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Wednesday, 28 October, 2026
होममत-विमतनेहा बोरा को पीस बॉन्ड भरना चाहिए, Gen Z को इसे अच्छे इरादे के सबूत के तौर पर मांगना चाहिए

नेहा बोरा को पीस बॉन्ड भरना चाहिए, Gen Z को इसे अच्छे इरादे के सबूत के तौर पर मांगना चाहिए

मैं इस शानदार पीढ़ी को Gen Z नहीं कहूंगी. इसमें भारत को महानता की नई सुबह तक ले जाने की क्षमता है. इसे ‘अमृत काल की अमृत पीढ़ी’ कहा जाना चाहिए.

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यह हफ्ता दिलचस्प रहा. दशहरे पर हमने बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया. काम के मोर्चे पर, पिछले कुछ दिन व्यस्त रहे. मैंने अलग-अलग मौकों पर युवाओं से बातचीत की. ये उसी पीढ़ी के लोग हैं, जिसे आमतौर पर Gen Z कहा जाता है. मैंने यह पूरा हफ्ता ऐसे कार्यक्रमों और व्याख्यानों में हिस्सा लेते हुए बिताया, जहां मेरी मुलाकात इस शानदार पीढ़ी के विचारकों, बदलाव लाने वालों और समाज को नई दिशा देने वाले सक्रिय युवाओं से हुई.

लेकिन दो सवाल लगातार मेरे मन में उठ रहे हैं. Gen Z कौन है? और किसे यह अधिकार है कि वह एक पूरी उम्र के लोगों को विवादों से भरे एक सीमित दायरे में बांध दे? ‘Gen X’ का विचार डगलस कूपलैंड की 1991 में आई किताब जनरेशन एक्स से लोकप्रिय हुआ था. इसके बाद आने वाली पीढ़ी, जिसका जन्म 1981 से 1996 के बीच हुआ, उसे ‘मिलेनियल’ कहा गया. यह इस सिलसिले की ‘Gen Y’ थी. आज के युवाओं की पीढ़ी को Gen Z नाम दिया गया है. इसमें 1997 से 2012 के बीच जन्मे लोग आते हैं.

विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक कार्यक्रमों और स्कूलों में युवाओं से बातचीत के दौरान मैं भारत के युवाओं में दिखने वाली ऊर्जा, मेहनत करने के जोश और सकारात्मक सोच को देखकर हमेशा खुश होती हूं. तथाकथित Gen Z में मौजूद टैलेंट हैरान करने वाला है. इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और तकनीक के क्षेत्र में काम करने वाले उद्यमी भी शामिल हैं, जैसे कोच्चि की कंपनी फ्यूजलेज इनोवेशंस के प्रमुख देवन चंद्रशेखरन, स्क्रैप अंकल की शुरुआत करने वाले मुकुल छाबड़ा और ईंधन से जुड़े ऐप नवगति के सीईओ वैभव कौशिक. इसमें 20 साल के बिट्टू तबाही भी हैं, जिन्होंने अजनार नदी की सफाई की.

इसके अलावा Gen Z के खिलाड़ी भी हैं. इनमें डी. गुकेश शामिल हैं, जो 2024 में 18 साल की उम्र में शतरंज के सबसे कम उम्र के निर्विवाद विश्व चैंपियन बने. मनु भाकर पहली भारतीय हैं, जिन्होंने ओलंपिक खेलों में दो पदक जीते. शीतल देवी ने 2026 के एशियाई पैरा खेलों में दो पदक जीते.

मैं इस शानदार पीढ़ी को Gen Z नहीं कहूंगी. इसमें भारत को महानता की नई सुबह तक ले जाने की क्षमता है. इसलिए हमारे युवाओं को ‘अमृत काल की अमृत पीढ़ी’ या स्वर्णिम पीढ़ी कहा जाना चाहिए. यह विकसित भारत की एक अहम भागीदार है और अपनी मातृभूमि, भारत के भविष्य के लिए कड़ी मेहनत करने को तैयार है.

