गुजरातियों के दबदबे की चाहे जितनी बात हो, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए उत्तर प्रदेश से ज्यादा अहम कोई और राज्य नहीं है और BJP के लिए यूपी से ज्यादा अहम कोई विधानसभा चुनाव नहीं है.
BJP के पिछले बड़े कदम पीछे खींचने के मामले को देखिए. यह नवंबर 2021 में हुआ था, यानी करीब पांच साल पहले. तब सरकार आखिरकार उन विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग के आगे झुक गई थी, जिन्हें उसने एक साल से ज्यादा समय पहले पास किया था. कानून पास होने और उन्हें वापस लेने के बीच पूरे एक साल तक सरकार ने आक्रामक किसानों की ओर से शुरू किए गए आंदोलन के आगे झुकने से इनकार किया था.
इसके बाद, जब यूपी चुनाव करीब आने लगे, तो उसने राज्य के नेताओं की यह सलाह मानी कि इन कानूनों को बड़ा चुनावी मुद्दा बनने से पहले ही खत्म कर देना बेहतर होगा.
हर तरफ से मिली जानकारी के मुताबिक, मोदी प्रदर्शनकारियों के सामने झुकने और अपनी मजबूत नेता वाली छवि को नुकसान पहुंचाने से खुश नहीं थे, लेकिन यूपी हारने की संभावना उन्हें इससे भी ज्यादा परेशान कर रही थी.
बाद में BJP के रणनीतिकारों ने कहा कि पीछे हटना एक गलती थी. कृषि कानून उतना बड़ा मुद्दा नहीं थे, जितना दिल्ली के रणनीतिकारों को बताया गया था और BJP ने यूपी में आसानी से जीत हासिल कर ली.
लेकिन यूपी को लेकर यह जुनून वहीं खत्म नहीं हुआ और इसकी वजह भी है. पिछले लोकसभा चुनाव में जब BJP ने अपनी बहुमत की स्थिति खो दी थी, तो इस नुकसान की सबसे बड़ी वजह यूपी था. राज्य में BJP की सीटें 62 से घटकर 33 रह गई थीं. उसका वोट शेयर भी करीब 50 प्रतिशत से गिरकर 41 प्रतिशत रह गया था. यहां तक कि वाराणसी में मोदी की अपनी जीत का अंतर भी काफी कम हो गया था.
हालांकि, BJP ने सहयोगी दलों की मदद से केंद्र में सरकार बना ली, लेकिन यूपी में हुए नुकसान से वह अब तक पूरी तरह उबर नहीं पाई है. कभी BJP यूपी को अपना राजनीतिक गढ़ मानती थी. इस साल, जब राज्य में चुनाव होने में सिर्फ कुछ महीने बचे हैं, वह एक और चुनावी झटका नहीं झेल सकती. यही वजह है कि यूपी को लेकर इतना जुनून है.
मोदी ज्ञानेश कुमार को क्यों नहीं हटाएंगे?
कृषि कानूनों जैसा कोई मुद्दा बहस पर हावी नहीं है, जिसे संभाला जा सके और कुछ आंतरिक सर्वे बता रहे हैं कि यूपी विधानसभा चुनाव में मुकाबला कड़ा होगा. ऐसे में BJP को जितनी भी मदद मिल सकती है, उसे उसकी जरूरत है. क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की चुनाव में भूमिका वह X फैक्टर हो सकती है, जो यूपी में BJP की जीत का कारण बने?
खैर, शायद यही वजह बता सकती है कि सरकार उन्हें पद पर बनाए रखने के लिए क्यों इतनी दृढ़ है. आखिरकार, CEC के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन से पैदा हुआ हंगामा और इस आंदोलन से सरकार की छवि को लगातार हो रहा नुकसान एक झटके में खत्म किया जा सकता है. मोदी को बस इतना करना है कि कुमार को राज्यपाल या राजदूत जैसी सम्मानजनक नौकरी की पेशकश करके इस्तीफा देने के लिए तैयार कर दें. ऐसा होते ही सब कुछ सामान्य हो जाएगा.
तो फिर मोदी ऐसा क्यों नहीं करते?
क्योंकि यूपी के लिए उन्हें कुमार की ज़रूरत है?
यही एक ऐसी वजह है जो समझ में आती है. आखिर सरकार नई पीढ़ी के मतदाताओं को नाराज करने के लिए क्यों तैयार है? वह शनिवार को दिल्ली में किए गए सुरक्षा इंतजामों की तरह दिल्ली को किले में क्यों बदलना चाहती है? वह मेट्रो और ट्रेनों को पूरी तरह बंद नहीं करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना करने को क्यों तैयार है? वह वकीलों को हिरासत में लेकर उन्हें नाराज करने को क्यों तैयार है? वह दिल्ली के बीचोंबीच एक छोटे से इलाके की सुरक्षा के लिए 30,000 से ज्यादा पुलिसकर्मियों और अर्धसैनिक बलों के जवानों को तैनात करके अपने डर और कमजोरी को स्वीकार करने को क्यों तैयार है? वह कुछ तानाशाही वाले देशों की तरह पुलिसकर्मियों को विमानों में भेजकर सरकार के विरोधियों को गिरफ्तार क्यों कर रही है?
और सबसे बड़ी बात: जो आंदोलन ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शुरू हुआ था, वह अब मोदी विरोधी आंदोलन बन गया है. प्रधानमंत्री कुमार के लिए इतना बड़ा जोखिम, जिसमें अपनी लोकप्रियता का जोखिम भी शामिल है, क्यों उठा रहे हैं? क्या इसकी वजह यह हो सकती है कि यूपी में हार उनके लिए इससे भी बड़ा झटका होगी?
