मुंबई: जब तक पायल केम्प्स कॉर्नर के पास उस सैलून पहुंचती है, जहां वह नेल टेक्नीशियन के तौर पर काम करती है, तब तक विक्रोली से आने के सफर में उसे पसीना आ चुका होता है. वह अपने काम के कपड़े बदलती है और बेला वीटा परफ्यूम की एक बोतल उठाती है.
36 साल की पायल ने कहा, “जब तक मैं सैलून पहुंचती हूं, मुझे पसीना आ चुका होता है. हम वहीं कपड़े बदल लेते हैं और फिर मैं कुछ स्प्रे कर लेती हूं ताकि बाकी दिन मेरे शरीर से अच्छी खुशबू आए. रोज के लिए मैं बेला वीटा इस्तेमाल करती हूं, जिसकी कीमत 500 रुपये से कम है.”
पायल जिस परफ्यूम को सच में चाहती है, वह टॉमी हिलफिगर का टॉमी गर्ल है, जिसे वह इस दिवाली अपने लिए खरीदना चाहती है.
इन दोनों बोतलों के बीच भारत का नया परफ्यूम बाजार है. बेला वीटा, रेनी और स्टूडियोवेस्ट ने उन ग्राहकों के लिए परफ्यूम को रोज की खरीदारी बना दिया है, जो पहले शायद डियोड्रेंट खरीदते थे. दूसरी भारतीय कंपनियां इसी ग्राहक से 2,000 रुपये, 5,000 रुपये या यहां तक कि 10,000 रुपये खर्च करने को कह रही हैं. बड़ा सवाल यह है कि ग्राहक इतनी बड़ी छलांग क्यों लगाता है और किसी भारतीय परफ्यूम को पैसे खर्च करने लायक क्या बनाता है.
Euromonitor के मुताबिक, 2025 में भारत का फ्रेगरेंस बाजार रिटेल बिक्री में 6,640 करोड़ रुपये तक पहुंच गया और कीमत के हिसाब से इसमें करीब 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. Redseer का अनुमान है कि ऑनलाइन फ्रेगरेंस बाजार हर साल 30-35 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और ऑनलाइन बिक्री में डियोड्रेंट से आगे निकल गया है.
परफ्यूम सिर्फ खास मौकों पर इस्तेमाल होने वाली चीज नहीं रहा
कई सालों तक रोज की खुशबू डियोड्रेंट की कैन में आती थी. Axe के विज्ञापनों में महिलाओं का ध्यान आकर्षित करने का वादा किया जाता था. Fogg के “क्या चल रहा है?” कैंपेन में हर बोतल में कितने स्प्रे होते हैं, यह बेचा जाता था. Nike के चमकीले रंगों वाले वेरिएंट ने लड़कियों को अपनी पसंद के लिए अलग शेल्फ दे दी.
Fogg ने 2011 में शुरुआत की और अगले साल 100 करोड़ रुपये की बिक्री की. उस समय रिपोर्ट किए गए Nielsen के आंकड़ों के मुताबिक, 2014 तक उसने Axe और Engage को पीछे छोड़ दिया था और 2,300 करोड़ रुपये के भारतीय डियोड्रेंट बाजार में सबसे आगे निकल गया था.
परफ्यूम ज्यादातर किसी और दुनिया की चीज थी: यात्रा से घर लाई गई विदेशी बोतल, किसी से मिले गिफ्ट में मिली बोतल, जिसे किसी खास मौके के लिए बचाकर रखा जाता था.
पायल ने कहा, “जब मैं बच्ची थी, मेरी मां के पास परफ्यूम की एक चमकदार बोतल थी. वह बहुत सुंदर थी और उसकी खुशबू भी बहुत अच्छी थी. शायद किसी ने उन्हें वह गिफ्ट में दी थी. मुझे अब उसका नाम याद नहीं है.”
