छात्र आंदोलन की मुश्किल से हासिल हुई जीत अब टूटती हुई नज़र आ रही है. जिस आंदोलन को कई लोगों ने युवाओं का ऐतिहासिक आंदोलन बताया था, अब उसके फिर से जाति बनाम मेरिट की पुरानी और सीमित बहस में सिमट जाने का खतरा है.
अगर ऐसा होता है, तो यह सिर्फ एक सामान्य झटका नहीं होगा, बल्कि उसी पुराने विवाद और अव्यवस्था में लौटना होगा. आंदोलन की असली मांगों से ध्यान हटकर फिर मेरिट, जाति और आरक्षण से जुड़ी पुरानी और जहरीली ऑनलाइन बहस की तरफ जा रहा है.
25 जुलाई को देश के युवाओं और उनके अपने दम पर हुए आंदोलन ने राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया. इस आंदोलन की शुरुआत और अगुवाई व्यंग्य मंच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने की थी. बाद में यह एक विकेंद्रीकृत और मजबूत युवा आंदोलन बन गया. इसी रफ्तार के साथ यह युवा आंदोलन एक ऐसे दुर्लभ गठबंधन में बदल गया, जिसमें अलग-अलग पहचान वाले हजारों युवा एक साथ आए और जंतर मंतर पर एक महीने से ज्यादा समय तक डटे रहे.
इन युवाओं ने अच्छी सरकार, सरकार की जवाबदेही, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की मांग की. लेकिन यह माहौल पूरी तरह खत्म भी नहीं हुआ था कि सिर्फ 72 घंटे के भीतर छात्रों की इस बड़ी एकजुटता पर संकट के बादल मंडराने लगे और यह सवाल उठने लगा कि क्या यह एकजुटता सिर्फ कुछ समय की थी. अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर “रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन” (RHA) के नाम से एक नई लहर तेजी से फैल रही है.
इस डिजिटल अभियान ने सिर्फ कुछ दिनों में इंस्टाग्राम पर 58 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स जुटा लिए. जो राष्ट्रीय चर्चा पहले सभी के साझा मुद्दों पर हो रही थी, अब उसका रुख बदल गया है. अब यह साफ और निष्पक्ष परीक्षाओं की मांग से हटकर जाति और मेरिट की कड़वी, आमने-सामने की लड़ाई बनती जा रही है.
इस वजह से उस आंदोलन की उपलब्धियां पीछे छूटती दिख रही हैं, जो व्यवस्था की बड़ी खामियों की पहचान और उन्हें दूर करने के लिए शुरू हुआ था. अब इसके सिर्फ जाति-आधारित आरक्षण और मेरिट की पुरानी बहस तक सीमित हो जाने का खतरा है. यही वह “सामान्य बुराई” है, जो भारतीय समाज में हमेशा मौजूद रही है और जिसकी ओर डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने भी ध्यान दिलाया था.
नकारात्मक एकजुटता
युवाओं के इस गठबंधन का तेजी से बिखरना एक तय पैटर्न पर चलता दिख रहा है. हमेशा की तरह इसके पीछे संस्थागत व्यवस्था की विफलता छिप जाती है. शुरुआत एक साझा दुश्मन से होती है. छात्र सामाजिक सीमाओं से ऊपर उठकर व्यवस्था में भ्रष्टाचार और पेपर लीक के खिलाफ एकजुट होते हैं. लेकिन जैसे ही आंदोलन का तत्काल लक्ष्य पूरा होता दिखता है और मंत्री के इस्तीफे जैसे प्रतीकात्मक कदम उठते हैं, एक खालीपन पैदा हो जाता है.
इसके बाद आंदोलन में शामिल लोगों के बीच संसाधनों को लेकर तेज प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है. अब लोगों का ध्यान परीक्षा सुधार से हटकर नौकरी की कमी की गंभीर समस्या पर आ गया है. ऐसे समय में आंदोलन के जातिगत पहचान के जाल में फंसने का खतरा बढ़ जाता है, जहां व्यवस्था की असमानताओं की जगह अलग-अलग जातियों के बीच टकराव हावी हो जाता है.
