नई दिल्ली: केदारनाथ जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए हेलिकॉप्टर की सवारी मुश्किल पैदल यात्रा को कुछ ही मिनटों के सफर में बदल सकती है. लेकिन पहाड़ों की तलहटी से हिमालय में स्थित मंदिर तक की यह छोटी उड़ान कोई आम सफर नहीं है. हेलिकॉप्टर को संकरी घाटियों, ऊंची पहाड़ी चोटियों और बदलते मौसम के बीच से गुजरना पड़ता है. इस दौरान रास्ता बदलने या आपात स्थिति में हेलिकॉप्टर उतारने की जगह भी अक्सर बहुत कम होती है.
30 अक्टूबर को बद्रीनाथ से देहरादून जा रहा ट्रांस भारत एविएशन का एक हेलिकॉप्टर जोशीमठ के पास लापता हो गया. इसके बाद इन उड़ानों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं फिर सामने आईं. हेलिकॉप्टर ने दोपहर करीब 1.12 बजे उड़ान भरी थी. उसमें पायलट समेत छह लोग सवार थे. बाद में अधिकारियों ने पुष्टि की कि हेलिकॉप्टर चमोली जिले के चायी गांव के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था.
2025 में चार धाम यात्रा के दौरान हेलिकॉप्टर दुर्घटनाओं की एक के बाद एक घटनाओं ने पायलटों के अनुभव, मौसम पर नजर रखने, उड़ानों के समय और नियामक निगरानी को लेकर सवाल खड़े कर दिए थे. सबसे गंभीर घटनाओं में से एक 15 जून को हुई थी. उस दिन केदारनाथ से गुप्तकाशी जा रहा एक हेलिकॉप्टर गौरीकुंड के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. उसमें छह यात्री और एक पायलट सवार थे. इस हादसे में सभी की मौत हो गई थी.
विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (AAIB) की अंतिम रिपोर्ट अक्टूबर 2026 में जारी हुई. रिपोर्ट में बताया गया कि तेजी से नीचे आते बादल, उसी रास्ते और ऊंचाई पर उड़ान जारी रखने का फैसला और केदारनाथ घाटी में पायलट का सीमित अनुभव दुर्घटना के कारणों में शामिल थे.
तो आखिर इन उड़ानों को इतना मुश्किल क्या बनाता है, बार-बार दुर्घटनाएं क्यों हुई हैं और हिमालय में श्रद्धालुओं को ले जाने की जिम्मेदारी किस तरह के पायलटों को सौंपी जाती है?
हिमालय में उड़ान भरना इतना मुश्किल क्यों
हेलिकॉप्टर को अक्सर सामान्य हवाई जहाजों से ज्यादा सुविधाजनक माना जाता है, क्योंकि वे सीधे ऊपर उठकर उड़ान भर सकते हैं, सीधे नीचे उतर सकते हैं, हवा में एक जगह रुक सकते हैं और छोटे हेलीपैड से भी उड़ान भर सकते हैं. लेकिन इन खूबियों का यह मतलब नहीं है कि ऊंचाई पर उड़ान भरते समय उन्हें मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ता.
सबसे बड़ी मुश्किलों में से एक ऊंचाई पर हवा का पतला होना है. जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, हवा का घनत्व कम होता जाता है. इससे हेलिकॉप्टर के रोटर ब्लेड से मिलने वाला उठाव कम हो जाता है और इंजन की उपलब्ध ताकत भी घट जाती है. इसका मतलब है कि कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की तुलना में हेलिकॉप्टर के पास ऊपर चढ़ने, हवा में एक जगह रुकने या वजन उठाने की क्षमता कम हो जाती है.
उड़ान भरते और उतरते समय यह समस्या खास तौर पर अहम होती है, क्योंकि उस समय हेलिकॉप्टर को खुद को और उसमें सवार यात्रियों को ऊपर उठाने के लिए पर्याप्त ताकत की जरूरत होती है. हेलिकॉप्टर को सुरक्षित तरीके से उड़ाया जा सकता है या नहीं, यह तय करने से पहले ऑपरेटरों को उसके वजन, ईंधन, तापमान, हवा की स्थिति और ऊंचाई का ध्यान रखना पड़ता है.
