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Thursday, 30 July, 2026
होममत-विमतभारत फाइलों को डिजिटल बना रहा है, लेकिन उन पर साइन करने का डर अब भी बरकरार

भारत फाइलों को डिजिटल बना रहा है, लेकिन उन पर साइन करने का डर अब भी बरकरार

CPGRAMS पर ज़्यादातर शिकायतें रिश्वत के बारे में नहीं होती हैं; वे किसी फ़ैसले के न लिए जाने के बारे में होती हैं, चाहे वह मंज़ूरी न मिली पेंशन हो या कोई पेंडिंग मंज़ूरी.

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करीब दो हफ्ते पहले शिलांग में केंद्र सरकार ने अपने प्रशासनिक सुधारों का अगला अध्याय खोला. नाम है “नेक्स्ट जेनरेशन एडमिनिस्ट्रेटिव एंड ई-गवर्नेंस रिफॉर्म्स”—आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और नागरिक से उसकी अपनी भाषा में बात करने वाले चैटबॉट. यह सचमुच बड़ी बात है, और मैं उन लोगों में नहीं हूं जो हर नई चीज़ पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं.

आंकड़े भी सिर्फ प्रचार नहीं हैं. 56 करोड़ जन धन खाते. हर महीने 18 अरब लेन-देन संभालने वाला पेमेंट सिस्टम. क़रीब 2,000 पुराने नियम ख़त्म और शिकायत प्रणाली CPGRAMS, जिसमें 2014 में क़रीब 2 लाख शिकायतें आई थीं, अब क़रीब 25 लाख आती हैं. भारत ने प्रशासन की ऐसी बुनियाद खड़ी की है जिसकी कई देश सिर्फ़ कल्पना कर सकते हैं.

लेकिन आख़िरी आंकड़े को ज़रा ग़ौर से देखिए. CPGRAMS की ज़्यादातर शिकायतें रिश्वत मांगने की नहीं होतीं. शिकायत इस बात की होती है कि फ़ैसला ही नहीं हुआ. पेंशन मंज़ूर नहीं हुई. ज़मीन का म्यूटेशन अटका है. कोई मंज़ूरी महीनों से फ़ाइल में पड़ी है. यही वह बात है जो ये सुधार बार-बार चूक जाते हैं. ये प्रक्रिया तेज़ करते हैं. पर असली रुकावट प्रक्रिया नहीं है. असली रुकावट वह अधिकारी है जिसे तंत्र ने सिखा दिया है कि सबसे सुरक्षित रास्ता कोई फ़ैसला न लेना है. सिस्टम कितना भी तेज़ हो जाए, वह वहीं जमा रहता है.

फ़ैसले टालने की इस आदत की जो क़ीमत देश चुकाता है, उसे मैं “फ़ियर (डर का) टैक्स” कहता हूं. इसकी जड़ में एक असमानता है. फ़ैसला लीजिए और वह ग़लत साबित हो जाए, तो दस साल बाद जांच बैठ सकती है. सस्पेंशन हो सकता है. बरसों विभागीय कार्रवाई चल सकती है. पेंशन तक रुक सकती है. और फ़ैसला न लीजिए, तो कोई पूछने वाला नहीं. नुक़सान लगभग शून्य.

पुलिस और सरकार की 33 साल की नौकरी में मैंने जल्दी में दी गई मंज़ूरी पर, पास किए गए टेंडर पर, ऐसी FIR पर जो दर्ज ही नहीं होनी चाहिए थी — जांच बैठते देखी है. लेकिन मुझे एक भी मामला याद नहीं जिसमें जांच सिर्फ़ इसलिए बैठी हो कि फ़ाइल आगे नहीं बढ़ी. ग़लत फ़ैसला करियर ख़त्म कर सकता था. देरी से कभी कुछ नहीं बिगड़ा. जब हिसाब इतना एकतरफ़ा हो, तो अधिकारी की चुप्पी उसकी कमज़ोरी नहीं है. वह उसी सवाल का सही जवाब है जो तंत्र उससे पूछ रहा है.

जब व्यवस्था बदलती है

मैंने यह भी देखा है कि जब आप लोगों को हिम्मत का भाषण देने के बजाय व्यवस्था बदलते हैं, तो क्या होता है. हरियाणा में जब हमने साइबर अपराध से निपटने का ढांचा खड़ा किया, तब खाते से चोरी हुआ पैसा मिनटों में ग़ायब हो जाता था और हमारी कार्रवाई में दिन लग जाते थे. हमने अधिकारियों से ज़्यादा मेहनत करने को नहीं कहा. हमने 1930 हेल्पलाइन को बैंकों से रियल-टाइम में जोड़ दिया, ताकि पैसा खाते में रहते ही फ़्रीज़ हो सके. ब्लॉक की गई रक़म की वसूली क़रीब 7 प्रतिशत से बढ़कर क़रीब 36 प्रतिशत हो गई. हरियाणा इस मामले में देश में अव्वल आ गया.

सुधारों के पैरोकार कहेंगे कि यही तो तकनीक का कमाल है. फ़ाइल ऑनलाइन कर दीजिए, समय-सीमा बांध दीजिए, देरी ख़त्म. काश ऐसा होता. CPGRAMS में आज भी ज़्यादातर शिकायतें कुछ हफ़्तों में “निपटा” दी जाती हैं. पर निपटारा और समाधान एक चीज़ नहीं है. शिकायत को “फ़ॉरवर्ड कर दिया गया”, “जांच जारी है” या “स्पष्टीकरण के लिए वापस” लिखकर बंद किया जा सकता है — बिना वह फ़ैसला लिए जिसके लिए वह आई थी. डर के ऊपर तेज़ डिजिटल सिस्टम बिठा देने से देरी नहीं जाती. सिर्फ़ बहाने पहले से जल्दी बनने लगते हैं.

