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Monday, 12 October, 2026
होमफीचरएक्स-रे, UV लाइट और 2.32 करोड़ रुपये—कैसे किया जा रहा है आमेर किले की पेंटिंग्स का मेकओवर

एक्स-रे, UV लाइट और 2.32 करोड़ रुपये—कैसे किया जा रहा है आमेर किले की पेंटिंग्स का मेकओवर

आमेर किले की मध्ययुगीन दीवारों पर बनी पेंटिंग्स को बचाने की बड़ी कोशिश. ‘सात्विक’ कला, साइंटिफिक बदलाव.

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जयपुर: कीर्तिपाल सिंह परमार आमेर किले के संकरे गलियारों से गुज़रे और इसके शानदार दरवाज़ों और आंगन को पार किया. वे एक बंद दरवाज़े के पास रुके जो भोजनशाला—शाही डाइनिंग हॉल की ओर जाता था.

जब दरवाज़ा खुला, तो उसके पीछे मौजूद पांच कमरों ने किले का एक छिपा हुआ पहलू दिखाया. दीवारों पर हल्के लाल, पीले और अन्य प्राकृतिक रंगों से अयोध्या, काशी, मथुरा और वृंदावन की पेंटिंग बनी हुई थीं. पारंपरिक ‘अराइश’ तकनीक का इस्तेमाल करके बनाई गई ये पेंटिंग (जिनमें गीले प्लास्टर पर रंग लगाए जाते हैं) सिर्फ डाइनिंग हॉल को सजाने के लिए नहीं थीं.

आमेर किले में संरक्षण के काम के प्रोजेक्ट मैनेजर और इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स (IGNCA) से जुड़े परमार ने कहा, “डाइनिंग हॉल में ऐसी पेंटिंग बनाने का मकसद खाना खाते समय सात्विक माहौल बनाए रखना था.”

आमेर किले की भोजनशाला में पौराणिक दृश्य दिखाने वाली एक बुरी तरह खराब हो चुकी पेंटिंग | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
आमेर किले की भोजनशाला में पौराणिक दृश्य दिखाने वाली एक बुरी तरह खराब हो चुकी पेंटिंग | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

लेकिन सदियों पुरानी ये पेंटिंग खतरे में हैं. पानी का रिसाव, नमी और देखरेख की कमी ने इन पर बुरा असर डाला है. पेंटिंग वाली सतह पीली पड़ गई है और दीवारों से परतें उखड़ रही हैं. अजीब बात यह है कि पहले पेंटिंग को ठीक करने की कोशिशों ने खराबी को और बढ़ा दिया. अब, संरक्षण विशेषज्ञ नुकसान को ठीक करने के लिए तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं.

आमेर की पेंटिंग के संरक्षण का काम 2008 और फिर 2017 में हुआ था, लेकिन उस समय यह काम निजी ठेकेदारों के ज़रिए किया गया था, वैज्ञानिक तरीके से नहीं. तब इस्तेमाल किए गए मटीरियल और रंगों से अब दीवारों की सतह को नुकसान पहुंच रहा है.

—कीर्तिपाल सिंह परमार, IGNCA प्रोजेक्ट मैनेजर

इस बार, पेंटिंग को ठीक करने का काम सिर्फ ऊपरी दिखावट से आगे बढ़कर फोरेंसिक जांच तक पहुंच गया है. IGNCA, आमेर डेवलपमेंट एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (ADMA) और राज्य पुरातत्व विभाग के साथ मिलकर मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजिंग, एक्स-रे फ्लोरोसेंस और केमिकल टेस्टिंग का इस्तेमाल कर रहा है ताकि असली रंगों की पहचान की जा सके, पहले किए गए सुधारों का पता लगाया जा सके और नुकसान का आकलन किया जा सके. UNESCO की वर्ल्ड हेरिटेज साइट पर मकसद किसी भी कीमत पर रंग वापस लाना नहीं है, बल्कि इतिहास की उन परतों को मिटाए बिना पेंटिंग को सुरक्षित करना है जो उनमें मौजूद हैं.