उदाहरण के लिए, केदारनाथ का हेलीपैड समुद्र तल से करीब 11,500 फीट की ऊंचाई पर है. इतनी ऊंचाई पर काम करने के लिए बनाए गए हेलिकॉप्टर को भी सीमित क्षमता के भीतर ही उड़ान भरनी पड़ती है.
पहाड़ी इलाका मुश्किल को और बढ़ा देता है. मैदानी इलाकों में उड़ान भरते समय पायलट के पास रास्ता बदलने या नीचे उतरने के ज्यादा विकल्प होते हैं. लेकिन पहाड़ों में रास्ते अक्सर संकरी घाटियों से होकर गुजरते हैं, जिनके दोनों ओर खड़ी ढलानें होती हैं. अगर हेलिकॉप्टर के सामने कोई रुकावट आ जाए, तेज हवा चलने लगे या दिखाई देना कम हो जाए, तो पायलट के पास बहुत कम विकल्प बचते हैं.
पहाड़ों में हवा का रुख भी अचानक बदल सकता है. जब हवा पहाड़ी चोटियों के ऊपर से गुजरती है, तो इससे हवा में झटके लग सकते हैं, हवा नीचे की ओर धकेल सकती है और हवा की दिशा अचानक बदल सकती है. इन हालात में हेलिकॉप्टर को स्थिर रखना और छोटी जगहों पर उतरना ज्यादा मुश्किल हो जाता है.
मौसम शायद सबसे अहम कारक है. पहाड़ों की चोटियों के आसपास बादल तेजी से बन सकते हैं और नीचे घाटियों तक आ सकते हैं. इससे पायलट को आसपास के पहाड़ी इलाके दिखाई देना बंद हो सकता है. बारिश, कोहरा और कम दृश्यता के कारण आगे का रास्ता और पहाड़ की ढलान के बीच अंतर करना मुश्किल हो सकता है.
श्रद्धालुओं को ले जाने वाली इनमें से ज्यादातर उड़ानें विजुअल फ्लाइट रूल्स (VFR) के तहत होती हैं. इन नियमों के मुताबिक, पायलटों को तय मानकों के अनुसार दृश्यता बनाए रखनी होती है और बादलों से एक निश्चित दूरी रखनी होती है. अगर दृश्यता कम हो जाए, तो उड़ान जारी रखना खतरनाक हो सकता है. संकरी घाटी में वापस मुड़ना या कोई दूसरा रास्ता तलाशना भी हमेशा आसान नहीं होता.
ये हेलिकॉप्टर किस तरह के पायलट उड़ाते हैं
श्रद्धालुओं को ले जाने वाले हेलिकॉप्टर आम तौर पर निजी विमानन कंपनियां चलाती हैं. ये कंपनियां नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) के नियमों के तहत काम करती हैं. इनके पायलटों के पास कमर्शियल हेलिकॉप्टर पायलट लाइसेंस होता है, जिसे CPL(H) कहा जाता है. उन्हें उस खास तरह के हेलिकॉप्टर को उड़ाने की योग्यता भी हासिल करनी होती है.
लेकिन सिर्फ कमर्शियल लाइसेंस होने से कोई पायलट हर तरह की उड़ान के लिए उपयुक्त नहीं हो जाता. हिमालय में उड़ान भरने के लिए ऊंचाई पर उड़ान का अतिरिक्त ज्ञान और अनुभव, पहाड़ों के मौसम की समझ, रास्ते की जानकारी और आपात स्थिति से निपटने की ट्रेनिंग जरूरी होती है.
इन पायलटों का पेशेवर अनुभव अलग-अलग होता है. कुछ को नागरिक हेलिकॉप्टर उड़ाने का अनुभव होता है, जबकि कुछ पहले सेना में काम कर चुके होते हैं. हालांकि, सेना में काम करने का अनुभव अपने आप यह साबित नहीं करता कि पायलट को किसी खास नागरिक उड़ान मार्ग या हेलिकॉप्टर को उड़ाने में महारत हासिल है.
