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Sunday, 21 June, 2026
होममत-विमतसेना के चरित्र की रक्षा की जिम्मेदारी गुमराह युवा अफसर की नहीं, सेना के नेतृत्व की है

सेना के चरित्र की रक्षा की जिम्मेदारी गुमराह युवा अफसर की नहीं, सेना के नेतृत्व की है

सेना का उच्च नेतृत्व अगर निजी आस्था और संस्थागत पहचान में फर्क करता है, तो निचले स्तरों के कर्मचारी खुद तय करेंगे कि स्वीकार्य आचरण क्या है.

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भारतीय सेना के एक कैप्टन ने नासिक के ‘कंबैट आर्मी एविएशन ट्रेनिंग स्कूल में अपना कोर्स पूरा करने के बाद सेना के हेलिकॉप्टरों के सामने अपनी गर्लफ्रेंड को प्रपोज क्या किया, सोशल मीडिया पर भारी बहस छिड़ गई. कई लोगों को यह दिल को छू लेने वाला का निर्दोष क्षण लगा, तो कुछ लोगों को यह सेना के प्रतीकों और समारोह स्थल का बेजा निजी इस्तेमाल नजर आया और उन्होंने सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग कर डाली.

लेकिन दोनों पक्ष ने बड़े मसले की अनदेखी की.

विवाद मूलतः रोमांस के जोश को लेकर नहीं है. न ही यह एक युवा अफसर के चरित्र या इरादों से संबंधित मामला है. दरअसल, यह मामला एक ऐसे दौर में पहचान और आम धारणा को लेकर सैन्य मूल्यों से संबंधित है जिस दौर में सोशल मीडिया लोगों के आचरण को तय कर रहा है.

इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे यह असुविधाजनक सवाल पैदा हो रहा है कि सेना के अंदर सभी श्रेणियों में समान मानकों का पालन हो रहा है या नहीं और सेना का नेतृत्व करने वाले अधिकारी एक पेशेवर, धर्मनिरपेक्ष, और राजनीति–मुक्त सेना से अपेक्षित मिसाल कायम कर रहे हैं या नहीं.

कसौटी पर घटना

सेना की परंपराओं, वर्दी, रेजिमेंट के पताकों, परेड के मैदानों, समारोहों, सर्वधर्म स्थलों, वेपन सिस्टमों, साजोसामान को एक तरह से पवित्र माना जाता रहा है. उन्हें सेना में एकजुटता स्थापित करने के प्रतीकों के तौर पर लिया जाता है, जिसे युद्ध में सैनिक में जोश पैदा करने का सबसे जरूरी कारण बनता है. विंग्स समारोह केवल प्रशिक्षण पूरा करने पर किया जाने वाला आयोजन नहीं होता, यह एक कंबाइंड आर्म्स अफसर के एक कंबैट पाइलट में बदलने का अवसर होता है जब उसे 125-250 करोड़ के हेलिकॉप्टर उड़ाने के योग्य घोषित किया जाता है. इस दृष्टि से, सेना के प्रतीकों का निजी मकसद से इस्तेमाल करने और सेना की मर्यादाओं का उल्लंघन करने को लेकर चिंता उभरे तो यह समझ में आने वाली बात है.

लेकिन संदर्भ भी उतना ही अहम है. उस अफसर ने किसी ऑपरेशन की सुरक्षा के साथ समझौता नहीं किया. उसने कमांड की चेन की अवज्ञा नहीं की. उसने कोई राजनीतिक काम नहीं किया. न ही संस्था के प्रति किसी तरह के असम्मान का प्रदर्शन किया गया. ज्यादा-से-ज्यादा, इसे जवानी के जोश में असावधानी का प्रदर्शन माना जा सकता है.

पेशेवर सेनाएं बुरे आचरण, पेशेगत चूक और जवानी में उत्साह में की गईं गलती के बीच अंतर करती रही हैं. नासिक वाली घटना को जवानी में उत्साह में की गई गलती है. इसलिए सवाल यह नहीं है कि उस युवा अफसर को चेतावनी दी जाए या नहीं, बल्कि मुद्दा यह है कि जब सैन्य आचरण और सोशल मीडिया से संबंधित विस्तृत नियम लागू हैं उसके बाद भी इस तरह का आचरण क्यों होता है.

