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Sunday, 12 July, 2026
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बिश्नोई का प्रत्यर्पण: भारत-अमेरिका संधि में क्या हैं नियम और किन कारणों से टल सकता है फैसला

लॉरेंस बिश्नोई के प्रत्यर्पण के लिए वॉशिंगटन की ओर से औपचारिक अनुरोध से भारत-अमेरिका प्रत्यर्पण संधि लागू हो जाएगी, लेकिन भारतीय कानून अधिकारियों को उसे सौंपने से पहले कई विकल्प देता है.

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नई दिल्ली: अमेरिकी न्याय विभाग (DoJ) ने पिछले हफ्ते तीन पंजाब से जुड़े अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध गिरोहों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल करने की घोषणा की. इन गिरोहों पर अमेरिका, कनाडा और यूरोप में आपराधिक गतिविधियां चलाने का आरोप है. इन गिरोहों का नेतृत्व लॉरेंस बिश्नोई, जग्गू भगवानपुरिया और रविंदर सिंह धांधा कर रहे हैं.

हालांकि, आरोपपत्र में सबसे प्रमुख नाम गुजरात की साबरमती सेंट्रल जेल में बंद लॉरेंस बिश्नोई और उसके सहयोगी गोल्डी बराड़ उर्फ सतिंदरजीत सिंह के हैं. आरोपपत्र में गोल्डी बराड़ को “बिश्नोई एंटरप्राइज का उत्तर अमेरिका प्रमुख” बताया गया है.

अमेरिकी न्याय विभाग ने मंगलवार को कहा, “अमेरिका, कनाडा और यूरोप की कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने भारत से संचालित तीन अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध गिरोहों से जुड़े 24 आरोपियों को गिरफ्तार किया है. इनमें से 11 कैलिफोर्निया में गिरफ्तार किए गए हैं. इन पर कई तरह के अपराधों के आरोप हैं, जिनमें 2023 में कनाडा में एक प्रमुख भारतीय राजनीतिक और धार्मिक नेता की हत्या भी शामिल है.”

इन आरोपों के बाद अमेरिका की ओर से लॉरेंस बिश्नोई के प्रत्यर्पण (Extradition) की औपचारिक मांग किए जाने की संभावना है. न्याय विभाग के एक अधिकारी ने कुछ मीडिया संस्थानों से पुष्टि की कि अमेरिका बिश्नोई के प्रत्यर्पण की मांग करेगा.

अमेरिका जब कूटनीतिक माध्यम से औपचारिक रूप से प्रत्यर्पण का अनुरोध करेगा, तब एक लंबी कानूनी प्रक्रिया शुरू होगी, जिसमें कई महीने या कई साल भी लग सकते हैं. इस प्रक्रिया में केंद्र सरकार मामला एक मजिस्ट्रेट के पास भेजेगी. मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट और अन्य पहलुओं पर विचार करने के बाद केंद्र सरकार प्रत्यर्पण पर फैसला ले सकती है. बिश्नोई को अदालत में इस आदेश को चुनौती देने का अधिकार भी होगा.

संबंधित संधि और कानून

भारत और अमेरिका के बीच 25 जून 1997 को हस्ताक्षरित द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि दोनों देशों के बीच गंभीर अपराधों के आरोपियों या दोषियों के प्रत्यर्पण को नियंत्रित करती है.

इस संधि के तहत दोनों देश एक-दूसरे को उन लोगों का प्रत्यर्पण करने पर सहमत हैं, जिन पर अनुरोध करने वाले देश की एजेंसियों ने औपचारिक रूप से आरोप लगाए हों, मुकदमा दर्ज किया हो या जिन्हें किसी प्रत्यर्पण योग्य अपराध में दोषी ठहराया गया हो.

यह मायने नहीं रखता कि अपराध संधि लागू होने से पहले हुआ था या बाद में.

