चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ जनरल धीरज सेठ ने 27 सितंबर को एनडीटीवी डिफेंस समिट में कहा, “जमीन ही कामयाबी का हमेशा एक और एकमात्र ठोस और उपयोगी पैमाना बनी रहेगी. जीत को हमेशा ताकत के जोर से जीती गई, अपने कब्जे में की गई और सुरक्षित की गई जमीन के पैमाने से ही मापा जाता रहा था, मापा जाता है और मापा जाता रहेगा.”
यह उनके व्याख्यान का एक छोटा-सा हिस्सा है, लेकिन इसने एक बहस शुरू कर दी. आर्मी चीफ की इस बात को कुछ लोगों ने निरंकुशतावादी और अतिवादी बताया. कुछ लोगों ने इसे कुछ समय पहले दिए गए एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह के बयान से जोड़कर देखा. उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का ज़िक्र करते हुए वायुसेना की ताकत की अहमियत पर जोर दिया था. इस पर एक सारगर्भित प्रतिक्रिया पूर्व फाइटर पायलट ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत (रिटायर्ड) की ओर से आई है, जो ‘दिप्रिंट’ में प्रकाशित हुई है.
अहलावत ने अपने लेख में सही कहा है कि युद्ध से राजनीतिक मकसद पूरा होना चाहिए. राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के तहत यह तय करने की आज़ादी होनी चाहिए कि दुश्मन को सज़ा देनी है, उसे जीत से रोकना है, उसके मन में डर पैदा करना है या ज़रूरत पड़ने पर उसकी कुछ ज़मीन पर कब्ज़ा करना है. इसलिए, ज़मीन जीतने को ही कामयाबी का एकमात्र पैमाना बनाने के खिलाफ एक सही तर्क दिया जा सकता है, लेकिन भारत ने जो लड़ाइयां लड़ी हैं, उनके बारे में उनके विचार इस तर्क को दूसरी दिशा में काफी दूर तक ले जाते हैं. उन्होंने कहा है कि 1965, 1971 और कारगिल युद्ध में ज़मीन पर कब्ज़ा किए बिना जीत हासिल की गई. इसी आधार पर वह जमीन को जीत का एकमात्र पैमाना मानने के तर्क पर सवाल उठाते हैं.
यह निष्कर्ष इस संकीर्ण सोच पर आधारित है कि युद्ध में जमीन जीतना कितना महत्वपूर्ण है. रणनीतिक सोच ने जमीन पर स्थायी कब्जे को कभी इतना महत्व नहीं दिया. ज्यादा महत्वपूर्ण सोच है—नियंत्रण: किसी अनुकूल नतीजे को हासिल करने के लिए जमीन का इस्तेमाल करने की क्षमता.
जमीन: फौजी जीत का सबसे अहम पैमाना
भारत ने जो लड़ाइयां लड़ी हैं, उनमें से कई में ज़मीन पर कब्जा एक मुख्य सैन्य शर्त थी, जिसके जरिए राजनीतिक नतीजा पक्का किया जा सकता था. यहां हम इसके केवल दो उदाहरण लेते हैं.
कारगिल युद्ध पूरी तरह इलाके पर कब्जा रखने का युद्ध था. पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) से भारतीय सीमा के अंदर कुछ इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया था. अहलावत सही कहते हैं कि उस युद्ध में राजनीतिक लक्ष्य उस कब्जे को खत्म करना था, जमीन जीतना नहीं. लेकिन यह फर्क जमीन की अहमियत को कम नहीं करता. जीत इस बात में थी कि पहाड़ी चोटियों को पाकिस्तानी कब्जे से मुक्त कराया जाए और जमीन के मामले में पहले जैसी स्थिति वापस लाई जाए.
यही बात 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध से भी जुड़ी है. अहलावत कहते हैं कि ढाका में पाकिस्तानी सेना के सरेंडर की तस्वीर सिर्फ इसलिए यादगार बन गई क्योंकि उसने अंतिम राजनीतिक नतीजे को दर्ज किया, इसलिए नहीं कि भारत ने ढाका पर कब्जा कर लिया था. यह निष्कर्ष गलत है, क्योंकि दोनों बातों को अलग नहीं किया जा सकता. अंतिम राजनीतिक नतीजा इसलिए हासिल किया जा सका क्योंकि पाकिस्तान ने अपने पूर्वी हिस्से पर सैन्य नियंत्रण बनाए रखने की क्षमता खो दी थी.
जमीन जीत का एकमात्र पैमाना भले ही न हो, लेकिन जमीन पर कब्जा सैन्य जीत का सबसे अहम संकेतक माना जाता रहेगा. यह उस वास्तविकता को दिखाता है, जिसे नकारना, बदलना या उसकी कोई सफाई देना मुश्किल होता है. 1991 के खाड़ी युद्ध में अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन ने 38 दिनों तक भारी हवाई हमले किए, लेकिन जीत तब ठोस हुई जब जमीनी हमले के जरिए कुवैत को आजाद कराया गया. 2020 में अजरबैजान की ओर से ड्रोन के इस्तेमाल पर काफी ध्यान दिया गया, लेकिन नागोर्नो-कराबाख को लेकर लड़ाई तब खत्म हुई जब अजरबैजान की सेना ने शुशा और उन सभी इलाकों पर फिर से कब्जा कर लिया, जिन पर 1990 के दशक में आर्मेनिया ने कब्जा कर लिया था.
