नई दिल्ली: बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को बॉलीवुड अभिनेता-फिल्म निर्माता इमरान खान की रिट याचिका पर सुनवाई के लिए अगले हफ्ते का समय तय किया. खान अमेरिकी नागरिक हैं और पिछले 42 साल से भारत में रह रहे हैं. उन्होंने मुंबई के फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (FRRO) की ओर से जारी भारत छोड़ो नोटिस (LIN) को चुनौती दी है. यह नोटिस उन्हें भारत के चुनाव आयोग के खिलाफ मुंबई में हुए एक प्रदर्शन के सिलसिले में कुछ समय के लिए हिरासत में लिए जाने के बाद जारी किया गया था.
नोटिस में 44 साल के खान को 28 अक्टूबर तक भारत छोड़ने का निर्देश दिया गया है.
अपनी याचिका में खान ने कहा है कि भारत छोड़ो नोटिस (LIN) जारी करने का अधिकार संबंधित अधिकारी के पास नहीं था और यह असंवैधानिक है, क्योंकि उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया.
दिप्रिंट बता रहा है कि विवाद क्या है, किन कानूनों की धाराएं लगाई गई हैं और इमरान खान ने हाईकोर्ट के सामने क्या दलील दी है.
इमरान खान के साथ क्या हुआ और उनके खिलाफ कौन-सी धाराएं लगाई गईं
खान की याचिका के मुताबिक, 10 अक्टूबर को शाम करीब 5 बजे वह नाना चौक के पास थे, जब उन्होंने बैरिकेड देखे और पुलिस के कहने पर वापस चले गए.
याचिका में आगे कहा गया है कि जब पत्रकारों ने उनसे बात की तो उन्होंने कहा: “मेरी कोई मांग नहीं है. मैं यहां एक नागरिक के तौर पर, एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर हूं जो इस शहर में रहता है. मैं यह देखने के लिए यहां हूं कि लोगों के आने-जाने की आजादी को क्यों रोका जा रहा है, लोगों की आवाज़ को क्यों दबाया और रोका जा रहा है. इसलिए मैं यहां हूं…मेरी कोई औकात नहीं है कि मैं लोगों से कुछ मांग करूं और न ही मैं किसी संगठन का हिस्सा हूं…”
मुंबई पुलिस ने उन्हें शाम करीब 5:20 बजे हिरासत में लिया और शाम 7 बजे उन्हें छोड़ दिया गया, लेकिन उसी शाम बाद में गामदेवी पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की उन धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की, जो सरकारी कर्मचारी के आदेश की अवहेलना, गलत तरीके से किसी व्यक्ति को रोकने, गैरकानूनी तरीके से लोगों के इकट्ठा होने और दंगा करने से जुड़ी हैं.
एफआईआर के मुताबिक, इमरान खान करीब 3:30 बजे अगस्त क्रांति मैदान पहुंचे और पुलिस के आदेश का उल्लंघन करते हुए 350 से 400 लोगों की भीड़ को भड़काया.
खान ने अपनी याचिका में इस आरोप को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया है. उन्होंने कहा है कि सीसीटीवी फुटेज से पता चलता है कि वह शाम 5 बजे के बाद वहां पहुंचे थे, उन्होंने पुलिस की ओर से लगाए गए बैरिकेड के बारे में पूछा था, जाने के लिए कहे जाने पर तुरंत वहां से चले गए थे और जब वह मीडिया के लोगों से बात कर रहे थे, तभी उन्हें हिरासत में लिया गया.
याचिका में कहा गया है कि भारतीय न्याय संहिता के तहत ये अपराध जमानती हैं, इनमें अधिकतम सजा दो साल से कम है और मामले की जांच अभी चल रही है तथा अब तक कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है.
14 अक्टूबर को FRRO ने Immigration and Foreigners Act, 2025 (IFA) की धारा 7(2)(c) को धारा 29 के साथ पढ़ते हुए LIN जारी किया. नोटिस में कहा गया है कि खान ने “Immigration and Foreigners Act, 2025 और इसके तहत बनाए गए नियमों और आदेशों का उल्लंघन किया है.” अभिनेता का कहना है कि नोटिस में किसी खास उल्लंघन का जिक्र नहीं किया गया है.
