पाकिस्तान में हथियारबंद विद्रोह का स्वरूप लगातार और ज्यादा खतरनाक होता जा रहा है, लेकिन इस्लामाबाद का सुरक्षा तंत्र इसके साथ कदम नहीं मिला पा रहा है. ये बातें अलग-अलग लग सकती हैं, लेकिन अब ये मिलकर एक बड़े और बढ़ते खतरे का रूप ले रही हैं. आतंकी संगठन ज्यादा संगठित, हालात के हिसाब से खुद को बदलने वाले और ज्यादा महत्वाकांक्षी होते जा रहे हैं, जबकि रावलपिंडी अब भी सिर्फ ताकत के इस्तेमाल पर भरोसा कर रहा है.
इस कहानी के अलग-अलग पहलू हैं. पिछले महीने बनने के बाद से बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट की नई महिला शाखा, करीमा आर्म्ड असॉल्ट डिवीजन, ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर कई हमलों की जिम्मेदारी ली है. उत्तर में खैबर पख्तूनख्वा में जिहादी गुट इत्तेहाद-उल-मुजाहिदीन के तहत एकजुट हो रहे हैं. और सीधे हमलों का सामना गृह मंत्रालय के तहत आने वाली पैरामिलिट्री फ्रंटियर कॉर्प्स (FC) और दूसरे स्थानीय बल कर रहे हैं, जो इन हमलों का बड़ा नुकसान झेल रहे हैं. यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब अफगानिस्तान के साथ पश्चिमी सीमा पर तनाव और सऊदी अरब तथा खाड़ी क्षेत्र में संघर्षों के कारण पाकिस्तानी सैनिकों पर नई जिम्मेदारियां बढ़ रही हैं.
पाकिस्तान ऐसी स्थिति में फंस गया है, जिसे वह खुद भी पूरी तरह समझ नहीं पाया है. राज्य ने वर्षों तक ताकत के इस्तेमाल, खुफिया नेटवर्क बनाने और लगातार ज्यादा आधुनिक सुरक्षा क्षमताएं इस्तेमाल करने में सुधार किया है. लेकिन वह यह समझने में उतना अच्छा नहीं रहा कि आतंकी संगठन भी सीख रहे हैं.
बलूच विद्रोही संगठन अब ज्यादा तालमेल के साथ काम कर रहे हैं. वे सड़कें रोक रहे हैं, काफिलों पर घात लगाकर हमला कर रहे हैं और ऐसे हमले कर रहे हैं जो सुरक्षा बलों को बड़े इलाके में लंबे समय तक उलझाए रख सकते हैं. KP में इस्लामी गुट भी अपने तरीके से ऐसा ही कर रहे हैं. वे पहले से बिखरे हुए गुटों को एकजुट कर रहे हैं, ड्रोन और दूसरे असममित तरीकों का इस्तेमाल करके देख रहे हैं और पुलिस तथा उन दूसरे बलों पर लगातार ज्यादा दबाव डाल रहे हैं जो जमीन पर सबसे करीब रहकर काम करते हैं. पाकिस्तान के लिए समस्या अब सिर्फ यह नहीं है कि आतंकवाद बचा हुआ है. समस्या यह है कि आतंकी संगठन राज्य के उनसे लड़ने के तरीके के हिसाब से खुद को बदल रहे हैं.
BLF के KAAD में महिलाओं की नई भूमिका
सितंबर में बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (BLF) ने एक नई पूरी तरह महिला लड़ाकू इकाई बनाने की घोषणा की. इसका नाम करीमा आर्म्ड असॉल्ट डिवीजन यानी KAAD रखा गया, जिसका नाम बलूच कार्यकर्ता करीमा बलोच के नाम पर रखा गया. कुछ ही दिनों में BLF ने इस यूनिट के नाम पर हथियारबंद गतिविधियों की जिम्मेदारी लेना शुरू कर दिया.
22 सितंबर को उसने कहा कि KAAD के लड़ाकों ने केच जिले में तुरबत के बाहर जुश्क के पास CPEC हाईवे पर पाकिस्तानी सेना के एक काफिले पर घात लगाकर हमला किया. 25 सितंबर को उसने एक और ऑपरेशन की जिम्मेदारी इस यूनिट को दी. यह ऑपरेशन कलात के मंगोचर में हुआ, जहां उसके लड़ाकों ने कथित तौर पर हाईवे को बंद किया, अचानक जांच की और सैन्य मदद के लिए आ रहे जवानों पर हमला किया. BLF ने बाद में दावा किया कि इन दोनों ऑपरेशनों में कुल नौ पाकिस्तानी सैन्यकर्मी मारे गए. इन मौतों के आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी.