परमार ने आगे कहा, “सभी पेंटिंग और डिज़ाइनों को बेहतर तरीके से संरक्षित करना एक मुश्किल और चुनौतीपूर्ण काम है.”

इस रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट को लीड कर रहे कीर्तिपाल सिंह परमार ने बताया कि ये म्यूरल (दीवार पर बनी पेंटिंग) कछवाहा शासकों, जिनमें सवाई जय सिंह भी शामिल थे, के संरक्षण में बनवाए गए थे | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
इस रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट को लीड कर रहे कीर्तिपाल सिंह परमार ने बताया कि ये म्यूरल (दीवार पर बनी पेंटिंग) कछवाहा शासकों, जिनमें सवाई जय सिंह भी शामिल थे, के संरक्षण में बनवाए गए थे | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

राजस्थान के पुरातत्व और संग्रहालय विभाग के फोर्ट सुपरिटेंडेंट राकेश छोलक के अनुसार, ढाई साल चलने वाले इस प्रोजेक्ट पर 2.32 करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान है. जयपुर से लगभग 11 किमी दूर आमेर के लिए 50 करोड़ रुपये की बड़ी संरक्षण योजना के तहत यह एक बड़ा हिस्सा है. तुलना करें तो, शीश महल के लिए सिर्फ 32 लाख रुपये और मान सिंह महल के लिए 1.61 करोड़ रुपये की योजना है.

म्यूरल का रेस्टोरेशन राजस्थान में अभी चल रहे सबसे बड़े संरक्षण प्रोजेक्ट्स में से एक है. चुनौती यह है कि पुरानी गलतियों को दोहराए बिना असली कलाकृति को बचाया जाए.

परमार ने कहा, “2008 और फिर 2017 में आमेर के म्यूरल पर संरक्षण का काम हुआ था. लेकिन उस समय यह काम प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टरों के ज़रिए किया गया था, न कि वैज्ञानिक तरीके से. तब इस्तेमाल किए गए मटीरियल और रंगों से अब दीवारों की सतह को नुकसान पहुंच रहा है.”

परमार ने 2020 में बाढ़ के बाद जयपुर के अल्बर्ट हॉल म्यूज़ियम में लगभग पांच साल तक संरक्षण का काम लीड किया था. IGNCA ने 2017 में अलवर म्यूज़ियम और बीकानेर व भरतपुर की जगहों पर भी रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट किए हैं.

भोजनशाला की दीवारों पर अयोध्या और काशी की दुर्लभ पेंटिंग बनी हुई हैं | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
भोजनशाला की दीवारों पर अयोध्या और काशी की दुर्लभ पेंटिंग बनी हुई हैं | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

आमेर किले के म्यूरल प्रोजेक्ट के पहले चरण में चार जगहें शामिल हैं: सिंह पोल, गणेश पोल, मान सिंह महल और भोजनशाला. परमार की सात सदस्यों वाली टीम में आर्काइविस्ट, कलाकार और संरक्षण विशेषज्ञ शामिल हैं.

भोजनशाला में काम बहुत बारीकी से किया जा रहा है. संरक्षण टीम की सदस्य शिखा शेखावत ने फूलों वाली पेंटिंग को छूने से पहले ग्लव्स पहने. डिस्टिल्ड वॉटर का इस्तेमाल करके, उन्होंने धीरे से उसकी एक पंखुड़ी के छोटे से हिस्से को साफ किया. अभी के लिए, टीम पूरी पेंटिंग को साफ करने की कोशिश करने के बजाय छोटे हिस्सों पर ट्रीटमेंट आज़मा रही है. सामने एक नाज़ुक काम है—सिर्फ पेंटिंग्स को बचाना ही नहीं, बल्कि उन्हें और नुकसान से भी बचाना. यह काम ऐसे किले में करना है जहां हर साल लगभग 20 लाख पर्यटक आते हैं और जो राजस्थान के सबसे बड़े टूरिस्ट आकर्षणों में से एक है.

