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Tuesday, 9 June, 2026
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विपक्ष के लिए शोक संदेश लिखने में इतनी जल्दी न करें, हम अभी भी मजबूती से मैदान में हैं

विपक्ष को राजनीतिक कब्रिस्तान में भेजने से पहले, ज़मीनी हकीकत पर एक नज़र डालना ज़रूरी है.

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लगता है इन दिनों विपक्ष का राजनीतिक मृत्युलेख लिखने का मौसम चल रहा है. “सब खत्म हो गया”, “अब वापसी संभव नहीं”, “विपक्ष का अंत हो चुका है”—ऐसी बातें बार-बार सुनने को मिल रही हैं.

राजनीतिक टिप्पणीकार विपक्ष का मृत्यु प्रमाणपत्र लिखने में व्यस्त हैं. कहा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस हार गई. विपक्ष की मजबूत नेता ममता बनर्जी अब मुख्यमंत्री नहीं रहीं. कांग्रेस को नेतृत्वहीन और दिशाहीन बताया जा रहा है. डीएमके को एक नई ताकत ने पीछे छोड़ दिया है और बार-बार हमें बताया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी को हराना असंभव है.

कहा जा रहा है कि बीजेपी को रोका नहीं जा सकता. विपक्ष खत्म हो चुका है. चिंता और निराशा की बातें लगातार की जा रही हैं, लेकिन विपक्ष को राजनीतिक कब्रिस्तान में भेजने से पहले, हकीकत की जांच कर लेना ज़रूरी है.

पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा यही कहा जा रहा है कि भाजपा ने ममता बनर्जी और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को निर्णायक रूप से हरा दिया है, लेकिन आंकड़ों को ध्यान से देखें तो तस्वीर कुछ और दिखाई देती है. बंगाल में बीजेपी को 45.9 प्रतिशत वोट मिले, जबकि तृणमूल कांग्रेस को 40.6 प्रतिशत वोट मिले. 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद, लगातार राजनीतिक, संस्थागत और मीडिया विरोध का सामना करने के बावजूद, “विजेता” और “हारने वाले” के बीच का अंतर सिर्फ करीब 5 प्रतिशत अंकों का है.

कुल वोटों की बात करें तो बीजेपी को 2.93 करोड़ वोट मिले, जबकि तृणमूल कांग्रेस को 2.60 करोड़ वोट मिले. लगभग 10 करोड़ की आबादी वाले राज्य में यह अंतर करीब 33 लाख वोटों का है.

और भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर तृणमूल, कांग्रेस और वाम दलों के वोट जोड़ दिए जाएं, तो बीजेपी विरोधी वोटों का प्रतिशत बीजेपी के वोट प्रतिशत से ज्यादा है. बात बिल्कुल साफ है—बंगाल में बीजेपी के पक्ष में वोट देने वालों से ज्यादा लोगों ने बीजेपी के खिलाफ वोट दिया. हां, मौजूदा चुनाव प्रणाली (फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट) के कारण बीजेपी वोट प्रतिशत को 200 से ज्यादा सीटों में बदलने में सफल रही. लेकिन यह कहना कि बंगाल अचानक मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी का मजबूत गढ़ बन गया है, आंकड़े इसका समर्थन नहीं करते.

बंगाल ने पूरी तरह बीजेपी को नहीं अपनाया है.

इसके बजाय राज्य में बेहद कड़ा मुकाबला देखने को मिला, जहां चुनाव आयोग के एक पक्ष के समर्थन में खुले तौर पर खड़े होने के आरोपों के बीच बीजेपी थोड़े अंतर से आगे निकल गई.

संदिग्ध चुनाव

एक और बहुत ज़रूरी बात है. जैसा कि मैंने ऊपर बताया, बीजेपी और टीएमसी के बीच कुल वोटों का अंतर 33 लाख है, लेकिन बहुत विवादित SIR एक्सरसाइज़ के बाद 34 लाख वोटर अभी भी फैसले के दायरे में हैं और वे असेंबली चुनाव में वोट नहीं दे सके. चुनाव आयोग का पक्षपातपूर्ण व्यवहार—चुनावों की देखरेख करने वाले दो अधिकारी अब बंगाल में बीजेपी सरकार में चीफ सेक्रेटरी और बीजेपी मुख्यमंत्री के सलाहकार के तौर पर शामिल हो गए हैं—ने बंगाल चुनावों को शुरू से आखिर तक परेशान किया है. अगर 34 लाख लोगों को उनके वोट देने के अधिकार से नहीं हटाया गया होता, तो बंगाल के नतीजे बहुत अलग हो सकते थे.