इसका जवाब उन शक्तिशाली मानवीय भावनाओं को समझने में निहित है, जिनका फायदा सोशल मीडिया उठाता है.

सीमाओं को विस्तार देते युवा अफसर

आक्रोश से यही जाहिर होता है कि पहले भी अफसरों को ऐसे आचरण के लिए माफ किया जाता रहा है. यह सच्चाई से बहुत दूर है. हर सेना में और हर पीढ़ी में युवा कैडेट, अफसर और सैनिक सीमाओं को विस्तार देने की कोशिश करते रहे हैं.

शस्त्रों से जुड़ा पेशा आत्मविश्वास, पहल, प्रतिस्पर्द्धा, और जोखिम उठाने के लिए तैयार करता रहा है. युद्ध लड़ने के लिए इस तरह के गुण अनिवार्य होते हैं. और शांति काल में भी ये दुस्साहसी, बिना किसी सावधानी के अक्सर हो जाया करती हैं. दुनियाभर में सेना के युवा अफसरों और सैनिकों से जुड़ी ऐसी कहानियां भरी पड़ी हैं जिनमें उनके जोशीले, रचनात्मक या अनावश्यक उत्साह के लिए सीनियरों की नाराजगी झेलनी पड़ी हैं.

आज फर्क यह आया है कि ये घटनाएं सामने आ रही हैं. पिछले दशकों में, ऐसी घटनाएं सेना की अकादमियों, अफसरों के मेसों, रेजीमेंटों या सेनाओं की दंतकथाओं में सीमित रहती थीं. आज हर स्मार्टफोन प्रसारण केंद्र बन गया है.

इसलिए, नासिक में जो प्रस्ताव किया गया वह एक अफसर के आचरण से ज्यादा उस पीढ़ी की हकीकतों को उजागर करता है, जो डिजिटल माहौल में जवान हुई है जहां अपेक्षा यह की जाती है कि जीवन की हर अहम घटना को शेयर, रेकॉर्ड और उसकी ऑनलाइन पुष्टि की जाए.

ऐसी स्थितियों से जरूरत से ज्यादा कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जगह मार्गदर्शन और परामर्श के जरिए ही निबटना बेहतर होता है.

मिलिटरी ट्रेनिंग का लक्ष्य रोबो तैयार करना नहीं होता, नेतृत्व देने वाला तैयार करना होता है. जो सेना व्यक्तिगत विशिष्टता के हर प्रदर्शन को दंडित करती है वह पहल की क्षमता और आत्मविश्वास को कुंठित करने का जोखिम उठाती है. इसके विपरीत जो सेना परंपरा के हर उल्लंघन की अनदेखी करती है वह पेशेवर मानदंडों के नष्ट होने का खतरा मोल लेती है. इसलिए, जवाब संतुलन बनाकर चलने में है. कहा यह जा रहा है कि सेना ने उस घटना पर कार्रवाई करते हुए उस अफसर को समझाने-बुझाने का काम किया.

सेना के मूल्य, सुरक्ष, और सोशल मीडिया

इंसान चाहता है कि उसे मान्यता मिले, वह किसी से जुड़े, कोई उपलब्धि हो, और वह खुद को अभिव्यक्त करे. सदियों तक ये जरूरतें परिवार, समुदाय, पेशा, और सामाजिक संस्थाओं के जरिए पूरी होती रहीं. सोशल मीडिया इन चारों जरूरतों को तुरंत पूरा करत है. मान्यता उस पर किए गए ‘लाइक्स’, कमेंट्स और फॉलोवरों के जरिए मिल जाती है. जुड़ाव ऑनलाइन संवादों के जरिए हो जाता है. उपलब्धियों का खुला जश्न मनाया जाता है. पहचान को जाहिर और मजबूत किया जाता है.

सेना वालों में ये भावनाएं ज्यादा प्रबल हो सकती हैं.

सेना श्रेणियों, अनुशासन, और सामूहिक पहचान पर खड़ी की गई ढांचे में ढली संस्था है. स्वार्थ से पहले सेवा को तरजीह देना उसकी प्रमुख नीति है. सोशल मीडिया इसका उलट है. वह गुमनामी की जगह प्रचार को, सामूहिकता की जगह व्यक्तिनिष्ठता को , और संस्थागत पहचान की जगह निजी छवि निर्माण को प्रोत्साहित करता है.