छोलक ने कहा, “मैंने देखा कि आमेर किले की वॉल पेंटिंग्स खराब हो गई थीं और उनका रंग फीका पड़ गया था, उन्हें तुरंत संरक्षण की ज़रूरत थी. रोज़ाना हज़ारों लोग इस स्मारक को देखने आते हैं और उन्हें बेहतर अनुभव देना हमारी ज़िम्मेदारी है.”

सदियों पुराना कैनवस

ॉभोजनशाला के अंदर, दीवारों पर महाकाव्यों की कहानियां दिखाई देती हैं, भले ही समय के साथ वे कुछ धुंधली हो गई हों. एक भित्ति-चित्र (म्यूरल) में समुद्र मंथन का दृश्य है, जिसमें देवता और असुर एक विशाल सर्प के दोनों सिरों को खींच रहे हैं. यह सर्प ब्रह्मांडीय सागर को मथने के लिए एक पर्वत के चारों ओर लिपटा हुआ है. इसके नीचे, विष्णु कछुए का रूप धारण किए हुए हैं और अपनी पीठ पर मंदराचल पर्वत को संभाले हुए हैं.

बाहर भव्य प्रवेश द्वार ‘गणेश पोल’ पर, मेहराबों, खंभों और प्रवेश-मार्गों पर हाथ से बनाए गए फूलों, बेलों और पत्तियों के बारीक चित्र बने हैं. ये डिज़ाइन राजपूत और मुगल परंपराओं के बीच कलात्मक आदान-प्रदान को दर्शाते हैं, खासकर बगीचों और प्राकृतिक दुनिया के प्रति मुगलों के लगाव को.

आमेर किले के भव्य प्रवेश द्वारों में से एक, गणेश पोल को फूलों वाले बारीक भित्ति-चित्रों से सजाया गया है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
आमेर किले के भव्य प्रवेश द्वारों में से एक, गणेश पोल को फूलों वाले बारीक भित्ति-चित्रों से सजाया गया है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

भोजनशाला खुद 16वीं सदी में राजा मान सिंह प्रथम के शासनकाल की है, लेकिन इसके भित्ति-चित्र बाद के कछवाहा शासकों के समय हुई कलात्मक प्रगति को दर्शाते हैं. सवाई जय सिंह द्वितीय के शासनकाल में, महल की सजावटी कला में वैष्णव विषयों और पौराणिक कथाओं को प्रमुखता मिली. जब 17वीं और 18वीं सदी में पूरे उत्तर भारत में अयोध्या की धार्मिक पहचान ‘राम की परम नगरी’ के रूप में मजबूत हुई, तो कछवाहा राजपूतों ने उस पवित्र परिदृश्य को सीधे अपने महल की दीवारों पर उकेरा.

भोजनशाला की छत पर फूलों के रंग-बिरंगे डिज़ाइन | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
भोजनशाला की छत पर फूलों के रंग-बिरंगे डिज़ाइन | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

परमार के लिए, सबसे खास बात यह है कि शाही भोजन-कक्ष में धार्मिक चित्र और महल की कला का अद्भुत संगम देखने को मिलता है.

उन्होंने कहा, “आमेर के भित्ति-चित्र समृद्ध विरासत से भरे हैं और धार्मिक भक्ति तथा कलात्मक विकास के अनूठे मेल को दर्शाते हैं. इन्हें सवाई जय सिंह सहित कछवाहा शासकों के संरक्षण में बनवाया गया था और राजपूत महल कला में इनका एक खास स्थान है.”

हर परत, रंग और पहले की गई मरम्मत से इस बात का सुराग मिल सकता है कि समय के साथ इन चित्रों को कैसे बनाया गया, उनमें क्या बदलाव किए गए और उन्हें कैसे संरक्षित किया गया. भोजनशाला में विष्णु के 24 अवतारों को दर्शाने वाले अधूरे पैनल भी हैं, जो संरक्षण विशेषज्ञों को यह अध्ययन करने का मौका देते हैं कि कलाकारों ने धार्मिक चित्रों के क्रम की योजना कैसे बनाई थी.