खुद उदाहरण पेश करें

यह दिलचस्प है कि तथाकथित Gen Z के विरोध-प्रदर्शनों का नेतृत्व उम्रदराज नेता कर रहे हैं. ये नेता युवाओं की नज़रों में प्रासंगिक बने रहने के लिए लगातार नए विवाद तलाशते रहते हैं. एक तरफ हमारे पास राहुल गांधी हैं. वह ऐसे नेता हैं, जिनका राजनीतिक दौर अब पीछे छूट चुका है, लेकिन उनकी वंशवादी पार्टी उन्हें अगले युवा आइकन के रूप में पेश करने की पूरी कोशिश कर रही है. 56 साल का व्यक्ति मुश्किल से ही ‘युवा नेता’ हो सकता है. गांधी अपनी पार्टी के लिए तीन चुनाव उस असली आम आदमी, नरेंद्र मोदी, से हार चुके हैं. आंकड़े साफ हैं. 2014 के बाद हुए हर आम चुनाव में भारत के मतदाताओं ने कांग्रेस को नकार दिया है और इंतज़ार करते-करते थक चुके इस तथाकथित युवा आइकन ने अब लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई जनता की सरकार को हटाने के लिए अराजकता फैलाने का रास्ता अपना लिया है.

अब व्यंग्य के तौर पर बनाई गई कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की बात करते हैं. इसके संस्थापक ने एक सरनेम अपने नाम से जोड़ने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की बात को गलत तरीके से पेश किया. सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका की उम्र क्रमशः 27 और 31 साल है. दास की उम्र मुश्किल से Gen Z की उम्र के दायरे में आती है, लेकिन रांका निश्चित रूप से इसमें नहीं आते.

इसी तरह, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की 29 साल की अध्यक्ष नेहा बोरा, जो अपने लिए ‘वे/दे’ (they/them) सर्वनाम का इस्तेमाल करती हैं, खुद को भारत की Gen Z राजनीति का चेहरा बनाने की कोशिश कर रही हैं. अगर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो पर भरोसा किया जाए, तो बोरा भारत में बांग्लादेश जैसी क्रांति भी लाना चाहती हैं. फिर वैध लोकतांत्रिक प्रक्रिया का इस्तेमाल करके चुनाव क्यों नहीं लड़तीं?

नेहा बोरा की कानूनी दलीलें

नेहा बोरा को 17 अक्टूबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 126 के तहत एक विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (एसईएम) ने कारण बताओ नोटिस जारी किया था. इस धारा के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति से पूछ सकता है कि उससे शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को क्यों न कहा जाए.

नोटिस में बोरा को 19 अक्टूबर को एसईएम के सामने पेश होने और यह बताने का निर्देश दिया गया था कि उन्हें “जांच की अवधि के दौरान शांति बनाए रखने” के लिए 10,000 रुपये का निजी बॉन्ड और एक जमानतदार क्यों नहीं देना चाहिए. दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी है, लेकिन बोरा बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर रही हैं. उनका कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत उन्हें “शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन” करने का अधिकार है.

क्या बोरा और उनकी टीम शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं? और करीब 30 साल की उम्र की कोई व्यक्ति खुद को Gen Z का प्रतिनिधि कैसे बता सकती है? महात्मा गांधी ने भी कहा था कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के लिए खुद पर कड़ा नियंत्रण रखना, नैतिक जिम्मेदारी निभाना और अहिंसा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध रहना जरूरी है.

इसी तरह, अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाला अधिकार भी पूरी तरह असीमित नहीं है. इस पर अनुच्छेद की उपधारा 2 से 6 के तहत “उचित पाबंदियां” लगाई जा सकती हैं. ये पाबंदियां नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था और शालीनता जैसे मामलों से जुड़ी हैं. यह महात्मा गांधी की उस सोच से मेल खाता है कि अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां और खुद पर नियंत्रण रखना भी जरूरी है.

किसी कानूनी प्रावधान की पूरी सच्चाई समझने के लिए उसे पूरी तरह पढ़ना और समझना जरूरी है. भारत में विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन इसका इस्तेमाल उचित पाबंदियों के दायरे में ही किया जा सकता है. इसलिए कानूनी पाबंदियां कोई बेड़ी नहीं हैं, बल्कि उन लोगों को समाज के नियमों और हितों के खिलाफ काम करने से रोकने का तरीका हैं, जो गड़बड़ी फैलाते हैं.

नेहा बोरा को पीस बॉन्ड क्यों भरना चाहिए

याचिकाकर्ता बोरा ने बीएनएसएस की धारा 126 और 130 के साथ धारा 135(3) के तहत विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से जारी नोटिस को चुनौती दी थी. इस नोटिस में उनसे यह बताने को कहा गया था कि जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए उन्हें बॉन्ड क्यों नहीं भरना चाहिए.

