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Saturday, 31 October, 2026
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पाकिस्तान कश्मीरियों के लिए आज़ादी चाहता है. फिर PoK को वही आज़ादी क्यों नहीं?

पाकिस्तान 27 अक्टूबर को ब्लैक डे कहता है, लेकिन 22 अक्टूबर के हमले को नज़रअंदाज़ करता है, जिसमें हज़ारों लोगों का नरसंहार हुआ था. इससे पाकिस्तान का दोहरा रवैया सामने आता है.

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एक बार फिर पाकिस्तान ने इस साल 27 अक्टूबर को कश्मीर ब्लैक डे के तौर पर मनाया.

जो लोग इतिहास से अनजान हैं, उनके लिए बता दें कि 27 अक्टूबर 1947 को भारतीय सैनिक श्रीनगर पहुंचे थे. इससे एक दिन पहले महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए थे और सैन्य मदद मांगी थी. पाकिस्तान इस तारीख को ब्लैक डे के तौर पर याद करता है.

लेकिन 22 अक्टूबर 1947 का क्या?

यह वह दिन था, जब पाकिस्तान के समर्थन वाले कबायली लड़ाके कश्मीर में दाखिल हुए थे. इसके बाद हिंसा, लूटपाट और हत्याएं हुईं. बारामूला सबसे ज्यादा प्रभावित जगहों में से एक बना. पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को इसका सामना करना पड़ा और इस हिंसा ने मुसलमानों को भी नहीं बख्शा.

यूरोपियन फाउंडेशन फॉर साउथ एशियन स्टडीज (ईएफएसएएस) की ओर से प्रकाशित एक टिप्पणी के मुताबिक, उस साल सिर्फ 26 अक्टूबर को बारामूला के करीब 11,000 निवासियों का नरसंहार किया गया था. यह संगठन का अनुमान है और मौतों की सही संख्या तय करना अब भी मुश्किल है, लेकिन हमले की क्रूरता के बारे में पर्याप्त दस्तावेज मौजूद हैं.

इसी पृष्ठभूमि में सिंह ने भारत से सैन्य मदद मांगी थी. भारतीय सैनिक 27 अक्टूबर को पहुंचे, उन्होंने पाकिस्तानी सेना को श्रीनगर की ओर आगे बढ़ने से रोका और बाद में बारामूला को फिर से अपने कब्ज़े में ले लिया.

इससे किसी को भी यह सवाल करना चाहिए कि 27 अक्टूबर को ब्लैक डे के तौर पर क्यों याद किया जाता है, जबकि 22 अक्टूबर, जिस दिन हमला शुरू हुआ था, उसे पाकिस्तान की हर साल की याद में इतनी कम जगह क्यों मिलती है.

कश्मीर पर पाकिस्तान का दोहरा रवैया

मुझे यह बात दिलचस्प लगती है कि पाकिस्तान खुद को कश्मीरियों के अधिकारों का रक्षक बताता है. हर 27 अक्टूबर को हम मानवाधिकारों के उल्लंघन, आजादी पर पाबंदियों और कश्मीरियों को “नैतिक, राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन” देने के वादों के बारे में सुनते हैं.

लेकिन कश्मीरियों की तकलीफ में पाकिस्तान की अपनी भूमिका का क्या?

दशकों से पाकिस्तान समर्थित उग्रवाद और आतंकवाद का जम्मू-कश्मीर की ज़िंदगी पर भयानक असर पड़ा है. साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल (एसएटीपी) के मुताबिक, 2000 से 24 अक्टूबर 2026 तक जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से जुड़ी 22,412 घटनाएं हुई हैं.

संख्या पर ध्यान दीजिए. यह 100 या 200 नहीं, बल्कि कई हजार है.

इन घटनाओं का असर आम लोगों पर पड़ा है, जिनकी ज़िंदगी डर, हिंसा और अनिश्चितता से प्रभावित हुई है. परिवारों ने अपने लोगों को खोया है, बच्चे संघर्ष के बीच बड़े हुए हैं और कई पीढ़ियों ने इसकी कीमत चुकाई है.

जबकि पाकिस्तान कश्मीर में ‘मानवाधिकारों के उल्लंघन’ का आरोप लगाता रहता है और वहां के लोगों के लिए ‘आजादी’ की मांग करता है, मैं सोचता हूं कि इस्लामाबाद के अवैध नियंत्रण वाले कश्मीर के दूसरे हिस्से में उन्हीं अधिकारों का कितना सम्मान किया जा रहा है.

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में जो हो रहा है, उसे देखिए.

जो शुरुआत आटे की कीमत और बिजली के भारी बिलों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन से हुई थी, वह धीरे-धीरे राजनीतिक प्रतिनिधित्व और क्षेत्र के शासन में ज्यादा भागीदारी की मांग करने वाले बड़े आंदोलन में बदल गई.

ये आम लोग थे, जो अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी और अपने भविष्य को लेकर सवाल उठा रहे थे. पीओके के प्राकृतिक संसाधनों का आर्थिक शोषण, खासकर झेलम और नीलम नदियों पर बिजली परियोजनाओं के जरिए, जिससे पंजाब प्रांत को फायदा होता है, लोगों के गुस्से का असली कारण है.

