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Monday, 13 July, 2026
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गुजरात के ‘ऑपरेशन म्यूल हंट’ की असली परीक्षा 55 गिरफ्तारियां नहीं, बल्कि बरामद हुआ पैसा है

राज्य सरकारों को लंबे समय तक काम करते हुए देखने के बाद मैं उनकी एक आदत अच्छी तरह जानता हूं—वे कार्रवाई के आंकड़े बढ़ाकर दिखाती हैं और उसी को सफलता मान लेती हैं. लेकिन अपराधी गिरोह अपना हिसाब किसी और तरीके से रखते हैं.

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55 गिरफ्तारियां, 802 करोड़ रुपये और 22 राज्य. गुजरात पुलिस के ऑपरेशन म्यूल हंट 2.0 ने खूब सुर्खियां बटोरीं हैं, लेकिन इन सुर्खियों में असली बात नहीं गिनी गई.

असल में यह देखना चाहिए कि म्यूल बैंक अकाउंट का इस्तेमाल साइबर ठगी से कमाए गए पैसे को इधर-उधर भेजने के लिए कैसे किया गया. आरोप है कि अहमदाबाद के एक व्यक्ति ने एक फर्ज़ी कंपनी रजिस्टर कराई, उसके नाम पर तीन बैंक खाते खुलवाए और फिर उन्हें साइबर ठगी करने वाले गिरोहों को दे दिया. पुलिस के मुताबिक, इन तीन खातों का संबंध 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज 253 साइबर अपराध मामलों से है, जिनमें 161 करोड़ रुपये से ज्यादा की ठगी हुई. यही आज के साइबर अपराध का असली गणित है. एक म्यूल बैंक अकाउंट पूरे भारत में किए गए अपराधों के पैसे संभाल सकता है. फोन पर ठगी करने वाला व्यक्ति किसी दूसरे देश में बैठा हो सकता है, लेकिन ठगी का पैसा आखिरकार भारत के किसी बैंक खाते में ही आता है. यही बैंक खाता उस अपराध का सबसे पक्का और स्थायी पता होता है.

यही वह बात है, जो इस मुद्दे पर होने वाली चर्चा में अक्सर छूट जाती है. जिसे हम साइबर फ्रॉड कहते हैं, वह असल में सिर्फ तकनीक की समस्या नहीं है. यह मनी लॉन्ड्रिंग (काले धन को छिपाने और इधर-उधर भेजने का खेल) है, जिसने सिर्फ तकनीक का मुखौटा पहन रखा है.

फोन कॉल, फर्जी गिरफ्तारी, नकली निवेश ऐप—ये सिर्फ लोगों से पैसे ठगने के तरीके हैं. इन्हें बार-बार बदला जा सकता है और पूरी तरह खत्म करना लगभग नामुमकिन है. असली खेल इसके पीछे चलता है. ठगी के पैसे को किराये पर लिए गए बैंक खातों में घुमाना, उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांटना और पीड़ित के हेल्पलाइन पर फोन करने से पहले ही उसे इतनी दूर पहुंचा देना कि उसे पकड़ना मुश्किल हो जाए.

कुछ दशक पहले तक इस तरह पैसे छिपाने का काम सिर्फ खास लोग करते थे—जैसे हवाला कारोबारी या फर्जी कंपनियों के अकाउंटेंट, लेकिन म्यूल बैंक अकाउंट ने यह काम आम लोगों तक पहुंचा दिया है. अब यह एक तरह का गिग वर्क बन गया है, जिसमें कोई भी व्यक्ति कुछ हजार रुपये के बदले अपने पहचान पत्र और बैंक खाते का इस्तेमाल करने देता है.

जब आप इस अपराध को इस नज़रिए से देखते हैं, तो 55 गिरफ्तारियों का आंकड़ा ज्यादा भरोसा नहीं दिलाता क्योंकि म्यूल अकाउंट देने वाला व्यक्ति इस पूरे नेटवर्क का सबसे सस्ता और सबसे आसानी से बदला जा सकने वाला हिस्सा होता है. वह सिर्फ किराये पर रखा गया आदमी होता है और कई बार उसे खुद भी नहीं पता होता कि उसके खाते से कितना और किस तरह का पैसा गुज़र रहा है. अगर पुलिस 55 लोगों को गिरफ्तार भी कर ले, तो अपराधी गिरोह हफ्ता खत्म होने से पहले ही 55 नए लोग ढूंढ़ सकता है क्योंकि कुछ हज़ार रुपये के बदले अपना बैंक खाता देने वाले लोगों की कमी नहीं है.

कोई भी पुलिस बल ऐसे लोगों की कभी खत्म न होने वाली संख्या को गिरफ्तार करके इस अपराध को नहीं रोक सकता, लेकिन वह इस पूरे सिस्टम की पैसों की आवाजाही को ज़रूर रोक सकता है.

सिर्फ गिरफ्तारियां मत गिनिए

इस साल फरवरी में गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय साइबर अपराध सम्मेलन में बताया था कि साइबर ठग करीब 20,000 करोड़ रुपये की ठगी कर चुके हैं. इनमें से 8,189 करोड़ रुपये या तो फ्रीज कर दिए गए या पीड़ितों को वापस लौटा दिए गए. मंत्रालय ने यह भी बताया कि नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर 82 लाख से ज्यादा शिकायतें दर्ज हुईं, लेकिन इनमें से सिर्फ करीब 1.84 लाख मामलों में ही एफआईआर दर्ज हुई.