वर्षों से सैन्य मानदंडों का पालन कर रहे युवा अफसर या सैनिक ऐसे मंच की ओर स्वाभाविक रूप से काफी आकर्षित हो जाते हैं, जो व्यक्तिगत अभिव्यक्ति को पुरस्कृत करता है. यह विरोधाभास केवल भारत में नहीं उभरता. इस समस्या से जूझती सभी सेनाओं की तरह भारतीय सेना ने भी अपनी सोशल मीडिया नीति में कई बार फेरबदल किए हैं.

इतिहास बताता है कि सेना के अफसरों और सैनिकों को यही सिखाया जाता रहा है कि प्रतिष्ठा हासिल करनी पड़ती है, उसका प्रचार नहीं किया जाता; कि उपलब्धियां खुद बोलती हैं; कि संस्था को व्यक्ति हमेशा बड़ा माना जाना चाहिए. लेकिन सोशल मीडिया इस सबको उलट देता है. इसके परिणामस्वरूप सैन्य मूल्यों और डिजिटल संस्कृति के बीच अनिवार्य रूप से तनाव पैदा हो जाता है. भारतीय सेना इससे संघर्ष कर रही है.

सोशल मीडिया के कारण सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा को लेकर है. सेना के कर्मचारी या उनके मित्र इंटरनेट पर अनगिनत गुमनाम ऐसे पोस्ट और वीडियो डालते रहते हैं जो सुरक्षा संबंधी नियमों का उल्लंघन करते हैं. विदेशी एजेंटों द्वारा सेना के अफसरों और सैनिकों को ‘हनी ट्रेप’ (लुभावने जाल) में फंसाने के अनगिनत मामले होते रहते हैं.

मिसाल पेश करने में चूक रहे हैं बड़े अफसर

मिसाल पेश करके नेतृत्व करना सैन्य संस्कृति का आधार रहा है. सैनिक नियमों की पढ़ाई से ज्यादा, अपने नेताओं को देखकर सीखते हैं. यहां प्रासंगिक सवाल यह है कि क्या बड़े अफसर सोशल और मुख्यधारा के मीडिया से निबटने के मामले में उदाहरण पेश कर रहे हैं? मेरा आलकन है कि वे इसमें चूक रहे हैं.

हाल के वर्षों में, हम सेना के बड़े अधिकारियों के मंदिर दर्शन, स्वयंभू धर्मगुरुओं तक के यहां के दौरों, और धार्मिक अनुष्ठानों में शिरकत का व्यापक प्रचार देख चुके हैं. चित्रों के साथ ऐसी खबरों को अक्सर सरकारी या अर्द्धसरकारी माध्यमों से प्रसारित किया जाता है और सोशल समेत मुख्यधारा के मीडिया पर इन्हें जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर प्रसारित किया जाता है.

ये सब न केवल नियम-कायदों का उल्लंघन हैं बल्कि लोगों के बीच धारणाओं का निर्माण करते हैं. केवल धर्म ही चिंता का विषय नहीं है. चिंता का विषय यह है कि आज जब धर्म और राजनीतिक विमर्श का गहरा घालमेल किया जा रहा है, तब खतरा यह पैदा हो रहा है कि सेना जैसी संस्था की पहचान किसी धर्म विशेष की पहचान के साथ जुड़ सकती है— और वह भी कथित व्यक्तिगत लाभों की खातिर.

हर सैनिक और अधिकारी को अपनी व्यक्तिगत आस्था रखने का निर्विवाद अधिकार हासिल है. भारतीय सेना संस्थागत तटस्थता का पालन करते हुए सभी धर्मों का सम्मान करती रही है. लेकिन निजी आस्था के पालन, और धार्मिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन तथा सोशल मीडिया पर उसका लाभ उठाने में अंतर है.

इसी तरह, यह भी सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाता जा रहा है कि ऊंचे सेना अधिकारी सत्ता प्रतिष्ठान के प्रचारों से जुड़े राजनीतिक किस्म के बयान देने के अलावा राजनीतिक नेताओं के साथ खड़े दिखने लगे हैं. सेना पर सिविल शासन का नियंत्रण किसी भी लोकतंत्र के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता. सेना का नेतृत्व को निर्वाचित सरकार से संवाद तो करना ही चाहिए लेकिन पेशेगत सैन्य मानदंड सेना से स्पष्ट राजनीतिक तटस्थता की मांग करते हैं. सेना संविधान और राष्ट्र की सेवा के लिए है, किसी राजनीतिक दल या विचारधारा केंद्रित आंदोलन की सेवा के लिए नहीं.

