चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ जनरल धीरज सेठ ने एनडीटीवी डिफेंस समिट में कहा कि ज़मीन जीतना ही युद्ध में जीत का ठोस पैमाना माना जाता है. उन्होंने उस सोच को ही सामने रखा जिसकी संस्थागत जड़ें बहुत गहरी हैं. ज़मीन दिखाई देती है, उसकी फोटो खींची जा सकती है और उसका राजनीतिक महत्व है. हथियार डाल चुकी सेना, हारे हुए जनरल या किसी पहाड़ी की चोटी पर कब्ज़े की तस्वीरें पूरी कहानी साफ कर देती हैं, लेकिन ज़मीन को ही जीत की एकमात्र कसौटी मानना इतिहास और रणनीति, दोनों के नजरिए से सही नहीं होगा.
इससे राष्ट्रीय सुरक्षा नीति ऐसी स्थिति में फंस सकती है, जिससे बचने का फैसला भारत बार-बार करता रहा है और इसके पीछे सही वजह भी है.
युद्ध असल में दूसरे साधनों से राजनीति है. इसलिए सैन्य रणनीति और युद्ध के पीछे का तर्क हमेशा सत्ता के राजनीतिक मकसद को पूरा करने वाला होना चाहिए, न कि मनमाना. जीत एक राजनीतिक नतीजा होती है, जिसे पहले से तय लक्ष्यों के आधार पर मापा जाता है, न कि नक्शे पर बनाए गए स्कोर से. अगर सिर्फ ज़मीन को पैमाना माना जाए तो भारत को हर बार राजनीतिक दबाव में बल प्रयोग करते समय ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. भारत को ज़मीन हासिल करनी होगी, उस पर कब्ज़ा बनाए रखना होगा और इस प्रक्रिया में खून और पैसा खर्च करना होगा, तभी उसे ‘जीत’ कहा जा सकेगा. यह सोच उस लचीलेपन को सीमित करती है जो सीमित लड़ाइयों और सीमित लक्ष्यों वाली लड़ाइयों में भारत के काम आता रहा है. ज़मीन हमेशा एक बड़ा रणनीतिक लक्ष्य रही है, लेकिन इसे ही एकमात्र महत्वपूर्ण लक्ष्य मानना सही नहीं होगा.
अगर हमने जीत की इस एकमात्र कसौटी को मान लिया तो हमें अपने पूरे सैन्य इतिहास को फिर से लिखना पड़ेगा.
1965, 1971, कारगिल और ऑपरेशन सिंदूर
1965 की लड़ाई को देखें तो भारतीय सेना ने पाकिस्तान की करीब 1,840 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया था, जबकि पाकिस्तान ने भारत की करीब 540 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर कब्ज़ा किया था. ताशकंद समझौते के तहत दोनों पक्षों को 5 अगस्त 1965 वाली स्थिति में लौटना पड़ा. ज़मीन पर हासिल की गई ‘उपलब्धि’ खत्म हो गई.
लेकिन राजनीतिक लक्ष्य पूरा हो गया. यह साफ कर दिया गया कि जीती गई ज़मीन पर कब्ज़ा बनाए रखे बिना भी पाकिस्तान कश्मीर पर जबरन कब्ज़ा नहीं कर सकता और भारत सैन्य कार्रवाई करके पहले की स्थिति कायम रख सकता है. अगर जीत की ज़मीन-केंद्रित कसौटी रखी गई तो भारत 1965 की लड़ाई में अपनी ‘जीत’ का जायज जश्न मनाने से वंचित हो जाएगा. अगर ज़मीन ही जीत को परिभाषित करे तो 1965 की लड़ाई को ज्यादा से ज्यादा ड्रॉ मुकाबला ही कहा जाएगा.
1999 में हुआ कारगिल युद्ध इसका ज्यादा साफ उदाहरण है. पाकिस्तानी सेना ने एलओसी के आसपास भारतीय ठिकानों पर कब्ज़ा कर लिया. भारत ने हर चोटी पर वापस कब्ज़ा कर लिया. किसी नए इलाके पर कब्ज़ा नहीं किया गया. एलओसी की पुरानी स्थिति वापस बहाल की गई. यह ऑपरेशन सफल हुआ क्योंकि राजनीतिक लक्ष्य कब्ज़ा छुड़ाना था, कब्ज़ा करना नहीं. ऑपरेशन के तहत गुंजाइश तो थी, लेकिन भारत ने एलओसी को पार नहीं करने का फैसला किया.
भारत ने एक इंच ज़मीन भी हासिल नहीं की, फिर भी अपनी जीत दर्ज की. इस जीत में काफी खून और पैसा खर्च हुआ, फिर भी यह जीत थी. इसे घुसपैठ को पीछे हटाने के राजनीतिक लक्ष्य के आधार पर मापा गया.
मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर इस अंतर को और साफ करता है. चार दिन चली इस टक्कर में आमने-सामने की लड़ाई नहीं हुई. लंबी दूरी की मिसाइलों, दूर से हमला करने वाले हथियारों, सटीक निशाना लगाने वाली तोपों, ड्रोनों, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और एयर डिफेंस का इस्तेमाल किया गया. भारत की किसी ज़मीनी सेना ने सीमा पार करके पाकिस्तानी ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं किया. घोषित लक्ष्य ज़मीन पर कब्ज़ा करना नहीं, बल्कि आतंकी ढांचे को निशाना बनाना था.
युद्धविराम तब हुआ जब भारत ने कहा कि उसके सैन्य लक्ष्य पूरे हो गए हैं. अब इस ऑपरेशन में किसी ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं किया गया, इसलिए इसे जीत घोषित न करना बिल्कुल अनुचित होगा.
जीत के लिए ज़मीन को ही कसौटी मानने वाले विचार के समर्थन में अक्सर 1971 की लड़ाई का उदाहरण दिया जाता है. सेना अध्यक्ष ने भी सरेंडर के कागज़ों पर हस्ताक्षर करते पाकिस्तानी लेफ्टिनेंट जनरल आमिर अब्दुल्लाह खान नियाज़ी की मशहूर फोटो का हवाला दिया. उस लड़ाई की भारत के सैन्य इतिहास में सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि एक नए देश, बांग्लादेश का जन्म हुआ. इसके बाद भी भारत ने पूर्व और पश्चिम, दोनों मोर्चों पर कब्ज़ा की गई ज़मीन युद्ध के बाद की व्यवस्था और शिमला समझौते के तहत वापस कर दी. राजनीतिक लक्ष्य हासिल हो गया था. पाकिस्तान का पूर्वी हिस्सा उससे अलग हो गया और शरणार्थी लौट गए. पूर्व और पश्चिम में पाकिस्तान की ज़मीन पर स्थायी कब्ज़ा कभी लक्ष्य नहीं रहा. ज़मीन एक लक्ष्य हासिल करने का एक साधन थी, लक्ष्य नहीं.
ढाका में सरेंडर की तस्वीरें सिर्फ इसलिए एक मिसाल बन गईं क्योंकि इनमें एक अंतिम राजनीतिक लक्ष्य हासिल होने के दृश्य दर्ज हैं. वे इसलिए मिसाल नहीं हैं कि भारत ने ढाका पर कब्ज़ा कर लिया था.
भारत-चीन लड़ाई और झड़पें भी इसी बात को एक अलग तरीके से दिखाती हैं. 1962 में भारत अक्साई चिन और तत्कालीन ‘नेफा’ यानी नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी नाम वाले इलाकों की कुछ ज़मीन हार गया था. यह हार वास्तविक थी और भारत ने इसे अपनी हार या नाकामी माना, लेकिन इसके बाद 1967 में नाथू ला और चो ला में हुई झड़पों में भारतीय सेना डटी रही और उसने चीनी सेना को नुकसान भी पहुंचाया. ज़मीन की अदला-बदली नहीं हुई, लेकिन भारत ने इसे अपनी जीत बताया.
2020 में गलवान में हुई झड़पों के बाद दोनों सेनाएं लंबे समय तक आमने-सामने डटी रहीं. बाद में सेनाओं की वापसी की व्यवस्था के तहत अस्थायी बफर जोन बनाए गए और कुछ इलाकों में गश्त पर रोक लगा दी गई. कुछ इलाकों तक पहुंच बंद होने को नीतिगत रूप से स्थायी ‘नुकसान’ नहीं कहा जाता है, लेकिन इसे राजनीतिक निर्देशों के तहत तनाव कम करने की तत्काल व्यवस्था कहा गया. अच्छी बात यह रही कि इस व्यवस्था में ज़मीन को केंद्रीय मुद्दा नहीं बनाया गया और व्यापक राष्ट्रीय हित तथा राजनीतिक निर्देशों पर जोर दिया गया.
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केवल ज़मीन जीतने का हिसाब रखना प्रतिबद्धता के जाल में फंसाता है. यह किसी भविष्य के ऑपरेशन की राजनीतिक कीमत बढ़ा देता है. अगर दुश्मन की ज़मीन पर कब्ज़ा बनाए रखना ही जीत है तो हर ऑपरेशन से यही उम्मीद की जाएगी और अगर यह उम्मीद पूरी नहीं हुई तो उसे अधूरा माना जाएगा. तब ‘सिंदूर’ जैसे ऑपरेशन को विजयी ऑपरेशन बताने के लिए ज़मीन जीतना या उस पर स्थायी कब्ज़ा रखना ज़रूरी माना जाएगा. इससे राष्ट्रीय नेतृत्व रणनीतिक लचीलापन बरतने से वंचित हो जाएगा.
