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Monday, 27 July, 2026
होममत-विमतकैसे भारत के युवाओं ने BJP के सबसे बड़े राजनीतिक हथियार को उसी के खिलाफ इस्तेमाल किया

कैसे भारत के युवाओं ने BJP के सबसे बड़े राजनीतिक हथियार को उसी के खिलाफ इस्तेमाल किया

पिछले दो दिनों में, नरेंद्र मोदी ने एल्गोरिदम को अपने पक्ष में करने की कोशिश की. उन्होंने Gen Z से जुड़ने की उम्मीद में रील्स बनाईं, लेकिन नुकसान की भरपाई करने की यह कोशिश उल्टी पड़ गई.

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जब आवाजें एक साथ मिलती हैं, तो ताकत सामूहिक बन जाती है. और जब ऐसा होता है, तो बड़े से बड़ा ताकतवर व्यक्ति भी समझ जाता है कि वह उतना अजेय नहीं है, जितना वह खुद को मानने लगा था.

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा अप्रत्याशित था. 29 दिनों तक छात्र प्रदर्शन कर रहे थे और इसके बाद सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल शुरू कर दी थी. लेकिन फिर 20 जुलाई आया, और दिल्ली की सड़कें उस पीढ़ी से भर गईं, जिसे शायद सरकार ने सोचा था कि बैरिकेड लगाकर, मेट्रो स्टेशन बंद करके और पर्याप्त पुलिस तैनात करके रोका जा सकता है.

उन्हें लगा था कि डर छात्रों को पीछे हटने पर मजबूर कर देगा.

लेकिन इसी समय एक और चीज भी हो रही थी. और वह ऐसे मैदान में हो रही थी, जिसे बीजेपी शायद भारत की किसी भी दूसरी राजनीतिक पार्टी से बेहतर समझती है. सोशल मीडिया.

उल्टा पड़ गया दांव

एक दशक से भी ज्यादा समय से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी इंटरनेट की राजनीति में माहिर हो चुके थे. तस्वीर, हैशटैग, सोच-समझकर बनाए गए वीडियो, वायरल क्लिप और पारंपरिक मीडिया को पीछे छोड़कर लोगों से सीधा संवाद. ये सब उनकी राजनीति के सिर्फ साधन नहीं थे. ये उनकी राजनीति की संरचना का हिस्सा थे. लेकिन एक महीने के अंदर, और खासकर पिछले एक हफ्ते में, एल्गोरिदम धीरे-धीरे उनसे दूर जाने लगे.

पिछले दो दिनों में खुद प्रधानमंत्री ने एल्गोरिदम को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश की. उन्होंने Gen Z से जुड़ने की उम्मीद में रील्स बनाईं. लेकिन नुकसान की भरपाई करने की यह कोशिश उलटी पड़ गई. जैसे ही मोदी के वीडियो सामने आए, वैसे ही उन्हें काटा गया, रीमिक्स किया गया, मीम बनाया गया और मजाकिया पंचलाइन में बदल दिया गया. हालात संभालने की एक और कोशिश भी नया कंटेंट बन गई.

प्रधानमंत्री Gen Z से उनकी भाषा में बात कर रहे थे. Gen Z भी अपनी भाषा में जवाब दे रहे थे.

आखिर Gen Z वह युवा पीढ़ी नहीं है जो लंबे फेसबुक पोस्ट लिखते हुए बड़ी हुई हो या शाम की न्यूज बुलेटिन का इंतिजार करती हो कि उस दिन क्या हुआ यह पता चले. वे TikTok, Snapchat, Instagram, YouTube Shorts, एडिट्स, रीमिक्स और मीम्स के साथ बड़े हुए हैं. वे सहज रूप से वह सब समझते हैं, जिसे पिछली पीढ़ियों को पेशेवर तरीके से सीखना पड़ा था. जैसे तीन सेकंड में ध्यान खींचना, एक तस्वीर को तर्क में बदलना और किसी चीज को तेजी से फैलाना.

