कोलकाता: 99 साल की उम्र में भी ट्रिंकास आज भी 80 के दशक की किसी फिल्म में दिखाए गए पार्टी के माहौल जैसा लगता है. लाल मखमली पर्दे, लाइव संगीत, गिलासों की खनखनाहट और लोगों की बातचीत. कोलकाता के लगभग हर व्यक्ति के लिए ट्रिंकास वह जगह है, जहां उनकी जवानी की शुरुआत हुई. यहां उन्होंने पहली बार दोस्तों के साथ कोई बड़ी पार्टी की होगी या शायद पहली बार शराब जैसी किसी ‘बड़ों वाली’ चीज़ का स्वाद चखा होगा.
ट्रिंकास की तीसरी पीढ़ी के मालिक आनंद पुरी ने कहा, “ट्रिंकास कभी पुराना नहीं पड़ता. यह एक क्लासिक जगह है और शहर के लोगों के मन में इसकी खास जगह है. इसके 100 साल पूरे होना एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन मैं इस पुरानी यादों का इस्तेमाल करके कुछ करना चाहता हूं. मेरा विचार है कि इस विरासत का इस्तेमाल करके इसे एक ऐसी पुरानी शैली वाली, लेकिन नए जमाने की पहचान दी जाए, जो आने वाली पीढ़ियों को भी पसंद आए.”
45 साल के आनंद इन दिनों इस काम में पूरी तरह जुटे हुए हैं. वह पुराने रिकॉर्ड खंगाल रहे हैं, अपने परिवार की कहानियां पढ़ रहे हैं और ट्रिंकास के साथ-साथ कोलकाता के इतिहास में डूबे हुए हैं.
आनंद ने कहा, “हमने 100 साल पूरे होने के जश्न के लिए कई चीजों की योजना बनाई है. इनमें एक किताब और कई कार्यक्रम शामिल हैं, जिन्हें कोलकाता लंबे समय तक याद रखेगा.”
पार्क स्ट्रीट पर मौजूद यह रेस्टोरेंट एक स्विस टीहाउस के रूप में शुरू हुआ था. इसके बाद यह नाइट क्लब बना, यहां जैज संगीत के प्रोग्राम हुए, चीनी खाने के नए प्रयोग हुए, समलैंगिक समुदाय के लोगों के लिए कराओके क्लब बना और आखिर में यह खुद कोलकाता के इतिहास को सहेजने वाली एक जीती-जागती मिसाल बन गया.
संगीत ने ट्रिंकास को मशहूर बनाया. बॉलीवुड की गायिका उषा उथुप ने इसी मंच से अपने करियर की शुरुआत की थी. बाद में यहां जैज संगीतकारों, कैबरे डांस करने वालों और अलग-अलग जगहों से आने वाले संगीत बैंड ने भी कार्यक्रम किए.
इसके बाद मुश्किल दौर आया. 1970 के दशक में नक्सल आंदोलन के दौरान अशांति के कारण लोग घरों में रहने लगे. 1980 के दशक में बिजली कटौती के चलते एयर कंडीशनिंग चलाना भी मुश्किल हो गया, लेकिन पुरी परिवार ने हिम्मत नहीं छोड़ी.
खाने-पीने की चीज़ों पर लिखने वाली लेखिका और खान-पान की जानकार आयंद्राली दत्ता ने कहा, “ट्रिंकास ने कई पीढ़ियों को आकार दिया है. यह पार्क स्ट्रीट की आत्मा रहा है और हमेशा रहेगा.”
दत्ता ने आगे कहा, “एक दौर ऐसा भी आया, जब मुझे लगा कि ट्रिंकास ने अपने पुराने जमाने का कुछ आकर्षण खो दिया है. मुझे याद है कि मैं सोचती थी कि क्या यह जगह कभी फिर वही जादू वापस ला पाएगी, जिसे मैंने बड़े होते हुए महसूस किया था, लेकिन आनंद के इससे जुड़ने के बाद इसे फिर से बेहतर बनाने की कोशिश देखकर अच्छा लगा है. यहां फिर से वही रौनक लौट आई है और वे कई चीजें भी वापस आ गई हैं, जिन्होंने शुरू से ट्रिंकास को खास बनाया था.”