जून 2025 में गौरीकुंड में हुए हेलिकॉप्टर हादसे की जांच से पता चला कि किसी खास रास्ते पर उड़ान भरने का अनुभव कितना जरूरी है. पायलट को कुल 2,000 घंटे से ज्यादा उड़ान भरने का अनुभव था, लेकिन मई 2025 में केदारनाथ घाटी में उड़ान शुरू करने से पहले उसने वहां कभी उड़ान नहीं भरी थी.
जांच की अंतिम रिपोर्ट में सिफारिश की गई कि पहली बार घाटी में अकेले पायलट के तौर पर उड़ान भरने की मंजूरी देने से पहले पायलटों को किसी अनुभवी पायलट की निगरानी में पहाड़ी इलाकों में कम से कम 50 घंटे की उड़ान पूरी करनी चाहिए.
2026 की चार धाम यात्रा के लिए नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने कहा कि पायलटों के पास पहाड़ी इलाकों में उड़ान भरने का कम से कम 750 घंटे का अनुभव होना जरूरी था. इसमें पिछले एक साल के दौरान 100 घंटे का अनुभव और केदारनाथ में कम से कम 10 बार उड़ान भरने और उतरने का अनुभव भी शामिल था.
यह अंतर समझना जरूरी है. दूसरे इलाकों में हेलिकॉप्टर उड़ाने का अनुभव होने का मतलब यह नहीं है कि पायलट को हिमालय की संकरी घाटी में उड़ान भरने के लिए जरूरी कौशल भी हासिल है.
दुर्घटनाओं से सुरक्षा को लेकर उठे सवाल
2025 की तीर्थयात्रा के दौरान उड़ानों के जोखिम साफ तौर पर सामने आए. राज्यसभा की परिवहन, पर्यटन और संस्कृति से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने उस साल की चार धाम यात्रा के दौरान हेलिकॉप्टर दुर्घटनाओं की चार घटनाएं दर्ज कीं.
15 जून 2025 को आर्यन एविएशन का बेल 407 हेलिकॉप्टर केदारनाथ से गुप्तकाशी जाते समय गौरीकुंड के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया. इसमें सवार सभी सात लोगों की मौत हो गई.
यह हादसा घाटी में उड़ान भरने के खतरों को समझने का एक अहम मामला बन गया. AAIB की अंतिम रिपोर्ट में कहा गया कि बादल घने होकर नीचे आने लगे थे और हेलिकॉप्टर के उड़ान मार्ग तक पहुंच गए थे. पायलट तय रास्ते और ऊंचाई पर उड़ान जारी रखे हुए था. घाटी से बाहर निकलने के करीब पहुंचने पर पायलट को आसपास का इलाका दिखाई देना बंद हो गया.
जांच में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि हेलिकॉप्टर में किसी तकनीकी खराबी के कारण दुर्घटना हुई थी. रिपोर्ट में उस समय ऑपरेटरों को उपलब्ध मौसम संबंधी जानकारी की सीमाओं की ओर भी ध्यान दिलाया गया.
2025 में हुई दुर्घटनाएं इस तरह के हादसों की पहली घटनाएं नहीं थीं. 18 अक्टूबर 2022 को आर्यन एविएशन का एक और बेल 407 हेलिकॉप्टर केदारनाथ के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. उसमें सवार सभी सात लोगों की मौत हो गई थी. AAIB की जांच में पाया गया कि चालक दल मौसम की बिगड़ती स्थिति का सही आकलन नहीं कर पाया था. इसे दुर्घटना का संभावित कारण बताया गया.
हिमालय में उड़ान भरने वाले पायलट के लिए कभी-कभी सबसे अहम फैसला यह नहीं होता कि हेलिकॉप्टर सफर पूरा कर सकता है या नहीं, बल्कि यह होता है कि उसे उड़ान भरनी भी चाहिए या नहीं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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