धारा 7(2)(c) केंद्र सरकार को यह आदेश, निर्देश या हिदायत जारी करने का अधिकार देती है कि किसी विदेशी को भारत छोड़ना होगा. धारा 29 कहती है कि केंद्र सरकार तीन स्थितियों में किसी विदेशी को भारत से बाहर भेजने का निर्देश दे सकती है—IFA के किसी प्रावधान का उल्लंघन, इस कानून के तहत बनाए गए किसी नियम या निर्देश या आदेश का उल्लंघन, और किसी प्रतिकूल सुरक्षा रिपोर्ट के आधार पर.
खान ने कहा है कि वह Citizenship Act, 1955 की धारा 7A(1) के तहत 15 दिसंबर 2006 से Overseas Citizen of India (OCI) के रूप में पंजीकृत हैं. याचिका में जोर देकर कहा गया है कि धारा 7A से 7D तक “Overseas Citizens of India के लिए पूरा और अपने आप में संपूर्ण कानून” है.
जहां Citizenship Act की धारा 7B(1) जीवनभर भारत में रहने का अधिकार देती है, वहीं धारा 7D में OCI रद्द करने के सभी आधार साफ तौर पर बताए गए हैं. इसमें “अपना पक्ष रखने का उचित मौका” देना जरूरी है.
खान ने अपनी याचिका में कहा है कि धारा 7D को नजरअंदाज करके IFA की सामान्य निष्कासन शक्तियों का इस्तेमाल करना LIN को “अधिकार क्षेत्र के बिना और शुरू से ही अमान्य” बनाता है. उन्होंने कहा है कि उन्हें अपना पक्ष रखने या अपनी सफाई देने का मौका नहीं दिया गया.
इसके अलावा, IFA की धारा 29 के तहत धारा 20 का उल्लंघन या प्रतिकूल सुरक्षा रिपोर्ट होना जरूरी है. खान की याचिका में कहा गया है कि अगर IFA की धारा 11 के तहत किसी प्रतिबंधित जगह पर जाने का आरोप लगाया भी जाता है, तो नाना चौक को प्रतिबंधित जगह घोषित करने वाली कोई Gazette अधिसूचना मौजूद नहीं है.
खान ने यह भी कहा है कि गृह मंत्रालय (MHA) की हाल की अधिसूचना के तहत OCI के लिए केवल कुछ खास गतिविधियों, जैसे रिसर्च या पत्रकारिता, के लिए विशेष परमिट जरूरी हैं, सार्वजनिक जगह पर मौजूद रहने के लिए नहीं.
संवैधानिक गलतियां और अदालतों के पुराने फैसले
संविधान का अनुच्छेद 14 भारत में मौजूद “किसी भी व्यक्ति” को सुरक्षा देता है. खान ने LIN को “एक सामान्य, तय प्रारूप जैसा और बिना कारण बताए जारी किया गया आदेश” बताया है. उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई समानुपातिकता की तीन कसौटियों पर खरी नहीं उतरती—उचित संबंध, कम से कम नुकसान और संतुलित असर.
याचिका में अनुच्छेद 14 (कानून के सामने समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का जिक्र किया गया है, जो भारत में “किसी भी व्यक्ति” की रक्षा करते हैं. ई.पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य (1974) और अजय हसिया बनाम खालिद मुजीब सेहरावर्दी (1981) मामलों का हवाला देते हुए खान ने कहा है कि सरकार की मनमानी कार्रवाई अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है.
मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त (1978) मामले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा है कि किसी प्रशासनिक आदेश में दिए गए कारणों के आधार पर ही वह आदेश कायम रहना चाहिए और बाद में उसमें नए कारण नहीं जोड़े जा सकते. खान का कहना है कि LIN एक मशीन की तरह तैयार किए गए तय प्रारूप वाला आदेश है, जिसमें IFA को ‘Act XII of 2025’ बताया गया है और उनके ओसीआई दर्जे को नजरअंदाज किया गया है.
उन्होंने कहा है कि किसी निवासी को अपना पक्ष रखने का मौका दिए बिना देश से बाहर निकालना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन है और समानुपातिकता की कसौटी पर भी खरा नहीं उतरता.
