तमिलनाडु के दक्षिणी समुद्री तट पर जाने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसे मछुआरा समुदायों को देखेगा, जिन्होंने समुद्र का किनारा पीछे खिसकने की वजह से अपनी ज़मीन और रोज़ी-रोटी खो दी है. उनके घर हमेशा के लिए समुद्र में बह गए. यह सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि ज़मीन पर 20,000 करोड़ रुपये की लूट का असली असर है.
विडंबना यह है कि यह लूट पिछले 25 साल से ज्यादा वक्त से कई सरकारों के दौरान चल रही है और जब आप यह पढ़ रहे हैं, तब भी जारी है. इसके लिए सिर्फ एक सरकार जिम्मेदार नहीं है, बल्कि पूरा सिस्टम जिम्मेदार है.
2002-03 से लेकर करीब 2016 तक 88.4 लाख मीट्रिक टन रेत की अवैध ढुलाई की गई. इससे तूतीकोरिन (थूथुकुडी), तिरुनेलवेली और कन्याकुमारी जिलों में 5,832 करोड़ रुपये से ज्यादा की रॉयल्टी और जुर्माना सरकार को नहीं मिला. सरकार के लिए इतनी बड़ी आय का नुकसान बेहद गंभीर मामला है.
अवैध रेत खनन को समझने के लिए पहले यह समझना ज़रूरी है कि रेत कितने प्रकार की होती है. मुख्य रूप से दो तरह की रेत होती है—नदी की रेत और समुद्र तट (बीच) की रेत. दोनों का इस्तेमाल और महत्व अलग-अलग है. नदी की रेत कावेरी, पालार, वैगई, भवानी और थामिरबरानी जैसी नदियों से निकाली जाती है. इससे नदियों का तल, भूजल स्रोत और राज्य के प्राकृतिक जल संसाधन बुरी तरह प्रभावित होते हैं. इस रेत का सबसे ज्यादा इस्तेमाल निर्माण कार्यों में होता है.
दूसरी है समुद्र तट की रेत. इसमें कई कीमती और दुर्लभ खनिज पाए जाते हैं, जैसे गार्नेट, मोनाजाइट, इल्मेनाइट और थोरियम. इनमें मोनाजाइट एक रेडियोधर्मी खनिज है. परमाणु ऊर्जा उत्पादन में इसके महत्व की वजह से इसका संबंध देश की राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा है. यह समुद्र तट की रेत थूथुकुडी, तिरुनेलवेली और कन्याकुमारी जिलों में अवैध रूप से खनन की जाती है.
प्रक्रिया और वजहें
यह पूरा काम समुद्र तट और नदियों से रेत निकालने से शुरू होता है. वन और राजस्व विभाग की गश्त से बचने के लिए यह काम रात 12 बजे से सुबह 4 बजे के बीच किया जाता है. इसके बाद रेत को छोटी-छोटी गाड़ियों—जैसे साइकिल, ऑटो-रिक्शा और दोपहिया वाहनों से छिपे हुए ठिकानों तक पहुंचाया जाता है. इन वाहनों का पता लगाना मुश्किल होता है और ये आसानी से पुलिस की नज़र से बच जाते हैं.
इसके बाद रेत को बड़ी मात्रा में आगे भेजा जाता है. इसे नकली परमिट और बिना सही दस्तावेज़ के ट्रकों में भरकर पीछे के रास्तों और छोटी सड़कों से ले जाया जाता है, ताकि पकड़े जाने से बचा जा सके. इसके बाद यह रेत गोदामों में पहुंचती है और वहां से बाज़ार की कीमत से कम दाम पर निर्माण स्थलों और ठेकेदारों को बेच दी जाती है. इससे कानूनी तरीके से रेत बेचने वाले कारोबारियों को नुकसान होता है. जांच में यह भी सामने आया है कि अवैध रेत खनन करने वालों के राज्य के कुछ नेताओं से संबंध हैं.
दिलचस्प बात यह है कि IAS अधिकारी यू. सगायम जब कांचीपुरम में अतिरिक्त जिलाधिकारी (एडीएम) थे, तब उन्होंने पालार नदी के तल में अवैध रेत खनन रोकने का आदेश दिया था. इसके बाद रेत माफिया ने उन पर हमला करवाया, धमकियां दीं और उनका तबादला करवा दिया. यह उनके करियर का पहला तबादला था. पूरे करियर में उनका 26 बार तबादला हुआ. हर बार उन्होंने माफिया के खिलाफ रिपोर्ट दी या कार्रवाई की, तो उनका तबादला कर दिया गया.
तमिलनाडु में तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण और निर्माण कार्यों की वजह से रेत की मांग कई गुना बढ़ गई है. कानूनी तरीके से मिलने वाली रेत बहुत कम है, इसलिए अवैध रेत कम कीमत पर इस कमी को पूरा करती है. यही वजह है कि यह धंधा खरीदने और बेचने, दोनों पक्षों के लिए बहुत फायदे का सौदा बन गया है. थूथुकुडी, तिरुनेलवेली और कन्याकुमारी में 64 खनन पट्टों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां मिलने की बात सामने आई है.
2013 में तमिलनाडु सरकार और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने तूतीकोरिन (थूथुकुडी) और कन्याकुमारी जिलों में समुद्र तट की रेत के खनन पर पूरी तरह रोक लगा दी थी. इसके बावजूद अवैध खनन आज भी जारी है.