और बीजेपी का सामना ऐसे राजनीतिक विरोधी से हुआ, जिसे वह न तो आसानी से ज्यादा बेहतर कंटेंट बनाकर हरा सकती थी और न ही बेहतर मीम बनाकर.

यही बात इस आंदोलन को देखने के लिए इतना दिलचस्प बनाती है. इसकी राजनीतिक भाषा पुरानी पीढ़ी से नहीं ली गई थी. यह हमेशा भाषण, पर्चे या घोषणापत्र के रूप में सामने नहीं आई. यह एक मीम के रूप में आई, एक खराब तरीके से बनाए गए पोस्टर के रूप में आई, बॉलीवुड गाने पर एडिट की गई रील के रूप में आई और पुलिस की कार्रवाई को कुछ ही घंटों में ऐसे कंटेंट में बदल दिया गया, जिसे देखकर हजारों लोग हंसने लगे.

और फिर इंटरनेट सड़क पर उतर आया.

ऑनलाइन से ऑफलाइन तक

जिस बेबाक और मजाकिया अंदाज को मैं अपने फोन पर देख रही थी, वही जंतर-मंतर पर भी दिखाई दिया. सड़क ने इंस्टाग्राम को कंटेंट दिया. इंस्टाग्राम ने और ज्यादा युवाओं को सड़क की ओर भेज दिया.

Gen Z पर बार-बार आरोप लगाया गया है कि उनका ध्यान बहुत जल्दी भटक जाता है. लेकिन 2026 के इस मानसून में उन्होंने उसी छोटी ध्यान अवधि को राजनीतिक हथियार में बदलने का तरीका खोज लिया. किसी तर्क के लिए 30 सेकंड काफी थे. किसी दिखावे की हवा निकालने के लिए एक मीम काफी था. और जब करोड़ों फोन पर फैला मजाक सबका बन गया, तो उसे नियंत्रित करना लगभग असंभव हो गया.

यही कारण है कि प्रधान का इस्तीफा सिर्फ एक मंत्री के जाने से कहीं बड़ा है. और इसका पूरा श्रेय सिर्फ सोशल मीडिया को देना बहुत सरल सोच होगी. लेकिन ऑनलाइन हुई घटनाओं को सिर्फ पृष्ठभूमि का शोर समझना भी उतना ही गलत होगा.

क्योंकि इस प्रदर्शन ने 21वीं सदी के विरोध का एक नया चक्र दिखाया. सड़क ने कंटेंट बनाया, कंटेंट ने सड़क को बड़ा किया और दोनों ने मिलकर राजनीतिक दबाव बनाया.

शायद प्रधान के इस्तीफे के पीछे यही बड़ी कहानी है. यह नहीं कि इंस्टाग्राम ने एक मंत्री को हटा दिया. राजनीति इतनी सीधी नहीं होती. बल्कि यह कि जिस सरकार ने वायरल राजनीति को समझने और इस्तेमाल करने में महारत हासिल कर ली थी, उसने देखा कि जब वायरल होने की ताकत दूसरी तरफ चली जाए तो क्या होता है. कई सालों तक सोशल मीडिया ने नरेंद्र मोदी को राजनीतिक रूप से अजेय छवि बनाने में मदद की. लेकिन इस हफ्ते उसी सोशल मीडिया पर पली-बढ़ी एक पीढ़ी ने सबको बता दिया कि अजेय दिखने वाली छवि का भी मीम बनाया जा सकता है, उसका मजाक उड़ाया जा सकता है और उसे झुकने पर मजबूर किया जा सकता है.

आज एल्गोरिदम बदल चुका है. सड़कें भी हलचल में आ गई हैं. आगे क्या होगा, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा, क्योंकि अगली राजनीतिक लड़ाई दो मोर्चों पर लड़ी जाएगी. सड़क पर और इंटरनेट पर.

श्रुति व्यास नई दिल्ली स्थित पत्रकार हैं. वह राजनीति, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और करंट अफेयर्स पर लिखती हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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