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Friday, 31 July, 2026
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म्यांमार भारत से संपर्क कर रहा है, नई दिल्ली को यह मौका नहीं गंवाना चाहिए

म्यांमार दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए भारत का ज़मीनी पुल और एक अहम स्ट्रेटेजिक पार्टनर है. अच्छी भावना तो है, लेकिन जो कमी है वह है भारत का लगातार ध्यान.

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भारत-म्यांमार संबंधों को मजबूत करने की दिशा में ‘म्यांमार नेशनल सॉलिडेरिटी एंड पीसकीपिंग निगोसिएशन कमिटी’ ने भारतीय दूतावास के साथ मिलकर पिछले दिनों एक महत्वपूर्ण कदम उठाया. उसने नेप्यीताव में 16 से 18 जुलाई तक संवैधानिक और संघीय व्यवस्था पर व्याख्यानमाला का आयोजन किया. 2023 से दोनों देश संवैधानिक व्यवस्था पर द्विपक्षीय बातचीत के तहत इससे पहले दो व्याख्यानमालाओं और कार्यशालाओं का आयोजन कर चुके थे. नेप्यीताव में हुई चर्चाओं में 100 से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया. इनमें सांसद, स्थानीय संगठनों के प्रतिनिधि, म्यांमार के मंत्रालयों के अधिकारी, सिविल सोसाइटी संगठन, भारतीय वैश्विक परिषद और भारतीय दूतावास शामिल थे. इस आयोजन के लिए जो समय चुना गया, वह काफी महत्वपूर्ण था. इससे ठीक पहले, मई-जून में म्यांमार की राष्ट्रपति यु मिन आंग ह्लाइंग ने भारत की पांच दिवसीय राजकीय यात्रा की. राष्ट्रपति बनने के बाद ह्लाइंग की यह पहली विदेश यात्रा थी. वे अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए चीन, रूस या किसी ‘आसियान’ देश को चुनकर अपनी राजनीतिक और रणनीतिक प्राथमिकता को दिखा सकते थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि उनके इस फैसले से भारत ने खुद को सम्मानित महसूस किया.

राष्ट्रपति ह्लाइंग के साथ उनके कई मंत्री और म्यांमार के केंद्रीय बैंक के गवर्नर भी भारत आए. एक बड़े व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल में कृषि, दवा उद्योग, बैंकिंग, ऊर्जा, निर्माण, आईटी, संचार, लॉजिस्टिक्स और व्यापार जैसे क्षेत्रों के प्रतिनिधि शामिल थे. इस यात्रा से दोनों देशों के अलग-अलग मंत्रालयों, सुरक्षा एजेंसियों, वित्तीय संस्थाओं और व्यापार जगत को आपसी संबंधों को और आगे बढ़ाने का राजनीतिक अधिकार मिला. यह बात भी खास रही कि राष्ट्रपति ने राजनीति और व्यापार जगत के नेताओं के साथ बैठक करने के लिए मुंबई की भी यात्रा की और ग्रेटर नोएडा में ‘एनटीपीसी एनर्जी टेक्नोलॉजी रिसर्च अलायंस’ (NETRA) का भी दौरा किया.

इन सब से भारत में निवेश, ऊर्जा टेक्नोलॉजी, बैंकिंग कारोबार, नवीकरणीय ऊर्जा, औद्योगिक विकास और निजी क्षेत्र में सहयोग में म्यांमार की दिलचस्पी साफ हुई. भारत म्यांमार को दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक, आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं के संस्थान, सस्ती टेक्नोलॉजी और विकास में साझेदारी देता है, जो म्यांमार की संप्रभुता को चुनौती नहीं देते.

राष्ट्रपति ह्लाइंग भारत से चीन के दौरे पर गए, जहां दोनों देशों ने 18 समझौतों और समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए. ये व्यापार, इन्फ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी और विकास में सहयोग से जुड़े हैं, लेकिन इन समझौतों को म्यांमार और चीन के बीच पूरी तरह आपसी भरोसे का सबूत नहीं माना जाना चाहिए. चीन के साथ म्यांमार का रिश्ता सच्चे रणनीतिक भरोसे से ज्यादा भौगोलिक मजबूरी, आर्थिक निर्भरता और एक ताकतवर पड़ोसी देश से निपटने की ज़रूरत पर आधारित है. म्यांमार की सरकार और उसकी आबादी का बड़ा हिस्सा चीन के वर्चस्ववादी रवैये को लेकर गहरा शक रखता है.