सस्ते परफ्यूम भी मिलते थे, लेकिन हमेशा ब्रांड ही सबसे जरूरी चीज नहीं था. 42 साल की गृहिणी मधु को याद है कि जब वह छोटी थीं, तब वह Archies का Charlie परफ्यूम लगाती थीं. मलाड में उनके घर के पास Occasions नाम की एक दुकान थी, जहां ऐसी ही बोतलें मिलती थीं. जब वह परीक्षा में अच्छा करती थीं, तो उनके पिता कभी-कभी वहां से उनके लिए बोतल खरीदते थे.
उन्होंने कहा, “उन दिनों हमें इन चीजों के नाम नहीं पता होते थे. बस एक गिफ्ट होता था. बोतल अच्छी दिखती थी, आप उसे रख लेते थे, इस्तेमाल करते थे और खत्म कर देते थे.”
Bella Vita ने इस ग्राहक को आसानी से पहचाने जाने वाला ब्रांड, कई वेरिएंट और 100 ml की बोतलें दीं, जिनकी कीमत 449 रुपये से 549 रुपये के बीच है. पायल को पहली बार इसका एक सेट गिफ्ट में मिला था और उसके बाद वह अपनी पसंदीदा खुशबू कई बार दोबारा खरीद चुकी है.
अंतरराष्ट्रीय ब्रांड की बोतल अब भी उसके दिमाग में एक अलग जगह रखती है. उसने Tommy Girl (टॉमी गर्ल) के बारे में अपनी भाभी से जाना, जिन्होंने इसे दुबई से खरीदा था. वह Carolina Herrera (कैरोलिना हेरेरा) का Good Girl (गुड गर्ल) बिना उसका नाम जाने पहचानती है. यह वही परफ्यूम है जिसकी बोतल हील के आकार की है और जिसे उसने ग्राहकों के घर जाते समय देखा है.
500 रुपये खर्च करने वाला ग्राहक अब ज्यादा खर्च करना सीख रहा है
मान्या का पहला परफ्यूम भी Bella Vita (बेला वीटा) था, जो उसे कॉलेज से ग्रेजुएशन के गिफ्ट में मिला था. 24 साल की इंजीनियरिंग ग्रेजुएट को पहले फ्रेगरेंस की ज्यादा परवाह नहीं थी.
उसने कहा, “कभी-कभी दिन के बीच में मैं अपने बालों को हटाती थी और अचानक अपने ऊपर फिर से परफ्यूम की खुशबू आती थी. यह बहुत अच्छा लगता था. मैं सोचती थी, वाह, मेरे शरीर से कितनी अच्छी खुशबू आ रही है.”
महामारी ने इस निजी खुशी को खरीदारी की आदत में बदलने में मदद की. घर में रहने वाले लोग आने-जाने, बाहर खाना खाने और रोजमर्रा की जिंदगी की दूसरी चीजों पर कम खर्च कर रहे थे. कुछ ग्राहकों के लिए खुशी देने वाली छोटी-छोटी चीजें खरीदना उन अनुभवों की जगह लेने का तरीका बन गया जिन्हें वे अब घर से बाहर जाकर नहीं कर सकते थे.
निवेशक हरनिध कौर ने कहा, “खुशी तक पहुंच मूल रूप से खरीदारी बन गई. अपनी जिंदगी में पहली बार मैंने खुद को और दूसरे लोगों को ऑनलाइन फ्रेगरेंस खरीदते देखा. बात सिर्फ उन फ्रेगरेंस की नहीं थी जिन्हें आप दोबारा खरीद रहे थे.”
बदलाव सिर्फ ज्यादा परफ्यूम खरीदने का नहीं था. इससे लोगों के परफ्यूम के बारे में सीखने का तरीका भी बदल गया. बिना खुशबू सूंघे परफ्यूम खरीदने से उसके बारे में सीखने की प्रक्रिया भी शुरू हुई. DesiFragranceAddicts (देसी फ्रेग्रेंस एडिक्ट्स) जैसे Reddit ग्रुप्स में खरीदार असली परफ्यूम और डुप्स की तुलना करते थे, डिस्कवरी सेट और छोटे सैंपल सुझाते थे और नोट्स, प्रोजेक्शन और सिल्लाज पर बात करते थे. सिल्लाज का मतलब है कि परफ्यूम लगाने के बाद पीछे जो खुशबू रह जाती है.