आमेर किले की भोजनशाला में अधूरे स्केच संरक्षण विशेषज्ञों को यह समझने का मौका देते हैं कि कलाकार अपनी धार्मिक और पौराणिक पेंटिंग की योजना कैसे बनाते थे | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
आमेर किले की भोजनशाला में अधूरे स्केच संरक्षण विशेषज्ञों को यह समझने का मौका देते हैं कि कलाकार अपनी धार्मिक और पौराणिक पेंटिंग की योजना कैसे बनाते थे | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

परमार और संरक्षण टीम के लिए चुनौती यह है कि पेंटिंग के असली रंगों और सतहों को नुकसान पहुंचाए बिना उन्हें सुरक्षित किया जाए. आज हटाई या जोड़ी गई कोई भी परत आने वाली पीढ़ी के लिए बची हुई चीज़ों को बदल सकती है.

उन्होंने कहा, “इसलिए किसी भी तरह का काम शुरू करने से पहले वैज्ञानिक दस्तावेज़ीकरण ज़रूरी हो जाता है.”

आमेर किले की भित्ति-चित्रों में राजपूत महल कला और मुगल प्रभाव का संगम दिखता है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
आमेर किले की भित्ति-चित्रों में राजपूत महल कला और मुगल प्रभाव का संगम दिखता है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

क्या गलत हो सकता है, इसका एक सबक पहले ही मिल चुका है. ADMA ने पहले भित्ति-चित्रों को ठीक करने के लिए प्राइवेट ठेकेदारों को काम पर रखा था, लेकिन उन्होंने काम खराब कर दिया.

ADMA के एक अधिकारी ने कहा, “वे उम्मीद के मुताबिक काम नहीं कर पाए और उन्होंने जो मटीरियल इस्तेमाल किया, वह स्टैंडर्ड के हिसाब से नहीं था. इस बार हम वह गलती नहीं दोहराना चाहते.”

यह कोई अनोखी कहानी नहीं है. पूरे भारत में संरक्षण परियोजनाओं की खराब काम के लिए बार-बार आलोचना होती रही है—चाहे वह दिल्ली के महरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क में कुली खान के मकबरे पर सफेद और नीले रंग के अजीब शेड्स हों या लखनऊ के छोटा इमामबाड़ा में सीमेंट का नुकसानदेह इस्तेमाल.

संरक्षण आर्किटेक्ट रतीश नंदा ने इस साल ‘भारत में संरक्षण-आधारित विकास’ विषय पर लेक्चर देते हुए कहा, “संरक्षण का मतलब सिर्फ इमारत को ठीक करना नहीं, बल्कि इमारत को समझना है. हमारे देश में अक्सर लोग सोचते हैं कि संरक्षण विकास के खिलाफ है, लेकिन यह एक विज्ञान और कला है.”

वैज्ञानिक संरक्षण

जब परमार और उनकी टीम ने जून में आमेर किले में काम शुरू किया, तो उन्होंने सबसे पहले पुराने संरक्षण रिकॉर्ड देखे ताकि यह समझा जा सके कि सालों से भित्ति चित्रों (murals) के साथ क्या-क्या किया गया था. लेकिन दस्तावेज़ों से उन्हें सीमित जानकारी ही मिल सकी. खुद पेंटिंग्स की अपनी एक कहानी थी.

पहली बार, टीम ने मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजिंग (MSI) का सहारा लिया और दिन की रोशनी के साथ-साथ इन्फ्रारेड और अल्ट्रावायलेट रोशनी में भित्ति चित्रों की तस्वीरें लीं. इन तस्वीरों से ऐसी बारीकियां सामने आईं जो नंगी आंखों से नहीं दिख रही थीं और पता चला कि पहले भी बड़े पैमाने पर उनमें सुधार (retouching) किया गया था.

परमार ने कहा, “इस प्रक्रिया से पता चला कि पहले भी बड़े पैमाने पर सुधार (retouching) किया गया था. इसके बाद पिगमेंट (रंगों) और बाइंडिंग मटीरियल (जोड़ने वाले पदार्थों) के केमिकल कंपोजीशन (रासायनिक संरचना) का पता लगाने के लिए एक्स-रे फ्लोरोसेंस (XRF) एनालिसिस का इस्तेमाल किया गया.”

