इस गर्मी में ‘दिमागी नक्सलियों’, ‘कॉकरोच’ और ‘जेन ज़ी’ और ‘जनरेशन गटर’ की चर्चा के बीच, प्रासंगिक बने रहना ही सबसे ज़रूरी चीज़ है. जब भारत के युवाओं के नेतृत्व में शुरू हुआ विरोध इंस्टाग्राम से निकलकर सड़कों पर पहुंच गया और इसके साथ एक केंद्रीय शिक्षा मंत्री और सरकार के 12 साल के अति-आत्मविश्वास को भी अपने साथ ले गया, तो हर उस व्यक्ति को, जिसके पास अपनी बात रखने का मंच है, 25 साल से कम उम्र के लोगों को लेकर अपना रुख सामने रखना पड़ा. कई बड़े लोग अपनी आवाज फिर से तलाश रहे हैं, इनमें सबसे नया नाम रामदेव का है.
अरबपति कारोबारी और योग गुरु अब खुद को जेन ज़ी के समर्थक और सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले व्यक्ति के तौर पर पेश कर रहे हैं. यह सब उनके स्वतंत्रता दिवस के भाषण से शुरू हुआ, जो उन्होंने हरिद्वार स्थित अपने कैंपस से दिया था.
उन्होंने कहा, “ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, दलित, आदिवासी, वनवासी, हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध एक-दूसरे के सामने इतनी दुश्मनी और विरोध के साथ खड़े रहे हैं, जैसे वे एक-दूसरे का खून पीने के लिए प्यासे हों. हमें देश में नफरत की इन सभी दीवारों को तोड़ना होगा.”
उनका अगला निशाना पेपर लीक था.
उन्होंने कहा, “कुछ जगहों पर खुलेआम नकल हो रही है, जबकि दूसरी जगहों पर प्रश्नपत्र लीक हो रहे हैं.” यह बात उन्होंने अपने कारोबारी सहयोगी और पतंजलि आयुर्वेद के मैनेजिंग डायरेक्टर आचार्य बालकृष्ण की मौजूदगी में कही. उन्होंने कहा, “सरकारी नौकरी के इंटरव्यू में भ्रष्टाचार 99% तक पहुंच गया है…फिर देश कैसे चलेगा?”
हर शब्द के साथ रामदेव की नाराज़गी बढ़ती गई. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “इसलिए अपना तरीका सुधारो, वरना आंदोलन और तेज होगा…कृपया इसे ठीक करिए, नहीं तो रामदेव को फिर आंदोलन करना पड़ेगा.”
“फिर आंदोलन करना पड़ेगा” कहना थोड़ा व्यक्तिगत दावा जैसा था और इसमें खुद को ज्यादा बड़ा दिखाने की कोशिश भी थी. रामदेव 2011-12 के इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन की बात कर रहे थे, जिसने यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के पतन के लिए एक बड़ा माहौल बनाया था. जून 2011 में उन्होंने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बड़े प्रदर्शन का नेतृत्व किया था, लेकिन ज्यादातर लोग उस घटना को इस बात के लिए याद करते हैं कि जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े, तब वे वहां से चले गए थे. कुछ घंटे बाद वह सलवार-कमीज पहनकर एक बुजुर्ग महिला का भेस बनाकर जाते हुए पाए गए थे.
फिर भी, रामदेव और उनके समर्थकों पर हुई कार्रवाई ने विपक्ष, खासकर बीजेपी को वह मुद्दा दे दिया जिसकी उसे ज़रूरत थी. लालकृष्ण आडवाणी ने इसकी तुलना जलियांवाला बाग हत्याकांड से की थी, जबकि उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे “भारतीय इतिहास के सबसे बुरे दिनों में से एक” बताया था. यही वह साल भी था जब बीजेपी और रामदेव के बीच गहरी और लंबे समय तक चलने वाली दोस्ती की नींव पड़ी थी.
इसलिए आंदोलन फिर से शुरू करने की उनकी मौजूदा धमकियां याद दिलाती हैं कि मौजूदा सरकार के ‘दिखावे और अहंकार’ के इस दौर में, जलती हुई मशाल ऊपर उठाकर रखने वाले व्यक्ति रामदेव ही होंगे.
रामदेव-BJP की दोस्ती खत्म?
रामदेव जब देश के युवाओं के सामने झुककर उन्हें यह कह रहे हैं कि वे खुद की तुलना कॉकरोच से नहीं, बल्कि कृष्ण से करें, उसी दौरान उनकी कुछ बीजेपी के नेताओं से भी बहस हो गई है.
कुछ दिन पहले रामदेव ने एक टीवी चर्चा में हिस्सा लिया और मंडी की सांसद कंगना रनौत की युवाओं को लेकर की गई ‘कॉकरोच’ वाली टिप्पणी पर आपत्ति जताई. जुलाई के आखिरी हफ्ते में रनौत ने ‘जनरेशन गटर’ के प्रदर्शनकारियों पर लगातार निशाना साधा था. उन्होंने उन्हें “भद्दा”, “बहुत बदसूरत और भ्रष्ट” बताया था और कहा था कि वे गृहिणी बनने के भी लायक नहीं हैं. उन्होंने यह भी कहा था कि वे ड्रग्स लेने की अपनी आज़ादी दिखा रहे हैं.
