Thursday, 11 August, 2022
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मोदी सरकार की कश्मीर में उग्रवाद से निबटने की उतनी ही कोशिश, जितनी से उसको सियासी फायदा हो

कश्मीर में उग्रवाद का वास्तविक हल खोजने के बजाय मोदी सरकार बीजेपी के लिए राजनीतिक लाभ तलाशने की कोशिश कर रही है.

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भारत का ध्यान एक बार फिर जम्मू-कश्मीर पर केन्द्रित हो गया. वहां 5 से 17 अक्तूबर के बीच 11नागरिकों— 2 स्थानीय हिंदुओं, 1 स्थानीय सिख, 3 स्थानीय मुसलमानों, 4 गैर-स्थानीय हिंदुओं और 1 गैर-स्थानीय मुसलमान की निशानदेही करके मार डाला गया. इसके बाद कश्मीर घाटी से अल्पसंख्यकों और प्रवासी कामगारों के पलायन की खबरें आने लगीं. इन हत्याओं के साथ 11 अक्तूबर से पुंछ जिले के डेरा की गली और भट्टा धुरियां के जंगलों में एकतरफा और अधूरे एनकाउंटर हुए जिनमें 9 सैनिक मारे गए और आतंकवादी बच कर निकल गए.

इन दो घटनाओं ने 23 से 25 अक्तूबर के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कश्मीर दौरे पर अपनी छाया डाली. अनुच्छेद 370 को रद्द किए जाने के बाद यह उनका पहला कश्मीर दौरा था. हालात का जायजा लेने, जवाबदेही तय करने और सरकार की राजनीतिक रणनीति साफ करने की जगह शाह ने ‘अनुच्छेद 370 के बाद से सब कुछ ठीक है’, ‘सुरक्षा बल अपनी क़ुर्बानी दे रहे हैं ‘, ‘विकास की गति तेज हुई है’ जैसे आम किस्म के बयान ही दिए. मेरे विचार से, आंतरिक इलाके में घुसपैठ और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में चूक हुई हैं. ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी की सरकार ने मसले का राजनीतिक हल खोजने की जगह उग्रवाद से निबटने की उसी हद तक कोशिश करने का तय कर लिया है जिससे बीजेपी को अधिकतम सियासी फायदा हो.


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पाकिस्तान की रणनीति

पाकिस्तान ने पास जम्मू-कश्मीर या कम-से-कम उसके मुस्लिम बहुल इलाकों को छद्म युद्ध के जरिए हड़पने की दीर्घकालिक रणनीति बना रखी है. यह रणनीति 32 साल से लागू की जा रही है. सामरिक स्तर पर उग्रवाद अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय रणनीतिक माहौल, ‘एफएटीएफ’ के तहत प्रतिबंधों, पाकिस्तान की दूसरी सैन्य प्रतिबद्धताओं और जम्मू-कश्मीर में भारत की राजनीतिक समेत सैन्य रणनीति के मुताबिक तेज या धीमी होती रहती है. पाकिस्तान परमाणु शक्ति वाला देश है और उसने पारंपरिक युद्ध के मामले में इतनी क्षमता हासिल कर ली है कि वह भारत की ओर से सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर सीमित युद्ध तक की कार्रवाइयों में उलझाने के दबाव को रोक सके.

