scorecardresearch
Wednesday, 10 June, 2026
होमराजनीति20 या दो-तिहाई सांसद अलग गुट बना लें, फिर भी TMC सांसदों की सदस्यता क्यों जा सकती है?

20 या दो-तिहाई सांसद अलग गुट बना लें, फिर भी TMC सांसदों की सदस्यता क्यों जा सकती है?

कानूनी विशेषज्ञ ‘विभाजन’ (स्प्लिट) और ‘विलय’ (मर्जर) में फर्क बताते हैं. उनका कहना है कि ऐसे मामलों में सांसदों को अयोग्यता से बचाने के लिए पार्टी का किसी दूसरी पार्टी में विलय होना ज़रूरी है.

Text Size:

नई दिल्ली: ऐसी अटकलों के बीच कि काकोली घोष दस्तिदार के नेतृत्व में करीब 20 तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) लोकसभा सांसद पार्टी से अलग होकर निचले सदन में एक अलग गुट बनाने की तैयारी कर रहे हैं, संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि उन्हें फिर भी अयोग्य ठहराया जा सकता है.

फिलहाल, बागी टीएमसी खेमे में कितने सांसद हैं, इसे लेकर कोई स्पष्टता नहीं है. दस्तिदार खेमे का दावा है कि कुल 28 टीएमसी सांसदों में से 20 उनके साथ हैं, लेकिन पार्टी के दो वरिष्ठ सांसदों ने पहले दिप्रिंट को बताया था कि 16 सांसद बगावत कर चुके हैं, जबकि 12 अभी भी ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल गुट के साथ हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि दल-बदल विरोधी कानून के तहत इस मामले में सिर्फ दो-तिहाई सांसदों का यह कहना काफी नहीं है कि वे अलग गुट बनाना चाहते हैं या एनडीए के साथ जाना चाहते हैं. इसके लिए पहले पूरे गुट का आधिकारिक तौर पर किसी दूसरी पार्टी में विलय होना ज़रूरी है.

गुटबाजी का यह विवाद सोमवार को सामने आया, जब टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी INDIA गठबंधन की बैठक में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली में थे.

उसी दिन टीएमसी सांसद शर्मिला सरकार ने कहा कि 20 टीएमसी सांसदों ने एनडीए का समर्थन करने के लिए अपना “अलग गुट” बनाने का फैसला किया है. उन्होंने इस कदम के लिए टीएमसी में “भ्रष्टाचार” को जिम्मेदार ठहराया.

बताया गया कि बागी सांसदों की एक बैठक दिल्ली में बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर हुई. शुभेंदु अधिकारी ने भी टीएमसी सांसदों से मुलाकात की.

इससे पहले पिछले हफ्ते पार्टी से निष्कासित टीएमसी नेता ऋतब्रत बनर्जी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस को पत्र लिखकर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष पद पर दावा किया था और कहा था कि उन्हें 58 टीएमसी विधायकों का समर्थन प्राप्त है.

हालांकि, खबरों के मुताबिक स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी, लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञों ने दिप्रिंट को बताया था कि नेता प्रतिपक्ष चुनने का अधिकार तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के पास है.

अब यह गुटीय संघर्ष लोकसभा तक पहुंच गया है.

हालांकि, संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ दो-तिहाई लोकसभा सांसदों का अलग गुट बनाना विलय नहीं माना जाएगा और इससे उन्हें अयोग्यता से सुरक्षा नहीं मिलेगी.

पूर्व लोकसभा महासचिव पीडीटी आचार्य ने दिप्रिंट से कहा, “वे ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि 28 में से 20 सांसद पार्टी छोड़ चुके हैं और दल-बदल कर चुके हैं. इसलिए वे संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य ठहराए जा सकते हैं.”

संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है, के तहत यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी मूल पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या पार्टी व्हिप के खिलाफ वोट देता है, तो इसे दल-बदल माना जा सकता है. ऐसे मामलों में सदस्य को अयोग्य ठहराया जा सकता है.

अयोग्यता से बचने के लिए असंतुष्ट समूह के पास केवल एक ही बचाव है—किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में विलय.

इसलिए कानून विधायकों को तभी अयोग्यता से बचने की अनुमति देता है, जब उनकी पार्टी किसी दूसरी पार्टी में विलय कर जाए और कम से कम दो-तिहाई विधायक या सांसद उस विलय से सहमत होकर मूल पार्टी छोड़ दें.

वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ किरपाल भी बताते हैं, “हालांकि, कानून पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन आम तौर पर यह माना जाता है कि विलय का मतलब राजनीतिक पार्टी (संगठन) का विलय होता है, सिर्फ विधायी दल का नहीं. इसलिए यह दावा करना कि वे (विधायक या सांसद) अलग हो गए हैं या उनका विलय हो गया है, अयोग्यता को आकर्षित कर सकता है.”