बाद में रनौत ने सफाई देते हुए कहा, “जो लोग खुद को कॉकरोच कहते हैं और हम कहते हैं कि कॉकरोच नालियों से निकलते हैं, तो इसमें गलत क्या है?”
लेकिन रामदेव के रहते ऐसा नहीं चलेगा. उन्होंने कहा कि देश के युवाओं के लिए ‘गटर’ शब्द का इस्तेमाल करना खराब सोच की निशानी है. उन्होंने यह भी सवाल किया कि रनौत का बचपन और जवानी कैसी रही होगी.
रनौत ने जवाब देते हुए कहा, “बाबा जी, मेरी जवानी या बेडरूम के सपने मत देखिए.” इसके बाद उन्होंने एक और तीखा जवाब दिया, “मुझे सुप्रीम कोर्ट ने कभी डांटा नहीं.”
रनौत अकेली नहीं थीं. इसके कुछ समय बाद पूर्व बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह, जिन्हें हाल ही में पहलवानों के चर्चित यौन उत्पीड़न मामले में बरी किया गया है, उन्होंने पूछा कि रामदेव को गंभीरता से कौन लेता है और क्या उनमें आंदोलन करने की क्षमता भी है.
रामदेव और बीजेपी के बीच हालिया इन विवादों को उनकी दोस्ती के जल्द खत्म होने के संकेत के तौर पर देखना आसान है. आखिर दोनों कई सालों से एक-दूसरे के साथ मिलकर आगे बढ़ते रहे हैं.
कौशिक डेका ने 2017 में लिखी अपनी किताब ‘द बाबा रामदेव फेनोमेनन’ में बताया है कि 2009 में भी पतंजलि आयुर्वेद ने बीजेपी को 11 लाख रुपये का दान दिया था और 2014 में बीजेपी के तेज़ी से आगे बढ़ने की भविष्यवाणी की थी.
डेका लिखते हैं, “इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं है कि 2014 में बीजेपी के केंद्र की सत्ता में आने और बाद में कई दूसरे राज्यों में सरकार बनाने के बाद रामदेव पर सुविधाओं और सम्मान की बारिश हुई.”
डेका के मुताबिक, “राज्य सरकारों ने उन्हें फैक्ट्रियां, हर्बल पार्क, यूनिवर्सिटी, स्कूल और गौशाला बनाने के लिए जमीन देने की पेशकश की. केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने तो उन्हें अंडमान में योग रिसॉर्ट बनाने के लिए एक द्वीप देने की पेशकश भी की थी.”
2014 से 2017 के बीच ही पतंजलि को ज़मीन पर करीब 4.6 करोड़ डॉलर की छूट मिलने की खबर थी. बीजेपी शासित राज्यों में जमीन की खरीद बाजार कीमत से औसतन 77 फीसदी कम दर पर हुई थी.
नवंबर 2014 में रामदेव को Z-कैटेगरी की सुरक्षा दी गई थी. करीब दो साल बाद पतंजलि के हरिद्वार फूड पार्क में 35 सीआईएसएफ जवान तैनात किए गए थे. देश में यह उन केवल आठ निजी जगहों में से एक है, जिन्हें अर्धसैनिक बलों की सुरक्षा दी गई है.
डेका के मुताबिक, “मोदी सरकार ने रामदेव के बड़े कारोबारी संस्थान में बने पतंजलि के उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए यह आदेश दिया कि इन्हें सरकार द्वारा चलाए जाने वाले केंद्रीय भंडारों में रखा जाए.” 2016 में डीआरडीओ ने भी हर्बल सप्लीमेंट्स और खाद्य उत्पादों की मार्केटिंग के लिए पतंजलि योगपीठ के साथ समझौते का ऐलान किया था.
यह रामदेव के बीजेपी से संबंधों की बस एक छोटी-सी झलक है. हालांकि, जब वह शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार के खिलाफ रुख अपनाते हैं, तो वह सिर्फ बयान देने वाले बाबा के तौर पर नहीं, बल्कि इस व्यवस्था से जुड़े एक हितधारक के तौर पर बोल रहे होते हैं.
रामदेव के ‘स्वदेशी समाधान’
रामदेव कई सालों से शिक्षा के कारोबार से जुड़े हुए हैं. 2019 में उन्हें भारतीय शिक्षा बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया था. यह बोर्ड “भारतीय पारंपरिक ज्ञान” पर आधारित है. यह स्कूलों को अपने साथ जोड़ता है और 2 लाख बच्चों के लिए परीक्षाएं आयोजित करता है.
उस साल मार्च में शिक्षा मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने नए बोर्ड को पतंजलि को सौंपने की प्रक्रिया की निगरानी की थी. वैदिक बोर्ड की आपत्ति के बावजूद यह फैसला लिया गया था. 2019 के चुनावों के लिए आचार संहिता लागू होने से कुछ घंटे पहले ही यह बोर्ड पतंजलि को सौंप दिया गया था.
