14 अगस्त को कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के सबसे कम उम्र के अश्वेत प्रोफेसर जेसन अर्डे लंदन स्थित अपने घर में मृत पाए गए. इसके कुछ दिन पहले ही उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया था. उनके परिवार के बयान में साफ कहा गया कि उन्हें तीन साल से लगातार परेशान किया जा रहा था. बाद में मीडिया की जांच-पड़ताल और भी बढ़ गई, जिसमें सिर्फ उनकी पढ़ाई और रिसर्च पर ही नहीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी की कहानी पर भी सवाल उठाए गए.
कई अखबारों ने अर्डे की 2015 की पीएचडी थीसिस के दर्जनों हिस्से प्रकाशित किए और दावा किया कि ये हिस्से पहले लिखी गई एक दूसरी थीसिस से काफी मिलते-जुलते हैं. लेकिन उन पर लगाया गया नकल यानी प्लेजरिज्म का आरोप सही साबित नहीं हुआ और समीक्षा के बाद Liverpool John Moores University ने उनकी डिग्री को बरकरार रखा. कैंब्रिज ने शुरुआत में इस जांच-पड़ताल को बदनाम करने की कोशिश यानी एक साजिश बताया, लेकिन बाद में उसने खुद जांच शुरू कर दी. इसी दौरान अर्डे ने इस्तीफा दे दिया. यूनिवर्सिटी के ऑटिज्म रिसर्च डायरेक्टर साइमन बैरन-कोहेन ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने अर्डे की मौत से कुछ घंटे पहले उनसे बात की थी. अर्डे ने उन्हें बताया था कि लगातार हो रही ऐसी जांच-पड़ताल के दबाव में वह आगे काम नहीं कर पा रहे थे. इस जांच-पड़ताल में उनकी जिंदगी की लगभग हर बात को गलत साबित किया जा रहा था.
आखिर में इस मामले का शांत और सही तरीके से जो भी निष्कर्ष निकले, अर्डे का ऊपर उठना और फिर गिरना भारतीय अकादमिक जगत के लिए तुरंत पहचाना जा सकने वाला होना चाहिए. यह उसी पैटर्न का हिस्सा है, जो दलितों के करियर में बार-बार और बेहद दुखद तरीके से दिखाई देता है.
भारतीय अकादमिक जगत में निशाना बनने की जानी-पहचानी कहानी
यह कहानी भारत के संदर्भ में काफी जानी-पहचानी है. ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय का कोई विद्वान ऐसे पद पर नियुक्त होता है, जिस पर उसके समुदाय का शायद ही कभी कोई व्यक्ति रहा हो. इस नियुक्ति को सार्वजनिक रूप से—कभी-कभी संस्थान खुद भी, तरक्की और बदलाव की निशानी के रूप में पेश करता है और यह बताने में काफी कुछ लिखा जाता है कि समानता हासिल कर ली गई है. दलित राष्ट्रपति, दलित मुख्य न्यायाधीश, दलित मुख्यमंत्री—देखिए, समानता हासिल हो गई है. कहानी कुछ ऐसी ही बनाई जाती है.
कुछ समय तक वह विद्वान एक प्रतीक बना रहता है. उसके बारे में लिखा जाता है, उसका सम्मान किया जाता है और उसे इस बात के सबूत के रूप में पेश किया जाता है कि व्यवस्था काम कर रही है, इसलिए अब और कुछ बदलने की ज़रूरत नहीं है. फिर जांच-पड़ताल शुरू होती है, अगर नियुक्ति से पहले ही शुरू न हुई हो, लेकिन यह उस सामान्य तरह की जांच नहीं होती, जिसका सामना हर पेशेवर को अपने काम को लेकर करना पड़ता है. यह उसकी योग्यता, उसकी डिग्री, उसकी नियुक्ति के तरीके, उसके परिवार के इतिहास और यहां तक कि उसके वहां रहने के अधिकार पर सवाल उठाने वाली जांच होती है. इसके बाद अक्सर गुमनाम शिकायतें सामने आती हैं.