भारतीय सेना को जनता का असाधारण सम्मान सिर्फ इसलिए मिलता रहा है कि वह हमेशा से धर्मनिरपेक्ष, अ-राजनीतिक, और राजनीतिक संघर्षों से पेशेगत रूप से अलगथलग रही है. यह प्रतिष्ठा एक राष्ट्रीय थाती है. इसे कमजोर करना कई धर्मों तथा विविध संस्कृतियों वाले बहुभाषी राष्ट्र की सेना के लिए भयानक परिणाम ला सकता है. सार्वजनिक दायरे में अब तक ऐसा कुछ नहीं किया गया है जो यह संकेत दे कि सेना  या सरकार ने इन भटकावों का कोई संज्ञान लिया हो या उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की है.

इसलिए, मुद्दा यह नहीं है कि किसी युवा कैप्टन ने असावधानी बरती. मुद्दा यह है कि क्या सेना वरिष्ठ नेतृत्व के आचरण की उतनी ही सख्ती से जांच करने को तैयार है, जो सैन्य मूल्यों के लिए ज्यादा खतरा पैदा कर सकते हैं. पहला मामला तो एक असावधान युवा अधिकारी द्वारा तहजीब के उल्लंघन का है, लेकिन दूसरा मामला एक संस्था के चरित्र के लिए ही चिंताजनक है. यह कहने की जरूरत नहीं है कि अगर उच्च तबका खुद को नहीं सुधारता, तो सरकार को हस्तक्षेप करना ही चाहिए.

आगे का रास्ता

समाधान सख्त नियम बनाना नहीं है. सेना में आचरण, मीडिया से संपर्क, और सोशल मीडिया के उपयोग से जुड़े व्यापक नियम पहले से मौजूद हैं. असली चुनौती सांस्कृतिक है. इससे निबटने के लिए शिक्षण, निगरानी, परामर्श, और अमल का मेल जरूरी है.

वैसे, उच्च नेतृत्व को मानना पड़ेगा कि उसका अपना आचरण संस्था के मानदंडों को स्वरूप प्रदान करता है. सेना की संस्कृति का निर्माण ऊपर से नीचे की ओर होता है. अगर उच्च नेतृत्व सार्वजनिकता को अपनाता है, निजी छवि को गढ़ता है, निजी आस्था और संस्थागत पहचान में फर्क करता है, तो निचले स्तरों   के कर्मचारी खुद तय करेंगे कि स्वीकार्य आचरण क्या है.

इसलिए, सैन्य मूल्यों के संरक्षण की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी शीर्ष नेतृत्व के कंधों पर है. नासिक में हेलिकॉप्टरों के बीच किए गए शादी के प्रस्ताव पर विवाद को तो लोग जल्दी ही भूल जाएंगे. इसके कारण जो बड़ा सवाल खड़ा हुआ उसे नहीं भूलना चाहिए. असली मुद्दा यह नहीं है कि एक युवा कैप्टन ने सीमा का उल्लंघन किया या नहीं, असली मुद्दा यह है कि क्या सेना सीमाओं के उल्लंघन के हर मामले की जांचकरने के लिए तैयार है, चाहे वह उल्लंघन किसी ने किया हो?

भारतीय सेना ने बड़ी मेहनत से अपनी जो छवि एक पेशेवर, धर्मनिरपेक्ष, और अ-राजनीतिक सेना की बनाई है उसे वह बचाए रखना चाहती है तो उसे एक नये रंगरूट सैनिक से लेकर सबसे वरिष्ठ जनरल तक के लिए कसौटी, संयम और निष्पक्षता के समान मानदंड अपनाने पड़ेंगे. सैन्य मूल्यों की रक्षा किसी युवा सैनिक के लिए अलग तरह के नियम लागू करके नहीं की जा सकती. इसकी रक्षा तभी हो सकती है जब हर दर्जे का नेतृत्व उन मूल्यों का पालन करेगा जिनकी रक्षा करने का वह दावा करता है.

लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग PVSM, AVSM (R) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वे नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड में GOC-in-C रहे. रिटायरमेंट के बाद, वे आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. वे @rwac48 पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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