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Tuesday, 20 October, 2026
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विदेश से आने वाला पैसा और IMF का कर्ज काफी नहीं, बांग्लादेश को संस्थाएं भी मजबूत करनी होंगी

अगर बांग्लादेश की बीमारी ढील देना है, तो इसका इलाज है हर नियम और पाबंदी को फिर से सख्त बनाना.

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हर महीने सऊदी अरब, खाड़ी देशों, मलेशिया, ब्रिटेन और कई दूसरे देशों में काम करने वाले बांग्लादेशी लोग अपनी कमाई का कुछ हिस्सा बांग्लादेश भेजते हैं. बांग्लादेश बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 में खत्म हुए वित्त वर्ष में विदेश से भेजे गए इस पैसे की कुल रकम 35.6 अरब डॉलर रही. यह देश के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है. दो साल पहले यह रकम 23.9 अरब डॉलर थी. यानी इसमें 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.

अलग-अलग काम की शिफ्ट से धीरे-धीरे जमा हुए इस फंड ने देश के खाली हुए रिज़र्व को फिर से भरने का ज़्यादातर काम किया. ग्रॉस फॉरेन एक्सचेंज रिज़र्व, जो जून 2024 में गिरकर $26.7 बिलियन हो गया था, जून 2026 में बढ़कर $37.6 बिलियन हो गया.

ग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट
ग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट

पिछले हफ्ते बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक की सालाना बैठक हुई. इसमें बांग्लादेश एक बार फिर आईएमएफ के एजेंडे में शामिल रहा. खबरों के मुताबिक, बांग्लादेश ने 4.5 अरब डॉलर से 5 अरब डॉलर तक के नए कर्ज पैकेज की मांग की है.

15 अक्टूबर को एक प्रेस ब्रीफिंग में आईएमएफ की एशिया-प्रशांत उप निदेशक सोनाली जैन-चंद्रा ने कहा कि बांग्लादेश में जीडीपी के मुकाबले सरकार की कमाई का अनुपात दुनिया में सबसे कम अनुपातों में से एक है. यह करीब 7 फीसदी है. उन्होंने यह भी कहा कि देश का वित्तीय क्षेत्र काफी कमजोर है.

बांग्लादेश के पास अब पिछले चार सालों में किसी भी समय के मुकाबले ज्यादा विदेशी मुद्रा भंडार है और देश में अब डॉलर की कमी भी नहीं है, लेकिन अब ज़रूरत अपनी संस्थाओं को मजबूत बनाने की है. खास तौर पर, उसे ऐसी बैंकिंग व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें सही शर्तों पर कर्ज दिया जाए. साथ ही, सरकार की कमाई के ऐसे मजबूत और बड़े स्रोत तैयार करने होंगे, जो देश की योजनाओं और लक्ष्यों को पूरा करने में मदद कर सकें.

बैंकिंग व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाना

विदेश में रहने वाले बांग्लादेशी परिवारों को जो पैसा मिलता है, उसका एक बड़ा हिस्सा बांग्लादेश के बैंकों में जमा किया जाता है. इसके बाद बैंक इसी पैसे को कर्ज के रूप में देते हैं. बांग्लादेश बैंक की हर तीन महीने में जारी होने वाली बैंकिंग क्षेत्र की रिपोर्ट से पता चलता है कि इसके बाद क्या हुआ.

जून 2024 तक बैंकों के कुल बकाया कर्ज में से 12.2 फीसदी कर्ज ऐसे थे, जिनका भुगतान नहीं हो रहा था. सितंबर 2025 तक यह हिस्सा बढ़कर 36.3 फीसदी हो गया. जून 2026 तक भी यह करीब एक-तिहाई बना रहा.

इस बढ़ोतरी का बड़ा कारण यह है कि अब आंकड़ों को पहले से ज्यादा साफ-साफ सामने रखा जा रहा है. इसका मतलब यह ज़रूरी नहीं है कि हालात नए सिरे से खराब हुए हैं.