इसके बाद इस यूनिट की गतिविधियां और बढ़ गईं. साउथ एशियन टेररिज्म पोर्टल (SATP) ने 26 सितंबर को खुजदार के लखोरियां में क्वेटा-कराची हाईवे पर और 29 सितंबर को कलात के दश्त-ए-गोरान में KAAD के नाम पर किए गए सड़क अवरोध और वाहनों की तलाशी दर्ज की. BLF ने यह भी दावा किया कि KAAD ने अपनी कुर्बान यूनिट के साथ मिलकर 1 अक्टूबर को वाशुक के मशकेल में FC की गोरिंदर पोस्ट पर हथियारबंद हमला किया. BLF का दावा था कि इसमें 18 सुरक्षाकर्मी मारे गए. यह दावा बाद में पाकिस्तानी सुरक्षा सूत्रों की जानकारी से अलग था. सुरक्षा सूत्रों ने कहा कि इलाके में एक सुरक्षा चौकी पर हुए हमले के बाद छह आतंकी मारे गए.
हालांकि ये घटनाएं अहम हैं, लेकिन अभी भी KAAD के पास कोई बड़ा ऑपरेशनल रिकॉर्ड नहीं है. लेकिन इन घटनाओं से यह जरूर पता चलता है कि यह यूनिट सिर्फ दिखावे के लिए नहीं बनाई गई है. इससे संकेत मिलता है कि संगठन यह जांच रहा है कि नई बनाई गई महिला यूनिट को अपने बड़े विद्रोही नेटवर्क में किस तरह शामिल किया जा सकता है.
यही वजह है कि KAAD जरूरी है. यह बदलाव इस बारे में कम है कि बलूच विद्रोह में महिलाएं अचानक शामिल हो रही हैं. असली बदलाव यह है कि अब उनकी भागीदारी किस रूप में हो रही है.
महिलाएं पहले भी बलूच विद्रोही अभियानों का हिस्सा रही हैं, जिनमें कुछ बेहद खतरनाक अभियान भी शामिल हैं. BLF ने खुद नवंबर 2025 में नोकुंडी में FC की एक सैन्य जगह पर आत्मघाती हमले के लिए जरीना रफीक, उर्फ तरंग माहो, का इस्तेमाल किया था. बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) भी इससे पहले इसी रास्ते पर जा चुकी थी. उसने शारी बलोच, सुमैया कलंदरानी बलोच, महल बलोच और महिकान बलोच जैसी महिलाओं को आत्मघाती हमलावर के रूप में इस्तेमाल किया था. KAAD में फर्क यह है कि अब BLF इस तरह की भागीदारी के लिए एक संगठनात्मक ढांचा दे रहा है. यह किसी खास ऑपरेशन के लिए अलग-अलग महिलाओं का इस्तेमाल करने से आगे बढ़कर ऐसी संरचना बनाने की दिशा में छोटा लेकिन अहम कदम है, जिसमें महिलाओं को विद्रोह का हिस्सा बनने के लिए भर्ती किया जा सके, उन्हें प्रशिक्षण दिया जा सके और उन्हें तैनात किया जा सके. इसलिए KAAD पहले से चल रही इस प्रवृत्ति को और तेज करने और उसे संस्थागत रूप देने का काम करता है.
एक अलग महिला लड़ाकू इकाई होने से BLF को वह भी मिलता है जो उसके पास पहले नहीं था. अब उसके पास ऐसा ढांचा है जिसके जरिए महिलाओं को भर्ती किया जा सकता है और अलग-अलग कामों में लगाया जा सकता है, न कि सिर्फ किसी एक अभियान में इस्तेमाल किया जा सकता है. कुछ महिलाएं निगरानी या खुफिया जानकारी जुटाने, संचार, रसद या मेडिकल मदद में शामिल हो सकती हैं, जबकि कुछ को सीधे लड़ाई में भेजा जा सकता है.
