अगर सुर्खियों और बड़े-बड़े दावों पर भरोसा करें, तो ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत जल्द ही लिथियम-आयन बैटरी के मामले में आत्मनिर्भर बनने वाला है, चीन पर निर्भरता खत्म कर देगा और बैटरी-इलेक्ट्रिक वाहन क्रांति में अपनी मजबूत जगह बना लेगा, लेकिन हकीकत इससे काफी अलग है.
एक स्टडी के मुताबिक, एडवांस बैटरी स्टोरेज में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए शुरू की गई प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना पांच साल में अपने लक्ष्य का 3 प्रतिशत भी हासिल नहीं कर पाई है. इसकी एक वजह यह भी है कि योजना का कुछ पैसा बैटरी निर्माता की बजाय एक ऐसी सोना निर्यात करने वाली कंपनी को दिया गया, जिस पर कथित घोटाले के आरोप हैं.
जम्मू-कश्मीर में मिले रिकॉर्ड लिथियम भंडार के लिए अब तक एक भी बोलीदाता नहीं मिला है. वहीं, मोदी सरकार द्वारा बड़े प्रचार के साथ किए गए कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों से भी कोई खास फायदा नजर नहीं आया है.
नतीजा यह है कि 2025-26 में भारत का लिथियम-आयन बैटरी आयात 57 प्रतिशत बढ़कर 4.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा चीन से आया. 2018 के मुकाबले यह निर्भरता नौ गुना बढ़ चुकी है और आगे और बढ़ने की संभावना है.
हम इस स्थिति में क्यों पहुंचे?
पहला कारण- नीतियों की विफलता, बैटरी पीएलआई योजना के असफल होने की एक बड़ी वजह यह रही कि इसके विजेताओं में राजेश एक्सपोर्ट्स जैसी कंपनी शामिल थी, जिसका कथित तौर पर गौतम अडाणी से संबंध बताया जाता है और जिसने पांच साल में एक भी वॉट-आवर बैटरी का उत्पादन नहीं किया. इस सोना कारोबार करने वाली कंपनी पर बाद में 15.5 लाख करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी का आरोप भी लगा. दूसरी ओर, बैटरी क्षेत्र की अनुभवी कंपनियां एक्साइड इंडस्ट्रीज और अमारा राजा, जो लिथियम-आयन बैटरी के काम में काफी आगे थीं, सरकारी सब्सिडी हासिल नहीं कर सकीं. यह सरकार की कमजोर नीतिगत पसंद को दिखाता है.
दूसरा कारण- समय से पहले जश्न मनाना. याद कीजिए, मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में मिले लिथियम भंडार को ऐसी खोज बताया था, जिससे भारत दुनिया का सातवां सबसे बड़ा लिथियम स्रोत बन जाएगा, लेकिन दो बार नीलामी होने के बाद भी एक भी खरीदार नहीं मिला. इसके कई कारण हैं. 59 लाख टन का अनुमानित भंडार अभी शुरुआती आकलन पर आधारित है, खनिज मिट्टी वाले ऐसे क्षेत्र में है जहां खनन करना मुश्किल है और खनन नियमों में भी कई कमियां हैं. इसके अलावा, भारत में अभी केवल एक ही लिथियम रिफाइनरी है. ऐसे में अगर भारत में निकाला गया लिथियम प्रोसेसिंग के लिए चीन भेजना पड़े, तो इससे खनिज के मामले में आत्मनिर्भरता कैसे मिलेगी?
तीसरा कारण- काम से ज्यादा प्रचार, काफी शोर-शराबे के बावजूद भारत को अब तक अमेरिका की अगुवाई वाली मिनरल्स सिक्योरिटी पार्टनरशिप (MSP) या इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क जैसी पहलों से कोई बड़ा फायदा नहीं मिला है. हालांकि, ऑस्ट्रेलिया के साथ हुआ द्विपक्षीय समझौता कुछ ठोस परिणाम देता दिख रहा है. भारत की सरकारी कंपनी खानिज विदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) ने भी कुछ प्रगति की है और फिलहाल अर्जेंटीना में लिथियम की खोज कर रही है.