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि 2024 से बैंकों की संपत्तियों और कर्ज की गुणवत्ता की जांच की गई. खबरों के मुताबिक, 2025 में कर्ज को अलग-अलग श्रेणियों में रखने के नियम भी सख्त किए गए. इसके चलते पुराने खराब कर्ज भी रिकॉर्ड में दर्ज हो गए. किसी समस्या की पहचान करना उसे दूर करने की दिशा में पहला कदम होता है. इस मामले में बांग्लादेश ने काफी प्रगति की है.

ग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट
ग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट

लेकिन यह सिर्फ पहला कदम है. हंगरी के अर्थशास्त्री यानोस कोरनाई ने कई दशक पहले समझाया था कि ऐसी समस्याएं लंबे समय तक क्यों बनी रहती हैं. 1970 के दशक के आखिरी वर्षों में समाजवादी हंगरी की घाटे में चलने वाली फैक्ट्रियों का अध्ययन करते हुए उन्होंने पाया कि इन फैक्ट्रियों को शायद ही कभी बंद किया जाता था. उन्होंने इसकी वजह को ‘नरम बजट की पाबंदी’ कहा.

उनके मुताबिक, जिस कर्ज लेने वाले को अपनी आर्थिक सीमा के भीतर रहकर काम करना पड़ता है, वह सावधानी से काम करता है, लेकिन जिस व्यक्ति या संस्था को यह भरोसा हो कि मुश्किल आने पर कोई बाहर से उसे बचा लेगा, वह कर्ज चुकाने को अपनी जिम्मेदारी मानना बंद कर देता है. वह इसे ऐसी चीज समझने लगता है, जिस पर बाद में बातचीत करके फैसला किया जा सकता है.

कर्ज चुकाने के लिए और समय देना भले ही अच्छी नीयत से किया जाए, लेकिन इससे ऐसे नतीजे निकल सकते हैं, जिनकी उम्मीद नहीं की गई थी. इसलिए बांग्लादेश में बैंकिंग सुधार का एक बड़ा लक्ष्य यह होना चाहिए कि कर्ज लेने वालों में यह भरोसा और उम्मीद फिर से कायम हो कि उन्हें तय की गई शर्तों के मुताबिक कर्ज चुकाना ही होगा.

सरकार की कमाई के स्रोत बढ़ाना

कोरनाई ने बताया था कि सरकार की आर्थिक व्यवस्था में भी इसी तरह ढील आ सकती है. ऐसा टैक्स में छूट देने, टैक्स चुकाने की तारीख आगे बढ़ाने और बातचीत के जरिए खास रियायतें देने जैसे तरीकों से होता है. धीरे-धीरे इससे सरकार की कमाई का दायरा छोटा होता जाता है.

आईएमएफ के आंकड़ों के मुताबिक, 1998 में बांग्लादेश की जीडीपी में सरकार की कमाई का हिस्सा 7.6 फीसदी था. आईएमएफ की अक्टूबर 2026 की राजकोषीय निगरानी रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक, चालू वर्ष में यह थोड़ा बढ़कर 7.8 फीसदी हो सकता है. यह तब है, जब पिछले एक दशक में देश की अर्थव्यवस्था हर साल 6 से 8 फीसदी की दर से बढ़ी है.

इसकी तुलना में, वैश्विक कपड़ा बाजार में बांग्लादेश के प्रतिद्वंद्वी वियतनाम की जीडीपी में सरकार की कमाई का हिस्सा 20.5 फीसदी रहने का अनुमान है.

सरकार की कमाई का दायरा सीमित होने के बावजूद बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है. यह देश के लिए एक बड़ा अवसर है. टैक्स की दरें बढ़ाने के बजाय बांग्लादेश अपने मौजूदा कर ढांचे का दायरा बढ़ाकर सरकार की कमाई में सुधार कर सकता है.

ग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट
ग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट

नियमों और पाबंदियों को फिर से सख्त बनाना

अगर ढील देना बीमारी है, तो इसका इलाज हर नियम और पाबंदी को फिर से सख्त बनाना है. कोरनाई के विचार बताते हैं कि इसकी शुरुआत चार जगहों से की जा सकती है.

पहला, बांग्लादेश को बड़े कर्ज न चुकाने वालों के कर्ज चुकाने की समय-सीमा बार-बार बढ़ाना बंद करना चाहिए और उनके कर्ज की समस्या को सुलझाना शुरू करना चाहिए. इसके लिए बैंकिंग व्यवस्था में एक भरोसेमंद ढांचा बनाना ज़रूरी है, जिसमें तय नियमों के आधार पर कमजोर बैंकों की समस्याओं को सुलझाया जा सके और उन्हें फिर से मजबूत बनाया जा सके.