अगर वास्तव में यही इरादा है, तो यूपी चुनाव को लेकर सरकार का जुनून उसे एक बड़ी सच्चाई देखने से रोक रहा हो सकता है. कुमार के नेतृत्व में कराया गया कोई भी चुनाव लोगों की नजर में अपनी वैधता की छाप नहीं छोड़ पाएगा. अगर मोदी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक और कार्यकाल भी जितवा देते हैं, तो इसकी कीमत उनकी अपनी व्यक्तिगत छवि और नैतिक अधिकार को चुकानी पड़ेगी. और पार्टी के अंदर योगी इस जीत का श्रेय खुद लेंगे. वह कहेंगे कि उन्होंने यह जीत केंद्र सरकार की अलोकप्रियता के बावजूद हासिल की.
मोदी की पसंद
हालांकि, इस आंदोलन का घोषित मकसद ज्ञानेश कुमार को पद से हटाना है, लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि प्रधानमंत्री मोदी जितनी देर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का फैसला टालेंगे, प्रदर्शनकारियों को उतना ही ज्यादा फायदा होगा. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को एक ऐसे दल के रूप में देखा जाता था, जो सिर्फ एक मुद्दे पर काम करता है. जब सरकार ने उसकी मांग मानकर धर्मेंद्र प्रधान को बर्खास्त कर दिया, तो ऐसा लगा कि CJP ने अपना मकसद हासिल कर लिया है. CJP के नेताओं ने दो केंद्रीय मंत्रियों के साथ सौहार्दपूर्ण बैठक की और प्रदर्शनकारियों से घर लौटने की अपील की.
इसके बाद यह मामला खत्म हो जाना चाहिए था. लेकिन कुमार को हटाने की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन ने इसे एक नई जान दे दी है. शनिवार को सरकार ने जिस तरह से ताकत दिखाई, उससे CJP के समर्थकों को पता चला कि सरकार उसके एक और आंदोलन से कितनी डरी हुई है. अगर मोदी CJP के जाल में फंसते हैं और कुमार को हटाने का फैसला लगातार टालते रहते हैं, तो उसके आंदोलन को और गति मिल सकती है. इससे मोदी विरोधी भावना भी बढ़ सकती है.
कांग्रेस के साथ भी ऐसा ही है. राहुल गांधी का अब तक का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा है, लेकिन कुमार के खिलाफ लोगों में बढ़ते गुस्से की वजह से वह संसद में विपक्षी दलों को एकजुट करने वाली ताकत बनकर उभरे हैं. मोदी उन्हें जितनी देर तक आंदोलन जारी रखने की वजह देंगे, गांधी के लिए उतना ही अच्छा होगा.
सच कहें तो मोदी के लिए सबसे अच्छी रणनीति यही होगी कि वह कहें कि उन्होंने जनता की आवाज सुनी है और कुमार को पद से हटा दें. BJP यूपी में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव जीत भी सकती है. यह जोखिम उठाना निश्चित रूप से फायदेमंद हो सकता है.
लेकिन ऐसा करने के लिए मोदी को यह समझना होगा कि जनता का मूड बदल चुका है. पुरानी धारणाएं अब खत्म हो चुकी हैं. सरकार अब सिर्फ एक ऐसे सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा करके, जो उसके प्रति नरम रुख रखता हो, और संसद के दोनों सदनों में सरकार के इशारे पर चलने वाले अधिकारियों के सहारे, अपनी मर्जी से सब कुछ नहीं कर सकती. प्रिंट मीडिया भी अब पहले के मुकाबले सरकार के आदेशों का ज्यादा विरोध कर रहा है. सोशल मीडिया पर होने वाली गाली-गलौज को अब कोई गंभीरता से नहीं लेता और न ही कोई व्हाट्सऐप पर भेजे जाने वाले संदेशों पर भरोसा करता है.
जैसे-जैसे जनता का मूड बदल रहा है, लोग भी उसके साथ बदल रहे हैं. यहां तक कि मोदी की अपनी सरकार और पार्टी में भी अब कम से कम लोग कुमार के समर्थन में बोलने को तैयार हैं. ऐसा करने वालों में किरेन रिजिजू जैसे कम प्रभाव वाले नेता और रविशंकर प्रसाद जैसे ऐसे नेता शामिल हैं, जिनका राजनीतिक प्रभाव अब पहले जैसा नहीं रहा.
इस मामले का व्यावहारिक पहलू भी है. हां, आप दिल्ली को किले में बदल सकते हैं और एक-दो बार पुलिस से विपक्षी नेताओं के साथ धक्का-मुक्की करवा सकते हैं, लेकिन क्या हर बड़े प्रदर्शन के समय आप अर्धसैनिक बलों पर निर्भर रहेंगे? क्या इस तरह सरकार चलाई भी जा सकती है?
मोदी के पास अब भी प्रदर्शन खत्म कराने का मौका है, लेकिन उन्हें एक फैसला करना होगा: कुछ समय के लिए ताकत दिखानी है या लंबे समय तक स्थिरता बनाए रखनी है? कम से कम अब तक तो ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने इनमें से किसी एक रास्ते को चुनने का फैसला किया है.
वीर सांघवी एक प्रिंट और टेलीविज़न पत्रकार और टॉक शो होस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @virsanghvi है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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