अमेरिका-ईरान युद्ध ने व्यापार और एनर्जी सप्लाई को बुरी तरह हिला दिया है और भारत को अपनी समुद्री निर्भरता का सामना करने पर मजबूर कर दिया है. भारत का लगभग 95 प्रतिशत व्यापार मात्रा (वॉल्यूम) के हिसाब से और लगभग 70 प्रतिशत मूल्य (वैल्यू) के हिसाब से समुद्र के रास्ते होता है.
जैसा कि उम्मीद थी, मोदी सरकार ने हाल ही में हुए वॉरशिप कमीशन और विवादित ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को निर्णायक समुद्री कार्रवाई के सबूत के तौर पर पेश किया है. फिर भी, इस दिखावे के पीछे, इसने भारत की नेवी की ज़रूरतों और उसकी प्रोक्योरमेंट पाइपलाइन के बीच एक बड़ा अंतर पैदा होने दिया है.
असलियत यह है कि हिंद महासागर और मलक्का स्ट्रेट के आसपास लगातार लड़ाई के ऑपरेशन के लिए ज़रूरी हाई-एंड प्लेटफॉर्म के ऑर्डर रुक गए हैं. अभी तीन फ्रिगेट तैयार हो रहे हैं, इसके अलावा मौजूदा ऑर्डर बुक में ऐसा कोई एयरक्राफ्ट कैरियर, डिस्ट्रॉयर, फ्रिगेट या अटैक सबमरीन नहीं है जिसके 2035 से पहले सर्विस में आने की उम्मीद हो.
पॉलिटिकल इच्छाशक्ति और फोकस की कमी
इस बुरी हालत के कई कारण हैं, जिसमें फंडिंग की कमी और लगातार ब्यूरोक्रेटिक देरी शामिल है. हालांकि, असली कारण पॉलिटिकल फोकस का कम होना है — एक ऐसी कमी जिसकी अगर लड़ाई छिड़ती है तो भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है.
यह सिविलियन लीडरशिप का काम है कि वह एक नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी बनाए जो खतरों, प्रायोरिटी और ट्रेड-ऑफ की पहचान करे. फिर आर्म्ड फोर्स इन लक्ष्यों को लागू करने के लिए फोर्स स्ट्रक्चर और क्षमताएं बनाती हैं. स्ट्रैटेजी के बिना फोर्स प्लानिंग, परिभाषा के अनुसार, एड हॉक है. असल में, डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर 2020 में कहा गया है कि प्लानिंग प्रोसेस “नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी/गाइडलाइन्स (जब भी जारी की जाएं)” से विकसित होनी चाहिए.
छह साल बाद भी, ऐसी कोई स्ट्रैटेजी दिखाई नहीं दे रही है.
खरीद में बढ़ता अंतर
2004 से 2026 के बीच भारतीय नौसेना में दो विमानवाहक पोत, सात डेस्ट्रॉयर, 15 फ्रिगेट और छह स्कॉर्पीन/कलवरी श्रेणी की पारंपरिक पनडुब्बियां शामिल की गईं, लेकिन इनमें से ज्यादातर जहाजों की खरीद का फैसला कई साल पहले लिया गया था. नौसैनिक जहाजों को डिजाइन करने, मंजूरी मिलने और बनने में 10 साल या उससे ज्यादा समय लगता है. यानी आज जो जहाज नौसेना में शामिल हो रहे हैं, वे पुराने राजनीतिक फैसलों का नतीजा हैं.
लेकिन अब आगे के फैसले नहीं लिए गए हैं. नौसेना ने तीसरे विमानवाहक पोत का कोई ऑर्डर नहीं दिया है. नए डेस्ट्रॉयर बनाने का कोई अनुबंध नहीं हुआ है. नए फ्रिगेट कार्यक्रम को मंजूरी नहीं मिली है और नई पारंपरिक अटैक पनडुब्बियों के लिए भी कोई अनुबंध नहीं हुआ है. अगर जल्द फैसला नहीं लिया गया, तो अगले 10 साल में भारत को आधुनिक युद्धपोतों की बड़ी कमी का सामना करना पड़ सकता है.
वहीं, चीन बहुत तेज़ी से अपनी नौसेना को मजबूत कर रहा है. सिर्फ 2025 में उसने एक विमानवाहक पोत, सात डेस्ट्रॉयर, चार फ्रिगेट, दो परमाणु अटैक पनडुब्बियां और तीन पारंपरिक पनडुब्बियां नौसेना में शामिल कीं. भारत को चीन जितने जहाज बनाने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन हिंद महासागर में अपनी ताकत बनाए रखने के लिए उसे लगातार नए जहाजों के ऑर्डर देने होंगे.
दूसरी तरफ, पाकिस्तान भी चीन की मदद से अपनी नौसेना को मजबूत कर रहा है. अप्रैल 2026 में उसने पहली हैंगोर श्रेणी की पनडुब्बी नौसेना में शामिल की. आने वाले समय में उसे और पनडुब्बियां और फ्रिगेट मिलने की उम्मीद है.