दूसरा, सरकारी बैंकों के कामकाज और प्रबंधन को राजनीतिक दखल से दूर रखना चाहिए. बांग्लादेश के सरकारी बैंकों में कर्ज न चुकाने की दर 43.2 फीसदी है, जबकि उसी अर्थव्यवस्था में काम कर रहे विदेशी बैंकों में यह दर 6.5 फीसदी है. इन दोनों के बीच का बड़ा अंतर दिखाता है कि समस्या भौगोलिक स्थिति की नहीं, बल्कि उन नियमों और प्रोत्साहनों की है, जिनके तहत बैंक काम करते हैं.

तीसरा, टैक्स की दरें बढ़ाने के बजाय छूट और बातचीत के जरिए दी जाने वाली रियायतें खत्म करके सरकार की कमाई बढ़ानी चाहिए. टैक्स प्रशासन को आधुनिक बनाने से भी कर व्यवस्था का दायरा बढ़ेगा और यह व्यवस्था सभी के लिए उचित बनी रहेगी.

आखिर में, विदेशी मुद्रा की लचीली विनिमय दर को बनाए रखना चाहिए. इसी दर ने विदेश में काम करने वाले बांग्लादेशियों के पैसे को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था के जरिए देश तक पहुंचाने में मदद की है. आईएमएफ ने भी इसकी सिफारिश की है.

बैंकॉक से क्या हासिल हो सकता है और क्या नहीं

आईएमएफ ने माना है कि बांग्लादेश की समस्या का स्वरूप बदल गया है. जून में उसने कहा था कि 2023 के अपने कार्यक्रम के बाद से हालात में ‘काफी बदलाव’ आया है. उसने यह भी कहा था कि बैंकों की कमजोर हालत और सरकार की कम कमाई के कारण सुधार के नए प्रयास करने की ज़रूरत है.

पहले यह कार्यक्रम आर्थिक चिंताओं के बजाय सुधार करने में आ रही मुश्किलों के कारण रुक गया था. अप्रैल में आई खबरों के मुताबिक, तय लक्ष्यों को पूरा नहीं किए जाने के कारण आईएमएफ ने 1.3 अरब डॉलर की किस्त रोक दी थी.

ढाका से आ रही मौजूदा खबरों के मुताबिक, अब कमजोर बैंकों की समस्याएं दूर करने, सरकार की कमाई के लक्ष्य पूरे करने और सब्सिडी घटाने के लिए समय-सीमा तय की गई है. इसका मकसद उन नियमों और पाबंदियों को लागू करना है, जिनमें दशकों से ढील दी जाती रही है.

आईएमएफ के अनुमान बताते हैं कि अगर सुधार नहीं किए गए, तो इसके क्या नतीजे हो सकते हैं. अनुमान है कि 2026-27 में बांग्लादेश की आर्थिक विकास दर घटकर 3.5 फीसदी रह जाएगी. अगर बड़े और निर्णायक सुधार नहीं किए गए, तो यह दर आगे चलकर 3 फीसदी से भी नीचे जा सकती है.

कोरनाई ने शायद इस बात में छिपे विरोधाभास पर ध्यान दिया होता कि आईएमएफ से मिलने वाला कर्ज भी एक तरह से बचाव ही है. और किसी को बचाने की व्यवस्था से नियमों और पाबंदियों में ढील मिलने की आशंका रहती है.

विदेश में काम करने वाले लोग पहले ही बांग्लादेश के विदेशी मुद्रा भंडार को फिर से बढ़ाने में योगदान दे चुके हैं. नया कर्ज कार्यक्रम देश को ऐसी संस्थाएं बनाने का अवसर देता है, जो इस मुश्किल से हासिल हुई स्थिरता को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद कर सकें.

बिदिशा भट्टाचार्य दिप्रिंट की कंसल्टिंग एडिटर (इकोनॉमिक्स) और चिंतन रिसर्च फाउंडेशन की एसोसिएट फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी है.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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