2000 से 2008 के बीच कुछ कंपनियों के एक समूह ने दक्षिणी तट से 34 लाख टन से ज्यादा रेत निकाली. इस रेत में गार्नेट, इल्मेनाइट, मोनाजाइट और थोरियम जैसे खनिज थे. यह तब हुआ, जबकि 2002 में परमाणु ऊर्जा विभाग ने इन कंपनियों के लाइसेंस रद्द कर दिए थे क्योंकि ये इलाके IREL के लिए आरक्षित थे. इसके बावजूद मोनाजाइट, जिसमें थोरियम होता है और जो भारत के तीन-चरण वाले परमाणु कार्यक्रम का अहम हिस्सा है, का अवैध खनन किया गया और फिर उसे विदेशों में निर्यात कर दिया गया. वह खनिज कहां गया? किसने खरीदा? इसका जवाब आज तक किसी के पास नहीं है.
खतरे में पड़ता पर्यावरण
कावेरी, पालार, वैगई और थामिरबारानी नदियों से अवैध रेत खनन की वजह से भूजल स्तर लगातार नीचे गया है. इससे आसपास के इलाकों में मीठे पानी के स्रोत और जलजीवों का पूरा तंत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है. मछलियों की संख्या भी काफी कम हो गई है.
वहीं, समुद्र तट की रेत के खनन से समुद्र का किनारा तेज़ी से कट रहा है. इससे आसपास रहने वाले मछुआरों की आजीविका पर भी खतरा पैदा हो गया है. भूजल स्तर में भारी गिरावट की वजह से कई जिलों में पीने के पानी की उपलब्धता भी प्रभावित हुई है. लोगों को सूखे, गंदे पानी, पीने के पानी की कमी, सिंचाई में दिक्कत और आसपास की जमीन कमजोर होने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.
रोकथाम के लिए उठाए गए कदम
2015 में न्यायपालिका ने इस मामले का स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) लिया. इसके बाद एक जनहित याचिका की वजह से यह मामला चलता रहा, जबकि रेत माफिया से जुड़े समूह इसका लगातार विरोध कर रहे थे. फिर अप्रैल 2024 में केंद्रीय जांच एजेंसियों ने रेत खनन से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में तिरुचिरापल्ली, तंजावुर, करूर, वेल्लोर और अरियालुर जिलों में कई जगह छापे मारे और जिला अधिकारियों (कलेक्टरों) से पूछताछ की. इसके बाद फरवरी 2025 में मद्रास हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार, मिलीभगत और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों का हवाला देते हुए समुद्र तट की रेत के खनन की जांच का आदेश दिया. इसके बाद 12 जगहों पर छापेमारी की गई और IREL ने खनिज के भंडार अपने कब्जे में ले लिए.
हालांकि, अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई तक मद्रास हाई कोर्ट के CBI जांच के आदेश पर रोक लगा दी, लेकिन नकली परमिट मिलने से अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं. जांच एजेंसियों द्वारा जिला कलेक्टरों से पूछताछ और हाई कोर्ट के प्रतिबंध के बावजूद सिस्टम का उसे नजरअंदाज करना, राज्य सरकार की विश्वसनीयता और साख के लिए गंभीर खतरा है. इससे लोगों और बाहर से देखने वालों के बीच यह संदेश जाता है कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल सिर्फ राजनीतिक हथियार की तरह किया जाता है और उन्हें स्वतंत्र और प्रभावी तरीके से काम नहीं करने दिया जाता. इस स्थिति को तुरंत बदलने की ज़रूरत है.
अब क्या होना चाहिए?
सिस्टम के अंदर या बाहर से बदलाव अब तक बहुत धीमा रहा है, लेकिन अब बदलाव तेज़ और पूरी तरह होना चाहिए, ताकि इस पूरे सिस्टम पर काबू पाया जा सके. रेत माफिया और उससे जुड़े पूरे नेटवर्क पर बड़े स्तर पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और पूरी प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता रखी जानी चाहिए. रेत खनन पर नज़र रखने के लिए सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाए जाने चाहिए. निगरानी की व्यवस्था और मजबूत होनी चाहिए. रेत ढोने वाले वाहनों और खनन क्षेत्रों में जीपीएस और ड्रोन से निगरानी अनिवार्य की जानी चाहिए. लगातार और नियमित जांच अब ज़रूरी है. हाई कोर्ट की निगरानी में 64 खनन पट्टों से बकाया राशि की सही, सीधे और निगरानी वाली वसूली की जानी चाहिए.
इसके साथ ही व्हिसलब्लोअर प्रोटेक्शन एक्ट लागू करने के लिए भी कदम उठाए जाने चाहिए, ताकि फील्ड अधिकारी, जिला कलेक्टर और राजस्व विभाग के अधिकारी सुरक्षित रह सकें. माफिया के खिलाफ कार्रवाई करने पर इन्हें अक्सर जान से मारने की धमकियां मिलती हैं.
लोगों का अपने घर खो देना, किसानों का अपनी ज़मीन खो देना, पीने के पानी की कमी, सूखा और देश के लिए महत्वपूर्ण खनिज भंडार का खत्म होना ऐसे नुकसान हैं, जिन्हें वापस नहीं लाया जा सकता. राज्य सरकार की निष्क्रियता के गंभीर नतीजे सामने आ रहे हैं. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि लालच और भ्रष्टाचार की कीमत आखिर कब तक बेगुनाह लोग चुकाते रहेंगे? राज्य कब हिम्मत दिखाकर इस पर सख्त कार्रवाई करेगा?
कार्ति पी चिदंबरम शिवगंगा से सांसद और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य हैं. वे तमिलनाडु टेनिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष भी हैं. उनका सोशल मीडिया हैंडल @KartiPC है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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