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Tuesday, 25 August, 2026
होमफीचरईरान की महिला कबड्डी टीम सोनीपत में कर रही ट्रेनिंग, 2026 एशियन गेम्स के लिए फिर से तैयारी में जुटी

ईरान की महिला कबड्डी टीम सोनीपत में कर रही ट्रेनिंग, 2026 एशियन गेम्स के लिए फिर से तैयारी में जुटी

जब फरवरी में 2026 एशियन गेम्स की तैयारी शुरू हुई थी, तब ईरान की महिला टीम का लक्ष्य साफ था. फिर युद्ध ने सब कुछ बदल दिया.

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सोनीपत, हरियाणा: ज़हरा अस्तेरेकी ने अपने परिवार से ज्यादा समय अपनी कबड्डी टीम की साथियों के साथ बिताया है.

28 साल की ईरानी खिलाड़ी पिछले 12 साल से नेशनल कैंम्प्स की ज़िंदगी जी रही हैं—उन्हीं महिला खिलाड़ियों के साथ ट्रेनिंग, सफर और मुकाबले करती रही हैं. टीम की ज्यादातर खिलाड़ी 24 साल से कम उम्र की हैं और ज़हरा सबसे अनुभवी खिलाड़ियों में से एक हैं. इसलिए वह इस टीम की युवा खिलाड़ियों के लिए बड़ी बहन और मार्गदर्शक बन गई हैं, जो अपने पहले बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में हिस्सा लेने जा रही हैं.

2026 एशियन गेम्स के लिए इस टीम की तैयारी बिल्कुल सामान्य नहीं रही है. ये खेल अगले महीने जापान के नागोया और आइची में होने वाले हैं.

इस साल की शुरुआत में जब युद्ध ने ईरान को प्रभावित किया, तो खिलाड़ियों की कई हफ्तों की ट्रेनिंग छूट गई. उनका कैंप बर्बाद हो गया, टीम को अलग-अलग शहरों के बीच जाना पड़ा और जापान के लिए तैयारी रोकनी पड़ी. टीम दोबारा ट्रेनिंग शुरू कर पाती, उससे पहले कुछ खिलाड़ियों को ईरान के सुरक्षित इलाकों में जाना पड़ा.

युवा टीम को लेकर उत्साह है, लेकिन दबाव भी है. ईरान की महिला राष्ट्रीय कबड्डी टीम उस टीम को फिर से तैयार करने की कोशिश कर रही है, जिसने 2018 में जकार्ता में ऐतिहासिक गोल्ड मेडल जीता था.

एशियन गेम्स में मेडल जीतने की तैयारी के लिए ही टीम 13 अगस्त को हरियाणा के सोनीपत स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) कैंपस पहुंची थी. यहां बिताए गए पिछले एक हफ्ते में टीम ने दिन में दो बार ट्रेनिंग की और भारतीय महिला कबड्डी टीम के साथ मुकाबले खेले. इसके अलावा उसने पूरे भारत से आई उभरती हुई खिलाड़ियों के साथ भी मैच खेले, जिनमें गांधीनगर, धर्मशाला और सोनीपत की खिलाड़ी शामिल थीं.

ईरान की महिला कबड्डी टीम ने SAI सोनीपत के खिलाड़ियों के साथ-साथ गांधीनगर और धर्मशाला से कैंप के लिए आई खिलाड़ियों के खिलाफ भी मुकाबले खेले | स्पेशल अरेंजमेंट
ईरान की महिला कबड्डी टीम ने SAI सोनीपत के खिलाड़ियों के साथ-साथ गांधीनगर और धर्मशाला से कैंप के लिए आई खिलाड़ियों के खिलाफ भी मुकाबले खेले | स्पेशल अरेंजमेंट

सोनीपत में बिताए उस एक हफ्ते के दौरान युद्ध कुछ समय के लिए पीछे चला गया. मैच खेलने थे, तकनीक सीखनी थी और विरोधी खिलाड़ियों को समझना था, लेकिन युद्ध पूरी तरह उनके दिमाग से नहीं निकला था.

ज़हरा के लिए एशियन गेम्स में हिस्सा लेना उस हर चीज का बोझ लेकर चलना है, जिससे टीम गुजरी है. उन्होंने कहा, “जापान एशियन गेम्स हम सभी के लिए बहुत मायने रखते हैं. हमने जो कुछ झेला है, इस पूरे सदमे के बाद हमें जीत की ज़रूरत है. हमारे देश को जीत की ज़रूरत है.”