भारत पूर्ण युद्ध से नीचे के स्तर की लड़ाई में हमेशा सीमित लक्ष्य रखता रहा है क्योंकि नेतृत्व को कभी खत्म न होने वाले युद्ध में फंसने के खतरे मालूम हैं. विनाशकारी युद्ध की जगह अपनी मर्जी चलाने के लिए दंड देने की रणनीति को प्राथमिकता दी जाती रही है. वैसे, यह विकल्प भी रखा जाता है कि राजनीतिक नेतृत्व किसी खास स्थिति में ज़मीन पर कब्ज़ा करने का आदेश दे सकता है, लेकिन इसे ‘एकमात्र’ संभव विकल्प बताना सही नहीं होगा.
जीत की व्यापक परिभाषा देने वाले आलोचकों का कहना है कि जब सीमारेखा विवादित हो तब ज़मीनी लड़ाई पहला विकल्प बन जाती है और ‘फौजी जूते ज़मीन पर’ उतरते हैं तब अंतिम फैसला होता है. यह सीमित अर्थों में ही सच है. भारत अपनी ज़मीन पर कब्ज़ा रखे, दूसरों की ज़मीन पर तभी कब्ज़ा करे जब ज़रूरी हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ताकत के हर इस्तेमाल से नक्शे पर हर बार नई रेखा खींची जाए.
सेना अध्यक्ष ने ठीक ही कहा कि ज़मीन की रक्षा करने और उस पर कब्ज़ा खने वाले किसी सैनिक को गंवाया नहीं जा सकता, लेकिन इस टिप्पणी को अगर एक खास कसौटी बनाया जाए और ज़मीन को जीत का एकमात्र पैमाना माना जाए तो करगिल और ऑपरेशन सिंदूर बेमानी हो जाएगा.
कुछ लोगों का कहना है कि झूठे नैरेटिव का खंडन करने के लिए दुश्मन की ज़मीन पर वास्तविक कब्ज़ा करना ज़रूरी है. वास्तविक कब्ज़ा सीमित अर्थों में एक ऐसा तथ्य है जिसे नकारना मुश्किल है, लेकिन यह लड़ाई को खत्म करना मुश्किल भी बना सकता है. आखिर में, ज़रूरत पड़ने पर राजनीतिक नेतृत्व पहल कर सकता है, लेकिन उसके लिए यही एक विकल्प उपलब्ध नहीं होता. कभी-कभी नदी के बहाव पर रोक लगाने जैसे कदम भी ज़मीन पर कब्ज़ा करने के मुकाबले ज्यादा बड़े रणनीतिक फायदे दे सकते हैं.
दूसरी चिंताजनक बात यह है कि जब इस विषय पर चर्चा चल रही है, उसी समय सोशल मीडिया पर तर्क की जगह लफ्फाजी को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है. कुछ लोगों ने इसे वायुसेना बनाम थलसेना विवाद के रूप में पेश किया है. यह बहुत महत्वपूर्ण रणनीतिक विषय है क्योंकि हमें यह तय करना है कि हम सेना को किस तरह तैयार करें, प्रशिक्षित करें और अपनी लड़ाई किस तरह लड़ें. इशारेबाजी, कटाक्ष और कमजोर तर्क विचार-विमर्श के लिए कोई महत्व नहीं रखते.
राष्ट्रीय सुरक्षा नीति को पूरी आज़ादी होनी चाहिए कि वह क्या चुने. दुश्मन की ज़मीन पर कब्ज़ा करने का फैसला करे, या दुश्मन को जीत से वंचित रखने और उसमें डर पैदा करने का विकल्प चुने, या ज़रूरत पड़ने पर सीमित कब्ज़ा करने का फैसला करे. कब्ज़ा की गई ज़मीन ही जीत का पैमाना है, राष्ट्रीय सुरक्षा नीति को केवल इस कसौटी से जोड़ना विकल्पों को सीमित करेगा और हर भविष्य के संकट को महंगा बना सकता है.
भारत का रिकॉर्ड बताता है कि वह तमाम लड़ाइयों में अपनी सीमा का विस्तार करने की जगह अपनी सीमा को बहाल करने या उसकी रक्षा करने पर ही जोर देता रहा है. यह चुनाव कमजोरी की निशानी नहीं है. यह इस बात को स्वीकार करने को दिखाता है कि जीत का मतलब है राजनीतिक मकसद को उचित कीमत देकर हासिल करना, न कि कई एकड़ ज़मीन पर कब्ज़ा करना जिसे हमेशा के लिए फौजी छावनी बनाकर रखना पड़े. ज़मीन को केंद्रीय महत्व देने से आगे बढ़ने का अर्थ सैनिक की अहमियत को खारिज करना नहीं है. इसका मतलब यह है कि रणनीति केवल एक कसौटी के आधार पर ही तय न की जाए.
ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत एक रिटायर्ड IAF फाइटर पायलट हैं. उनका एक्स हैंडल @Ahlawat2012 है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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