लॉरेंस बिश्नोई कई वर्षों से अलग-अलग राज्यों में हत्या, हत्या की कोशिश, रंगदारी, आपराधिक साजिश, आर्म्स एक्ट के उल्लंघन और संगठित अपराध गिरोह चलाने जैसे कई मामलों में जेल में बंद है. फिलहाल वह गुजरात की साबरमती सेंट्रल जेल में बंद है.

उसका प्रत्यर्पण 1997 की इसी संधि के तहत होगा. संधि का अनुच्छेद 14 भारत को यह विकल्प देता है कि वह या तो बिश्नोई को अस्थायी रूप से अमेरिका को सौंप दे या फिर भारत में चल रहे मुकदमों के खत्म होने तक प्रत्यर्पण टाल दे.

अनुच्छेद 14 के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति पर अनुरोध प्राप्त करने वाले देश (इस मामले में भारत) में मुकदमा चल रहा हो या वह सजा काट रहा हो, तो भारत अपने कानूनों के अनुसार उसे अस्थायी रूप से अमेरिका भेज सकता है ताकि वहां उसके खिलाफ मुकदमा चल सके.

इस प्रावधान में कहा गया है, “ऐसे व्यक्ति को अनुरोध करने वाले देश की हिरासत में रखा जाएगा और वहां की कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसे वापस अनुरोध प्राप्त करने वाले देश को लौटा दिया जाएगा.”

संधि में यह भी व्यवस्था है कि अगर किसी व्यक्ति पर मुकदमा चल रहा हो या वह सजा काट रहा हो, तो प्रत्यर्पण को तब तक टाला जा सकता है जब तक भारत में मुकदमा पूरा न हो जाए या वह अपनी सजा पूरी न कर ले.

एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड श्रीराम पारक्कट के मुताबिक, प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 की धारा 21 भी अहम भूमिका निभाएगी. उन्होंने कहा, “आरोपी पर सिर्फ उन्हीं अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है, जिनका जिक्र प्रत्यर्पण अनुरोध और बाद में प्रत्यर्पण आदेश में किया गया हो.”

इसके अलावा, भारत के प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 की कई अन्य धाराएं भी इस प्रक्रिया में लागू होंगी.

अधिनियम की धारा 31 कहती है कि अगर प्रत्यर्पण जिस अपराध के लिए मांगा गया है वह “राजनीतिक प्रकृति” का हो, या आरोपी मजिस्ट्रेट, अदालत या केंद्र सरकार को यह संतुष्ट कर दे कि उसके प्रत्यर्पण की मांग राजनीतिक कारणों से उसे सजा दिलाने के उद्देश्य से की गई है, तो उसे किसी विदेशी देश को नहीं सौंपा जाएगा.

प्रत्यर्पण से इनकार उस स्थिति में भी किया जा सकता है, जब जिस देश ने प्रत्यर्पण मांगा है, वहां उस कथित अपराध में मुकदमा चलाने की कानूनी समय-सीमा समाप्त हो चुकी हो.

हालांकि, अगर केंद्र सरकार यह फैसला करती है कि किसी भगोड़े अपराधी का प्रत्यर्पण नहीं किया जा सकता, तो प्रत्यर्पण अधिनियम की धारा 34 के तहत वह उन्हीं आरोपों में भारत में उसके खिलाफ मुकदमा चलाने की प्रक्रिया शुरू कर सकती है.

इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्यर्पण से इनकार होने पर भी आरोपी दंड से न बच सके.

लखनऊ स्थित लॉ फर्म वन इंडिया लॉ के पार्टनर एडवोकेट राघवेंद्र प्रताप सिंह ने दिप्रिंट से कहा, “अमेरिका का आरोपपत्र एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम जरूर है, लेकिन सिर्फ इससे लॉरेंस बिश्नोई को भारत की हिरासत से अमेरिका नहीं भेजा जा सकता. यह सिर्फ कूटनीतिक और कानूनी माध्यमों से औपचारिक प्रत्यर्पण अनुरोध की नींव तैयार करता है.”