ये चिंताएं बेहद अलोकप्रिय मीत्सोन बांध परियोजना को लागू करने के लिए डाले जा रहे दबाव से पैदा हुई हैं. इस बांध के मूल डिजाइन के कारण बांध से पैदा होने वाली 90 फीसदी बिजली चीन ले जाने वाला था, जबकि म्यांमार को लोगों के विस्थापन और पर्यावरण को नुकसान जैसी कीमतें चुकानी पड़तीं. पर्यावरण को नुकसान को लेकर चिंता काचिन प्रांत में चीनी कंपनियों द्वारा दुर्लभ खनिजों के खनन और इसके कारण जंगलों, खेतों और जलस्रोतों में प्रदूषण को लेकर भी है. चीन पर शक इसलिए भी बढ़ रहा है क्योंकि वह म्यांमार की सरकार के साथ-साथ ताकतवर हथियारबंद स्थानीय संगठनों (EAO) से भी संपर्क बनाए हुए है. इसके कारण चीन म्यांमार की आंतरिक सुरक्षा और सीमा से जुड़े मामलों पर भी काफी हावी रहा है.

इसलिए राष्ट्रपति ह्लाइंग का चीन दौरा भरोसे के साथ हाथ मिलाने के बजाय व्यवहारिक कूटनीतिक कदम उठाने का मामला है. इससे भारत की अहमियत कम नहीं होती. राष्ट्रपति ह्लाइंग ने पहले भारत का दौरा करके यह संदेश दे दिया है कि म्यांमार भारत को एक स्वतंत्र, सांस्कृतिक रूप से जुड़ा हुआ और शोषण न करने वाला सहयोगी मानता है. ऐसा सहयोगी जो उसके विदेश संबंधों में विविधता लाने में मदद कर सकता है, चीन पर उसकी निर्भरता कम कर सकता है और उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा कर सकता है.

नेप्यीताव में व्याख्यानमाला

इस भू-राजनीतिक माहौल के बीच ‘म्यांमार नेशनल सॉलिडेरिटी एंड पीसकीपिंग निगोसिएशन कमिटी’ (NSPNC) ने म्यांमार के ‘सेंटर फॉर पीस एंड रीकॉन्सिलिएशन’ के समर्थन से व्याख्यानमाला का आयोजन किया. इससे देश के नीति बनाने वाले लोगों, स्थानीय संगठनों और राजनीति से जुड़े लोगों की यह सोच सामने आई कि वे म्यांमार का संवैधानिक भविष्य कैसा चाहते हैं. (NSPNC) वह संस्था है जिसे युद्धविराम समझौतों को लागू कराने, राष्ट्रीय युद्धविराम समझौते (NCA) को आगे बढ़ाने, संघीय और संवैधानिक व्यवस्था पर चर्चा कराने, युद्ध से प्रभावित इलाकों में विकास कार्य लागू करने जैसी जिम्मेदारियां दी गई हैं.

मुझे लेकर चार वक्ताओं ने भारत के संवैधानिक अनुभवों के आधार पर संघीय ढांचे, भारतीय संघीय व्यवस्था की खासियतों, संवैधानिक शासन व्यवस्था में विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं के अधिकारों और भूमिकाओं तथा संविधान संशोधन जैसे विषयों पर जानकारी दी. दो दिनों में जो आठ प्रस्तुतियां दी गईं, उनमें श्रोताओं ने काफी दिलचस्पी ली और कई सवाल पूछे. चर्चा बड़े अधिकारों वाली केंद्र सरकार की एकात्मक शासन प्रणाली से लेकर ज्यादा स्वायत्तता देने वाले संघीय ढांचे की खासियतों जैसे बड़े मुद्दों पर हुई. साफ महसूस किया गया कि संघीय ढांचे में राज्य ज्यादा अधिकार और स्वायत्तता मांग रहे हैं, जबकि केंद्र राज्यों पर अपनी पकड़ खोने के डर से संविधान को ज्यादा एकात्मक बनाना चाहता है.