कौर ने कहा, “लोग सिल्लाज जैसे शब्द इस्तेमाल कर रहे थे. इससे सीखने का माहौल बना.”
एक ही परफ्यूम खरीदने के बजाय कई छोटी बोतलें आजमाना आसान हो गया. परफ्यूम को दिन, मौके या मूड के हिसाब से चुना जा सकता था.
मान्या ने Bella Vita (बेला वीटा) के सेट से आगे देखना शुरू किया. वह पहले से Westside (वेस्टसाइड) में खरीदारी करती थी, जहां Studiowest (स्टूडियोवेस्ट) के परफ्यूम करीब 1,000 रुपये के होते हैं.
उसने कहा, “बोतलें ज्यादा अच्छी दिखती हैं और भारी महसूस होती हैं. ऐसी बोतलें जिन्हें मैं अपनी ड्रेसिंग टेबल पर रखना चाहती हूं. Bella Vita (बेला वीटा) अब आम हो गया है. Studiowest (स्टूडियोवेस्ट) लगाती हूं तो लोग मुझसे पूछते हैं कि मैंने कौन सा परफ्यूम लगाया है.”
Studiowest पर मान्या Bella Vita (बेला वीटा) के मुकाबले करीब दोगुना खर्च करती है. वह एक अच्छी बोतल, अनजान खुशबू और लोगों के उसके परफ्यूम के बारे में पूछने की खुशी के लिए यह अतिरिक्त पैसा देने को तैयार है.
यह कीमत की सीढ़ी पर पहला कदम है. अगला कदम बहुत बड़ा है. Typsy का डबल-साइडेड परफ्यूम 2,299 रुपये का है, SKINN by Titan की 100 ml बोतलों की कीमत 2,795 रुपये से 4,995 रुपये तक है और 33North 50 ml के लिए 3,500 रुपये लेता है.
16 साल की ईशा पहले से ही इन तीनों से आगे देख रही है. मधु अपनी बेटी के साथ किशोरी के जन्मदिन के गिफ्ट के लिए एक डिजाइनर परफ्यूम खरीद रही थीं. ईशा रोज Bella Vita (बेला वीटा) और Renee (रेनी) इस्तेमाल करती है और अपने Bella Vita सेट की बोतलों को नाम से नहीं, बल्कि रंग से पहचानती है.
ईशा ने कहा, “मुझे रंग और यह पता है कि किसकी कैसी खुशबू है. मैं अपने मूड के हिसाब से इनमें से चुनती हूं. अगर शादी में जाना हो, दोस्तों से मिलना हो या फिल्म देखने जाना हो.”
अपने जन्मदिन पर वह Miss Dior (मिस डिओर) या Burberry Goddess (बरबेरी गॉडेस) चाहती थी. Bella Vita (बेला वीटा) के उलट, डिजाइनर परफ्यूम की बोतल सिर्फ खास मौकों के लिए रखी जाती.
ईशा ने कहा, “जब मैं बड़ी होकर इसे लगाऊंगी, तो मैं चाहती हूं कि मुझे ये सारे पल याद आएं.”
दोनों की कीमत मधु के बजट से ज्यादा थी. Burberry Goddess की 100 ml बोतल की कीमत करीब 10,800 रुपये थी, जबकि Miss Dior की कीमत इससे भी ज्यादा थी.
मधु ने कहा, “उसे Miss Dior पसंद आया, लेकिन 16वां जन्मदिन होने का मतलब यह नहीं है कि हम 16,000 रुपये खर्च कर दें.”
उन्होंने ऑनलाइन डिस्काउंट देखने या विदेश जा रहे किसी व्यक्ति से इसे वापस लाने के लिए कहने का फैसला किया.
500 रुपये से 10,000 रुपये तक की छलांग सिर्फ परफ्यूम की ताकत या बोतल के आकार का सवाल नहीं है. ग्राहक से एक कहानी खरीदने के लिए कहा जा रहा है: एक जाना-पहचाना फैशन हाउस, एक पहचाना जाने वाला नाम, किसी खास देश में बना होने की बात या लग्जरी का एक विचार.
