अपराध में दोषी ठहराए गए लोगों और किसी अपराध के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए लोगों से उनकी “माप” या शारीरिक पहचान से जुड़ी जानकारी ले सकती है. इस जानकारी में तस्वीरें और आंखों की पुतली के स्कैन भी शामिल हैं (धारा 2(1)(b)). लेकिन इस कानून में चेहरे पहचानने वाली तकनीक का कहीं जिक्र नहीं है.

यह कानून राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) को इन रिकॉर्ड को अपराध से जुड़े रिकॉर्ड के साथ “प्रोसेस” करने और उन्हें किसी भी कानून लागू करने वाली एजेंसी के साथ साझा करने का निर्देश भी देता है (धारा 4(1)). अगर चेहरे पहचानने वाली तकनीक के इस्तेमाल को कानूनी आधार मिलता है, तो वह इसी एक ऐसे शब्द के अंदर आता है, जिसकी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है. सरकार धारा 8 के तहत जो नियम बना सकती है, उनमें यह नहीं बताया गया है कि दो चेहरों के बीच कितनी समानता होने पर उन्हें एक माना जाएगा, सॉफ्टवेयर की जांच कैसे होगी, तलाशी के रिकॉर्ड रखे जाएंगे या नहीं, और जिन चेहरों का मिलान नहीं होता, उनका क्या किया जाएगा.

इसलिए हर पुलिस बल अपने हिसाब से इन सवालों के जवाब तय करता है. और क्योंकि यह कानून गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति पर लागू होता है, इसलिए डेटाबेस में ऐसे लोग भी शामिल हो सकते हैं जिन पर आरोप तो लगा था, लेकिन जिन्हें कभी दोषी नहीं ठहराया गया.

फ़ेशियल रिकग्निशन जांच का हिस्सा कैसे बनता है

BNSS की धारा 35 पुलिस अधिकारी को विश्वसनीय जानकारी या उचित संदेह के आधार पर बिना वारंट गिरफ्तार करने की अनुमति देती है, अगर उसे लगता है कि किसी व्यक्ति ने ऐसा अपराध किया है जिसमें पुलिस सीधे कार्रवाई कर सकती है. लेकिन कानून यह नहीं बताता कि चेहरे का मिलान विश्वसनीय जानकारी माना जा सकता है या नहीं. जो अधिकारी सिर्फ इस मिलान के आधार पर कार्रवाई करता है, वह कानून में मौजूद एक कमी के बीच काम कर रहा होता है.

2022 में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिले जवाबों से पता चला कि दिल्ली पुलिस 80 प्रतिशत से ज्यादा समानता वाले मिलान को सही मानती है. अगर समानता का स्कोर इससे कम होता है, तो पुलिस दूसरे सबूतों से उसकी पुष्टि करने की कोशिश करती है. अगस्त में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि चेहरे का मिलान होने के बाद अपने आप कोई कार्रवाई नहीं की जाती. ये सही सोच को दिखाते हैं, लेकिन इनकी जानकारी सिर्फ हलफनामों और RTI के जवाबों में मिलती है. पुलिस ने कभी यह सार्वजनिक नहीं किया कि इस तय सीमा पर उसका सिस्टम कितनी बार गलत नतीजे देता है. सिर्फ 80 प्रतिशत समानता का स्कोर होने से इस सवाल का जवाब नहीं मिलता.

अपराध की भविष्यवाणी करने वाले टूल भी यही समस्या पैदा करते हैं. धारा 170 पुलिस अधिकारी को किसी व्यक्ति को एहतियात के तौर पर गिरफ्तार करने की अनुमति देती है, जब अधिकारी को पता हो कि वह व्यक्ति ऐसा अपराध करने की योजना बना रहा है जिसमें पुलिस सीधे कार्रवाई कर सकती है. लेकिन अगर कोई सिस्टम यह अनुमान लगाता है कि किसी खास सड़क पर अपराध होने की संभावना है, तो इससे अधिकारी को किसी व्यक्ति के बारे में ऐसी जानकारी नहीं मिल जाती.

