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Tuesday, 20 October, 2026
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बिना अधिकार फेसबुक पेज ब्लॉक, HC ने हरियाणा पुलिस को फटकारा

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि SP के पास सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को पेज बंद करने का नोटिस देने का अधिकार नहीं था, क्योंकि ऐसा आदेश केवल DIGP रैंक या उससे ऊपर का अधिकारी ही दे सकता है.

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चंडीगढ़: 45 दिनों तक हरियाणा 24 न्यूज नेटवर्क का फेसबुक पेज भारत में नहीं खुल रहा था. कंपनी के निदेशकों को न तो कोई नोटिस मिला और न ही अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया. उन्हें इस रोक के बारे में 21 अगस्त को तब पता चला, जब पेज पर Meta का एक संदेश दिखाई दिया.

संदेश में कहा गया था कि Information Technology Act, 2000 की धारा 79(3)(b) के तहत “भारत सरकार/कानून लागू करने वाली एजेंसी के नोटिस के आधार पर” पेज तक पहुंच रोक दी गई है. यह प्रावधान तब किसी इंटरमीडियरी को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा से जुड़ा है, जब उसे किसी गैरकानूनी कंटेंट की जानकारी मिलने के बाद उसे हटाने या उस तक पहुंच रोकने में नाकाम रहने पर यह सुरक्षा नहीं मिलती. कंपनी को इसके अलावा कोई और जानकारी नहीं दी गई.

इसके बाद पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इस नोटिस को रद्द कर दिया. जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने कहा कि यमुनानगर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) ने मेटा को पेज तक पहुंच बंद करने का निर्देश दिया था, लेकिन उनके पास ऐसा निर्देश देने का अधिकार नहीं था.

राज्य ने मामले के मूल तथ्यों पर कोई विवाद नहीं किया. हरियाणा की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ताभूपेंद्र सिंह ने अदालत को बताया कि कंपनी के निदेशक मोहित वर्मा 6 अगस्त को दर्ज एक जबरन वसूली की FIR में आरोपी थे. उन्होंने दलील दी कि SP ने Meta से संपर्क इसलिए किया था क्योंकि आरोप था कि वर्मा ने शिकायतकर्ता और गवाहों को डराने के इरादे से पेज का इस्तेमाल वीडियो पोस्ट करने और संदेश भेजने के लिए किया था.

अदालत ने लागू नियमों की जांच की. सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के Rule 3(1)(d) के तहत किसी इंटरमीडियरी को गैरकानूनी कंटेंट की जानकारी मिलने के बाद 36 घंटे के अंदर कार्रवाई करनी होती है. यह जानकारी किसी अदालत के आदेश या अधिकृत अधिकारी की ओर से दिए गए कारण वाले लिखित नोटिस के जरिए मिल सकती है. जब ऐसा नोटिस पुलिस प्रशासन की ओर से आता है, तो अधिकारी कम से कमपुलिस उप महानिरीक्षक (डीआईजीपी) रैंक का होना चाहिए और सरकार की ओर से उसे इस काम के लिए विशेष रूप से अधिकृत किया गया होना चाहिए.

SP इस रैंक की शर्त पूरी नहीं करते थे. राज्य ने भी इस बात को स्वीकार किया.

हालांकि, हरियाणा ने दलील दी कि SP को राज्य सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर काम करने के लिए अधिकृत किया गया था. अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि जिस शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए कम से कम एक तय रैंक का अधिकारी होना जरूरी है, वह शक्ति उस रैंक से नीचे के अधिकारी को नहीं दी जा सकती. राज्य के वकील ऐसा कोई नियम नहीं बता सके, जो इस तरह की शक्ति SP को सौंपने की अनुमति देता हो. नोटिस में भी ऐसे किसी आदेश का जिक्र नहीं था, जिसके जरिए SP को यह अधिकार दिया गया हो.