राज्यपाल के अधिकारों, उसकी सीमाओं और राज्यपाल पद के फायदे और नुकसान जैसे मुद्दों पर ज्यादा जोर दिया गया. गौर करने वाली बात है कि म्यांमार में राज्यों (सीमावर्ती इलाकों में जहां गैर-बामर लोग रहते हैं) और क्षेत्रों (केंद्रीय इलाके, जहां बामर लोग रहते हैं, जिनकी आबादी देश में 68 फीसदी है) में राज्यपाल नहीं हैं. राज्यों में एक संवैधानिक सुरक्षा के तौर पर राज्यपाल की ज़रूरत तो है ही. म्यांमार भारत के अनुभवों से सीख लेते हुए इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए संविधान में संशोधन कर सकता है.

म्यांमार के 2008 के संविधान के अनुच्छेद 261 के तहत मुख्यमंत्री ही फिलहाल राज्यों या क्षेत्रों के मुखिया हैं. इस अनुच्छेद के अनुसार राष्ट्रपति संबंधित राज्य या क्षेत्र की ह्लुत्तो (विधानसभा) के सदस्यों में से मुख्यमंत्री का चयन करते हैं, जो राष्ट्रपति के प्रति जवाबदेह होते हैं. इस व्यवस्था में एक पद के साथ दो जिम्मेदारियां जुड़ी हैं—राज्य के संवैधानिक मुखिया की भूमिका और राजनीतिक सत्ता के मुखिया की भूमिका. इससे विधानसभाओं को अपना स्थानीय नेता चुनने का अधिकार नहीं मिलता और कार्यपालिका के अधिकारों का राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीकरण होता है.

जातीय अल्पसंख्यकों की राजनीतिक पार्टियों और संघीय वकीलों ने अनुच्छेद 261 की यह कहकर कड़ी आलोचना की है कि इसके कारण क्षेत्र में बहुमत पाने वाली स्थानीय पार्टियां अपने क्षेत्रों की सरकार नहीं चला पातीं. ह्लुत्तो अपने मुख्यमंत्री चुन सकें, इसके लिए अनुच्छेद 261 में संशोधन का मुद्दा विवाद का केंद्र बना हुआ है और इस पर अब तक की सरकारों और शांतिवादी संगठनों के बीच बातचीत चलती रही है.

श्रोताओं ने मिजोरम मॉडल को लेकर बहुत ज्यादा उत्सुकता दिखाई. मिजोरम चूंकि म्यांमार के चिन राज्य की सीमा से जुड़ा है और यह इलाका तत्मादावों और अलग-अलग चिन समूहों के बीच संघर्ष के कारण काफी हिंसाग्रस्त रहा है. सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों के बीच जिस तरह की जातीय समानता और भाईचारा है, उसके कारण ज्यादातर श्रोता यह जानना चाहते थे कि दो दशकों तक बगावत से बुरी तरह प्रभावित राज्य से मिजोरम भारत के सबसे शांतिपूर्ण और सबसे ज्यादा साक्षरता दर वाले राज्यों में कैसे शामिल हो गया. आगे म्यांमार में शांति बहाल होने के बाद मिजोरम मॉडल को चिन और राखाइन राज्यों में लागू किया जा सकता है, बशर्ते वहां सत्ता चिन समूहों और अराकान आर्मी को दी जाए, जिनका इन राज्यों के ज्यादातर हिस्से पर नियंत्रण है.

म्यांमार को समझने की ज़रूरत है

अफसोस की बात है कि म्यांमार के बारे में भारत में बहुत कम जानकारी है और सार्वजनिक चर्चाओं में उसे अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है. भारत में ज्यादातर लोग म्यांमार को फौजी शासन, बागियों के अड्डों, शरणार्थियों, नशीले पदार्थों या चीनी दबदबे जैसी बातों के नज़रिए से देखते हैं, लेकिन यह अधूरी सोच है. म्यांमार न केवल हमारी ‘एक्ट ईस्ट’ नीति (जो हमारा भविष्य है) के लिए एक ज़मीनी पुल है, बल्कि यह हमारा एक ऐसा पड़ोसी देश भी है जो भारत के लोगों पर काफी भरोसा करता है और काफी सद्भावना रखता है. कई लोगों को यह भी नहीं पता है कि भारत की सबसे लंबी समुद्री सीमा (593 समुद्री मील, यानी 1,098 किमी) म्यांमार के साथ ही है. इसलिए म्यांमार बंगाल की खाड़ी और भारत के अंडमान और निकोबार द्वीपों समेत पूर्वी समुद्री ठिकानों की सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.

अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर और मिजोरम की सुरक्षा सीमा पार होने वाली घटनाओं से पूरी तरह जुड़ी है. अलगाववादी गतिविधियां, नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी, शरणार्थियों की गतिविधियां और जातीय संघर्ष अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहते. मजबूत और दोस्ताना म्यांमार भारत के उत्तर-पूर्वी हिस्से को रणनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ने और बाहरी दबावों के सामने कमजोर होने से बचाता है.

भारत के साथ म्यांमार का सभ्यतागत संबंध सरकारों के बीच कूटनीति से आगे जाता है. संयोग से, म्यांमार का अपने चार अन्य पड़ोसी देशों के साथ ‘फ्री मूवमेंट रिजीम’ (FMR) वाली व्यवस्था नहीं है. भारत सरकार ने FMR को खत्म करने की घोषणा कर दी थी, लेकिन गहराई से देखने पर पता चलता है कि इस व्यवस्था में मामूली बदलाव किया गया है. दोनों देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा पर आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए 43 स्थान बनाए गए हैं. इनके अलावा सीमा पर भौतिक और स्मार्ट बाड़बंदी की गई है. FMR को खत्म करने की घोषणा के बाद से एक लाख से ज्यादा लोग सीमा के आर-पार जा चुके हैं. जरूरत यह है कि इसे सभी लोग समझें.

इसलिए, म्यांमार के बारे में राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रयास करने की ज़रूरत है. भारत के विश्वविद्यालयों में म्यांमार अध्ययन के कार्यक्रम शुरू किए जाएं. भारत में ज्यादा सरकारी अधिकारी, सेना अधिकारी, राजनयिक और शोधकर्ता बर्मी भाषा सीखें और म्यांमार के जातीय समुदायों का अध्ययन करें. उत्तर-पूर्वी भारत के विश्वविद्यालय मांडले, यंगून, नेप्यीताव और दूसरी जगहों के संस्थानों के साथ साझेदारी करें.

भारतीय व्यापारियों को म्यांमार के बाज़ारों और नियमों की बेहतर जानकारी होनी चाहिए. भारतीय मीडिया उस देश में अपने मजबूत नेटवर्क बनाए. बौद्ध संगठन, विश्वविद्यालय, मेडिकल संस्थान और सांस्कृतिक संस्थाएं आपसी संबंधों के विकास में सक्रिय भागीदारी करें. भारत म्यांमार की सरकार के साथ औपचारिक रिश्ते बनाए रखने के अलावा वहां के जातीय समुदायों, सिविल सोसाइटी और अन्य संबंधित पक्षों के साथ मानवीय, शैक्षिक, सांस्कृतिक और विकास से जुड़ी भागीदारी करता रहे. यह तरीका भारत के हितों की रक्षा तो करेगा ही, इससे यह भी जाहिर नहीं होगा कि वह म्यांमार की आंतरिक राजनीति में दखल दे रहा है.

भारतीय वक्ताओं और म्यांमार के समाज और सरकार के अलग-अलग वर्गों के बीच विचारों के आदान-प्रदान ने दोनों पक्षों को एक-दूसरे को अच्छी तरह समझने का मौका दिया. यह दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत बनाने का एक छोटा लेकिन सार्थक प्रयास रहा. बताया जाता है कि इस चर्चा से पहले म्यांमार की सरकार स्विट्जरलैंड, अमेरिका और जर्मनी के संवैधानिक मॉडलों का गहराई से अध्ययन कर रही थी.

इस चर्चा में भाग लेने वाले एक व्यक्ति का कहना था कि इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि म्यांमार को यह एहसास हुआ है कि अगर उसे अपने 2008 के संविधान में कोई बदलाव करना है, तो उसे संवैधानिक और संघीय व्यवस्था के मामले में भारतीय अनुभवों से सीख लेनी चाहिए. इसके अलावा, दोनों देशों में काफी समानताएं हैं, खासकर यह कि दोनों देश अच्छी तरह समझते हैं कि उनकी आबादी विविधताओं से भरी है और उनके सीमावर्ती इलाकों में अस्थिरता है. हमारी साझा संस्कृति, हमारा साझा इतिहास और भूगोल हमारी समानताओं को और मजबूत करते हैं.

लेफ्टिनेंट जनरल प्रदीप सी. नायर (सेवानिवृत्त) असम राइफल्स के पूर्व महानिदेशक हैं. वह फिलहाल हैदराबाद की सेंट मैरीज़ रिहैबिलिटेशन यूनिवर्सिटी के कुलपति हैं. उनका एक्स हैंडल @LtGenPCN है. ये लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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