यह कानूनी कमी जांचकर्ताओं के लिए भी परेशानी पैदा करती है, जब मामला अदालत में पहुंचता है. धारा 230 के तहत आरोपी को पुलिस की रिपोर्ट और उसके साथ अदालत में भेजे गए दस्तावेज पाने का अधिकार है. अगर किसी सॉफ्टवेयर से मिली जानकारी के कारण पुलिस ने सबसे पहले आरोपी की तलाश शुरू की थी, तो वह जानकारी एक ऐसा दस्तावेज है जिस पर कोई भरोसा नहीं करता. इसलिए वह आरोपी तक पहुंचती ही नहीं और पहली बार जिरह के दौरान सामने आती है.

जब कोई सिपाही किसी घर की तलाशी लेता है, तो उसे उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग करनी होती है. यह रिकॉर्डिंग उसकी भी रक्षा करती है. डेटाबेस में की गई तलाशी को भी ऐसी ही सुरक्षा मिलनी चाहिए.

प्रमाणपत्र में मशीन की गलती पकड़ने की व्यवस्था नहीं

धारा 63 वह आखिरी मौका है, जहां सिस्टम किसी एल्गोरिदम की गलती पकड़ सकता है. लेकिन एल्गोरिदम इस व्यवस्था से दो बार बच निकलता है.

पहला कारण है समय. प्रमाणपत्र की जरूरत तभी होती है, जब कोई इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड अदालत में सबूत के तौर पर पेश करता है. चेहरे का मिलान सिर्फ एक सुराग होता है. इसके आधार पर पुलिस अधिकारी किसी के घर तक पहुंचते हैं, और फिर मुकदमा वीडियो फुटेज या किसी गवाह के बयान पर आधारित होता है. चेहरे के मिलान को खुद सबूत के रूप में पेश ही नहीं किया जाता, इसलिए उसका प्रमाणपत्र भी नहीं बनता. यह व्यवस्था तब तक चलती रहती है, जब तक बचाव पक्ष का वकील यह नहीं पूछता कि पुलिस उस घर तक पहुंची कैसे.

दूसरा कारण और भी गहरा है. प्रमाणपत्र अदालत को बताता है कि डिवाइस सही तरीके से काम कर रहा था और रिकॉर्ड किए जाने के बाद फाइल में कोई बदलाव नहीं हुआ है. लेकिन यह नहीं बताता कि उस फाइल से निकाला गया नतीजा सही है या नहीं. अगर सॉफ्टवेयर किसी धुंधली तस्वीर में गलत चेहरे की पहचान कर लेता है, तो हैश वैल्यू फिर भी सही रहेगी और कागजी प्रक्रिया उस गलती को भी सही तरीके से प्रमाणित कर देगी.

विशेषज्ञ के हस्ताक्षर करने से यह समस्या दूर नहीं होती. धारा 39(2) के तहत इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की जांच करने वाला विशेषज्ञ यह बता सकता है कि कोई फाइल असली है या नहीं. लेकिन रात के समय ली गई धुंधली तस्वीर में चेहरे का मिलान करने वाला प्रोग्राम सही काम करता है या नहीं, यह विज्ञान से जुड़ा सवाल है, जिसका जिक्र धारा 39(1) में है. और कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो किसी को इस सवाल का जवाब देना जरूरी बनाता हो.

तीन संशोधन

पुलिस के पास इन तकनीकों के इस्तेमाल का एक मजबूत कारण है, क्योंकि इनकी मदद से घंटों की वीडियो फुटेज में से कुछ ही घंटों में एक संदिग्ध को खोजा जा सकता है. नीचे बताए गए संशोधन पुलिस के इस काम को सुरक्षित बनाएंगे. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में पुलिस पहले ही जो भरोसे दे चुकी है, उन्हें कानून का हिस्सा बनाया जाएगा.