मिडिल ईस्ट के ब्रांड्स ने डुप्स के जरिए इस बाजार में आने का एक और रास्ता खोजा. डुप्स ऐसे परफ्यूम होते हैं जो बहुत महंगे और मशहूर परफ्यूम जैसे बनाए जाते हैं.
कौर ने कहा, “हम परफ्यूम को विदेशी चीज मानते थे, खास तौर पर गोरे लोगों का ब्रांड. ‘यह परफ्यूम फ्रांस में बना है’ अपने आप में पहचान थी. मिडिल ईस्ट के परफ्यूम ने हमारे लिए इस सोच को सच में बदल दिया. आपको YSL Opium जैसा कुछ 800 रुपये में मिल रहा था. लेकिन डुप्स बनाने की इस क्षमता से भरोसा बनने लगा.”
कलर-कॉस्मेटिक्स ब्रांड Typsy की संस्थापक कैरवी भरत राम ने इस मांग को तब देखा, जब Baccarat Rouge के डुप्स के बारे में एक सोशल मीडिया वीडियो को 5 लाख से 6 लाख व्यू मिले. इसके बाद लोग पूछने लगे कि Typsy अपना परफ्यूम कब लॉन्च करेगा.

लेकिन Bella Vita पहले ही कम कीमत तय कर चुका था, जबकि मिडिल ईस्ट के ब्रांड्स ने पहचानी जाने वाली खुशबुओं के जरिए भरोसा बना लिया था. Typsy की बोतल में दो परफ्यूम थे, जिन्हें अलग-अलग भी लगाया जा सकता था या एक के ऊपर दूसरा भी लगाया जा सकता था. कंपनी के हिसाब से एक की कीमत में दो खुशबू मिल रही थीं. लेकिन ऑनलाइन ऑर्डर करने वाले ग्राहक को दो ऐसी अनजान खुशबुओं के लिए पैसे देने पड़ते, जो शायद उसे पसंद न आएं.
भरत राम ने कहा, “हम उनसे जिस चीज के लिए ज्यादा पैसे मांग रहे थे, उसके बारे में पहले हमें उन्हें जानकारी देनी थी और फिर उन्हें यह भरोसा दिलाना था कि उन्हें इसकी जरूरत है.”
भारतीय परफ्यूम स्टार्टअप से 13 सदियां पहले
इस नए बाजार में एक दिलचस्प बात है: भारत में परफ्यूम का इतिहास कम नहीं है. इसका इतिहास आज खुशबू की दुनिया से जुड़े ज्यादातर लग्जरी हाउस से भी पुराना है.
Typsy को यह समझाने से 1,300 साल से भी ज्यादा पहले कि भारतीय परफ्यूम की कीमत 2,299 रुपये क्यों होनी चाहिए, कन्नौज में राजाओं के लिए खुशबू बेची जाती थी.
The Ittar Industry of Kannauj: A Saga of Commodification of Olfactory Aesthetics (कन्नौज का इत्र उद्योग: घ्राण सौंदर्यशास्त्र के वस्तुकरण की एक गाथा) के लेखक अनिर्बान मुखर्जी को सातवीं सदी के बाणभट्ट के हर्षचरित में कन्नौज के परफ्यूम कारोबार के संदर्भ मिले. बाद में मुगल रिकॉर्ड में कन्नौज के इत्र का जिक्र शाही दरबार में मिलता है, जहां जहांगीर ने इसकी गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए एक खुशबू दारोगा नियुक्त किया था.
इत्र फूलों, जड़ी-बूटियों, मसालों, लकड़ी या पकाई हुई मिट्टी को तेल के बेस, आमतौर पर चंदन, में डालकर डिस्टिल करने से बनाया जाता है. लेकिन इस इतिहास को आगे बढ़ाने वाला कारोबार छोटा होता गया. मुखर्जी ने 2008 में कन्नौज में परफ्यूम बनाने वाली 375 इकाइयां गिनी थीं और 2012 में इनकी संख्या 250 रह गई थी. उनका अनुमान है कि अब करीब 130 इकाइयां बची हैं.