इसका मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक महत्व भी है. ऐसा विद्रोही संगठन जो महिलाओं को संगठित लड़ाकों के रूप में आगे कर सकता है, खुद को एक जमीनी आंदोलन के रूप में पेश कर सकता है. ऐसा आंदोलन जो उस आबादी के अनुभवों से जुड़ा हुआ दिखे, जो खुद को वर्षों से गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों का शिकार मानती है. इससे बलूच विद्रोह को एक ज्यादा धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक चेहरा भी मिलता है, खासकर पाकिस्तान जैसे देश में, जहां आतंकी गतिविधियों का बड़ा हिस्सा इस्लामी संगठनों के हाथ में है. यह छवि BLF के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हो सकती है जितना कि इस यूनिट का तत्काल सैन्य फायदा.
KAAD वास्तव में युद्ध के मैदान में कितना फर्क ला सकती है, यह एक अलग सवाल है. इसने अभी काम करना शुरू ही किया है और यह जानना अभी जल्दबाजी होगी कि BLF इस तरह की यूनिट में कितनी महिलाओं को भर्ती, प्रशिक्षण और सुरक्षा दे सकता है. लेकिन महिलाओं के लिए अपनी अलग यूनिट बनाने का फैसला काफी कुछ बताता है.
BLF का अपना रिकॉर्ड बताता है कि यह विद्रोह कितना बढ़ चुका है. SATP ने 2024 में BLF के 284 हमले गिने थे. अगले साल, BLF के अपने दावे के अनुसार, उसने 581 हथियारबंद ऑपरेशन किए. अकेले जुलाई 2025 में संगठन ने ऑपरेशन बाम के तहत 84 समन्वित हमलों की जिम्मेदारी ली. इस साल जून में उसने 14 इलाकों में 25 और हथियारबंद ऑपरेशनों की जिम्मेदारी ली. आखिरी तीन आंकड़े BLF के अपने दावे हैं, इसलिए उन्हें इस बात को ध्यान में रखकर देखा जाना चाहिए. लेकिन इसके बावजूद इन हमलों का पैमाना और फैलाव नजरअंदाज करना मुश्किल है.
अब यह विद्रोह कुछ गिने-चुने इलाकों में कभी-कभार होने वाले हमलों तक सीमित नहीं है. BLF अब पहले से कहीं बड़े भौगोलिक क्षेत्र में एक साथ कई ऑपरेशन करने में ज्यादा सक्षम होता जा रहा है.
असल में निशाने पर कौन है?
इस बात में भी कुछ दिलचस्प है कि असल में मारे कौन जा रहे हैं? पाकिस्तान की सेना वह संस्था है जिसे कई बलूच नागरिक राज्य की ताकत और दबाव के सबसे बड़े चेहरे के रूप में देखते हैं. जबरन गायब किए जाने, बिना कानूनी प्रक्रिया के हत्याएं, सामूहिक सजा और सैन्य अभियानों ने लोगों की नजर में सेना को राज्य का चेहरा बना दिया है. लेकिन जब विद्रोही जवाबी हमला करते हैं, तो अक्सर फ्रंटियर कॉर्प्स, पुलिस, प्रांतीय लेवीज फोर्स और दूसरे स्थानीय स्तर पर तैनात जवान ही सीधे निशाने पर होते हैं. यही लोग चेकपोस्ट संभालते हैं, सड़कों और जिला स्तर की सरकारी जगहों की सुरक्षा करते हैं, काफिलों के साथ चलते हैं और उन इलाकों में आते-जाते हैं जहां विद्रोही गतिविधियां सबसे ज्यादा हैं.
इससे एक अजीब असंतुलन पैदा होता है. जिस संस्था को बलूच नागरिक दबाव और जबरदस्ती का मुख्य साधन मानते हैं, जरूरी नहीं कि विद्रोह की सबसे बड़ी कीमत वही संस्था चुकाए. और इसका राजनीतिक महत्व है. जब रणनीतिक फैसले लेने वाली संस्था खुद सबसे ज्यादा मौतों का नुकसान नहीं झेल रही हो, तो राज्य के लिए सख्त सुरक्षा नीति जारी रखना आसान हो जाता है.

मैं यह दावा नहीं करूंगा कि आसिम मुनीर इस असंतुलन को देखकर क्या सोचते हैं, लेकिन इससे यह समझने में मदद मिलती है कि पाकिस्तान का सैन्य नेतृत्व बलूच विद्रोह को ताकत के जरिए खत्म करने और उन संगठनों को तोड़ने की बात इतने भरोसे के साथ क्यों करता रहा है, जिन्हें वह विदेशी समर्थन से चलने वाले प्रॉक्सी बताता है. मुनीर ने बार-बार बलूच विद्रोह को इसी नजरिए से पेश किया है, जिसमें बलूचिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व के साथ उनकी हाल की बातचीत भी शामिल है.