जब परीक्षा व्यवस्था की विफलता को सिर्फ इस सवाल तक सीमित कर दिया जाता है कि सीट का असली हकदार कौन है, तो आंदोलन धीरे-धीरे “शुद्ध मेरिट” की उस सोच को सही मानने लगता है, जो लंबे समय से समाज में हावी रही है. साथ ही यह फिर पुराने सामाजिक बंटवारे की तरफ लौट जाता है. यह समझना जरूरी है कि प्रशासनिक सुधार की लड़ाई इतनी जल्दी जाति की लड़ाई में कैसे बदल जाती है.
मेरिट की अवधारणा, जिसे प्रभुत्व वाली व्यवस्था की एक नई रणनीति बताया गया है, का इस्तेमाल एक टूटी हुई व्यवस्था को बचाने के हथियार के रूप में किया जाता है. RHA अभियान उसी चीज पर टिका है, जिसे “नकारात्मक एकजुटता” कहा जा सकता है.
“नकारात्मक एकजुटता” का मतलब है ऐसा अस्थायी गठबंधन, जो किसी साझा दुश्मन के “खिलाफ” तो बनता है, लेकिन किसी ठोस और दीर्घकालिक व्यवस्था के “समर्थन” में नहीं होता.
जब पेपर लीक का खुलासा हुआ, तब सामने आया कि पूरी परीक्षा व्यवस्था से समझौता किया जा चुका था और उसमें गंभीर खामियां थीं. इससे साफ हुआ कि यह प्रशासन की विफलता थी, जिसका असर हर छात्र पर पड़ा, चाहे उसकी पृष्ठभूमि या पहचान कुछ भी रही हो. लेकिन अब यह नई लहर सफलतापूर्वक जिम्मेदारी सरकार से हटाकर आरक्षण की अवधारणा पर डाल रही है. मेरिट के मिथक को, जिसे “जाति आधारित हथियार” बताया गया है, सामने रखकर यह अभियान यह संदेश देता है कि परीक्षा व्यवस्था तो पूरी तरह निष्पक्ष है और छात्रों की सफलता में सिर्फ आरक्षण ही रुकावट है.
ये बातें पूरी तरह जमीनी हकीकत से अनजान हैं. ये नहीं समझतीं कि अगर परीक्षा व्यवस्था भ्रष्ट हो, पेपर लीक हो चुका हो और पूरी प्रणाली से समझौता किया जा चुका हो, तो किसी भी छात्र की व्यक्तिगत मेरिट उसे नहीं बचा सकती.
एल्गोरिदम का जाल
RHA अभियान ने नव-उदारवादी आर्थिक चिंता का बहुत प्रभावी तरीके से इस्तेमाल करते हुए छात्रों के इस सामूहिक और भाईचारे वाले समुदाय को अलग-अलग, बेहद प्रतिस्पर्धी और आपस में लड़ने वाले जातिगत समूहों में बांट दिया है.
इस बंटवारे को डिजिटल मीडिया का माहौल और उसके एल्गोरिदम अधिक तेज कर रहे हैं. ये एल्गोरिदम सार्वजनिक चर्चा को अलग-अलग शिकायतों में बांट देते हैं.
जमीन पर जब प्रदर्शन हो रहे थे, तब अलग-अलग समूहों को लोकतांत्रिक तरीके से बातचीत, बहस और आमने-सामने चर्चा करके अपने मतभेद सुलझाने पड़ते थे.
लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म इसके उलट हैं. उन्हें गणितीय तरीके से और जानबूझकर इस तरह बनाया गया है कि वे बंटवारे को बढ़ावा दें.
बिग डेटा नेटवर्क की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पूरे राजनीतिक माहौल को टुकड़ों में बांटने का काम करती है. यह ऐसी व्यवस्था है जो गहराई से सोचने और पूरे संदर्भ को समझने की बजाय उसे नजरअंदाज करती है.
एल्गोरिदम एक रणनीति के तहत जातिगत आरक्षण के खिलाफ गुस्से को बढ़ाते हैं, क्योंकि इससे तुरंत ज्यादा लोगों की भागीदारी और फायदा मिलता है.
इस तरह संस्थानों में पारदर्शिता की साझा मांग की जगह समाज के हाशिए पर मौजूद अलग-अलग समूहों के बीच आपसी टकराव शुरू हो जाता है.