आज के समय में यूक्रेन इसका सबसे साफ उदाहरण है. ड्रोन से युद्ध, लंबी दूरी से हमले और तकनीक के नए इस्तेमाल यूक्रेन-रूस युद्ध की पहचान बन गए हैं. लेकिन मुख्य सवाल जमीन से ही जुड़ा है. सफलता को जीती गई जमीन या खोई हुई जमीन को दोबारा हासिल करने से ही मापा जाएगा. और यूक्रेन-रूस युद्ध में कोई समझौता इसी बात पर निर्भर करेगा कि यूक्रेन अपनी खोई हुई जमीन को लेकर क्या रुख अपनाता है और कितनी जमीन खोने की बात मानता है.
इस संदर्भ में ऑपरेशन सिंदूर पर भी गौर करने की जरूरत है. इसे आतंकी ठिकानों को नष्ट करने और पाकिस्तान को नुकसान पहुंचाने जैसे सीमित राजनीतिक लक्ष्यों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था. इसलिए इस ऑपरेशन का मूल्यांकन जमीन के पैमाने पर करना बेकार होगा. लेकिन इस ऑपरेशन से मिले अनुभवों के आधार पर भविष्य के युद्ध की कल्पना करना एक गंभीर गलती होगी. सजा देने, डर पैदा करने या दबाव बनाने के लिए किए जाने वाले ऑपरेशन राजनीतिक और सैन्य तौर पर आकर्षक लगते हैं और किसी देश के पास मौजूद सैन्य विकल्पों में शामिल हो सकते हैं. लेकिन जानबूझकर चलाए गए सीमित ऑपरेशन जरूरी नहीं कि हमें यह बताएं कि युद्ध में बढ़त हासिल करने के लिए क्या करना होगा.
भारत लंबे युद्ध की तैयारी करे
जनरल सेठ के पूरे व्याख्यान के संदर्भ को देखें तो उनका तर्क जमीन को लेकर कही गई उनकी एक बात से कहीं ज्यादा व्यापक है. उन्होंने चेतावनी दी कि तकनीक की वजह से लड़ाइयां छोटी हो सकती हैं, लेकिन युद्ध छोटे हो जाएं, यह जरूरी नहीं है. उन्होंने कहा कि संघर्ष ‘विराम वाले युद्ध’ में बदल सकते हैं. इसलिए उनका बड़ा मुद्दा यह था कि भारत ऐसे युद्धों के लिए तैयारी करे, जो लंबे खिंच सकते हैं और जिन्हें खत्म करना मुश्किल हो सकता है.
यह बात सीधे सैन्य क्षमता बढ़ाने से जुड़ी है. कोई देश भविष्य में जिस तरह के युद्ध की कल्पना करता है, उसी के हिसाब से अपनी सेना को तैयार करता है. जब यह माना जाता है कि भविष्य का युद्ध सटीक हमलों, दुश्मन को सजा देने और तनाव बढ़ाने वाला होगा, तो सेना का विकास भी उसी हिसाब से किया जाएगा. सेना की रणनीति, प्रशिक्षण और हथियारों की खरीद सीमित संघर्ष को ध्यान में रखकर क्षमता बनाने के लिए होगी, भले ही अगला युद्ध अलग तरह की मांग करे.
लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता, ड्रोन, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और निगरानी व्यवस्था आदि जरूरी हैं. खतरा यह है कि इनके आधार पर ऐसे युद्ध की कल्पना न कर ली जाए, जिसमें दूर तक हमला करने की क्षमता को युद्ध का फैसला करने वाली क्षमता मान लिया जाए.
बड़ी संख्या में सैनिकों वाली सेना के कारण बजट पर पड़ने वाले दबाव की वजह से जमीनी सेना में निवेश करने के बजाय सटीक निशाना लगाने वाले हथियारों पर पैसा खर्च करना आसान लगता है. लेकिन समय बीतने के साथ लंबे युद्ध के लिए जरूरी सैन्य क्षमता के कम दिखाई देने वाले हिस्से कमजोर पड़ सकते हैं. भारत की पश्चिमी और उत्तरी सीमा पर जो मुख्य सैन्य चुनौतियां हैं, उनकी जड़ें विवादित भूगोल में हैं. भविष्य के संघर्ष सीमित ही रहेंगे, यह मान लेना दूरदर्शिता नहीं होगी. राजनीतिक नेता ऐसे संकट में फंस सकते हैं, जिसमें वे पहले से तय लक्ष्यों और नियंत्रित तनाव के हिसाब से आगे बढ़ने की कोशिश कर सकते हैं. लेकिन वे युद्ध कितने समय तक चलेगा, कितना गंभीर होगा और उसका स्वरूप क्या होगा, इसका फैसला अकेले नहीं कर सकते.
लंबे समय तक चलने वाले बड़े जमीनी संघर्ष भारतीय सेना के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बने हुए हैं. यह कोई अलग या काल्पनिक स्थिति नहीं है. भारत चीन और पाकिस्तान के साथ बड़े युद्ध लड़ चुका है और उसके लिए सबसे बड़ा जोखिम विवादित और भारी सैन्य तैनाती वाली सीमाओं को लेकर है. यह कोई सैन्य तर्क नहीं है और न ही सवाल पारंपरिक सेना के ढांचे और आधुनिक तकनीक के बीच किसी एक को चुनने का है. असली जरूरत ऐसी संयुक्त सेना तैयार करने की है, जो सीमित संघर्ष के बड़े रूप लेने, दबाव बनाने की रणनीति के नाकाम होने और युद्ध के दौरान सहनशक्ति तथा जमीन पर नियंत्रण बनाए रखने की परीक्षा में भी मजबूत बनी रहे. यही वह कसौटी है, जिस पर सेना के ढांचे, रणनीति और क्षमता विकास को परखा जाना चाहिए.
लेफ्टिनेंट जनरल डी.एस. हुडा (रिटायर्ड) इंडियन आर्मी की नॉर्दर्न कमांड के पूर्व जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ और दिल्ली पॉलिसी ग्रुप में सीनियर फेलो हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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