इस भरोसे के पीछे एक दिलचस्प इतिहास है. अगस्त 2024 में गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने कहा था कि बलूचिस्तान में किसी बड़े सैन्य अभियान की जरूरत नहीं है, क्योंकि आतंकियों से “एक SHO” के जरिए निपटा जा सकता है. बाद में उन्होंने कहा कि उनकी बात प्रतीकात्मक थी और उसे संदर्भ से अलग करके पेश किया गया.
फिर भी यह बात काफी कुछ बताती थी. इससे पता चलता था कि इस्लामाबाद में समस्या के पैमाने को कितनी आसानी से कम समझा जा सकता है, जबकि उसी समय विद्रोह ज्यादा संगठित और ज्यादा महत्वाकांक्षी होता जा रहा था.
‘एक SHO’ से KP में ‘आपातकाल’ तक
दो साल बाद उस भरोसे को बनाए रखना काफी मुश्किल दिखाई देता है. समस्या अब सिर्फ बलूचिस्तान तक सीमित नहीं है. खैबर पख्तूनख्वा में सुरक्षा की स्थिति इतनी खराब हो गई है कि इस्लामाबाद अब खुले तौर पर राज्य में आपातकाल लगाने की बात कर रहा है.
30 सितंबर को संसदीय मामलों के मंत्री तारिक फजल चौधरी ने कहा कि संघीय सरकार इस तरह का कदम उठाने पर “गंभीरता से विचार” कर रही है. चार दिन बाद गृह मंत्री नकवी ने KP के गवर्नर फैसल करीम कुंडी से मुलाकात की. इस दौरान गवर्नर शासन या आपातकाल लगाने की संभावना पर फिर चर्चा हुई. गवर्नर हाउस ने कहा कि अगर जरूरी हुआ तो “राज्य को आतंकवाद और तबाही से बचाने” के लिए यह कदम उठाया जा सकता है.

इन सभी बयानों को साथ रखकर देखें तो पता चलता है कि सुरक्षा की समस्या उस स्थानीय कानून-व्यवस्था की चुनौती से कितनी आगे बढ़ चुकी है, जिसका संकेत नकवी की “एक SHO” वाली बात से सिर्फ दो साल पहले मिलता था.
KP में आतंकी संगठनों के बीच भी संगठनात्मक बदलाव हुआ है. इत्तेहाद-उल-मुजाहिदीन पाकिस्तान, यानी IMP, विचारधारा या राजनीतिक मकसद के मामले में BLF से बिल्कुल अलग है. फिर भी इसका उभरना यह दिखाता है कि पाकिस्तान में आतंकवाद किस दिशा में बढ़ रहा है.
अप्रैल 2025 में हाफिज गुल बहादुर ग्रुप, लश्कर-ए-इस्लाम और हरकत इनकिलाब-ए-इस्लामी पाकिस्तान ने मिलकर IMP बनाया. इसके जरिए कई जिहादी गुट, जो पहले अलग-अलग काम करते थे, अब ज्यादा तालमेल वाली व्यवस्था में आ गए. इसके अभियानों में घात लगाकर हमले, IED हमले और सुरक्षा ठिकानों पर हमले शामिल हैं. इसके साथ ही वे युद्ध के ऐसे तरीके भी तेजी से इस्तेमाल कर रहे हैं जिनमें कम संसाधनों से ज्यादा नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जाती है.
दूसरे शब्दों में, पाकिस्तान के दो बिल्कुल अलग इलाकों में काम कर रहे आतंकी संगठन अलग-अलग परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं, लेकिन उनमें एक जैसी प्रवृत्ति साफ दिखाई दे रही है. वे ज्यादा संगठित हो रहे हैं, हालात के हिसाब से खुद को बदल रहे हैं और अपने काम करने के तरीकों में नए प्रयोग करने के लिए ज्यादा तैयार हैं.