यह कार्रवाई 16 अक्टूबर को बोरा को हिरासत में लिए जाने के बाद शुरू हुई थी. उन्हें एक प्रस्तावित विरोध मार्च के सिलसिले में हिरासत में लिया गया था. नोटिस में मंडी हाउस में कथित तौर पर नारे लगाने, पहले विरोध-प्रदर्शनों से जुड़ी गतिविधियों और कनॉट प्लेस में लोगों को कथित तौर पर इकट्ठा करने का ज़िक्र किया गया था.

बोरा ने नोटिस को चुनौती देते हुए कहा कि इसे बिना ठीक से विचार किए जारी किया गया था. उन्होंने कहा कि यह अस्पष्ट और ऐसे तथ्यों पर आधारित था, जिन पर विवाद है. उन्होंने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से राजनीतिक विरोध करने के खिलाफ रोकथाम से जुड़ी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया गया.

सरकार ने कार्रवाई को सही ठहराने के लिए मजिस्ट्रेट के सामने पेश की गई पुलिस रिपोर्ट (कलंदर), छह एफआईआर और जनरल डायरी की तीन प्रविष्टियों का सहारा लिया.

हाई कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी रिट जारी करने की शक्ति का इस्तेमाल करके नोटिस रद्द करने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास रोकथाम से जुड़ी कार्रवाई शुरू करने के लिए पर्याप्त सामग्री थी और यह मामला केवल सुनी-सुनाई बातों पर आधारित नहीं था.

बोरा के वकीलों ने आशा पंत बनाम राज्य एवं अन्य मामले का हवाला दिया. उन्होंने दलील दी कि बोरा के खिलाफ आदेश बिना ठीक से विचार किए जारी किया गया था और गैरकानूनी था.

हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में बोरा के मामले को पंत के मामले से अलग बताया. अदालत ने कहा कि पंत का मामला निजी संपत्ति को लेकर विवाद का था, जिसमें सार्वजनिक शांति को कोई वास्तविक खतरा नहीं था. वहीं, बोरा के मामले में राजनीतिक विरोध-प्रदर्शन शामिल थे. अदालत के मुताबिक, कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरवाने और सार्वजनिक शांति भंग होने से रोकने के लिए “पर्याप्त सामग्री” थी.

16 अक्टूबर को जंतर-मंतर के आसपास हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की गाड़ियों और एक आपातकालीन वाहन को कथित तौर पर नुकसान पहुंचाया गया था.

बोरा ने बांग्लादेश के सोशल स्टूडेंट्स फ्रंट को एक वीडियो संदेश भी भेजा था.

इस वीडियो में बोरा कहती सुनाई देती हैं, “इस देश में हम हर जगह Gen Z के जो विरोध-प्रदर्शन देख रहे हैं, उनकी शुरुआत सबसे पहले बांग्लादेश में हुई थी…हम आपसे प्रेरणा लेते हैं.”

आइसा की अध्यक्ष अब दावा करती हैं कि वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई थी. हालांकि, सरकारी वकीलों ने दिल्ली हाई कोर्ट में उनके भड़काऊ भाषणों के वीडियो सबूत के तौर पर पेश किए हैं. अगस्त 2024 के बाद बांग्लादेश में हुई हिंसा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

मैं यह फैसला ‘अमृत काल की अमृत पीढ़ी’ पर छोड़ती हूं कि इन तथाकथित युवा नेताओं के नेतृत्व में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के पीछे असली कहानी क्या है. मुझे भरोसा है कि भारत के युवा ‘जनरेशन जिंग’ हैं. यह ऐसी पीढ़ी है, जो मुश्किलों का सामना कर सकती है और मजबूती से खड़ी रह सकती है. वे ‘जनरेशन जॉम्बी’ नहीं हैं, जिन्हें उम्रदराज युवा नेता अपने प्रचार और अराजकता फैलाने वाली बातों से आसानी से गुमराह कर सकें.

युवाओं की जिम्मेदारी है कि वे देश को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को आगे बढ़ाएं और इसकी तरक्की का लाभ उठाएं. हमारे देश के जीवन में यह एक अहम समय है, जब हम सभी उस भारत को बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका सपना हमारे पूर्वजों ने देखा था.

मेरी पीढ़ी ने अपना योगदान दिया है. हो सकता है कि हम इस सपने को पूरा होते देखें या हो सकता है कि तब तक हम यहां न हों, लेकिन अमृत पीढ़ी 2047 तक विकसित देश बनने का लाभ उठाएगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास 2047 तक विकसित भारत बनाने का विजन है. वह तब तक आराम नहीं करेंगे, जब तक यह सपना पूरा नहीं हो जाता. इस सपने को पूरा करने के लिए अमृत पीढ़ी सबसे अहम पीढ़ी है.

मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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