सफाई के टेस्ट से आमेर किले में फूलों वाले भित्ति चित्र के असली रंगों का पता चला | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
सफाई के टेस्ट से आमेर किले में फूलों वाले भित्ति चित्र के असली रंगों का पता चला | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

वैज्ञानिक एनालिसिस से टीम को सतह पर मौजूद पदार्थों की पहचान करने में मदद मिली — ऐसी जानकारी जिससे यह तय हो सके कि असली परतों को नुकसान पहुंचाए बिना पेंटिंग्स को कैसे और किस हद तक साफ किया जा सकता है.

इसके बाद ही संरक्षण विशेषज्ञों ने भित्ति चित्रों को छूना शुरू किया, और वह भी बहुत सावधानी से.

पूरी पेंटिंग को एक साथ साफ करने के बजाय, उन्होंने छोटे-छोटे टेस्ट पैच (हिस्सों) से शुरुआत की. सबसे पहले डिस्टिल्ड वॉटर से और जहां ज़रूरत पड़ी, वहां बहुत कम मात्रा में इथेनॉल और एसीटोन से उनका ट्रीटमेंट किया गया.

एक छोटा टेस्ट पैच भोजनशाला में भित्ति चित्र पर सफाई के असर को दिखाता है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
एक छोटा टेस्ट पैच भोजनशाला में भित्ति चित्र पर सफाई के असर को दिखाता है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

फूलों वाले एक डिज़ाइन पर, टेस्ट पैच से टीम को पीली पड़ चुकी सतह के नीचे छिपी चीज़ों की एक उत्साहजनक झलक मिली. वह हिस्सा फीका और पीला दिख रहा था, लेकिन ट्रीटमेंट के बाद असली लाल और नीले रंग उभरकर सामने आए.

शिखा शेखावत ने कहा, “भित्ति चित्रों को तुरंत साफ करने या दोबारा पेंट करने के बजाय, संरक्षण टीम छोटे-छोटे हिस्सों पर काम कर रही है. हमने सबसे पहले कंडीशन मैपिंग की. नुकसान का स्तर अलग-अलग है, और इसमें से कुछ मौसम, सीपेज (सीलन) और पहले किए गए सुधारों (retouching) की वजह से हुआ है. हम बहुत कम मात्रा में केमिकल का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि यह पक्का किया जा सके कि पेंट की असली परत को कोई नुकसान न पहुंचे.”

भोजनशाला में बुरी तरह खराब हो चुके पौराणिक भित्ति चित्र की सफाई से पहले, सफाई के दौरान और सफाई के बाद की स्थिति | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
भोजनशाला में बुरी तरह खराब हो चुके पौराणिक भित्ति चित्र की सफाई से पहले, सफाई के दौरान और सफाई के बाद की स्थिति | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

हर टेस्ट पैच एक तरह की जांच भी है. इससे संरक्षण करने वालों को असली सतह और पहले की मरम्मत के दौरान जोड़ी गई परतों के बीच फर्क करने में मदद मिलती है.

टीम की एक और सदस्य नेहा शर्मा ने कहा, “पूरे हिस्से को संरक्षित करने से पहले टेस्ट पैच लेने से हमें असली सतह और उस पर इस्तेमाल किए गए केमिकल का पता लगाने में मदद मिलती है.”

हर दिन हज़ारों लोग इस स्मारक को देखने आते हैं और उन्हें बेहतर अनुभव देना हमारी ज़िम्मेदारी है.

–राकेश छोलक, आमेर किले के सुपरिटेंडेंट

लेकिन पेंटिंग की सफाई काम का सिर्फ एक हिस्सा है. पानी का रिसाव अभी भी भित्ति-चित्रों (म्यूरल) के लिए खतरा बना हुआ है, और कई जगहों पर प्लास्टर उखड़ रहा है. टीम यह पता लगाने के लिए ग्राउंड-पेनिट्रेटिंग रडार (GPR) का इस्तेमाल करने की योजना बना रही है कि नमी संरचना में कहां से आ रही है. अगर यह रिसाव जारी रहता है, तो भित्ति-चित्रों की सफाई से उन्हें बस कुछ समय के लिए ही ठीक किया जा सकेगा.