उन्होंने कहा कि बिश्नोई 2015 से लगातार भारत की हिरासत में है और फिलहाल साबरमती सेंट्रल जेल के हाई-सिक्योरिटी वार्ड में बंद है. उसके खिलाफ भारत में हत्या और महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट (MCOCA) समेत कई मामले लंबित हैं.

उन्होंने कहा, “इन लंबित मामलों को देखते हुए भारत पहले अपने मुकदमे पूरे करना चाहेगा और उसके बाद ही प्रत्यर्पण पर विचार करेगा. प्रत्यर्पण संधियों में अलग-अलग देशों के अधिकार क्षेत्र का टकराव आम बात है.”

अमेरिका बिश्नोई को क्यों चाहता है

अमेरिकी न्याय विभाग की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, लॉरेंस बिश्नोई पर ओंटारियो और ब्रिटिश कोलंबिया में रंगदारी से जुड़े मामलों और 2023 में सरे शहर में सिख अलगाववादी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भूमिका निभाने के आरोप हैं.

अभियोजकों ने बिश्नोई के गिरोह समेत तीनों गिरोहों को ऐसे अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठन बताया है, जो रंगदारी, मादक पदार्थों की तस्करी, अपहरण और टारगेट किलिंग जैसी गतिविधियों में शामिल हैं.

न्याय विभाग की विज्ञप्ति में कहा गया है, “पंजाब का 33 वर्षीय लॉरेंस बिश्नोई, जो लंबे समय से भारत में जेल में बंद है, पहले खुद को विश्वविद्यालय छात्र नेता बताता था. बाद में उसने राजनीति छोड़कर खुद और अपने साथियों को अपराध की दुनिया में झोंक दिया.” यह आरोप 1 जुलाई को संघीय ग्रैंड जूरी द्वारा दाखिल नौ आरोपों वाले आरोपपत्र में लगाए गए हैं.

आरोपपत्र के मुताबिक, जेल में तस्करी करके पहुंचाए गए मोबाइल फोन और अन्य इंटरनेट आधारित संचार उपकरणों का इस्तेमाल करते हुए बिश्नोई ने अपनी जेल की कोठरी से ही राजनीतिक हत्याओं, हत्याओं, फायरिंग, रंगदारी, अपहरण, मादक पदार्थों की तस्करी, मानव तस्करी और दुनिया भर में उसके गिरोह द्वारा किए गए अन्य अपराधों का संचालन किया.

सितंबर 2025 में कनाडा सरकार ने बिश्नोई “एंटरप्राइज” को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था.

आरोपपत्र के मुताबिक, अपने गिरोह के रोजमर्रा के संचालन के लिए बिश्नोई ने गोल्डी बरार, रोहित गोदारा और सुखराज सिंह कंग जैसे भरोसेमंद सहयोगियों और क्षेत्रीय नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी थी.

दस्तावेज में कहा गया है कि गोल्डी बराड़ और रोहित गोदारा बिश्नोई की ओर से बात करते थे और अमेरिका, कनाडा तथा अन्य देशों में गिरोह के सदस्यों द्वारा की गई हिंसक वारदातों का संचालन करते थे.

महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोपपत्र में बिश्नोई और बराड़ पर हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आदेश देने का आरोप लगाया गया है. 18 जून 2023 को ब्रिटिश कोलंबिया के सरे शहर में एक गुरुद्वारे से बाहर निकलते समय दो हमलावरों ने निज्जर की गोली मारकर हत्या कर दी थी.

आरोपपत्र के मुताबिक, यह गिरोह अक्सर प्रमुख धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नेताओं को निशाना बनाता था और ऐसी चर्चित हिंसक घटनाओं का इस्तेमाल अमेरिका में भारतीय समुदाय को डराने और उनसे रंगदारी वसूलने के लिए करता था.