कोलकाता का कॉन्टिनेंटल खाना, आज भी मेन्यू में
ट्रिंकास में चिकन अ ला कीव खाने के दो तरीके हैं: या तो इसे बहुत सलीके से खाएं या फिर खाने के दौरान फिजिक्स के नियमों का ध्यान रखें.
चिकन के चपटे टुकड़े को काटते ही उसके अंदर भरा लहसुन वाला मक्खन तेज़ी से बाहर निकलता है. कभी-कभी यह मक्खन अगली मेज तक भी पहुंच जाता है. इसके साथ परोसे जाने वाले मैश किए हुए आलू और हल्की आंच पर पकाई गई सब्जियां इस स्वादिष्ट मक्खन को साफ करने में मदद करती हैं.
ट्रिंकास में अक्सर आने वाले लोगों के लिए यह रेस्टोरेंट की उन ‘पुरानी खासियतों’ में से एक है.
रेस्टोरेंट में अक्सर आने वाले चैतन्य पाल ने कहा, “यहां का चिकन अ ला कीव और लॉबस्टर थर्मिडोर नाम की झींगा मछली की डिश, पिछले 10 साल से एक जैसी ही लगती है.”
ट्रिंकास में वह खाना भी मिलता है, जिसे इसके पुराने और पक्के ग्राहक ‘कोलकाता कॉन्टिनेंटल’ कहते हैं. यह कॉन्टिनेंटल खाना बनाने के तरीके का स्थानीय रूप है, जिसमें चीनी और भारतीय खाने का असर भी है. यह उस शहर का खाना है, जिसने अलग-अलग संस्कृतियों से बहुत कुछ अपनाया, उसे अपने स्वाद के हिसाब से बदला और समय के साथ उसे अपनी खास पहचान दे दी.
प्रॉन कॉकटेल, फिश म्यूनियर और बेक्टी फ्लोरेंटाइन जैसे पकवान पुराने जमाने की शान और चमक की याद दिलाते हैं. वहीं लॉबस्टर थर्मिडोर, डेविल्ड क्रैब, चिकन स्ट्रोगनॉफ और सिजलर जैसे पकवान आज भी लोगों को यहां खींचते हैं. मेन्यू में भारतीय पसंद के खाने के लिए भी जगह है. इनमें मटन रेजाला से लेकर चिकन टिक्का तक शामिल हैं. हालांकि, एक ग्राहक को यहां का चिकन लाहौरी कबाब सबसे ज्यादा पसंद है.

कांच के पीछे सिचुआन का राज
कॉन्टिनेंटल मेन्यू ट्रिंकास की पहचान का सिर्फ आधा हिस्सा है. रेस्टोरेंट की कहानी का एक और, ज्यादा मसालेदार चैप्टर है.
1983 में आनंद के पिता सनी पुरी ने मिंग रूम शुरू किया. यह ट्रिंकास के मुख्य खाने वाले हिस्से के पीछे कांच की एक दीवार के पीछे बना चीनी रेस्टोरेंट था. इसका मकसद कोलकाता के लोगों के बदलते और नए स्वाद को कुछ ज्यादा तीखा और मसालेदार देना था.
उस समय सिचुआन शैली का खाना बहुत आम नहीं था. मिंग रूम ने चीन के खाने की ऐसी शैली को लोकप्रिय बनाने में मदद की, जिसमें मिर्च का इस्तेमाल ज्यादा होता था. बाद में यह कोलकाता के खाने की पहचान का एक हिस्सा बन गया. इस बदलाव के केंद्र में एक खास चिली पेस्ट था, जिसे अब मिंग रूम के नाम से जाना जाता है.
लहसुन और मिर्च से बनाई गई यह खास सॉस चिली गार्लिक नूडल्स, हॉट गार्लिक सॉस में लैम्ब और सिचुआन प्रॉन्स जैसी डिश का खास हिस्सा बन गई.
