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Thursday, 16 July, 2026
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स्थानीय निकाय चुनाव में दो-बच्चे के नियम पर SC की आपत्ति, 23 साल पहले इसी प्रावधान को दी थी मंजूरी

पंचायत चुनावों के लिए महाराष्ट्र की 'दो-बच्चे की नीति' को चुनौती देने वाली मंगला इंगले की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने अदालत के पिछले फैसलों पर ध्यान खींचा है.

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नई दिल्ली: इस हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव लड़ने की पात्रता से जुड़े दो-बच्चों के नियम पर सवाल उठाते हुए उस बहस को फिर से जिंदा कर दिया, जिस पर वह खुद दो दशक पहले फैसला दे चुका है. तब अदालत ने राज्यों के पंचायत कानूनों में ऐसे ही प्रतिबंधों को सही ठहराया था.

मंगलवार को जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इंगले ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत तीसरे बच्चे के जन्म के बाद उन्हें पंचायत चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया गया था.

इस प्रावधान के मुताबिक, दो से ज्यादा बच्चे वाले व्यक्ति पंचायत सदस्य या सरपंच का चुनाव नहीं लड़ सकते और न ही यह पद संभाल सकते हैं.

सुनवाई के दौरान बेंच ने पूछा कि आखिर दो-बच्चों की नीति को अब भी क्यों जारी रखा गया है. अदालत ने कहा, “यह कैसी बेकार नीति है? जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले पर फिर से विचार करने की जरूरत है. देश बदल चुका है.”

अब इस मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले, जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003) और राजबाला बनाम हरियाणा राज्य (2015) फिर चर्चा में आ गए हैं. इन दोनों मामलों में अदालत ने परिवार के आकार से जुड़े चुनावी प्रतिबंधों को जनसंख्या नियंत्रण की नीति का हिस्सा मानते हुए सही ठहराया था.

2015 के राजबाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत चुनाव लड़ने के लिए तय नई शर्तों, जैसे न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता, टैक्स बकाया न होना और घर में शौचालय होना, की संवैधानिक वैधता पर फैसला दिया था. इस फैसले की कानूनी नींव 2003 के जावेद मामले पर ही आधारित थी, जिसमें दो-बच्चों की नीति को सही माना गया था.

2003 के जावेद मामले में अदालत के सामने सवाल था कि हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा 175(1)(q) संवैधानिक है या नहीं. इस धारा के तहत दो से ज्यादा जीवित बच्चों वाले व्यक्ति सरपंच या पंच नहीं बन सकते.

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि दो-बच्चों का नियम मनमाना और भेदभाव वाला है. लेकिन अदालत ने कहा कि यह वर्गीकरण स्पष्ट आधार पर किया गया है और इसका उद्देश्य भी उचित है.

तत्कालीन जस्टिस आर.सी. लाहोटी, जस्टिस अशोक भान और जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने कहा था कि चुनाव लड़ने का अधिकार कोई मौलिक अधिकार नहीं है.

अदालत ने कहा, “चुनाव लड़ने का अधिकार न तो मौलिक अधिकार है और न ही सामान्य कानून के तहत मिलने वाला अधिकार. यह कानून से मिला अधिकार है. इसलिए इस पर कानून के जरिए जरूरी योग्यताएं और अयोग्यताएं तय की जा सकती हैं.”

अदालत ने कहा, “दो से ज्यादा जीवित बच्चों वाले लोग, दो या उससे कम बच्चों वाले लोगों से अलग श्रेणी में आते हैं. इस कानून का एक उद्देश्य परिवार कल्याण और परिवार नियोजन कार्यक्रम को बढ़ावा देना है. यह अयोग्यता लोगों को ऐसा करने के लिए हतोत्साहित करती है.”

अदालत ने यह भी कहा कि दो बच्चे हों, तीन हों या उससे ज्यादा, इसकी सीमा तय करना सरकार का नीतिगत फैसला है और इसमें अदालत दखल नहीं दे सकती.

जनसंख्या नियंत्रण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बताया

जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि तेजी से बढ़ती आबादी देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में बड़ी बाधा है.

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का हवाला देते हुए अदालत ने कहा था कि देश की आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है और “भारत हर साल एक ऑस्ट्रेलिया जितनी आबादी बढ़ा रहा है. अगर यही स्थिति रही तो दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा.”

फैसले में कहा गया कि सामाजिक और आर्थिक न्याय दिलाने के लिए जनसंख्या नियंत्रण बेहद जरूरी है. पंचायतों के जनप्रतिनिधि इस सोच को समाज तक पहुंचाने का अहम माध्यम बन सकते हैं.

अदालत ने उन मामलों पर भी टिप्पणी की, जहां लोग तीसरे बच्चे को गोद देकर कानून से बचने की कोशिश करते हैं. अदालत ने कहा कि अयोग्यता तीसरे बच्चे के जन्म के साथ ही लागू हो जाती है.

अदालत ने कहा, “जैसे ही दो जीवित बच्चों के बाद तीसरा बच्चा जन्म लेता है और जीवित रहता है, अयोग्यता लागू हो जाती है. बाद में बच्चे को गोद दे देने से यह अयोग्यता खत्म नहीं होती.”

कुछ मुस्लिम याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि यह नियम उनके धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन करता है. अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया.

अदालत ने कहा, “मुस्लिम कानून चार शादियों की अनुमति देता है, लेकिन उसे अनिवार्य नहीं बनाता. किसी धर्म में किसी चीज की अनुमति होना, उसे धार्मिक प्रथा नहीं बना देता. सिर्फ इसलिए कि कोई प्रथा मान्य है, उसे धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता.”

अदालत ने कहा कि किसी समुदाय में कोई प्रथा प्रचलित होने के बावजूद, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के हित में कानून बनाकर उसे नियंत्रित या प्रतिबंधित किया जा सकता है.

दो-बच्चों की नीति के समर्थन में पहले भी उठी मांग

नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एस.के. कौल और जस्टिस ए.एस. ओका की बेंच ने बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए दो-बच्चों की नीति लागू करने की मांग वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार कर दिया था. अदालत ने कहा था कि यह फैसला सरकार को करना है. यह याचिका बीजेपी नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दायर की थी.

मार्च 2020 में कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने राज्यसभा में एक निजी विधेयक पेश किया था. इसमें दो-बच्चों की नीति लागू करने के लिए प्रोत्साहन देने, जैसे उच्च शिक्षा संस्थानों में प्राथमिकता और सरकारी नौकरियों में वरीयता, और नियम न मानने वालों को चुनाव लड़ने और सरकारी सब्सिडी लेने से रोकने का प्रस्ताव था.

फरवरी 2020 में शिवसेना सांसद अनिल देसाई ने भी राज्यसभा में एक निजी विधेयक पेश किया था. इसमें संविधान में अनुच्छेद 47A जोड़ने का प्रस्ताव था.

प्रस्ताव में कहा गया था, “राज्य छोटे परिवार को बढ़ावा देने के लिए टैक्स, रोजगार, शिक्षा जैसी सुविधाओं में प्रोत्साहन देगा. जो लोग परिवार को दो बच्चों तक सीमित नहीं रखेंगे, उनसे ये सुविधाएं वापस ले ली जाएंगी, ताकि बढ़ती आबादी पर नियंत्रण किया जा सके.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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