सरकार इस मर्ज़ से अनजान भी नहीं है. 2018 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में धारा 17A जोड़ी गई—ड्यूटी के दौरान लिए गए फ़ैसलों पर किसी अधिकारी की जांच शुरू करने से पहले सरकार की मंज़ूरी ज़रूरी. मक़सद था कि ईमानदार अधिकारी को भरोसा मिले. पर व्यवहार में कुछ ख़ास नहीं बदला. वजह सीधी है. यह ओट तब मिलती है जब जांच का सवाल उठता है—यानी बरसों बाद. और डर उस पल में होता है जब फ़ाइल सामने पड़ी है और क़लम हाथ में है. डर आज है. सुरक्षा, मिले भी तो, बहुत बाद में मिलती है.

इलाज: सी.ओ.पी. मॉडल

इसका इलाज एक और पोर्टल नहीं है. इलाज वह है जिसे मैं सी.ओ.पी. मॉडल कहता हूं—क्लैरिटी, ओनरशिप, प्रोटेक्शन. यानी फ़ैसले का साफ़ पैमाना, फ़ैसले की नामज़द ज़िम्मेदारी, और फ़ैसला लेने वाले को सुरक्षा.

साफ़ पैमाना—फ़ैसला किस कसौटी पर और कितने दिनों में होगा, यह पहले से लिखा हो. सवाल हां-या-ना में बदला जाए, “विचारार्थ” की खुली छूट में नहीं. ज़िम्मेदारी—हर फ़ैसले पर एक नामज़द अधिकारी हो. फ़ाइल दस मेज़ों पर घूमे, तो फ़ैसला किसी का नहीं रहता. और सुरक्षा जो अधिकारी तय पैमाने पर ईमानदारी से फ़ैसला ले, उसका मूल्यांकन उस जानकारी पर हो जो फ़ैसले के वक़्त उसके पास थी, न कि उस पर जो बाद में साफ़ दिखने लगी. तय पैमाने पर लिया गया फ़ैसला बाद में दोबारा न खोला जाए. यही वह सुरक्षा-कवच है जो धारा 17A काग़ज़ पर देती है और यह मॉडल उसी पल देता है जब क़लम हाथ में है.

इस मॉडल के तीन औज़ार हैं, और तीनों बिना किसी नए बजट के लग सकते हैं.

पहला, मौन सहमति. जिन विभागों की राय चाहिए, उन्हें सात कामकाजी दिन दीजिए. आपत्ति आए तो दर्ज हो, न आए तो सहमति मान ली जाए और फ़ाइल आगे बढ़े. अभी चुप्पी फ़ाइल रोकती है. मौन सहमति के बाद चुप्पी फ़ाइल चलाएगी.

दूसरा, स्टेज-ट्रैकिंग. हर फ़ाइल का हर पड़ाव दर्ज हो — किस मेज़ पर कितने दिन रुकी. और हर तिमाही हर दफ़्तर का हिसाब उसके बराबर के दफ़्तरों के सामने रखा जाए: कितनी फ़ाइलें निपटीं, कितनी रुकीं, कितने दिन गए. यह सज़ा नहीं, आईना है. जो नौकरशाही अदृश्य रहने की आदी हो, उस पर आईने का असर देखकर आप चौंक जाएंगे.

तीसरा, और सबसे सस्ता — सालाना गोपनीय रिपोर्ट यानी ACR में एक कॉलम निष्क्रियता का भी हो. अभी अधिकारी के रिकॉर्ड में ग़लत फ़ैसले का पूरा खाता है, पर न लिए गए फ़ैसले का कोई ज़िक्र नहीं. जिस दिन रुकी हुई फ़ाइल अधिकारी की ACR में उतरने लगेगी, उस दिन टालना मुफ़्त नहीं रह जाएगा. और सरकार की सफलता इससे नापी जाए कि नागरिक का काम हुआ या नहीं, सिर्फ़ इससे नहीं कि प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं. इसे “निर्णय की रफ़्तार” कहिए. यही पैमाना पूरे तंत्र में सबसे ज़्यादा ग़ायब है.

अब AI की कहानी का सबसे अहम हिस्सा. AI नोट बना देगा. शिकायत का अनुवाद कर देगा. गड़बड़ी पकड़ लेगा. यानी हर कदम की लागत लगभग शून्य कर देगा. पर एक कदम बचेगा जिस पर निजी ज़िम्मेदारी लिखी है — दस्तख़त. और जब आसपास की पूरी प्रक्रिया पलक झपकते होने लगेगी, तब रुकी हुई फ़ाइल धीमे सिस्टम की देन नहीं लगेगी. वह साफ़-साफ़ एक चुनाव दिखेगी. अधिकारी पहले से ज़्यादा असुरक्षित महसूस करेगा, और ख़ुद को बचाने के लिए वही करेगा जो तंत्र उसे करने देता है — एक और स्पष्टीकरण मांगेगा. हम पूरी प्रक्रिया ऑटोमेट कर देंगे और ठीक वहीं रुक जाएंगे जहां डर का टैक्स वसूला जाता है.

फ़ाइल उतनी ही तेज़ चलती है जितनी तेज़ी से फ़ैसला लेने का डर घटता है. डर घटाइए, सरकार की रफ़्तार बढ़ जाएगी. डर वहीं रहा, तो ये सारे सुधार हमें दुनिया की सबसे आधुनिक कतार देकर विदा हो जाएंगे.

ओपी सिंह एक रिटायर्ड IPS अधिकारी और हरियाणा के पूर्व डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DGP) हैं. उनका एक्स हैंडल @opsinghips है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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