इस बोर्ड ने 2022 में काम शुरू किया. यह रामदेव की उस सोच का विस्तार है, जिसमें वह आधुनिक दवाओं, FMCG सामान और यहां तक कि मैगी जैसी “पश्चिमी” चीज़ों के बदले स्वदेशी विकल्प देने की बात करते हैं. उन्होंने रूह अफजा को भी निशाना बनाया था और इसे लेकर ‘शरबत जिहाद’ जैसा बयान दिया था. वह लगातार खुद को और अपने उत्पादों को एक ऐसी मुख्यधारा के विकल्प के तौर पर पेश करते रहे हैं, जो उनके मुताबिक ठीक से काम नहीं कर रही है.
पेपर लीक इस कारोबार के लिए बहुत अच्छा मुद्दा है. बार-बार होने वाली परीक्षा रद्द होने या किसी मामले में गिरफ्तारी से जब व्यवस्था की नाकामी सामने आती है, तो मुख्यधारा से बाहर मौजूद किसी कुशल विकल्प की जरूरत का तर्क मजबूत होता है.
लेकिन कॉकरोच कहे जा रहे इन युवाओं को विकल्पों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है—उनका मकसद मौजूदा व्यवस्था से जवाब मांगना है.
अगस्त के दौरान सीजेपी ने अलग-अलग राज्यों के सरकारी स्कूलों की स्थिति देखने के लिए स्वयंसेवकों की टीमें भेजीं. इसके लिए उन्होंने एक सूची तैयार की थी, जिसमें पीने का पानी और शौचालय, बिजली और इस्तेमाल करने लायक क्लासरूम, चारदीवारी और मिड-डे मील जैसी चीज़ें शामिल थीं.
उन्हें अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नतीजे मिले. अलवर में बाहर से आए लोगों को तस्वीरें लेने से रोक दिया गया. वहीं पश्चिम बंगाल में उनकी टीम के एक सदस्य और उनके पिता पर हमला किया गया. हमले के दो दिन बाद उनके पिता की मौत हो गई.
इस आसान-सी सूची का स्वदेशी विकल्प आखिर क्या है?
युवा इसे नहीं मान रहे
इस बीच, रामदेव आखिर क्या कर रहे हैं, यह कोई भी ठीक से नहीं कह सकता. हो सकता है कि वह दूसरे पक्ष के लिए अपने स्तर पर काम कर रहे हों. पतंजलि के प्रोडक्ट खरीदने वाला महत्वाकांक्षी मिडिल क्लास वही है, जिसके बच्चों को परीक्षाएं दोबारा देनी पड़ी हैं. अगर रामदेव सरकार के पक्ष में बोलते रहे, तो क्या वे लोग उनका टूथपेस्ट और घी खरीदते रहेंगे? या शायद उन्होंने राजनीतिक हवा को समझ लिया है और उस दौर में लौटने की तैयारी कर रहे हैं, जब वह हर किसी के दोस्त हुआ करते थे. या शायद वह योजना के मुताबिक काम कर रहे हैं और उस गुस्से को बाहर निकालने के लिए दबाव कम करने वाले की भूमिका निभा रहे हैं, जिसकी वजह से एक मंत्री को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी है.
2011 में ‘कारवां’ मैगजीन के लिए लिखे एक प्रोफाइल में क्रिस्टोफ जाफरेलो ने रामदेव को “सम्प्रदाय के बिना स्वामी” कहा था. जाफरेलो ने उन्हें भगवा कपड़े पहनने वाले साधुओं की एक नई तरह की श्रेणी का हिस्सा बताया था, जो “बिना आध्यात्मिक चिंता वाले राजनीतिक लोग” थे और जो “एकतरफा, आसान और बहुत ही साधारण तरीके से” अपनी बात रखते थे. इससे रामदेव एक स्वतंत्र व्यक्ति बन जाते हैं, जिनके पास एक बड़ा फायदा है—वह जिसे चाहें, उसके साथ जुड़ सकते हैं और इससे उनकी छवि को कोई नुकसान नहीं होता.
सिवाय युवाओं के.
जब रामदेव ने ‘कॉकरोच’ कहे जा रहे युवाओं को अपना नाम और छवि बदलने की सलाह दी, तो सीजेपी के सह-संस्थापक अभिजीत दिपके ने उनसे अपने खराब प्रोडक्ट्स पर ध्यान देने को कहा, “जिनके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि उनमें धोखा है.” दिपके ने पलटकर कहा कि जेन ज़ी उनकी मदद के बिना संस्कृति, लोकतंत्र और देश को संभाल लेगा.
रामदेव यह पेशकश करते रह सकते हैं. लेकिन प्रासंगिक बने रहना ऐसी चीज़ है, जिसे वह सिर्फ अपनी मर्ज़ी से नहीं बना सकते.
करनजीत कौर एक पत्रकार, ‘Arré’ की पूर्व संपादक और ‘TWO Design’ में पार्टनर हैं. वह @Kaju_Katri पर ट्वीट करती हैं. विचार उनके निजी हैं.
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