युद्ध के दौरान कबड्डी नहीं

जब फरवरी में एशियन गेम्स की तैयारी शुरू हुई, तो ईरान की महिला टीम का एक साफ लक्ष्य था. फिर युद्ध ने सब कुछ बदल दिया.

टीम की सबसे कम उम्र की खिलाड़ियों में से एक, 20 साल की सानी ने अपनी परेशानी याद करते हुए कहा, करीब 40 दिनों तक खिलाड़ी अपने रेगुलर कैंप में ट्रेनिंग नहीं कर सकीं.

उन्होंने फारसी में कहा, “युद्ध में हमारा कैंप तबाह हो गया, जिसका मतलब था कि हमारे पास ट्रेनिंग करने के लिए कोई जगह नहीं थी. हम बहुत परेशान थे.” उनकी टीम की साथी ज़हरा ने उनके जवाब का अंग्रेज़ी में अनुवाद करने में मदद की.

ट्रेनिंग का टाइम खोने के अलावा, खिलाड़ी अपने परिवारों की सुरक्षा को लेकर चिंतित थीं और उन्हें यह भी पता नहीं था कि उनकी ज़िंदगी में सामान्य स्थिति कभी वापस आएगी या नहीं.

ज़हरा के लिए राष्ट्रीय टीम लंबे समय से उनके दूसरे परिवार जैसी रही है. उन्होंने 12 साल अंतरराष्ट्रीय कैंपों में बिताए हैं और अपने परिवार से ज्यादा बार अपनी टीम की साथियों को देखा है.

जब राष्ट्रीय टीम ईरान के सुरक्षित उत्तरी हिस्सों में फिर से इकट्ठा हुई, तो इस रिश्ते ने खिलाड़ियों को एक साथ बनाए रखा. ज़हरा ने कहा कि एक बार राष्ट्रीय टीम के लिए चुने जाने के बाद, कबड्डी के अलावा बाकी सब पीछे छूट जाता है.

उन्होंने कहा, “हमने परिवार के बारे में नहीं सोचा. हमने घर के बारे में नहीं सोचा. हमने अपनी नौकरी के बारे में नहीं सोचा. कबड्डी हमारा प्यार है. यह हमारी सबसे पसंदीदा चीज़ है.”

उनके कोच, गुलामरेज़ा माज़ंदरानी ने फरवरी के आखिर में युद्ध शुरू होने से कुछ महीने पहले ही महिला टीम की जिम्मेदारी संभाली थी. उनके पास अंतरराष्ट्रीय कोचिंग का 20 साल से ज्यादा का अनुभव है. उन्होंने ईरान की पुरुष राष्ट्रीय टीम और भारत की प्रो कबड्डी लीग के साथ भी काम किया है. उन्हें उस महिला टीम को फिर से तैयार करने के लिए लाया गया था, जिसका प्रदर्शन 2018 के जकार्ता स्वर्ण पदक के बाद कमजोर पड़ गया था. तब से मौजूदा टीम में काफी बदलाव हो चुका है.

ईरानी महिला कबड्डी कोच गुलामरेज़ा माज़ंदरानी सोनीपत में अपने ट्रेनिंग कैंप के दौरान अपनी टीम के साथ | स्पेशल अरेंजमेंट
ईरानी महिला कबड्डी कोच गुलामरेज़ा माज़ंदरानी सोनीपत में अपने ट्रेनिंग कैंप के दौरान अपनी टीम के साथ | स्पेशल अरेंजमेंट

माज़ंदरानी ने कहा, “मैं 23 साल से ज्यादा समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोचिंग कर रहा हूं, लेकिन महिला टीम के साथ यह मेरा पहला अनुभव है.” लेकिन उनके कार्यकाल को मुश्किल से एक महीना ही हुआ था कि युद्ध शुरू हो गया.

उन्होंने कहा, “युद्ध की वजह से हमने करीब तीन महीने गंवा दिए.” खिलाड़ियों के फिर से इकट्ठा होने के बाद, माज़ंदरानी ने कहा कि उन्होंने हालात के बावजूद गेम्स पर ध्यान देने का फैसला किया.