पहचान अधिनियम में एक नई धारा 4A जोड़ी जानी चाहिए. इससे चेहरे का अपने आप मिलान करने वाली तकनीक का इस्तेमाल केवल सरकार द्वारा अधिकृत एजेंसियों के जरिए ही किया जा सकेगा. साथ ही, हर तलाशी का रिकॉर्ड रखना जरूरी होगा. इसमें इस्तेमाल की गई तस्वीर, जिस डेटाबेस में तलाश की गई, सॉफ्टवेयर का वर्जन, मिलान के लिए तय की गई सीमा और मिले हुए स्कोर की जानकारी दर्ज होगी. एक स्वतंत्र प्रयोगशाला इस्तेमाल की जा रही सीमा पर इस तकनीक की गलतियों की दर की जांच करेगी और इसे लागू करने से पहले इन आंकड़ों को सार्वजनिक करेगी. जिन चेहरों का मिलान नहीं होगा, उन्हें तुरंत डिलीट कर दिया जाएगा.

BNSS में धारा 35(1) के साथ एक स्पष्टीकरण और धारा 170 में एक अतिरिक्त प्रावधान जोड़ा जाना चाहिए. इनमें साफ कहा जाना चाहिए कि केवल किसी स्वचालित सिस्टम से मिला नतीजा धारा 35 के तहत जरूरी विश्वसनीय जानकारी या उचित संदेह का आधार नहीं बन सकता. इसी तरह, यह नतीजा धारा 170 के तहत जरूरी उस जानकारी का आधार भी नहीं बन सकता, जिससे पता चले कि कोई व्यक्ति अपराध करने की योजना बना रहा है. धारा 230 में यह भी जोड़ा जाना चाहिए कि आरोपी को सिस्टम से मिले हर उस नतीजे की जानकारी पाने का अधिकार होगा, जिसके आधार पर पुलिस उस तक पहुंची थी. ऐसा तब भी होगा, जब अभियोजन पक्ष उस नतीजे पर भरोसा न करे.

तीसरा बदलाव BSA में किया जाना चाहिए. धारा 63(4) के तहत दिए गए प्रमाणपत्र के फॉर्म में एक भाग C जोड़ा जाना चाहिए. यह उन सभी रिकॉर्ड के लिए होगा, जो किसी व्यक्ति की पहचान करने के लिए इस्तेमाल किए गए एल्गोरिदम के नतीजे पर आधारित हों. भाग C में सिस्टम और उसके वर्जन का नाम, मिलान की तय सीमा और स्कोर, इस्तेमाल किए गए डेटाबेस की जानकारी और जांच के जरिए पता लगाई गई गलतियों की दर शामिल होगी. बायोमेट्रिक जांच में योग्य एक विशेषज्ञ धारा 39(1) के तहत इस पर हस्ताक्षर करेगा. अगर अभियोजन पक्ष भाग C के साथ अदालत में आता है, तो मुकदमे के दौरान उसे कुछ भी नुकसान नहीं होगा और उसे ऐसी पहचान मिलेगी, जिस पर अदालत भरोसा कर सकती है.

अदालतें ऐसे गवाह पर भरोसा नहीं करतीं, जिससे जिरह करके सवाल नहीं पूछे जा सकते. एल्गोरिदम के नतीजे उस पुलिस अधिकारी के जरिए सामने आते हैं, जो उन्हें दूसरों तक पहुंचाता है. ऐसे में उस अधिकारी को एक ऐसे मॉडल के बारे में जवाब देना पड़ता है, जिसे उसने खुद नहीं बनाया है. इन नई संहिताओं ने पुलिस को हर चीज का रिकॉर्ड रखना सिखाया है. अगला संशोधन ऐसा होना चाहिए, जिससे पुलिस मशीन ने क्या कहा और उसे अपने नतीजे पर कितना भरोसा था, यह भी दर्ज कर सके.

प्रणव जैन एक IPS (P) ऑफिसर और कॉलमिस्ट हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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