आज भी रेस्टोरेंट की मेजों पर होने वाली छोटी-छोटी चीज़ों में इसका असर दिखाई देता है. कोई परिवार पांच हफ्तों में लगातार पांचवीं बार यहां खाना खाने आ सकता है. वेटर को यह पूछने की भी ज्यादा ज़रूरत नहीं पड़ती कि वे शुरुआत में क्या खाना चाहेंगे. ड्रम्स ऑफ हेवन, चिली गार्लिक नूडल्स और गोल्डन-फ्राइड प्रॉन्स तो जैसे ज़रूरी ही हैं.
पाल के लिए कोलकाता में चीनी खाने का बदलाव लोगों को स्वाद की एक बिल्कुल नई दुनिया से परिचित कराने के बारे में था.
लाइव म्यूजिक की आवाज़ में उनकी बात दबते हुए उन्होंने कहा, “कोलकाता के व्यावसायिक चीनी खाने पर कैंटोनीज और हक्का खाने का असर था. यह ऐसा खाना था, जिसे लोग विदेशी और अलग तरह का मानते थे और इसे वही लोग खाते थे जो कुछ नया और अलग करने के लिए तैयार रहते थे. इसे समझने के लिए इतना जानना काफी है कि ज्यादातर कोलकातावासियों ने चीनी खाना आने से पहले नूडल्स तक नहीं देखे थे.”
कोलकाता का चीनी खाने के साथ रिश्ता भारत के किसी भी दूसरे शहर से अलग है. यह शहर की अलग-अलग संस्कृतियों के साथ जुड़ी पहचान का हिस्सा है. इसका एक ऐसा खाने का इतिहास बना, जिसमें एक नहीं बल्कि दो चाइनाटाउन शामिल हैं—टायरेटा बाजार और तांगरा. दोनों की अपनी-अपनी मशहूर खाने की जगहें हैं.
इन समुदायों से निकला खाना कई पीढ़ियों के दौरान बदलता गया. इस पर लोगों के यहां आने-जाने, स्थानीय चीज़ों और भारतीय स्वाद का असर पड़ा. हालांकि, आनंद ने कहा कि उन्हें हाल में ही पता चला कि इस कहानी में उनके अपने परिवार की भूमिका कितनी बड़ी थी.
आनंद ने कहा, “1980 के दशक की शुरुआत में भारत में सिचुआन खाना लगभग किसी ने सुना भी नहीं था और यह सिर्फ दो जगहों पर मिलता था: ताज बॉम्बे और ताज दिल्ली. उस समय पांच सितारा होटल में खाना बहुत महंगा था, पहले से बुकिंग करनी पड़ती थी और आम लोगों की पहुंच से बाहर था.”
बॉम्बे और दिल्ली के ताज होटलों में काम करते हुए सनी ने फ्रैंकी लॉक से सिचुआन की डिश बनाना सीखा. लॉक हांगकांग से आए थे. उन्होंने भारतीय स्वाद के हिसाब से इस खाने में बदलाव किया था और सनी ने उनसे सीधे इसकी रेसिपी और खाना बनाने का तरीका सीखा.
मिंग रूम में इन स्वादों को लाने का मतलब था कि कभी सिर्फ खास लोगों तक सीमित रहने वाले इस तरह के खाने को कोलकाता के आम लोगों तक पहुंचाया जाए. ट्रिंकास में कांच की एक दीवार के पीछे खाने की दो अलग-अलग दुनिया एक साथ रहने लगीं.
आनंद ने कहा, “मैंने अपने पिता से कहा, ‘क्या आपको पता है कि यह शहर में पूरी तरह से एक ‘खाने की क्रांति’ थी?’ लेकिन मेरे पिता ने इसे यह कहकर टाल दिया कि उन्होंने तो बस एक काम किया था. वह बहुत विनम्र हैं और उन्होंने कभी इसका श्रेय लेने की कोशिश नहीं की.”
संगीतकारों के लिए लॉन्चपैड
रिटायर हो चुके अकाउंटेंट और ट्रिंकास में अक्सर आने वाले सुरिंदर देबाकर को 1970 के दशक में रेस्टोरेंट में जाना याद है. उन्होंने वहां एक महिला को जोरदार आवाज़ में गाते देखा था. उन्होंने साड़ी पहन रखी थी, बड़ी बिंदी लगाई थी और उनकी आवाज़ ऐसी थी कि बातचीत के बीच में भी लोग चुप हो जाएं.