“Superintendent of Police ने उस शक्ति का इस्तेमाल किया जो उन्हें मिली ही नहीं थी,” जस्टिस दहिया ने लिखा. उन्होंने इस कार्रवाई को “पूरी तरह मनमानी और अधिकार का मनमाने तरीके से इस्तेमाल” बताया.

अदालत ने प्रक्रिया से जुड़ी एक और गलती बताई. नियमों के मुताबिक, इस तरह के हर नोटिस की महीने में एक बार कम से कम Secretary रैंक के अधिकारी को समीक्षा करनी होती है. इस समीक्षा का मकसद यह देखना होता है कि कार्रवाई अभी भी जरूरी और उचित है या नहीं. नोटिस जारी होने के एक महीने से ज्यादा समय बीत चुका था, लेकिन राज्य यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं दे सका कि जरूरी समीक्षा की गई थी.

हरियाणा ने यह भी दलील दी कि कंपनी को Rule 3(2) के तहत Meta के Grievance Officer के पास जाना चाहिए था. इस नियम में इंटरमीडियरी के जरिए शिकायत का समाधान करने की व्यवस्था है.

अदालत ने कंपनी को ऐसा करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि जब कंपनी को मूल नोटिस ही नहीं मिला था, तो उसे उस उपाय का इस्तेमाल करने के लिए कहना बेकार होगा. अदालत की यह दलील इस मामले से आगे भी असर डाल सकती है.

जस्टिस दहिया ने कहा कि नियमों में कंटेंट ब्लॉक करने से पहले यूजर्स को अपना पक्ष रखने का मौका देने की व्यवस्था नहीं है. याचिकाकर्ता ने इस व्यवस्था को चुनौती नहीं दी थी, इसलिए अदालत ने इस मुद्दे को खुला छोड़ दिया. हालांकि, अदालत ने कहा कि पेज या कंटेंट ब्लॉक होने के बाद शिकायत करने का कोई भी तरीका तब तक सही मायने में उपयोगी नहीं हो सकता, जब तक प्रभावित यूजर को यह पता न हो कि उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई और क्यों की गई.

सुप्रीम कोर्ट के 2023 के Madhyamam Broadcasting Ltd v. Union of India फैसले पर भरोसा करते हुए अदालत ने कहा कि जब भी इंटरमीडियरी को नोटिस भेजा जाए, उसकी एक कॉपी प्रभावित यूजर को भी दी जानी चाहिए. अदालत ने कहा कि इस शर्त को Rule 3(2) में प्राकृतिक न्याय के एक हिस्से के रूप में शामिल माना जाना चाहिए.

SP और Meta, दोनों ने ही कंपनी को नोटिस की कॉपी नहीं दी थी. इसलिए ऐसी स्थिति में Meta के Grievance Officer के पास जाना “बेकार की कवायद” होता, अदालत ने कहा.

5 अक्टूबर के अपने आदेश में जस्टिस दहिया ने SP को निर्देश दिया कि आदेश की प्रमाणित कॉपी मिलने के 24 घंटे के अंदर Meta को पेज को उसकी पहले वाली स्थिति में बहाल करने का निर्देश दें. Meta को इस निर्देश का तुरंत पालन करना था. अदालत ने Meta को नोटिस जारी नहीं किया, क्योंकि उसने कहा कि वह प्लेटफॉर्म के हितों के खिलाफ कोई आदेश नहीं दे रही है.

अदालत ने आगे नई कार्रवाई की संभावना को भी खुला रखा. अगर राज्य को पेज पर कोई प्रतिबंधित कंटेंट मिलता है और उसका इस्तेमाल गैरकानूनी गतिविधि के लिए किया जा रहा हो, तो अधिकृत अधिकारी Meta को नया नोटिस भेज सकता है. हालांकि, ऐसा नोटिस भेजे जाने के तुरंत बाद उसकी एक कॉपी कंपनी को देनी होगी.

कंपनी की ओर से अधिवक्ता नमित खुराना और गगन बुधिराजा पेश हुए, जबकि भारत सरकार की ओर से धीरज जैन और अमृता सिंह ने पैरवी की.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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