सिर्फ आरक्षण विरोधी सोच पर आधारित ऑनलाइन अभियान सरकार और उसके प्रशासन की किसी भी गंभीर आलोचना से बचता है.
यह उससे भी बड़ी आर्थिक और संरचनात्मक विफलताओं को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देता है.
सच यह है कि शहरों में पढ़े-लिखे युवाओं की बेरोजगारी दर करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच गई है. साथ ही प्रशासनिक व्यवस्था में इतनी गंभीर खामियां हैं कि उसी की वजह से पेपर लीक जैसी घटनाएं होती हैं.
लेकिन RHA या आरक्षण विरोधी अभियान सिर्फ एक भावनात्मक मुद्दे पर पूरा ध्यान केंद्रित करते हैं.
वे एक दूसरे वंचित समुदाय को हमेशा के लिए सबसे बड़ा दुश्मन बनाकर पेश करते हैं.
युवाओं की लगातार बढ़ती बेरोजगारी और संस्थागत विफलता को शासन की नाकामी मानने के बजाय जातिगत संघर्ष बताकर यह अभियान हाल के युवा आंदोलन के साथ अन्याय कर रहा है और उसकी मुश्किल से हासिल हुई उपलब्धियों को कमजोर कर रहा है.
इससे प्रशासन पूरी तरह जिम्मेदारी से बच निकलता है.
RHA जैसे प्रतिक्रियावादी अभियानों के पक्ष में सिर्फ तुरंत भड़कने वाला और सतही ऑनलाइन गुस्सा काम करता है.
प्रदर्शन से राजनीति तक
एक तरफ CJP और उससे जुड़े युवा समूह आधी रात की पुलिस कार्रवाई और अलग-अलग राज्यों में छात्रों की जारी गिरफ्तारियों के खिलाफ फिर से आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दे रहे हैं.
दूसरी तरफ एल्गोरिदम से पैदा हो रहा ध्रुवीकरण उनकी नैतिक ताकत को लगातार कमजोर कर रहा है.
अगर न्याय के व्यापक संवैधानिक विचार के प्रति लगातार, सिद्धांतों पर आधारित, संगठित और मजबूत प्रतिबद्धता नहीं होगी, तो समावेशिता धीरे-धीरे खत्म होकर फिर जातिगत खेमों में बदल जाएगी.
इतिहास बताता है कि युवा आंदोलन अक्सर किसी एक नेता के खिलाफ बने अस्थायी गठबंधन से आगे बढ़कर साझा संवैधानिक मूल्यों पर आधारित मजबूत समुदाय नहीं बना पाते.
नतीजा यह होता है कि वे फिर समाज के सबसे पुराने और भरोसेमंद बंटवारों की ओर लौट जाते हैं.
भारत भी इससे अलग नहीं है.
जेपी आंदोलन और अन्ना आंदोलन इसके उदाहरण हैं. ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं.
आज हमारे सामने यही खतरा है.
अगर हमारी सार्वजनिक चर्चा जाति और मेरिट के मिथक पर होने वाली अंतहीन बहस और शोर-शराबे में ही फंसी रही, तो भारत एक गंभीर संकट का सामना कर सकता है.
देश हमेशा के लिए सामाजिक गतिरोध की स्थिति में फंस सकता है.
अगर आधुनिक भारत के निर्माताओं की कल्पना के अनुसार भारतीय मूल्यों पर आधारित सच्चा और समग्र लोकतंत्र बनाना है, जो संविधान के सामाजिक समझौते का सम्मान करता हो, तो युवाओं को अपनी टाइमलाइन पर दिखने वाले योजनाबद्ध गुस्से से आगे देखना होगा.
उन्हें स्क्रीन से बाहर निकलना होगा और आमने-सामने बैठकर व्यापक भाईचारा बनाने की कठिन, उलझी हुई लेकिन जरूरी कला को फिर से सीखना होगा.
अदिति नारायणी डॉ. आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. वह @AditiNarayani पर ट्वीट करती हैं. निखिल संजय-रेखा अडसूले एक वकील हैं, TISS के पूर्व छात्र, USA में क्रेटन पेडन स्कॉलर और IIT-दिल्ली में सीनियर स्कॉलर हैं. वह @Surajya_Raje_ पर ट्वीट करते हैं.
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