सितंबर में कोहाट पुलिस लाइंस पर हुआ हमला इसका एक खास उदाहरण था. वाहन से किए गए आत्मघाती हमले के बाद हथियारबंद हमला हुआ, जिसमें कम से कम 23 लोग मारे गए. इनमें 17 पुलिसकर्मी और छह आम नागरिक शामिल थे. IMP ने इसकी जिम्मेदारी ली. इस तरह किसी पुलिस ठिकाने पर हमला होना KP में बदलते खतरे के बारे में बहुत कुछ बताता है. बलूचिस्तान की तरह यहां भी अक्सर वही सुरक्षा बल सबसे ज्यादा खतरे में होते हैं जो जमीन पर सबसे करीब काम करते हैं. वे चेकपोस्ट संभालते हैं, ठिकानों की सुरक्षा करते हैं और उन इलाकों में आते-जाते हैं जहां आतंकियों को फायदा मिलता है.
इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि बलूचिस्तान और KP में हो रहे ये बदलाव अब पूरी तरह अलग-अलग खतरे नहीं रह गए हैं. वे एक-दूसरे को प्रभावित करने लगे हैं. हर चेकपोस्ट जिसे ज्यादा सुरक्षा की जरूरत है, हर काफिले के लिए जरूरी बड़ा सुरक्षा दल, हर पुलिस स्टेशन जिसे अतिरिक्त सुरक्षा चाहिए और हर जिला जहां संसाधनों को दूसरी जगह से हटाना पड़ता है, पहले से कई मोर्चों पर दबाव झेल रहे सुरक्षा तंत्र पर एक और बोझ डालता है.
बहुत सारे मोर्चे, लेकिन ताकत कम
पाकिस्तान की रणनीतिक समस्याएं पश्चिमी सीमा पर खत्म नहीं होतीं. वह अफगान तालिबान के साथ एक मुश्किल रिश्ते को संभालने की कोशिश कर रहा है, जबकि आतंकी खतरा उसी सीमा के पार से लगातार बढ़ रहा है. इसी समय उसकी सुरक्षा जिम्मेदारियां खाड़ी क्षेत्र तक भी बढ़ रही हैं. सऊदी अरब में हजारों पाकिस्तानी सैनिक तैनात हैं और रियाद तथा हूतियों के बीच तनाव में इस्लामाबाद की भागीदारी भी बढ़ती जा रही है.
पाकिस्तान जिस सुरक्षा बोझ को उठा रहा है, उसका दायरा काफी बड़ा और अजीब है. वह बलूचिस्तान में विद्रोह से लड़ रहा है, KP में लगातार मुश्किल होते आतंकी माहौल का सामना कर रहा है, काबुल में तालिबान सरकार के साथ उसके रिश्ते खराब हो रहे हैं और अब खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा राजनीति में भी उसकी हिस्सेदारी काफी ज्यादा हो गई है. अफगानिस्तान में तालिबान विरोधी प्रतिरोध के कुछ तत्वों के साथ पाकिस्तान के काम करने की कोशिशों को लेकर दावे और उनके जवाब में दावे भी सामने आए हैं, हालांकि इन रिपोर्टों की पुष्टि नहीं हुई है. हर चुनौती अलग है. मुश्किल यह है कि इन सभी के लिए वही सरकारी क्षमता, वही सुरक्षा संस्थाएं और आखिर में वही राजनीतिक ध्यान चाहिए.
शायद यही पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति से जुड़ा सबसे दिलचस्प सवाल है. वह ताकत दिखाने में बहुत अच्छा हो गया है और देश के अंदर तथा अब अपनी सीमाओं के बाहर भी इसका इस्तेमाल करने के लिए काफी तैयार है. लेकिन ताकत की एक कीमत होती है और अब उसका बिल कई जगहों पर एक साथ सामने आ रहा है. इसलिए रावलपिंडी के सामने चुनौती शायद सिर्फ यह नहीं है कि वह एक और आतंकी संगठन को हरा सकता है या एक और मोर्चे को संभाल सकता है या नहीं. असली सवाल यह है कि इतने सारे मोर्चों पर पहले से लड़ रहा राज्य क्या लगातार नई जिम्मेदारियां लेता रह सकता है, बिना आखिरकार अपनी ही रणनीतिक हद से आगे बढ़ने के नतीजों का सामना किए.
सोनम महाजन एक स्ट्रेटेजिक मामलों की कमेंटेटर और कॉलमिस्ट हैं, जो पाकिस्तान, अफगानिस्तान, आतंकवाद और साउथ एशिया की जियोपॉलिटिक्स में स्पेशलाइज़ हैं. विचार निजी हैं.
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