जिन संस्थानों ने नियुक्ति का श्रेय लेने में जल्दी दिखाई थी, वे सवाल उठने के बाद अचानक उसका बचाव करने में धीमे पड़ जाते हैं या बचाव करना ही नहीं चाहते. भारत में इस तरह के मामलों का अपना अच्छी तरह दर्ज किया हुआ इतिहास है और इसकी शुरुआत अर्डे से नहीं हुई थी.
2018 में आईआईटी कानपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नए-नए नियुक्त हुए सुब्रह्मण्यम सडेरला जांच-पड़ताल के घेरे में आ गए, जब चार वरिष्ठ शिक्षकों ने उनकी नियुक्ति पर आपत्ति जताई. इसके बाद एक गुमनाम ईमेल वरिष्ठ शिक्षकों और संस्थान के निदेशक के पास पहुंचा, जिसमें सडेरला की पीएचडी थीसिस में नकल यानी प्लेजरिज्म का आरोप लगाया गया था. सडेरला ने यह पीएचडी तीन साल पहले इसी संस्थान से पूरी की थी. जिन साथियों ने पहले कभी उनसे इस बारे में बात नहीं की थी, वे अचानक यह चर्चा करने लगे कि क्या उनकी नियुक्ति गलती थी—क्या उन्हें आरक्षण का फायदा मिला था और क्या उनमें यह पद संभालने की योग्यता नहीं थी.
एक आंतरिक जांच में चारों वरिष्ठ प्रोफेसरों को जाति के आधार पर उत्पीड़न और एससी/एसटी प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज़ एक्स के उल्लंघन का दोषी पाया गया. आईआईटी कानपुर के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने सडेरला की डिग्री रद्द करने से इनकार कर दिया और चारों प्रोफेसरों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की. लेकिन इस कार्रवाई पर फैसला लेने के लिए होने वाली बोर्ड की बैठक से एक दिन पहले यह रिपोर्ट लीक हो गई. रातोंरात 70 शिक्षकों ने बोर्ड के अध्यक्ष को पत्र लिखकर कार्रवाई न करने और इसके बजाय आपसी समझौते की कोशिश करने की मांग की.
केरल यूनिवर्सिटी के दलित रिसर्च स्कॉलर विपिन विजयन को अब भी अपनी पीएचडी का इंतज़ार है. उनके विभाग की प्रमुख सीएन विजयकुमारी ने उनकी अंतिम थीसिस को मंजूरी देने से इनकार कर दिया था. उन्होंने साफ तौर पर जाति के आधार पर सवाल उठाते हुए पूछा कि उन्हें संस्कृत पढ़ने का अधिकार ही कैसे है, जबकि इस स्कॉलर ने सभी ज़रूरी औपचारिक शर्तें पूरी की थीं. तेलंगाना में समाजशास्त्र की दलित प्रोफेसर सुजाता सुरेपल्ली ने आरोप लगाया है कि उन्हें सार्वजनिक रूप से “अर्बन नक्सल” कहे जाने के बाद उनकी निगरानी शुरू हो गई, प्रमोशन रोक दिया गया और पेशेवर तौर पर उनका बहिष्कार किया गया. पंजाब में अर्थशास्त्र विभाग के दलित असिस्टेंट प्रोफेसर हरप्रीत सिंह को जातिवादी टिप्पणियों का सामना करना पड़ा और उन्हें प्रमोशन नहीं दिया गया. इसके बाद आठ दिन के धरने के बाद मामले की जांच शुरू की गई.
ऐसे मामले सिर्फ बड़ी समस्या का एक छोटा हिस्सा हैं. रोहित वेमुला के मामले को कार्यकर्ताओं ने “संस्थागत हत्या” बताया था. इस शब्द को लेकर भले ही मतभेद हों, लेकिन यह उसी मूल बात की ओर इशारा करता है जो अब अर्डे का परिवार कह रहा है: किसी व्यक्ति की छवि और कहानी को इस तरह पेश करके उसका पेशेवर जीवन बर्बाद करना भी उतना ही जानलेवा हो सकता है, जितना कोई एक सीधा हमला.