उन्होंने कहा, “यह आसान नहीं था. हमारा देश लड़ रहा है, लोग मर रहे हैं, कई लोग घायल हैं, घरों को नुकसान पहुंचा है. किसी के लिए भी यह आसान नहीं था.”

लेकिन ट्रेनिंग उन्हें केवल एक सीमा तक ही तैयार कर सकती थी. उन्हें अपनी फिटनेस परखने, अपनी गलतियों को पहचानने और उन्हें सुधारने के लिए प्रतिस्पर्धी मैचों की जरूरत थी.

माज़ंदरानी ने कहा, “अनुभव सिखाया नहीं जा सकता. इसके लिए आपको मैत्री मैच खेलने होते हैं.”

और फिर यहीं से सोनीपत की शुरुआत हुई.

सोनीपत में दूसरा मौका

सोनीपत में भारतीय महिला खिलाड़ियों के खिलाफ खेला गया एक हफ्ते का समय, खोए हुए समय की भरपाई करने के बारे में था. वहीं, भारतीय खिलाड़ियों के लिए यह एशियन गेम्स की पूर्व चैंपियन टीम के खिलाफ खुद को परखने का मौका था.

SAI की कार्यकारी निदेशक रितु पथिक ने कहा कि यह सहयोग तब हुआ जब ईरानी टीम ने एमेच्योर कबड्डी फेडरेशन ऑफ इंडिया (AKFI) से संपर्क किया और फिर AKFI ने जरूरी अनुमति ली.

पथिक ने कहा, “हमें लगा कि युद्ध की वजह से उन्हें नुकसान हुआ है, इसलिए हम उन्हें सहयोग देना चाहते थे और, निश्चित रूप से, उनकी टीम बहुत अच्छी है, इसलिए हमारी लड़कियों के लिए भी यह अच्छा अनुभव था.”

कई भारतीय खिलाड़ियों के लिए किसी विदेशी राष्ट्रीय टीम के खिलाफ खेलने का यह पहला मौका था. पथिक ने कहा, “वे खुश थीं क्योंकि उनमें से कई पहली बार विदेशी खिलाड़ियों के खिलाफ खेल रही थीं और वह भी एशियन गेम्स की स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम के खिलाफ.”

स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रितु पथिक सोनीपत कैंपस में | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रितु पथिक सोनीपत कैंपस में | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

उन्होंने कहा कि इस कैंप का फायदा केवल मैचों तक सीमित नहीं था. अनजान विरोधियों के खिलाफ खेलने से युवा भारतीय खिलाड़ियों और कोचों को खेल के अलग-अलग तरीकों को देखने का मौका मिला. वहीं, ईरानी खिलाड़ियों को जापान जाने से पहले यह समझने का मौका मिला कि वे इस समय कहां खड़ी हैं.

पथिक ने कहा, “खेल टीमवर्क और भाईचारे के बारे में है. जब अंतरराष्ट्रीय या पूरे भारत से टीमें हमारे यहां आती हैं, तो खिलाड़ियों के लिए नए लोगों के साथ बातचीत करना, उनके साथ खेलना और अलग स्तर की टीमों के खिलाफ अभ्यास करना हमेशा अच्छा होता है.”

मैत्री मैचों ने ईरानी खिलाड़ियों को वह चीज दी, जिसकी उन्हें कमी महसूस हो रही थी: अलग शैली वाली टीम के खिलाफ खेलना. उन्होंने उस हफ्ते करीब आठ या नौ मैच खेले, जिससे हर खिलाड़ी को मैट पर खेलने का पर्याप्त समय मिला.

माज़ंदरानी ने कहा, “हमें ऐसा कुछ करने की ज़रूरत थी और इससे हमें मदद मिली. हमें समझ आया कि हम कहां कमजोर हैं और हमें क्या सुधारना है.”

ज़हरा ने उन खिलाड़ियों के खिलाफ खेलने में भी फायदा देखा, जिनसे वे अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में दोबारा मिल सकती हैं.

उन्होंने कहा, “SAI कैंप में कुछ खिलाड़ी ऐसी भी हैं जो एशियन गेम्स में जाने वाली टीमों का हिस्सा हैं. ईरान और भारत में डिफेंडरों की लाइनअप अलग है. जब हम एक-दूसरे के खिलाफ खेलते हैं तो हमें इसका फर्क महसूस होता है. यह हमारे लिए बहुत अच्छा है.”