अफगानिस्तान में तालिबान की निर्णायक जीत के बाद पाकिस्तान ने भारत की कथित गुप्त कार्रवाइयों को बेअसर कर दिया है. उसकी कूटनीति और अहम भू-रणनीतिक स्थिति ने ‘एफएटीएफ’ के तहत प्रतिबंधों के खतरों को टाल दिया है. पूर्वी लद्दाख में सैन्य गतिरोध खत्म होता नहीं दिख रहा और सेना की तैनाती में कुछ फेरबदल के कारण जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों में थोड़ी कमजोरी आई है. उधर पाकिस्तान ने उग्रवाद को तेज करने का फैसला कर लिया है.
उसने इन गर्मियों में घाटी और पीर पंजाल क्षेत्र के दक्षिण-पश्चिम, खासकर पुंछ और रजौरी जिलों में घुसपैठ बढ़ा दी. यह चिंताजनक बात है क्योंकि 2007 से इस क्षेत्र में आतंकवादी गतिविधियां और इस क्षेत्र से घाटी में घुसपैठ बंद थी. गुज्जर और बकरवाल आबादियां आम तौर पर भारत समर्थक हैं. दुर्गम क्षेत्र और घने जंगलों के कारण इस इलाके को आतंकवादियों के स्थायी अड्डे के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है जैसा कि 2003 में हिल काका में हुआ था. तालिबान ने इस मॉडल का अफगानिस्तान में सफलता से इस्तेमाल किया.

अल्पसंख्यकों और बाहरी लोगों को निशाना बनाना आतंकवादियों के लिए हमेशा आसान रहा है. आम धारणा के विपरीत, मुस्लिम आबादी इसका विरोध करती है. वहां करीब 1,40,000 प्रवासी मजदूर उद्योगों और बागानों में काम करते हैं लेकिन सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाइयों से अलगाववादी भावना बढ़ती ही है. ‘गोदी मीडिया’ और नव-राष्ट्रवादी तत्व कश्मीर की मुस्लिम आबादी की जो भयानक छवि पेश करते हैं उससे भी अलगाव बढ़ता है. अल्पसंख्यकों और बाहरी लोगों पर हमले बीजेपी को भी परेशानी में डालते हैं जिसके इस दावे पर सवाल खड़ा होता है कि अनुच्छेद 370 रद्द किए जाने के बाद वहां स्थिति सामान्य हो गई है.

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फिलहाल पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में छद्म युद्ध को मजबूत करने के लिए सामरिक नीति में परिवर्तन कर रहा है. पाकिस्तान की सभी चालों की पूरी जानकारी भारत सरकार और सेना को है फिर भी हम आश्चर्य में क्यों पड़ गए हैं?

लक्ष्य से भटकाव

पिछले 10 साल में जम्मू-कश्मीर में मारे गए आतंकवादियों, सुरक्षा बलों, नागरिकों की संख्या और हिंसा एक स्तर पर आकर ठहर गई है. विडंबना यह है कि मोदी सरकार और सेना के दावों के विपरीत हिंसा में पिछले पांच साल में थोड़ी बढ़ोतरी ही हुई है. भावनाओं को अलग रखते हुए कहा जा सकता है कि यह हिंसा मुंबई में हिंसक अपराधों की वार्षिक दर के बराबर है. सैन्य दृष्टि से, उस क्षेत्र में आतंकवाद विरोधी ‘ग्रिड’ को बनाए रखते हुए घुसपैठ रोकने पर ज्यादा ज़ोर देकर इस हिंसा के इस स्तर को नीचे लाया जा सकता है.

स्रोतः साउथ एशिया टेररिज़म पोर्टल

इन दोनों मूलभूत बातों को लेकर गर्मियों में आर्मी के स्तर पर जो कमियां रहीं, उसकी वजह से हिंसा के स्तर में वृद्धि देखने को मिली. जुलाई के बाद से पीरपंजाल के दक्षिण पश्चिम के दो जिलों राजौरी और पुंछ में आतंकवादी गतिविधियों में तेजी आना काफी स्पष्ट था. इसलिए, घुसपैठ को रोकने के लिए ‘ग्रिड’ को मजबूत करने की जरूरत थी, जो नहीं किया गया. कुछ साल पहले यह क्षेत्र शांत था तो राष्ट्रीय राइफल्स की कुछ बटालियनों को यहां से हटा कर घाटी में भेज दिया गया था जिससे समस्या गहरी हुई. इसके अलावा आतंकवाद विरोधी ‘ग्रिड’ को और विस्तार दिया गया जिससे खालीपन पैदा हुआ और इसका फायदा उठाया गया.