किसके प्लेजरिज्म पर बड़ा विवाद और किसके प्लेजरिज्म को राष्ट्रपति पद
बीआर अंबेडकर ने कहा था कि भारत में जाति सिर्फ काम का बंटवारा नहीं है, बल्कि काम करने वाले लोगों को उनकी सामाजिक अहमियत के अलग-अलग स्तरों में बांटने की व्यवस्था है. यह मानकर चलने की व्यवस्था कि कौन कितना योग्य है, वह सबसे साफ इस बात में दिखती है कि किससे अपनी कुर्सी के लायक होने का सबूत मांगा जाता है और किसे बिना सवाल किए योग्य मान लिया जाता है.
अर्डे के कैंब्रिज और सडेरला के आईआईटी कानपुर मामले को जो चीज जोड़ती है, वह है शक करने में असमानता. किसी वंचित समुदाय के विद्वान के खिलाफ गुमनाम आरोप लगते ही बात जल्दी से उसके पूरे जीवन की जांच-पड़ताल तक पहुंच जाती है. वहीं, प्रभावशाली या ऊंची सामाजिक स्थिति वाले समूह के साथियों के बीच ऐसी ही गड़बड़ियां—और ऐसी घटनाएं कम नहीं हैं—अक्सर चुप्पी की दीवार से टकराकर रह जाती हैं. भारतीय विश्वविद्यालयों में सवर्ण विद्वानों से जुड़े प्लेजरिज्म और डिग्री को लेकर विवाद के अपने मामले रहे हैं, लेकिन उनमें जांच-पड़ताल का स्तर बहुत कम रहा और उनके नतीजे भी बहुत कम गंभीर रहे.
यह कोई नया पैटर्न नहीं है. 1929 में मेरठ कॉलेज में दर्शनशास्त्र के युवा लेक्चरर रहे जदुनाथ सिन्हा ने अपने ही परीक्षक सर्वपल्ली राधाकृष्णन पर अपनी डॉक्टरेट थीसिस से बिना नाम दिए बड़ी मात्रा में सामग्री उठाने का आरोप लगाया था. सिन्हा ने मॉर्डन रिव्यू में ऐसे दर्जनों हिस्से दिखाए जो दोनों जगह एक जैसे थे और बाद में कॉपीराइट के उल्लंघन का आरोप लगाकर मुकदमा भी किया. राधाकृष्णन ने भी मानहानि का मुकदमा कर दिया. राजनीतिक दबाव के कारण संभवतः मामला अदालत के बाहर ही सुलझा लिया गया. इस पर कभी कोई फैसला नहीं आया और धीरे-धीरे यह मामला लोगों की याद से गायब हो गया. राधाकृष्णन को इसकी कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ी. वह आगे चलकर भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति बने. हर साल शिक्षक दिवस पर उन्हें याद किया जाता है, जबकि सिन्हा का नाम ज्यादातर सिर्फ फुटनोट्स में रह गया.
सडेरला के मामले में जो असमानता दिखाई दी—एक कम जाने-पहचाने जूनियर अकादमिक की तरफ से किसी वरिष्ठ व्यक्ति के खिलाफ सबूतों के साथ की गई शिकायत, जिसे उसी संस्थान ने दबा दिया और खत्म कर दिया जहां वह वरिष्ठ व्यक्ति काम करता था—भारतीय अकादमिक जगत में इसका इतिहास करीब एक सदी पुराना है.