ईरानी कबड्डी खिलाड़ी ज़हरा एस्टेरेकी टीम के ट्रेनिंग कैंप के दौरान SAI सोनीपत के खिलाड़ियों के साथ | स्पेशल अरेंजमेंट
ईरानी कबड्डी खिलाड़ी ज़हरा एस्टेरेकी टीम के ट्रेनिंग कैंप के दौरान SAI सोनीपत के खिलाड़ियों के साथ | स्पेशल अरेंजमेंट

उन्होंने कहा कि ईरान और भारत दोनों ही ताकत पर काफी निर्भर हैं, लेकिन उनके खेलने का तरीका एक जैसा नहीं है.

ज़हरा ने कहा, “भारत ज्यादा ताकतवर है. ईरान में हम गति का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. यह एक-दूसरे के लिए अच्छी चुनौती है.”

खेल की शैली में यही अंतर माज़ंदरानी अपने खिलाड़ियों को दिखाना चाहते थे. उनके मुताबिक, भारत अब भी वह सबसे मजबूत टीम है, जिससे वे सीख सकते हैं.

माज़ंदरानी ने कहा, “भारतीय कबड्डी की शैली ईरानी कबड्डी से अलग है. भारत एशिया और दुनिया की सबसे अच्छी टीम है, इसलिए हमारे खिलाड़ी उनकी शैली और कौशल से सीख सकते हैं.”

इन मैचों से रणनीति के अलावा भी कुछ मिला. युवा भारतीय और ईरानी खिलाड़ी, जिन्होंने पूरा हफ्ता एक-दूसरे के खिलाफ मुकाबले खेले, मैचों के बाद एक-दूसरे से बात करने लगीं—एक-दूसरे की ट्रेनिंग, ज़िंदगी और देशों के बारे में पूछने लगीं.

माज़ंदरानी ने कहा, “मुकाबला और कबड्डी जिंदगी का एक हिस्सा हैं, लेकिन पूरी जिंदगी नहीं. वे एक-दूसरे से लड़ते हैं और उसके बाद दोस्त बन जाते हैं. यह ज्यादा महत्वपूर्ण है.”

एक मैच देखने के लिए करीब 300 से 400 लोगों की भीड़ जुटी. कोच के लिए यह भी उपयोगी तैयारी थी.

उन्होंने कहा, “थोड़ा दबाव था, लेकिन हमारे खिलाड़ियों ने समझा कि वे फिर भी खेल सकती हैं. लोगों को उनके लिए चीयर करते देखना टीम के लिए बहुत प्रेरणा देने वाला था.”

अपनी जिम्मेदारी संभालने के पांच महीने बाद, माज़ंदरानी जानते हैं कि टीम को फिर से तैयार करने में समय लगेगा. लेकिन उन्होंने कहा कि खिलाड़ी फिर से टीम पर विश्वास करने लगी हैं.

ईरान ने भारतीय खिलाड़ियों को क्या सिखाया

17 साल की दीक्षा, 22 साल की भातेरी और 21 साल की मोनिका उन भारतीय कबड्डी खिलाड़ियों में शामिल थीं, जिन्होंने ईरानी टीम के खिलाफ खेला. इन मैचों से तीनों खिलाड़ियों ने अलग-अलग चीज़ें सीखीं.

मोनिका के लिए यह गति के बारे में था. उन्होंने कहा, “हमने उनसे सबसे महत्वपूर्ण चीज गति सीखी.” वह खास तौर पर इस बात से प्रभावित थीं कि ईरानी डिफेंडर वापस जा रही रेडर का कितनी तेजी से पीछा करती थीं.

सोनीपत में ईरान के खिलाफ खेलने वाली कबड्डी खिलाड़ी दीक्षा, भतेरी और मोनिका स्पीड, डिफेंस और टेक्निक की सीख लेकर आईं | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
सोनीपत में ईरान के खिलाफ खेलने वाली कबड्डी खिलाड़ी दीक्षा, भतेरी और मोनिका स्पीड, डिफेंस और टेक्निक की सीख लेकर आईं | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

भातेरी ने देखा कि डिफेंडर किस तरह मिलकर काम करती थीं. उन्होंने कहा, “जब हम टैकल करते हैं, तो अकेले करते हैं. लेकिन जब वे जाती हैं, तो साथ जाती हैं. पूरे खेल के दौरान जिस तरह वे एक-दूसरे का साथ दे रही थीं, वह बहुत अच्छा था.”