देबाकर के मुताबिक, उस महिला की आवाज़ इतनी “दमदार” थी कि वह पूरे कमरे पर अपना असर डाल सकती थी और लोगों को अपनी ओर बांधे रख सकती थी.
वह महिला उषा उथुप थीं और ट्रिंकास वह जगह थी, जहां 1969 में कोलकाता के साथ उनकी कहानी ने सच में उड़ान भरी. उस समय नाइट क्लब के मंचों पर आमतौर पर गाउन और विग पहनने वाली एंग्लो-इंडियन कलाकार ही दिखाई देती थीं. ऐसे में उथुप कांजीवरम साड़ी और बड़ी बिंदी लगाकर आती थीं. जल्द ही उनकी प्रस्तुतियां पार्क स्ट्रीट में चर्चा का विषय बन गईं.
2019 में रेस्टोरेंट के साथ अपने पांच दशक लंबे रिश्ते को याद करते हुए उथुप ने एक इंटरव्यू में कहा, “ट्रिंकास पार्क स्ट्रीट के साथ हुई सबसे अच्छी चीज है. यहां हमेशा शानदार भीड़ रहती है.” उन्होंने यह भी बताया कि अपने आसपास के संगीतकारों से उन्होंने कार्यक्रम करने की बारीकियां सीखीं और यह समझा कि कोई गाना सिर्फ उसे गाने वाले व्यक्ति के बारे में नहीं होता.
एक दूसरे इंटरव्यू में उन्होंने रेस्टोरेंट के साथ अपने रिश्ते को एक ऐसी लाइन में बताया, जो ट्रिंकास का अनौपचारिक आदर्श वाक्य भी बन सकती है: “मैं ट्रिंकास की हूं और ट्रिंकास मेरा है.”
उथुप की आवाज़ जल्द ही हिंदी सिनेमा तक पहुंच गई. उन्होंने 1970 में बॉम्बे टॉकीज से फिल्मों में शुरुआत की और इसके बाद 1971 में हरे रामा हरे कृष्णा में गाया. इस फिल्म के गाने “आई लव यू” का अंग्रेज़ी हिस्सा उनके करियर की शुरुआती बड़ी उपलब्धियों में से एक बना. उनका करियर आगे चलकर पॉप, जैज, विज्ञापनों के जिंगल और फिल्मी संगीत तक फैला.

जहां सितारे आराम करने आते थे
उथुप ही ट्रिंकास की एकमात्र खासियत नहीं थीं. अमिताभ बच्चन, सुपरस्टार बनने से पहले, कोलकाता में रहने के दौरान यहां अक्सर आते थे. हाल ही में ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के एक एपिसोड में उन्होंने पार्क स्ट्रीट पर एक के बाद एक बने रेस्टोरेंट को याद किया और ट्रिंकास के साथ मोकाम्बो और ब्लू फॉक्स का भी नाम लिया.
बच्चन ने कहा, “हम लोग बहुत बेकार लोग होते थे. ये हमारा रात का मनोरंजन होता था. पार्क स्ट्रीट में एक लाइन से लगे हुए थे ये सब, ट्रिंकास, मोकाम्बो, ब्लू फॉक्स. मैंने आज तक दुनिया भर में ऐसे कहीं नहीं देखा है कि एक स्ट्रीट पर इतने सारे हो.”
विदेशी कलाकार भी यहां आते थे. आनंद के मुताबिक, एंगेलबर्ट हम्परडिंक ने अपने करियर की शुरुआत में ट्रिंकास में कार्यक्रम किया था. क्रिस पेरी जैसे संगीतकारों ने भी यहां कार्यक्रम किए. बाद में उन्होंने बॉम्बे की फिल्म इंडस्ट्री में काम के मौके तलाशे.