कई इत्र बनाने वालों ने पान मसाला, तंबाकू या ऐसी कंपनियों को सप्लाई करना शुरू कर दिया जो तैयार प्रोडक्ट को किसी दूसरे नाम से बेचती थीं. इस बीच युवा ग्राहकों के लिए इत्र का मतलब छोटी बोतल में बहुत तेज खुशबू रह गया, जिसमें पारंपरिक इत्र और सस्ते सिंथेटिक तेल के बीच ज्यादा फर्क नहीं किया जाता था.
37 साल के विक्रम सिंह ने काम करते-करते इत्र बनाना सीखा. एक बार इत्र बनाने की प्रक्रिया में उन्होंने 80 किलो फूलों का इस्तेमाल किया और करीब 5 किलो इत्र बनाया.
उन्होंने कहा, “जब मैं देग के नीचे आग जलाता हूं, तो वह धीरे-धीरे गर्म होती है और भाप बनना शुरू होती है. भाप पाइप के जरिए भपका में जाती है, जिसे ठंडे पानी में रखा जाता है. वहीं खुशबू जमा होती है.”
जब भाई-बहन वरुण और क्रति टंडन ने महामारी के दौरान बूंद शुरू किया, तो उनकी उम्र के लोगों को इत्र “बहुत, बहुत पुराने जमाने की चीज लगता था, और अच्छे तरीके से नहीं”. उन्होंने पैकेजिंग बदली, बनाने की प्रक्रिया समझाई और हल्की खुशबुओं को पेश किया. उनकी पहली खेप की 72 बोतलें दो दिन में बिक गईं.
एक भारतीय नाम, एक यूरोपीय परफ्यूमर
परफ्यूम का बहुत सारा कारोबार उस ब्रांड से दूर होता है, जिसका नाम बोतल पर लिखा होता है. एक ब्रांड अपनी जरूरत और आइडिया एक फ्रेगरेंस हाउस को देता है, जिसके परफ्यूमर सैंपल बनाते हैं, फॉर्मूला में बदलाव करते हैं और परफ्यूम बना भी सकते हैं. कंज्यूमर ब्रांड उसे मंजूरी देता है, उसका नाम रखता है और उसे बेचता है.
International Flavors & Fragrances – IFF (इंटरनेशनल फ्लेवर्स एंड फ्रेगरेंस) ऐसी ही एक स्पेशलिस्ट कंपनी है. इसके परफ्यूमर्स ने Lancôme (लांकोम), Yves Saint Laurent (यवेस सेंट लॉरेंट) और दूसरे इंटरनेशनल ब्रांड्स के लिए फ्रेगरेंस बनाए हैं.
“अगर आप बिल्कुल शुरुआत से कोई फ्रेगरेंस बना रहे हैं, तो आपको एक परफ्यूम हाउस और एक परफ्यूमर के साथ काम करना पड़ता है. इसमें एक साल, दो साल, 30 या 40 बार बदलाव और कोशिशें लग सकती हैं. यह बहुत, बहुत महंगा होता है,” भरत राम ने कहा.
भारतीय ब्रांड्स ने इस सिस्टम में अलग-अलग तरीकों से जगह बनाई है. SKINN (स्किन) कहता है कि उसके परफ्यूम “फ्रांस में बनाए जाते हैं”. All Good Scents (ऑल गुड सेंट्स ) के संस्थापक राजीव शेठ के पेरिस और ग्रास के अनुभव को खास तौर पर सामने रखता है. Nykaa Moi (नायका मोई ) Joie de Vivre (जोआ दे विवर) और Raison d’Être (रेज़ॉन डेट्र) जैसे फ्रेंच नामों का इस्तेमाल करता है.
सूर्यांश परिहार ने 2023 में 33North (33नॉर्थ) को विकसित करना शुरू किया, तो उन्होंने लिंक्डइन के जरिए यूरोपीय परफ्यूमर्स ढूंढे. इसके पहले चार परफ्यूम बनाने में लगभग डेढ़ साल लगा और 60 से 80 बार बदलाव और कोशिशें करनी पड़ीं. उनके नाम और कहानियां भारतीय हैं. फॉर्मूले यूरोप से आए.