उनकी रेडिंग ने भी भातेरी का ध्यान खींचा. अगर कोई ईरानी डिफेंडर रेडर को पकड़ लेती थी, तो दूसरी डिफेंडर तुरंत उसे कवर करने के लिए आगे आ जाती थी. उन्होंने कहा, “उनका बोनस भी बहुत अच्छा था.”

वहीं, दीक्षा ईरानी खिलाड़ियों की गतिविधियों की बारीकियों पर ध्यान दे रही थीं. उन्होंने देखा कि जब वे बोनस लेने की कोशिश करती थीं, तो कई बार लाइन तक सीधे पहुंचने के बजाय अपना पैर मोड़ लेती थीं.

उन्होंने कहा, “उनका पैर खिसकाने का तरीका और उनकी पहुंच ऐसी चीज थी, जिसे मैं भी अपने खेल में आजमाना चाहती थी.”

इसीलिए दूसरे देशों की टीमों के खिलाफ खेलना महत्वपूर्ण है. इससे खिलाड़ियों को ऐसी तकनीक और खेलने की शैलियां देखने को मिलती हैं, जिनका सामना उन्हें आमतौर पर नहीं करना पड़ता.

भारतीय खिलाड़ियों ने ईरानी टीम के फिटनेस और खान-पान के तरीके पर भी ध्यान दिया. भातेरी ने कहा, “सभी खिलाड़ी बहुत अच्छा खाना खाती हैं. हमारा डाइट पूरी तरह अलग है. हमारी टीम में ऐसी लड़कियां हैं जो अंडे नहीं खातीं.”

इस अनुभव ने भारतीय खिलाड़ियों को नई चुनौतियों और तकनीकों के लिए तैयार किया और अब वे इससे आगे बढ़ना चाहती हैं. वे और ज्यादा अंतरराष्ट्रीय टीमों के खिलाफ खेलना चाहती हैं. चीन, ताइवान और नेपाल ऐसी टीमें हैं, जिनके खिलाफ वे खास तौर पर खेलना चाहती हैं.

एक कोच ने अपने खिलाड़ियों को अलग नज़र से देखा

ईरान का सामना करने से पहले, गायत्री अग्रवाल की खिलाड़ी ज्यादातर अंडर-18 आयु वर्ग में सबसे अच्छी खिलाड़ियों में शामिल रही थीं. फिर सोनीपत में एक के बाद एक मैच खेलते हुए, उन्होंने ऐसी तकनीकें सीखीं, जिन्हें उन्होंने पहले नहीं सीखा था.

SAI सोनीपत के कोच नवीन कुमार, ब्रह्मा शर्मा और साक्षी राठिया, SAI गांधीनगर की कोच गायत्री अग्रवाल के साथ, जिनके खिलाड़ी ईरान से मुकाबला करने के लिए सोनीपत गए थे | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
SAI सोनीपत के कोच नवीन कुमार, ब्रह्मा शर्मा और साक्षी राठिया, SAI गांधीनगर की कोच गायत्री अग्रवाल के साथ, जिनके खिलाड़ी ईरान से मुकाबला करने के लिए सोनीपत गए थे | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

SAI गांधीनगर में कबड्डी की सहायक कोच अग्रवाल दोनों टीमों को खेलते हुए देख रही थीं. उन्हें सबसे ज्यादा हैरानी इस बात से हुई कि उनकी टीम ने एक मजबूत टीम के खिलाफ कितनी जल्दी खुद को संभाला.

उन्होंने कहा, “जब मैंने अपनी टीम को खेलते हुए देखा, तो उन्होंने बिल्कुल अलग प्रदर्शन किया. मैंने कभी नहीं सोचा था कि वे इस स्तर पर खेल सकती हैं. मैं मानती हूं कि उन्होंने अपने स्तर के हिसाब से नहीं खेला, लेकिन आयु वर्ग के हिसाब से उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया. उन्होंने समझा कि वजन कैसे बढ़ाना है, मांसपेशियों का आकार कैसे बढ़ाना है और कितनी प्रैक्टिस की जरूरत है.”