बिश्नोई गिरोह अपनी गतिविधियों के लिए अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थों की तस्करी और प्रतिद्वंद्वी गिरोहों से ड्रग्स की खेप लूटकर भी पैसा जुटाता था. उदाहरण के तौर पर, नवंबर 2024 में बिश्नोई और बराड़ ने 49 किलोग्राम (108 पाउंड) कोकीन की खेप भेजने की निगरानी की थी, जिसे रेडलैंड्स में जब्त कर लिया गया. आरोपपत्र के मुताबिक, यह खेप अमेरिका से कनाडा तक लंबी दूरी तय करने वाले ट्रकों के जरिए भेजी जानी थी.

कुल मिलाकर, आरोपपत्र में बिश्नोई, बराड़, गोदारा और छह अन्य लोगों पर रैकेटियरिंग साजिश का एक आरोप, हॉब्स एक्ट के तहत रंगदारी के जरिए व्यापार में बाधा डालने की साजिश का एक आरोप, हॉब्स एक्ट के तहत रंगदारी की छह कोशिशों के आरोप और कोकीन तथा मेथामफेटामिन जैसे प्रतिबंधित मादक पदार्थों के वितरण की साजिश का एक आरोप लगाया गया है.

प्रत्यर्पण के पुराने मामले

पिछले साल 9 अप्रैल को अमेरिका ने 2008 के मुंबई आतंकी हमलों की साजिश में अपनी भूमिका के लिए तहव्वुर हुसैन राणा को भारत प्रत्यर्पित किया था, ताकि उस पर यहां कानून के तहत कार्रवाई हो सके.

अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने अपनी वेबसाइट पर कहा था, “इन हमलों में 166 लोगों की दुखद मौत हुई थी, जिनमें छह अमेरिकी नागरिक भी शामिल थे. इस घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था. अमेरिका लंबे समय से भारत के उन प्रयासों का समर्थन करता रहा है जिनका मकसद इन हमलों के जिम्मेदार लोगों को न्याय के कटघरे में लाना है.”

पिछले साल दिसंबर में बेल्जियम की सर्वोच्च अदालत, कोर्ट ऑफ कैसैशन ने भगोड़े हीरा कारोबारी मेहुल चोकसी की उस अपील को खारिज कर दिया था, जिसमें उसने पंजाब नेशनल बैंक से कथित 13,000 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के मामले में भारत प्रत्यर्पण को चुनौती दी थी.

भारत ने 2008 के मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड पाकिस्तानी-अमेरिकी आतंकी डेविड कोलमैन हेडली के प्रत्यर्पण की भी अमेरिका से मांग की थी.

यह अनुरोध दिसंबर 2012 में अमेरिका को भेजा गया था. जनवरी 2013 में अमेरिकी अदालत ने हेडली को मुंबई हमलों की साजिश में उसकी भूमिका से जुड़े आतंकवाद के 12 मामलों में 35 साल की जेल और उसके बाद पांच साल की निगरानी में रिहाई की सजा सुनाई थी.

मार्च 2013 में लोकसभा में एक सवाल के जवाब में तत्कालीन गृह राज्य मंत्री रतनजीत प्रताप नारायण सिंह ने कहा था, “प्रत्यर्पण अनुरोध खारिज किए जाने की कोई आधिकारिक पुष्टि अभी तक प्राप्त नहीं हुई है.”

भारत हेडली का प्रत्यर्पण इसलिए नहीं करा सका क्योंकि उसने अमेरिकी सरकार के साथ एक प्ली बार्गेन (दोष स्वीकार करने का समझौता) किया था. इस समझौते के तहत हेडली ने 26/11 मुंबई आतंकी हमलों और डेनमार्क के एक अखबार को निशाना बनाने की अलग साजिश से जुड़े 12 संघीय आतंकवाद मामलों में अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. इसके बदले में पूरी जांच में सहयोग करने की शर्त पर अमेरिकी सरकार ने उसे भारत प्रत्यर्पित न करने पर सहमति दी थी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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