इमरान खान ने अपनी याचिका में कहा है कि LIN असाधारण जल्दबाजी में, 4-5 दिनों के भीतर जारी कर दिया गया. यह सब एक राजनीतिक नेता की ओर से एक्स पर की गई सार्वजनिक सोशल मीडिया मांगों के बाद हुआ. खान ने आरोप लगाया कि उस नेता ने बिना जानकारी छिपाए LIN और पासपोर्ट की जानकारी भी लीक कर दी.
खान ने कानून के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए कहा है कि इस मामले में राजनीतिक दबाव और पासपोर्ट की जानकारी लीक होने जैसे मामले सामने आए हैं. उन्होंने LIN को रद्द करने के लिए रिट ऑफ सर्टियोरारी की मांग की है. यह एक कानूनी तरीका है, जिसके जरिए ऊंची अदालतें निचली अदालतों या प्रशासनिक संस्थाओं के फैसलों की समीक्षा कर सकती हैं. उन्होंने अपने देश से बाहर भेजे जाने पर अंतरिम रोक लगाने की भी मांग की है.
पहले के ऐसे ही मामले
भारतीय अदालतें पहले भी ऐसे ही मामलों पर फैसला दे चुकी हैं. कोलकाता की जादवपुर यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री कर रहे पोलैंड के छात्र कामिल सिएड्ज़िंस्की को 2020 मेंएफआरआरओ ने भारत छोड़ने का नोटिस दिया था. सरकार का आरोप था कि उन्होंने शहर में CAA विरोधी राजनीतिक रैली में खड़े होकर और फोटो खिंचवाकर “सरकार विरोधी गतिविधियों” में हिस्सा लिया था.
कलकत्ता हाईकोर्ट ने LIN को रद्द कर दिया था. अदालत ने कहा था कि किसी राजनीतिक रैली में शांतिपूर्वक मौजूद रहना या बिना सक्रिय भूमिका के उसमें शामिल होना किसी विदेशी को देश से बाहर भेजने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है. अदालत ने कहा था कि जब तक राज्य सरकार ऐसी प्रतिकूल सुरक्षा रिपोर्ट पेश नहीं करती, जिससे यह साबित हो कि संबंधित व्यक्ति सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है, तब तक LIN के जरिए इस तरह किसी को देश से बाहर भेजना मनमाना है और निष्पक्ष प्रक्रिया के अधिकार का उल्लंघन है.
मार्च 2025 में स्वीडन में रहने वाले अकादमिकअशोक स्वैन का ओसीआई कार्ड कथित तौर पर “राष्ट्र विरोधी” टिप्पणियां करने और ऑनलाइन सरकार की नीतियों की आलोचना करने के आरोप में रद्द कर दिया गया था. दिल्ली हाईकोर्ट ने इस रद्द करने के आदेश को खत्म कर दिया. अदालत ने कहा कि सरकार अपने फैसले को सही ठहराने के लिए खास और पर्याप्त कारण या ठोस सबूत देने में नाकाम रही.
हालांकि, जब अमेरिकी साइबर सुरक्षा पत्रकार राफेल सैटर ने अपना OCI कार्ड रद्द किए जाने को चुनौती दी, तो हाईकोर्ट ने उन्हें राहत नहीं दी. सरकार ने उनके OCI कार्ड को रद्द करने का आधार यह बताया था कि उन्होंने “भारतीय संस्थानों के खिलाफ जानबूझकर नकारात्मक राय बनाई”. गृह मंत्रालय ने दलील दी कि OCI कार्डधारक विदेशी नागरिक होते हैं और संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत उन्हें राजनीतिक अधिकार नहीं मिलते.
बाद की सुनवाई के दौरान जस्टिस सचिन दत्ता के सामने दिल्ली हाईकोर्ट ने MHA के मामले को संभालने के तरीके पर सवाल उठाए. जब Satter की ओर से पेश वरिष्ठ वकील करुणा नंदी ने कहा कि समीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं थी और बताया कि राज्य ने एक साल पहले ही रिवीजन याचिका पर फैसला कर दिया था, लेकिन इसकी जानकारी सैटर को नहीं दी थी, तो जज ने सरकार की कागजी कार्रवाई पर सवाल उठाए और “पत्रकारिता गतिविधि” के दावों को अस्पष्ट बताया.
मामला अभी अदालत में विचाराधीन है.
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