अगर इन आंकड़ों को किसी जांच अधिकारी की तरह देखा जाए, तो एक अलग तस्वीर सामने आती है. शिकायतों और एफआईआर के बीच का इतना बड़ा अंतर बताता है कि आपराधिक न्याय व्यवस्था इस पूरी समस्या के सिर्फ करीब 2 प्रतिशत हिस्से तक ही पहुंच पा रही है. बरामद हुए पैसे का आंकड़ा भी एक दूसरी कहानी बताता है. यह दिखाता है कि असली ताकत कहां है—पैसे को बैंकिंग सिस्टम से बाहर जाने से पहले ही रोक देना. अगर ठगी का एक करोड़ रुपये शुरुआती कुछ घंटों में ही फ्रीज़ कर दिया जाए, तो उसकी अहमियत बाद में की गई दर्जनों गिरफ्तारियों से ज्यादा होती है क्योंकि साइबर ठग का धंधा तब बंद नहीं होता, जब उसका म्यूल अकाउंट देने वाला व्यक्ति जेल जाता है. उसका धंधा तब रुकता है, जब उसके पास पैसा पहुंचना बंद हो जाता है.

इसलिए ऑपरेशन म्यूल हंट की असली परीक्षा 55 गिरफ्तारियां नहीं हैं. बल्कि तीन मुश्किल सवाल हैं.

पहला, पुलिस के पहुंचने से पहले बैंकों ने इनमें से कितने बैंक खातों को संदिग्ध मानकर चिन्हित किया था? अगर जवाब एक भी नहीं है, तो फिर ऐसे बैंक, जो विदेश में 500 रुपये के संदिग्ध कार्ड ट्रांजैक्शन को पकड़ लेते हैं, वे एक फर्जी कंपनी के सिर्फ तीन खातों से गुज़र रहे 161 करोड़ रुपये को कैसे नहीं पकड़ पाए? दूसरा, फ्रीज किया गया पैसा पीड़ितों तक वापस पहुंचने में कितना समय लगता है? आज भी पीड़ितों को अपना पैसा वापस पाने के लिए मजिस्ट्रेट के पास आवेदन करना पड़ता है, जबकि सिस्टम कुछ ही दिनों में पैसे को फ्रीज़ कर देता है. यानी पैसा फ्रीज करने की प्रक्रिया डिजिटल रफ्तार से चलती है, लेकिन पैसा वापस करने की प्रक्रिया अदालत की फाइलों की रफ्तार से.

तीसरा, क्या जांच एजेंसियां सिर्फ म्यूल अकाउंट देने वालों तक सीमित हैं, या उन लोगों तक भी पहुंच रही हैं जो बड़ी संख्या में बैंक खाते खरीदकर गिरोहों को उपलब्ध कराते हैं? क्या उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत कार्रवाई हो रही है, जिसमें उनकी संपत्ति जब्त की जा सकती है? या फिर सिर्फ धोखाधड़ी की धाराएं लगाई जा रही हैं, जिनमें अक्सर जमानत मिल जाती है?

इसका एक ईमानदार जवाब भी हो सकता है. गिरफ्तारियां अपराध रोकने का डर पैदा करती हैं और कोई भी कानून लागू करने वाली एजेंसी यह संदेश नहीं दे सकती कि छोटे अपराधियों को छोड़ दिया जाएगा. यह बात सही है, लेकिन अपराध रोकने वाला डर सिर्फ दिखावे से नहीं आता.

वह इस बात से आता है कि अपराधियों को कितना यकीन हो कि वे पकड़े जाएंगे. आज म्यूल अकाउंट देने वाले लोगों को ज्यादा डर नहीं लगता, क्योंकि उन्हें लगता है कि पकड़े जाने का खतरा बहुत कम है.

असली डर कैसे पैदा होगा

तो फिर इसका हल क्या है?

अगर किराये पर बैंक खाता देने वाले हर व्यक्ति की कमाई जब्त कर ली जाए और उसके बैंक रिकॉर्ड पर हमेशा के लिए एक चेतावनी (फ्लैग) लगा दी जाए, तो बिना एक भी नई जेल बनाए ऐसे लोगों की संख्या अपने आप कम होने लगेगी. ऐसा लगता है कि गुजरात के साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने इस बात को समझ लिया है. ऑपरेशन म्यूल हंट की शुरुआत आरोपियों से नहीं, बल्कि म्यूल बैंक खातों की पहचान से हुई. यही सोच पूरे देश की नीति बननी चाहिए.

मैंने अपने पूरे करियर में देखा है कि जब किसी मुद्दे पर जनता में नाराजगी होती है, तो सरकार और एजेंसियों की पहली प्रतिक्रिया क्या होती है. वे कार्रवाई के आंकड़े बढ़ा देती हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस कर देती हैं और यह मान लेती हैं कि ज्यादा आंकड़े ही सफलता का सबूत हैं. ये आंकड़े लोगों को कुछ समय के लिए संतुष्ट जरूर कर देते हैं, लेकिन समस्या का समाधान नहीं करते. अपराधी गिरोह अपना हिसाब किसी और तरीके से रखते हैं. वे यह नहीं गिनते कि कितने लोग गिरफ्तार हुए. वे यह गिनते हैं कि कितना पैसा सुरक्षित उनके पास पहुंच गया.

जब तक हम भी वही नहीं गिनेंगे, जो वे गिनते हैं, तब तक हम प्रेस कॉन्फ्रेंस तो जीतते रहेंगे, लेकिन पैसों की इस पूरी चेन को रोकने में हारते रहेंगे.

इसलिए बंद किए गए बैंक खातों और पीड़ितों को वापस लौटाए गए पैसों की गिनती कीजिए. हथकड़ियां उसके बाद अपने आप आएंगी.

लेखक रिटायर्ड IPS अधिकारी और हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) हैं. उन्होंने भारत के मनी लॉन्ड्रिंग विरोधी नियम बनाने में मदद की थी और साइबर अपराध व संगठित अपराध से जुड़ी कई इकाइयों का नेतृत्व किया है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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