Typsy भी इंटरनेशनल फ्रेगरेंस हाउसेज के जरिए काम करता है, जिनमें IFF भी शामिल है. भरत रामने कहा कि जिन भारतीय हाउसेज से उन्होंने संपर्क किया, वे उस तरह की मीठी, गोरमांद खुशबू नहीं बना सके, जैसी ब्रांड चाहता था.
यूरोप किसी खास परफ्यूमर, तकनीकी विशेषज्ञता या मैन्युफैक्चरिंग क्षमता की सुविधा दे सकता है. लेकिन ग्राहक के लिए परफ्यूम की बोतल पर लिखा “फ्रांस” लग्जरी और विशेषज्ञता की एक ऐसी पुरानी पहचान भी लेकर आता है, जिसे भारतीय ब्रांड को खुद बनाना पड़ता है.
भारत में ऐसी कंपनियां हैं जो फ्रेगरेंस विकसित करने की क्षमता रखती हैं. Keva (केवा), एस एच केलकर एंड कंपनी का फ्रेगरेंस बिजनेस है, जिसके पास परफ्यूमर्स, लैबोरेटरीज और फैक्ट्रियां हैं. इसके फ्रेगरेंस डिवीजन ने 2025-26 में 2,052 करोड़ रुपये का रेवेन्यू रिपोर्ट किया. इसके बताए गए ग्राहकों में हिंदुस्तान यूनिलीवर, गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स , मैरिको और विप्रो कंज्यूमर केयर शामिल हैं, हालांकि यह नहीं बताया जाता कि उसके काम का कितना हिस्सा फाइन परफ्यूम से जुड़ा है और कितना दूसरे कंज्यूमर प्रोडक्ट्स के लिए खुशबू बनाने से. Typsy और 33North ने आखिरकार अपने परफ्यूम विदेश में विकसित किए.
भारत यूरोपीय परफ्यूम हाउसेज को कच्चा माल भी सप्लाई करता है. जैस्मिन कंक्रीट एक्सपोर्ट्स तमिलनाडु में फूलों को प्रोसेस करती है, जिनका इस्तेमाल परफ्यूमर्स के लिए किया जाता है. गुएरलेन (Guerlain) के परफ्यूमर थियरी वासर ने AFP को बताया कि वह इस कंपनी से जैस्मिन एक्सट्रैक्ट लेते हैं. इसके डायरेक्टर ने कहा कि कंपनी ने Bulgari (बुल्गारी), Dior और Lush (लश) को सप्लाई की है. जीन-पॉल गुएरलेन ने 1989 में मदुरै की चमेली का इस्तेमाल करके Samsara (सामसारा) बनाया था.
इसलिए यह अंतर सिर्फ इस बात का नहीं है कि भारत परफ्यूम बना सकता है या नहीं. यह भी सवाल है कि क्या कोई भारतीय परफ्यूम हाउस अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, कच्चे माल और इतिहास को ऐसे ब्रांड में बदल सकता है, जिसे ग्राहक पसंद करें और अच्छा समझें.
क्या भारतीय परफ्यूम इतिहास को लग्जरी में बदल सकता है?
Chanel No. 5 (शनेल नंबर 5) 1921 में लॉन्च हुआ था. Miss Dior 1947 में आया. दोनों के साथ पेरिस, फैशन के पुराने रिकॉर्ड और दशकों की विज्ञापन की पहचान जुड़ी हुई है. कन्नौज का परफ्यूम इतिहास इससे काफी पुराना है, लेकिन वह उसी तरह आधुनिक बोतल के साथ दुनिया तक नहीं पहुंच पाया है.