परमार ने कहा, “जब पुरानी हेरिटेज इमारतों में रिसाव होता है, तो इससे पेंट की गई सतहों को नुकसान पहुंचता है. हमें इसकी मूल वजह को ठीक करने की ज़रूरत है.”

छोलक ने भी कहा है कि काम आगे बढ़ाने से पहले रिसाव की समस्या को ठीक किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, “जब तक रिसाव की समस्या ठीक नहीं हो जाती, तब तक पेंटिंग पर काम करने का कोई मतलब नहीं है.”

इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स (IGNCA) के कीर्तिपाल सिंह परमार आमेर किले में कलाकारों, संरक्षण करने वालों और आर्काइविस्ट की एक टीम का नेतृत्व करते हैं | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स (IGNCA) के कीर्तिपाल सिंह परमार आमेर किले में कलाकारों, संरक्षण करने वालों और आर्काइविस्ट की एक टीम का नेतृत्व करते हैं | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

कमेटियां और भीड़

आमेर किले में तीन महीने तक बारीकी से काम करने के बाद, परमार की टीम ने अपनी शुरुआती जांच और टेस्ट पैच के आधार पर एक साइंटिफिक रिपोर्ट तैयार की.

लेकिन UNESCO की वर्ल्ड हेरिटेज साइट पर संरक्षण का काम करने के लिए ओरिजिनल मटीरियल, आर्किटेक्चरल डिज़ाइन और स्मारक के सांस्कृतिक महत्व को बनाए रखने से जुड़े कड़े नियम होते हैं. बड़े पैमाने पर काम शुरू होने से पहले, IGNCA और राज्य का पुरातत्व विभाग अगले महीने विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाएगा.

परमार ने कहा, “हमारे सामने बड़ी चुनौतियां हैं क्योंकि हमें UNESCO साइट पर तय नियमों का सख्ती से पालन करना होगा. एक एक्सपर्ट कमेटी तय करेगी कि हम कितना बदलाव या काम कर सकते हैं.”

आमेर किले में गणेश पोल पर म्यूरल (भित्ति चित्र) की बहाली करने वाली टीम | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
आमेर किले में गणेश पोल पर म्यूरल (भित्ति चित्र) की बहाली करने वाली टीम | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

अब किले की हालत को लेकर ज़्यादा तेज़ी से काम करने की ज़रूरत महसूस की जा रही है. अगस्त 2025 में, भारी बारिश के कारण आमेर किले में रामबाग के पास दीवार का एक हिस्सा गिर गया था. इसके बाद डिप्टी सीएम दीया कुमारी ने मौके का मुआयना किया और अधिकारियों को तुरंत मरम्मत और सुरक्षा का काम शुरू करने का निर्देश दिया.

छोलक के अनुसार, उनके दौरे के बाद संरक्षण के काम की रफ़्तार बढ़ गई.

अगली चुनौती आमेर किले में आने वाले पर्यटकों की भीड़ है. सर्दियों में पर्यटकों की भारी भीड़ उमड़ती है, और टीम को भीड़ के बीच भी अपना काम जारी रखना होगा.

पहला चरण पूरा होने के बाद, टीम किले में मौजूद अन्य उपेक्षित म्यूरल्स पर काम करने की योजना बना रही है.

छोलक ने कहा, “अगर यह तरीका काम करता है, तो टीम इसके बाद किले के रंग महल पर काम कर सकती है— यह एक और ऐसी जगह है जहां म्यूरल्स के मामले में समय के साथ जमा हुई गंदगी को साफ करने और जो बचा हुआ है उसे सुरक्षित रखने के बीच एक नाज़ुक संतुलन बनाए रखने की ज़रूरत है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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