पनडुब्बियों की कमी सबसे ज्यादा चिंता की बात है. भारत की 1999 की 30 साल की योजना में 2030 तक 24 नई पारंपरिक पनडुब्बियां शामिल करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अब तक सिर्फ छह स्कॉर्पीन पनडुब्बियां ही नौसेना में शामिल हो पाई हैं, जिनका ऑर्डर 2005 में दिया गया था. बीजेपी की अगुवाई वाली किसी भी सरकार ने अब तक नई पारंपरिक पनडुब्बियां बनाने के लिए एक भी अनुबंध नहीं किया है. आज भारतीय नौसेना में मौजूद सभी पारंपरिक पनडुब्बियों का ऑर्डर कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकारों ने दिया था. आईएनएस सिंधुशास्त्र का ऑर्डर कांग्रेस समर्थित यूनाइटेड फ्रंट सरकार के समय दिया गया था.
काफी समय से अटके प्रोजेक्ट 75(I) की बातचीत पूरी होने पर जर्मनी की डिजाइन वाली टाइप-214 पनडुब्बियां मझगांव डॉक में बनाई जा सकती हैं. लेकिन अनुबंध होने के बाद भी पहली पनडुब्बी आने में करीब सात साल लगेंगे. 2024 में मंजूर की गई दो स्वदेशी परमाणु अटैक पनडुब्बियां जरूर अहम हैं, लेकिन नौसेना के अनुमान के मुताबिक भी पहली पनडुब्बी 2036-37 से पहले सेवा में नहीं आ पाएगी.
सतह पर चलने वाले युद्धपोतों की स्थिति भी ऐसी ही है. हाल में नौसेना में शामिल डेस्ट्रॉयर और फ्रिगेट उन परियोजनाओं का हिस्सा हैं, जिनका ऑर्डर 2011 से 2019 के बीच दिया गया था. इसके बाद की तीन परियोजनाएं—प्रोजेक्ट 15C डेस्ट्रॉयर, प्रोजेक्ट 17B फ्रिगेट और अगली पीढ़ी के डेस्ट्रॉयर के लिए प्रोजेक्ट 18A—अभी सिर्फ प्रस्ताव हैं. इन पर अभी तक कोई अनुबंध नहीं हुआ है. अगर सब कुछ ठीक भी रहा, तो इन नए जहाजों में से पहला 2030 के दशक के आखिर में ही नौसेना में शामिल हो पाएगा. वहीं प्रोजेक्ट 18A के 2040 से पहले पूरा होने की संभावना नहीं है. रूस से फ्रिगेट खरीदने की योजना भी अमेरिका के प्रतिबंधों और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण सप्लाई में आई दिक्कतों की वजह से मुश्किल लग रही है.
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ में बिछाई गई समुद्री बारूदी सुरंगों ने यह भी दिखा दिया कि कम खर्च में भी समुद्री व्यापार और नौसेना की आवाजाही रोकी जा सकती है, लेकिन भारत के पास 2019 में आखिरी पांडिचेरी श्रेणी के जहाज के रिटायर होने के बाद से बारूदी सुरंग हटाने वाला एक भी विशेष जहाज नहीं है. 2014 तक ऐसे सात जहाज थे. रक्षा मंत्रालय ने जुलाई 2025 में ऐसे 12 नए जहाज खरीदने की मंजूरी दी थी, लेकिन अब तक कोई अनुबंध नहीं हुआ है. और अगर अनुबंध हो भी जाए, तो पहला जहाज आने में करीब 10 साल लग सकते हैं. क्या यह स्थिति जानी-पहचानी नहीं लगती?
भारत इस कमी को कुछ हद तक समुद्री निगरानी बढ़ाकर, लंबी दूरी तक मार करने वाले एंटी-शिप हथियार, समुद्र के अंदर लगाए जाने वाले सेंसर, बिना चालक वाली पानी के अंदर चलने वाली मशीनें और बिना चालक वाले सतह पर चलने वाले जहाज बढ़ाकर कम कर सकता है. इनसे हिंद महासागर में दुश्मन के लिए काम करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन ये पनडुब्बियों, एयर डिफेंस डेस्ट्रॉयर, फ्रिगेट और विमानवाहक पोत की जगह नहीं ले सकते. ये सिर्फ उनकी मदद कर सकते हैं.
जैसा कि लेफ्टिनेंट जनरल डी.एस. हुड्डा ने कहा है, लंबे समय के लिए सैन्य ताकत तैयार करने के लिए पहले से योजना बनाना और उसके लिए फंड तय करना दोनों जरूरी हैं. यह काम बिना योजना या अस्थायी तरीके से नहीं किया जा सकता. खासकर नौसेना की परियोजनाओं में, जिन्हें पूरा होने में कई साल लगते हैं, पहले से तैयारी करना बहुत ज़रूरी है. अगर हर साल मिलने वाले बजट के हिसाब से ही योजना बनेगी, तो फंड भी कभी कम तो कभी ज्यादा मिलेगा.
भारत यह तय नहीं कर सकता कि उसे कैसी नौसेना चाहिए, जब तक वह पहले यह तय न कर ले कि उससे कौन-कौन से काम लेने हैं. साफ राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति नहीं होने की वजह से सिर्फ सोच में कमी नहीं आई है, बल्कि रक्षा खरीद की ऐसी व्यवस्था बन गई है, जिसमें फैसले तब तक टाले जाते हैं, जब तक समुद्र में कमी साफ दिखाई नहीं देने लगती.
अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य हैं. यह उनके निजी विचार हैं.
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