इनके अलावा कपूर परिवार भी यहां आता था. आनंद ने कहा, “कपूर परिवार का इस रेस्टोरेंट के साथ लंबे समय से रिश्ता रहा है. करिश्मा कपूर एक फिल्म की शूटिंग के दौरान ट्रिंकास आई थीं. उनके पिता रणधीर कपूर भी कई पीढ़ियों तक ट्रिंकास आते रहे. वह 1960 के दशक से लेकर उस समय तक यहां आते रहे, जब 1990 और 2000 के दशक में मेरे पिता यहां थे.”
उन्होंने आगे कहा, “1960 के दशक में बॉलीवुड के आधे लोग ट्रिंकास आ चुके हैं.”
कोलकाता के रेस्टोरेंट और बार की संस्कृति में लंबे समय से लाइव म्यूजिक का हिस्सा रहा है. आज भी इसकी झलक एएमपीएम और लिटिल बिट सोबर जैसी नई जगहों पर दिखाई देती है, जहां लाइव बैंड अब भी वहां के अनुभव का अहम हिस्सा हैं.
हालांकि, देबाकर का कहना है कि आज के लाइव म्यूजिक के क्षेत्र में कोई बड़ा और मशहूर नाम नहीं है.
उन्होंने कहा, “शायद 20 साल बाद इनमें से कुछ लड़के और लड़कियां भी बॉलीवुड में गा रहे होंगे, लेकिन आजकल उथुप जैसी प्रतिभा नहीं है.”

बर्मा से आए शरणार्थी, लाहौर का किशोर
जब भी आनंद ट्रिंकास के बारे में बात करते हैं, उनकी आंखों में चमक आ जाती है. रेस्टोरेंट का इतिहास जैसे उनकी यादों में ही बुना हुआ है. इसे बनाने वाले लोगों की कहानियों के साथ यह इतिहास पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनके परिवार तक पहुंचा है.
ट्रिंकास की शुरुआत 1927 में पार्क स्ट्रीट पर ‘फ्लूरी एंड ट्रिंका’ के नाम से हुई थी. इसे स्विट्जरलैंड के दो साझेदार चलाते थे और यह एक चायघर था. 1939 में क्विंटो चिंजियो ट्रिंका और जोसेफ फ्लूरी अलग हो गए. इसके बाद फ्लूरी ने पुरानी जगह अपने पास रखी, जबकि ट्रिंका सड़क के दूसरी तरफ 17 पार्क स्ट्रीट चले गए. आज भी रेस्टोरेंट इसी जगह पर है.
1959 में, जब ट्रिंका रिटायर होकर स्विट्जरलैंड लौटने की तैयारी कर रहे थे, तब दो दोस्तों ने रेस्टोरेंट संभालने के लिए कदम आगे बढ़ाया. बर्मा से आए शरणार्थी एलिस जोशुआ और 18 साल की उम्र में लाहौर से आए ओम प्रकाश पुरी ने रेस्टोरेंट खरीद लिया और इसकी विरासत को आगे बढ़ाया.
आनंद ने कहा, “किसी ने भी नाम बदलने के बारे में नहीं सोचा.”
कुछ समय तक कारोबार बहुत अच्छा चला. लेकिन कोलकाता के बदलते राजनीतिक और आर्थिक माहौल का असर जल्द ही रेस्टोरेंट पर पड़ने लगा. 1960 के दशक के आखिर और 1970 के दशक में नक्सली अशांति के कारण लोग घरों में रहने लगे. 1980 के दशक तक लगातार होने वाली बिजली कटौती भी एक और बड़ी चुनौती बन गई.
एयर कंडीशनिंग बंद होने से दोपहर और शाम के लंबे समय तक रेस्टोरेंट में बैठना मुश्किल हो गया. इसके कारण रेस्टोरेंट को एक कठिन दौर से गुजरना पड़ा.
फिर भी ट्रिंकास चलता रहा. इसका जाना-पहचाना नाम, पुराने ग्राहक और पार्क स्ट्रीट की लाइव म्यूजिक संस्कृति से इसका जुड़ाव इसे उस समय भी टिकाए रखने में मदद करता रहा, जब इसके आसपास का शहर बदल रहा था.