चूंकि इस इलाके (पीर पंजाल के दक्षिण पश्चिम) में करीब एक दशक के बाद आतंकवादियों के एक बड़े गुट से मुठभेड़ हो रही थी तो सैनिक काफी जोश में थे और सुरक्षा के एहतियातों में ढील कर रहे थे. इसलिए काफी सैनिक हताहत हुए. जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के इतिहास में यह एक दुर्लभ मुठभेड़ों में शुमार था और इसमें आतंकवादियों ने सेना को बड़ा नुकसान पहुंचाया और बचकर निकल गए. अब सबक लेने के लिए जांच चल रही है. आतंकवादियों के स्थायी अड्डों की स्थापना जो कि चिंता का विषय है.

अब तक दोस्ताना रही आबादी में से कई लोगों की गिरफ्तारी भी चिंता का कारण है. ये गिरफ्तारियां इस आरोप में की गईं कि उन लोगों ने डेरा की गली और भट्टा धुरियां में आतंकवादियों की मदद की. घुसपैठ विरोधी और आतंकवाद विरोधी ‘ग्रिड’ में अतिरिक्त बलों को जोड़ कर उन्हें तुरंत मज़बूत करना जरूरी है. पीर पंजाल के दुर्गम क्षेत्र को भी अपने काबू में लेने की जरूरत है ताकि वहां स्थायी अड्डे न बनाए जा सकें. घाटी में घुसपैठ बढ़ी है. सितंबर में सेना ने उड़ी सेक्टर में घुसपैठ की कोशिशों को कम करके बताने की कोशिश की. शम्साबारी रिज और उसके उत्तर में मुठभेड़ न होना बताता है कि उधर से घुसपैठ हुई है.


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राजनीतिक पहल की कमी

उग्रवाद में कमी लाने का दूसरा उपाय यही है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों का दिल-दिमाग जीतने के लिए दूरदर्शितापूर्ण राजनीतिक रणनीति लागू की जाए. अनुच्छेद 370 को अगस्त 2019 में रद्द किया गया और गृह मंत्री अमित शाह ने इसके बाद घाटी का पहला दौरा अब जाकर अक्टूबर 2021 में किया. यह राजनीतिक पहल की गंभीरता पर सवाल उठाने के लिए काफी है. उन्होंने वहां जो कुछ कहा और प्रशासन ने जो कदम उठाए वे यही संकेत देते हैं कि सरकार ने समाधान खोजने की जगह उग्रवाद पर ही अंकुश लगाकर संतोष कर लेने का फैसला कर लिया है.

इतने वर्षों में, स्पष्ट राजनीतिक रणनीति के अभाव के बावजूद सेना उग्रवाद को अच्छी तरह काबू में करती रही है. अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के मामलों में खुफिया और सुरक्षा महकमों की विफलता के लिए जवाबदेही तय करने की जगह डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी के महानिदेशक ने आतंकवादी बंदूकों के साए में जी रहे लोगों की इसलिए निंदा की कि उन लोगों ने हत्याओं की निंदा नहीं की. हकीकत यह है कि इन वारदातों की कड़ी आलोचना की जा चुकी है.

जम्मू-कश्मीर में राजनीति जबकि सुसुप्तावस्था में है, ऐसे में ज़िम्मेदारी वापस सेना के कंधे पर आ गई है और वह इससे आंख नहीं चुरा सकती. राजनीति में अगर ‘सब कुछ ठीकठाक है’ वाला राग अपनाया तो यह पहल को पाकिस्तान के हाथ में ही सौंपने के बराबर होगा.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के यहां क्लिक करें.)

(ले.जन. एचएस पनाग, पीवीएसएम, एवीएसएम (रिटायर्ड) ने 40 वर्ष भारतीय सेना की सेवा की है. वो नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड में जीओसी-इन-सी रहे हैं. रिटायर होने के बाद आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य रहे. व्यक्त विचार निजी हैं)


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