लेकिन जून 2026 में पाकिस्तानी अधिकारियों ने आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी पर प्रतिबंध लगा दिया. विरोध प्रदर्शन जारी रहे, लोगों को गिरफ्तार किया गया और इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदी लगा दी गई. इस अशांति के कारण जानलेवा झड़पें भी हुईं.

अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों पर सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा करने का आरोप लगाया. लेकिन एमनेस्टी इंटरनेशनल समेत मानवाधिकार संगठनों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानूनों के इस्तेमाल और उनकी आज़ादी पर लगी पाबंदियों पर सवाल उठाए. रिपोर्टों में 32 से ज्यादा नागरिकों की मौत, इंटरनेट बंद किए जाने और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों की जानकारी दर्ज की गई.

जिस बात ने मेरा खास ध्यान खींचा, वह कोटली के स्कूल शिक्षक तारिक रहमान की चुनावों को लेकर द डिप्लोमैट से कही बात थी. उन्होंने चुनावों को दिखावा बताया और सवाल किया कि क्या आम कश्मीरियों की वास्तव में कोई भूमिका है, जब उनके मुताबिक पाकिस्तान की सेना राजनीतिक प्रक्रिया को नियंत्रित करती है. यह उस व्यक्ति की ओर से लगाया गया गंभीर आरोप है, जो खुद उसी क्षेत्र में रहता है.

पीओके की आज़ादी का सवाल

अगर पाकिस्तान मानता है कि कश्मीरियों को अपना भविष्य खुद तय करने की आज़ादी होनी चाहिए, तो यह आज़ादी पीओके से शुरू नहीं होनी चाहिए? क्या उन्हें बिना डर के विरोध प्रदर्शन करने, अपनी सरकार पर सवाल उठाने, इंटरनेट इस्तेमाल करने और अपने प्रतिनिधि चुनने की आजादी नहीं होनी चाहिए?

सीमा पार कश्मीरियों की राजनीतिक आज़ादी की बात करना मुश्किल है, जब घर में उन्हीं आज़ादियों की रक्षा करने में परेशानी हो रही हो.

और इससे एक और सवाल उठता है कि पीओके में रहने वाले कश्मीरियों को अपना राजनीतिक भविष्य तय करने की वास्तव में कितनी आज़ादी है.

28 अप्रैल 1949 को वापस चलते हैं, जब पाकिस्तान, पीओके सरकार और ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के प्रतिनिधियों के बीच कराची समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे.

इस समझौते के तहत पाकिस्तान ने क्षेत्र की रक्षा, विदेश संबंधों और संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी बातचीत की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली. वहीं स्थानीय क्षेत्रीय प्रशासन को रोजमर्रा का घरेलू शासन चलाने की जिम्मेदारी दी गई.

लेकिन असली बात बारीकियों में छिपी है. दिलचस्प बात यह है कि क्षेत्र के अपने संविधान में राजनीतिक पसंद को लेकर प्रावधान हैं. तथाकथित आज़ाद जम्मू और कश्मीर अंतरिम संविधान अधिनियम, 1974 की धारा 7(2) के तहत लोग और राजनीतिक दल क्षेत्र के पाकिस्तान के साथ विलय के खिलाफ गतिविधियों को बढ़ावा नहीं दे सकते.

एक पल के लिए इस मजाक के बारे में सोचिए.

पाकिस्तान दशकों से मांग करता आया है कि भारतीय कश्मीरियों को अपना भविष्य खुद तय करने का अधिकार दिया जाए. लेकिन पीओके में पाकिस्तान से अलग भविष्य के लिए खुले तौर पर अभियान चलाने पर संवैधानिक पाबंदियां हैं.

पाकिस्तान की कश्मीर नीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि वह नियंत्रण रेखा के एक तरफ कश्मीरियों के लिए आजादी की मांग करता है, जबकि दूसरी तरफ राजनीतिक विकल्पों पर पाबंदियां लगाता है.

दशकों से पाकिस्तान खुद को कश्मीरियों की आवाज़ और उनके अधिकारों का समर्थक बताता रहा है. लेकिन पीओके के लोगों की अपनी आवाज, अपनी चिंताएं और भविष्य को लेकर अपने विचार हैं. उन्हें इन्हें ज़ाहिर करने के लिए इस्लामाबाद की अनुमति की जरूरत नहीं होनी चाहिए.

राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व को लेकर यही सवाल गिलगित-बाल्टिस्तान में भी ध्यान देने लायक हैं.

अब समय आ गया है कि पाकिस्तान खुद से एक आसान सवाल पूछे: क्या वह वास्तव में कश्मीरियों की ‘आजादी’ की रक्षा कर रहा है, या सिर्फ कश्मीरियों को पाकिस्तान से सहमत होने की ‘आजादी’ की?

आमना बेगम अंसारी एक कॉलमिस्ट, राइटर और टीवी न्यूज़ पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय अमाना एंड खालिद’ नाम का एक वीकली यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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