ऐसे और भी कई मामले हैं. पांडिचेरी यूनिवर्सिटी की कुलपति चंद्रा कृष्णमूर्ति के एक प्रकाशित पेपर को औपचारिक रूप से वापस लेना पड़ा था, क्योंकि नौ महीने की जांच में पाया गया कि उसके करीब तीन-चौथाई हिस्से में प्लेजरिज्म था. उन्हें प्रशासनिक भाषा में “कंपलसरी वेट” पर रखा गया और चुपचाप उनकी जगह किसी और को नियुक्त कर दिया गया. लेकिन मीडिया में ऐसा कोई बड़ा मामला नहीं चला और न ही यूनिवर्सिटी के बाहर उनकी पूरी जिंदगी को लेकर कोई सवाल उठाया गया. उनके उत्तराधिकारी गुरमीत सिंह अपने दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहने के समय की एक प्लेजरिज्म शिकायत को लेकर इसी कुलपति पद पर आए थे. यूनिवर्सिटी ने गोपनीयता का हवाला देकर जांच के नतीजे को सार्वजनिक करने से मना कर दिया और इसके बावजूद उन्हें विजिलेंस क्लियरेंस मिल गई. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी के कुलपति विनय कुमार पाठक को भी उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने तीन साल के लिए दोबारा नियुक्त किया, जबकि आरटीआई के जरिए सामने आया था कि उनके सीवी में शामिल एक पेपर विदेशी प्रकाशनों से काफी हद तक उठाया गया था और कुछ हिस्सों को “100 प्रतिशत प्लेजरिज्म वाली कॉपी” तक बताया गया था.
इनमें से किसी भी मामले में गुमनाम ईमेल का अभियान, अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुर्खियां या इस्तीफा नहीं हुआ. इसके बावजूद इन लोगों को प्रमोशन मिले और लंबे समय तक बड़े पदों पर रहने का मौका मिला. इसके बिल्कुल उलट, एक दलित विद्वान के पहले फैकल्टी पद पर तीन साल पूरे होने के बाद सिर्फ एक गुमनाम शिकायत के आधार पर उसकी पूरी पीएचडी की दोबारा जांच शुरू कर दी गई. बाद में पता चला कि यह शिकायत उन्हीं प्रोफेसरों में से एक ने की थी, जिन्हें पहले उसे परेशान करने का दोषी पाया जा चुका था.
भारतीय संस्थानों को क्या करना चाहिए
इनमें से कोई भी बात जवाबदेही के खिलाफ नहीं है, जहां भी प्लेजरिज्म यानी नकल मिले, उसकी जांच होनी चाहिए और सही कानूनी प्रक्रिया के जरिए हर किसी को, जिसमें आरोपी भी शामिल है, मीडिया ट्रायल से बचाया जाना चाहिए. लेकिन भारतीय विश्वविद्यालयों, यूजीसी और फंडिंग देने वाली संस्थाओं को सिर्फ यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि उनकी गलत कामों की जांच करने वाली प्रक्रिया कागज पर निष्पक्ष है या नहीं. उन्हें इससे ज्यादा मुश्किल सवाल पूछना चाहिए: क्या इन प्रक्रियाओं और उनके आसपास की अनौपचारिक संस्कृति में, कुर्सी पर बैठा व्यक्ति चाहे कोई भी हो और उसकी जाति चाहे जो भी हो, उस पर उतने ही स्तर का शक किया जाता है?
संभावना है कि अर्डे की मौत के बाद ब्रिटेन में यह सवाल उठेगा कि जब शुरुआती तारीफ और चर्चा का दौर खत्म हो जाता है, तब विश्वविद्यालय अपने विद्वानों को जरूरत से ज्यादा सार्वजनिक जांच-पड़ताल से कैसे बचाते हैं. भारतीय अकादमिक जगत को अपने अर्डे वाले पल का इंतजार करने की जरूरत नहीं है. यहां ऐसे कई मामले पहले ही हो चुके हैं—सुब्रह्मण्यम सडेरला, विपिन विजयन, सुजाता सुरेपल्ली, हरप्रीत सिंह और कई दूसरे लोग, जिनके नाम कभी राष्ट्रीय खबरों तक पहुंचे ही नहीं. सवाल यह है कि क्या भारतीय अकादमिक जगत इस पैटर्न को पहचानने के लिए तैयार है, इससे पहले कि कोई और मामला जानलेवा बन जाए.
प्रदीप सिंह अत्री, यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ (यूके) के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में स्ट्रेटेजी और ऑर्गनाइज़ेशन में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. उनका एक्स हैंडल @pardeep_s_attri है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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