अग्रवाल ने यह भी देखा कि खिलाड़ी ईरानी खिलाड़ियों को ध्यान से देख रही थीं और जो उन्होंने देखा, उसे दोहराने की कोशिश कर रही थीं. हर मैच के बाद वे एक और तकनीक सीखती हुई नजर आईं—कोई मूवमेंट, डिफेंस का जवाब या विरोधी को रोकने का कोई तरीका.

उन्होंने कहा, “उनका डिफेंस देखकर मेरी खिलाड़ी उछलने लगीं. उनके डिफेंस ने उन्हें बाहर धकेल दिया. मेरे लिए यह हैरान करने वाला था. उनकी परफॉर्मेंस शानदार थी.”

हालांकि, सबसे बड़ा सबक मानसिकता का था. अपनी नियमित प्रतियोगिताओं में अग्रवाल की खिलाड़ी सबसे अच्छी खिलाड़ियों में रहने की आदी थीं. ईरान के खिलाफ अचानक वे दूसरी तरफ खड़ी थीं.

उन्होंने कहा, “जब तक उन्होंने उन्हें नहीं देखा था, वे अपनी दुनिया की रानियां थीं. अब उन्हें समझ आ गया है कि वे उनसे इतनी आगे नहीं हैं. हमें और विकास करना होगा.”

‘मिट्टी से मैट तक’

भारतीय महिला कबड्डी टीम के कोच नवीन कुमार ने अपनी टीम की कमियों को पूरा करने के लिए नोट्स बनाए, क्योंकि उनकी टीम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने की तैयारी कर रही है.

उन्होंने कहा, “ईरानी खिलाड़ी बहुत मेहनती हैं. इसका मुख्य कारण उनकी फिटनेस है. यह हर खेल के लिए बहुत ज़रूरी है, खासकर कबड्डी के लिए.”

लेकिन उनके मुताबिक, इससे भी बड़ा फायदा भारतीय खिलाड़ियों के लिए ऐसी शैली का सामना करना था, जिसे वे घरेलू प्रतियोगिताओं में ज़रूरी नहीं कि देख पाएं. उन्होंने कहा कि इस तरह के मुकाबले खेल के बड़े विकास के लिए जरूरी हैं.

कबड्डी की शुरुआत भले ही मिट्टी पर खेले जाने वाले खेल के रूप में हुई हो, लेकिन आज इसके सबसे बड़े मुकाबले मैट पर खेले जाते हैं.

कुमार ने कहा, “कबड्डी ने मिट्टी से मैट तक का लंबा सफर तय किया है.” उन्हें उम्मीद है कि यह सफर यहीं नहीं रुकेगा और कबड्डी आखिरकार ओलंपिक का हिस्सा बनेगी.

आगे जो आने वाला है उसका बोझ

सोनीपत में ट्रेनिंग के आखिरी दिन के बाद, ईरानी खिलाड़ी एक लंबी शॉपिंग लिस्ट के साथ दिल्ली के लिए निकलीं: जूते और खेल का सामान, दवाइयां, बैंडेज टेप, परिवार और टीम की साथियों के लिए यादगार चीज़ें और इमली—वह खट्टी-मीठी इमली, जिसे ज़हरा ने भारत की अपनी पहली यात्रा से याद रखा था.

उनका पहला पड़ाव डेकाथलॉन था, जहां एक कर्मचारी ने उन्हें तुरंत पहचान लिया. वह प्रो कबड्डी लीग (PKL) को फॉलो करता है और अपने यू मुम्बा के समय से उनके कोच को जानता था. खिलाड़ी स्टोर में इधर-उधर जल्दी-जल्दी घूम रही थीं, कोई दूसरी टी-शर्ट लेने के लिए, तो कोई बैकपैक ढूंढने के लिए.

दिल्ली से निकलने वाली कार पीक आवर के ट्रैफिक में धीमी हो गई. सड़क की रोशनी ज़हरा और सानी के चेहरों पर पड़ रही थी. घर लौटने का समय करीब आ रहा था; और दोबारा जाने का समय भी, इस बार जापान के लिए.

उस एक हफ्ते ने उन्हें मैच, नई तकनीकें और कबड्डी की एक अलग शैली को समझने का मौका दिया. इसने उन्हें कुछ ऐसा भी दिया, जिसे छुआ नहीं जा सकता था — कुछ ऐसे दिन, जब सुबह उठते ही युद्ध उनका पहला ख्याल नहीं था.

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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