25 साल के शिव कोठारी अपने ज्यादातर परफ्यूम यात्रा के दौरान खरीदते हैं क्योंकि ड्यूटी-फ्री कीमतें कम होती हैं. उन्होंने इंस्टाग्राम पर भारतीय ब्रांड Bla Bli Blu (ब्ला ब्ली ब्लू) को खोजने के बाद उसका सैंपल सेट आजमाया, लेकिन कोई भी फ्रेगरेंस उन्हें इतनी पसंद नहीं आई कि वह पूरी बोतल खरीदें.
वह भारतीय परफ्यूम के लिए उतनी ही कीमत देने को तैयार होंगे, जितनी किसी फ्रेंच या इटालियन परफ्यूम के लिए, लेकिन एक शर्त पर.
“उसमें वह विरासत होनी चाहिए. मुझे नहीं लगता कि किसी भी भारतीय कोलोन में वह विरासत है, या कम से कम वे उसे उस तरह से मार्केट नहीं करते,” कोठारी ने कहा.
जो ब्रांड 500 रुपये वाले ग्राहक से आगे बढ़ना चाहते हैं, उनके लिए यही मुश्किल हिस्सा है. कम कीमत किसी को परफ्यूम आजमाने के लिए तैयार कर सकती है. एक अलग तरह की बोतल लोगों का ध्यान खींच सकती है. डुप्स लोगों को ब्रांड से परिचित करा सकते हैं. लेकिन ऊंचे स्तर पर ग्राहक उस प्रतिष्ठा के लिए भी पैसे दे रहा होता है, जो कई सालों में बनाई गई है.
इस भरोसे को बनाने के लिए सिर्फ एक और लेबल लॉन्च करना काफी नहीं होगा. कौर को उम्मीद है कि इनमें से कई नए ब्रांड गायब हो जाएंगे, लेकिन उनका अनुमान है कि “सिर्फ ब्रांड्स के बजाय कम से कम कुछ भारतीय परफ्यूम हाउस जरूर उभरेंगे”.
महंगे परफ्यूम के बाजार में यह अंतर महत्वपूर्ण है. Chanel और Dior फैशन हाउस की पहचान के साथ परफ्यूम बेचते हैं. एक निच परफ्यूम हाउस की पहचान खुद फ्रेगरेंस के आसपास बनती है. उसके परफ्यूमर, उसकी बनाई हुई खुशबुएं और उसके सामग्री महत्वपूर्ण होते हैं. Maison Francis Kurkdjian (मैसन फ्रांसिस कुर्कजियन), उदाहरण के लिए, परफ्यूमर फ्रांसिस कुर्कजियन (Francis Kurkdjian) का नाम लेकर चलता है. उसका Baccarat Rouge 540 (बैकारा रूज 540 ) इंटरनेशनल पहचान बन गया, जबकि उसके पीछे सौ साल पुरानी कुट्योर की पहचान नहीं थी.
यही वह बाजार है जिसमें डिंपल फौजदार Maison de Fouzdar (मैसन दे फौजदार) को मुकाबला करते हुए देखना चाहती हैं. उन्होंने ब्रांड लॉन्च करने से पहले 2021 में ग्रास में फ्रेगरेंस ब्लेंडिंग की ट्रेनिंग ली थी, और वह इंटरनेशनल स्तर पर खरीदे गए सामग्री का इस्तेमाल करके अपने परफ्यूम भारत में बनाती हैं.
कीमत भी तुलना की मांग करती है. Santal Safran (सैंटल सफ्रान) की कीमत 50 मिली के लिए 9,800 रुपये और 100 मिली के लिए 13,999 रुपये है. फौजदार को शुरुआत में लगता था कि ग्राहकों को इतनी कीमत खर्च करने से पहले परफ्यूम सूंघना जरूरी होगा, लेकिन अब ऑनलाइन बिक्री ऑफलाइन बिक्री से आगे निकल गई है. उन्होंने कहा कि ब्रांड के 46 प्रतिशत ग्राहक दोबारा खरीदारी करते हैं.
“मैं Gucci (गुच्ची) और Chanels (शनेल्स) से मुकाबला नहीं कर रही हूं,” फौजदार ने कहा. “मैं इंटरनेशनल नीश (खास और सीमित बाजार वाले) ब्रांड्स से मुकाबला कर रही हूं.”
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