फिर भी भारत की घरेलू और विदेशी परियोजनाओं की संख्या अभी बहुत कम है. यह चिंता की बात क्यों है? भारत के लिए सुरक्षित लिथियम सप्लाई चेन आने वाले समय में और ज्यादा जरूरी होने वाली है. सरकार चाहती है कि 2030 तक बिकने वाले नए यात्री वाहनों में कम से कम 30 प्रतिशत बैटरी इलेक्ट्रिक वाहन हों. दोपहिया, तिपहिया और व्यावसायिक वाहनों में यह हिस्सा और भी ज्यादा रखने का लक्ष्य है. इसके अलावा, सरकार अगले साढ़े तीन वर्षों में 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य भी रखती है. नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ते उपयोग के साथ बिजली भंडारण के लिए बैटरियों की मांग भी तेजी से बढ़ेगी. ऐसे में अगर हालात नहीं बदले, तो भारत की चीन पर निर्भरता और गहरी हो सकती है.
जरूरी तैयारी
क्या इसका एक समाधान ऐसी चीज़ में छिपा है जो ज्यादा आकर्षक नहीं लगती—रीसाइक्लिंग, जिसे कुछ लोग ‘अर्बन माइनिंग’ भी कहते हैं? इसका मतलब है फेंके गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और बैटरियों से लिथियम जैसे खनिज निकालना और उन्हें दोबारा इस्तेमाल लायक बनाना. भारत दुनिया में ई-वेस्ट पैदा करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है.
कुछ अध्ययनों के अनुसार, 2030 तक बैटरी रीसाइक्लिंग भारत की लिथियम ज़रूरत का 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा पूरा कर सकती है. दिलचस्प बात यह है कि भारत की एकमात्र लिथियम रिफाइनिंग कंपनी लोहम (Lohum) खदानों से निकले लिथियम की बजाय रीसाइकिल किए गए लिथियम का इस्तेमाल करती है. ऐसा नहीं है कि सरकार इस बात को समझती नहीं है. पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने महत्वपूर्ण खनिजों से जुड़ी बैटरी कचरा प्रबंधन (बैटरी वेस्ट मैनेजमेंट) नियमों को औपचारिक रूप दिया है और बैटरी रीसाइक्लिंग प्लांट लगाने के लिए 700 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन की घोषणा भी की है.
लेकिन मौजूदा नीति को अब अपडेट करने की ज़रूरत है, क्योंकि रीसाइक्लिंग प्लांट बनाना काफी महंगा है. इसके अलावा, चीन में जरूरत से ज्यादा उत्पादन होने के कारण लिथियम की कीमतें गिर गई हैं, जिससे इस क्षेत्र में निवेश करने का उत्साह भी कम हो गया है. भारत में सिर्फ एक लिथियम रिफाइनरी होने का मुद्दा यहां बहुत महत्वपूर्ण है. दुनिया भर में चर्चा और नीतियां आमतौर पर खनिजों की सप्लाई पर केंद्रित रहती हैं, लेकिन चीन की असली ताकत कच्चे खनिज को इस्तेमाल लायक उत्पाद में बदलने यानी उसकी प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग पर नियंत्रण से आती है.
दुनिया के कुल लिथियम का दो-तिहाई से ज्यादा हिस्सा चीन प्रोसेस करता है. जब तक भारतीय कंपनियां लिथियम रिफाइनरी लगाने में निवेश नहीं करेंगी, तब तक कच्चा माल प्रोसेसिंग के लिए चीन भेजा जाता रहेगा. इससे चीन पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता की समस्या खत्म नहीं होगी.
इस क्षेत्र में अभी बहुत काम करने की ज़रूरत है और कुछ शुरुआती तैयारी भी हो रही है, लेकिन जब तक मोदी सरकार काम से ज्यादा घोषणाओं को, नतीजों से ज्यादा फोटो अवसरों को और निर्माताओं की तुलना में करीबी उद्योगपतियों को ज्यादा महत्व देती रहेगी, तब तक इस रणनीतिक उद्योग में भारत को आत्मनिर्भर कहना मुश्किल होगा.
अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य हैं. यह उनके निजी विचार हैं.
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