किरपाल का कहना है कि विलय के बिना सांसद खुद को अलग गुट नहीं बता सकते.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “उन्हें विलय करना होगा. वे अलग गुट नहीं बन सकते, क्योंकि वह ‘स्प्लिट’ यानी विभाजन होगा, और विभाजन की व्यवस्था को कानून से जानबूझकर हटा दिया गया है.”

उन्होंने बताया कि पहले दसवीं अनुसूची के तहत यदि किसी राजनीतिक दल के एक-तिहाई विधायक या सांसद अलग हो जाते थे, तो वे अयोग्यता से बच सकते थे, लेकिन 2004 में संशोधन के जरिए इस अपवाद को खत्म कर दिया गया और केवल विलय वाली व्यवस्था को ही रखा गया.

उन्होंने कहा, “विभाजन की व्यवस्था को खत्म करने का मकसद आसान राजनीतिक खरीद-फरोख्त को रोकना था. इसलिए अब सीमा बढ़ाकर विभाजन से विलय तक कर दी गई है.”

कानूनी पहलू के अलावा, किरपाल ने इस कदम की “नैतिकता और जनता के जनादेश के साथ विश्वासघात” का भी मुद्दा उठाया.

उन्होंने कहा, “कानूनी बहस की बारीकियों में अक्सर नैतिकता का पहलू भुला दिया जाता है, लेकिन कानून के हिसाब से भी मुझे समझ नहीं आता कि वे इस तरह सिर्फ अलग कैसे हो सकते हैं.”

दो-तिहाई संख्या का भ्रम

हालांकि, 20 सांसदों का संख्या बल लोकसभा में पार्टी की कुल ताकत का “दो-तिहाई” होने के कारण इसे संभावित अयोग्यता से बचाव के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि दो-तिहाई विधायकों या सांसदों की मंजूरी का सवाल तभी आता है, जब पूरी पार्टी का विलय हो चुका हो.

आचार्य बताते हैं कि ये सांसद दसवीं अनुसूची के तहत कोई स्वतंत्र कदम नहीं उठा सकते, जब तक उनकी पार्टी यानी टीएमसी किसी दूसरी पार्टी में विलय न कर ले.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “इस समय दो-तिहाई संख्या का कोई मतलब नहीं है. यह संख्या तभी मायने रखती है, जब टीएमसी और बीजेपी के बीच विलय हो. अगर ऐसा नहीं हो रहा है, तो इस संख्या का कोई महत्व नहीं है.”

आचार्य का कहना है कि अगर पार्टी के भीतर ही विभाजन होता है, तो वह गुट खुद को असली पार्टी बताते हुए भारत निर्वाचन आयोग के पास जा सकता है, लेकिन इसे भी विलय नहीं माना जाएगा.

उन्होंने कहा, “विलय दो राजनीतिक दलों के बीच होता है. इसका मतलब है कि ममता बनर्जी को फैसला करना होगा कि उनकी पार्टी बीजेपी में विलय करेगी. केवल सांसद ही पार्टी नहीं होते, वे पार्टी का सिर्फ एक हिस्सा हैं. पार्टी इससे कहीं बड़ी होती है, वह एक संगठन है. पूरी पार्टी का बीजेपी में विलय होना ज़रूरी है. तभी ये लोग उस पार्टी में शामिल होकर कह सकते हैं कि उन्होंने ऐसा विलय के कारण किया है.”

दसवीं अनुसूची के प्रावधानों पर बात करते हुए किरपाल कहते हैं कि विलय के लिए मुख्य संगठनात्मक पार्टी में विभाजन जरूरी है या नहीं, इसे लेकर दो तरह की व्याख्याएं हो सकती हैं.

वे कहते हैं, “एक व्याख्या यह कहती है कि इसकी जरूरत नहीं है और लोकसभा के सदस्यों में साधारण दो-तिहाई विभाजन ही पर्याप्त होगा, लेकिन शिवसेना मामले में कुछ टिप्पणियां ऐसी भी हैं, जो कहती हैं कि दसवीं अनुसूची के पीछे की सोच और तर्क यही है कि संसदीय दल में विभाजन होने से पहले संगठनात्मक ढांचे में विभाजन होना चाहिए.”

किरपाल का कहना है कि दोनों विचारों को अलग-अलग फैसलों का समर्थन मिला है, लेकिन “सिर्फ तर्क के आधार पर देखें तो दूसरा विचार—यानी पार्टी संगठन में विभाजन की जरूरत वाला—ज्यादा स्वीकार्य लगता है.”

उन्होंने कहा, “सामान्य समझ के अनुसार विलय का मतलब है कि दो पार्टियां एक हो जाएं. यह सिर्फ व्यक्तियों का मामला नहीं होता. अगर आप दसवीं अनुसूची के शब्दों को पढ़ें, तो दोनों तरह की व्याख्याओं की गुंजाइश दिखती है. लेकिन अगर आप यह देखें कि दसवीं अनुसूची क्यों लाई गई थी, तो मुझे लगता है कि पार्टी के वास्तविक विलय की जरूरत जरूर है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: विपक्ष के लिए शोक संदेश लिखने में इतनी जल्दी न करें, हम अभी भी मजबूती से मैदान में हैं


 

share & View comments