यादों का प्रोजेक्ट
जब पुरी परिवार की तीसरी पीढ़ी ने ट्रिंकास की जिम्मेदारी संभाली, तब तक ट्रिंकास सिर्फ एक रेस्टोरेंट नहीं रह गया था. यह यादों का एक खजाना बन चुका था. पहली डेट, पसंदीदा गाने, परिवार के साथ डिनर और लाइव बैंड सुनते हुए बिताई गई रातों की कहानियां इसके इतिहास का हिस्सा बन चुकी थीं.
2019 में आनंद करीब एक दशक तक पढ़ाई और काम के लिए बाहर रहने के बाद घर लौटे.
हालांकि, जब उन्होंने कारोबार संभाला, तो उन्होंने रेस्टोरेंट का चेहरा या वहां परोसा जाने वाला खाना बदलने की कोशिश नहीं की. आनंद समझते थे कि ट्रिंकास आने वाले हर ग्राहक के दिल में पुरानी यादें हैं. इसलिए उनकी रणनीति इन यादों का इस्तेमाल करने की थी.
इसी वजह से उन्होंने समुदाय के साथ मिलकर यादों को इकट्ठा करने का एक प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसका नाम ट्रिंकास टाइमलाइन प्रोजेक्ट रखा गया.
आनंद ने कहा, “मैंने ट्रिंकास टाइमलाइन प्रोजेक्ट शुरू किया ताकि यहां आने वाले ग्राहकों की यादों, उनकी सामूहिक यादों को इकट्ठा किया जा सके और उन लोगों और पलों को दर्ज किया जा सके, जिन्होंने इस जगह को आकार दिया. क्योंकि कोई एक व्यक्ति पूरे 100 साल के इतिहास को याद नहीं रख सकता.”
वह खुद को “एकांत में रहने वाला इंसान” कहने लगे और कई महीनों तक किताबों और पुराने रिकॉर्ड की खोज में डूबे रहे. उन्होंने कोलकाता से बाहर रह रहे लोगों से भी संपर्क किया. ये लोग अब कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और मध्य पूर्व में रहते हैं. इसके लिए उन्होंने “कोलकाता फोटोग्राफ्स एंड मेमोरीज” जैसे फेसबुक के इतिहास से जुड़े ग्रुपों के सदस्यों से संपर्क किया. इन ग्रुपों में हर एक के 15,000 से लेकर 30,000 से ज्यादा सदस्य हैं.
इस प्रोजेक्ट के पेज के जरिए उन्हें ट्रिंकास, पार्क स्ट्रीट और कोलकाता की कई दशक पुरानी और दुर्लभ तस्वीरें मिलीं. लोगों ने याद किया कि कैसे पांच किशोरों का एक समूह सिर्फ एक कोक और एक कॉफी ऑर्डर करता था, ताकि एक टेबल मिल सके. इसके बाद वे वहीं बैठकर डांस करते, बातें करते और स्थानीय अड्डा का मजा लेते थे.
एक और परंपरा थी, ‘उधार की डिनर जैकेट’. 70 और 80 साल की उम्र के लोगों ने याद किया कि वे औपचारिक शाम के खाने के लिए ट्रिंकास आते थे. अगर वे अपनी जैकेट लाना भूल जाते, तो प्रवेश द्वार पर रखी ट्रिंकास की अतिरिक्त डिनर जैकेट में से एक जैकेट पहन लेते थे.
आनंद ने आगे कहा, “कुछ लोगों ने अपनी जिंदगी की खास यादें भी साझा कीं. जैसे ट्रिंकास में पहली बार शराब पीना या ठीक उन्हीं टेबलों पर अपना 22वां और 90वां जन्मदिन मनाना.”
जैसे-जैसे ट्रिंकास अपने 100 साल पूरे करने के करीब पहुंच रहा है, ये यादें सिर्फ एक रेस्टोरेंट के पुराने दिनों की कहानियां नहीं हैं. ये इस बात का रिकॉर्ड हैं कि कैसे कोलकाता की कई पीढ़ियों ने एक ही जगह पर बड़े होते हुए, बाहर जाते हुए और फिर उन्हीं टेबलों पर वापस आते हुए अपनी जिंदगी के पल बिताए.
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