91 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए. सेंट्रल फोर्स ने काउंटिंग प्रोसेस में दखल दिया, एआईटीसी के काउंटिंग एजेंट्स को काउंटिंग टेबल पर बैठे हुए पीटा गया और करीबी मुकाबले वाले चुनाव क्षेत्रों में बहुत ही संदिग्ध नतीजों की खबरें आईं.

राजारहाट-न्यू टाउन का मामला खास तौर पर परेशान करने वाला है. मुस्लिम आबादी वाले एक बूथ से आखिरी मिनट में वोटिंग की वजह से नतीजा बीजेपी की तरफ हो गया, जिससे गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. यह एक इलेक्शन पिटीशन का विषय बनने वाला है. राजारहाट न्यू टाउन से बीजेपी के “जीतने वाले” ने 316 वोटों से सीट जीती.

जंगीपारा में, जहां SIR से जुड़े डिलीट किए गए वोटरों की संख्या 17,000 से ज़्यादा थी, एआईटीसी कैंडिडेट 862 वोटों से हार गया. अगर डिलीट किए गए कुछ वोटरों को वोट देने दिया जाता, तो एआईटीसी जीत जाती.

जिन सीटों पर SIR डिलीट किए गए वोटरों की संख्या जीत के अंतर से कहीं ज़्यादा थी, वहां डिलीट किए बिना भी नतीजे दूसरी तरफ जा सकते थे. ये रिपोर्ट आखिरकार कानूनी जांच में टिकती हैं या नहीं, यह कोर्ट को तय करना है, लेकिन एक बात साफ है: 2026 के बंगाल असेंबली चुनाव आज़ादी के बाद के भारत के सबसे शक वाले, विवादित और विवादित फैसलों में से एक रहेंगे. बंगाल के नतीजे को बीजेपी का सीधा-सादा समर्थन मानना, दिमागी तौर पर बेईमानी है.

प्रभुत्व नहीं, सिर्फ गणित

दूसरी हकीकत बीजेपी के जनादेश से जुड़ी है. यह नहीं भूलना चाहिए कि 2024 के लोकसभा चुनाव में “अबकी बार 400 पार” के बड़े-बड़े दावों के बावजूद बीजेपी को सिर्फ 240 सीटें मिली थीं. पार्टी अपने दम पर बहुमत से काफी दूर रह गई थी. जो सरकार बनी, वह किसी भारी जनादेश का नतीजा नहीं थी, बल्कि गठबंधन के गणित का परिणाम थी. बीजेपी आज सत्ता में इसलिए है क्योंकि उसे नीतीश कुमार की जेडीयू के 12 सांसदों और एन. चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के 16 सांसदों का समर्थन मिला हुआ है. अगर जेडीयू और टीडीपी का समर्थन न हो, तो तथाकथित अजेय मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार गिर जाएगी. जनता ने किसी एक पार्टी के पूर्ण प्रभुत्व को मंजूरी नहीं दी थी. फिर भी बीजेपी पर आरोप है कि वह लालच, दबाव, सरकारी ताकत और जांच एजेंसियों के लगातार इस्तेमाल के जरिए राजनीतिक बहुमत बनाने की कोशिश कर रही है. आरोप यह भी है कि उसका मकसद सिर्फ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि राजनीतिक विपक्ष को पूरी तरह खत्म करना है.

लेख के अनुसार, जनता से स्पष्ट जनादेश न मिलने के बावजूद बीजेपी 2024 में लोगों द्वारा दिए गए फैसले को बदलने के लिए “साम, दाम, दंड, भेद” की नीति अपना रही है. तीसरी हकीकत देश के राजनीतिक भूगोल से जुड़ी है. बीजेपी खुद को पूरे भारत की पसंद के रूप में पेश करने की कोशिश करती है, लेकिन दक्षिण भारत के बड़े हिस्सों में उसकी मौजूदगी अब भी सीमित है. पार्टी की सबसे ज्यादा ताकत अभी भी हिंदी भाषी राज्यों और उनसे जुड़े इलाकों में केंद्रित है. मीडिया में चाहे जितनी भी चर्चा हो, लेकिन मोदी का प्रभाव पूरे देश में एक जैसा नहीं है. इसकी भौगोलिक सीमाएं हैं.

हिंदुत्व के मुख्य क्षेत्रों से बाहर बीजेपी की लोकप्रियता काफी कमजोर पड़ जाती है. बीजेपी का लंबे समय तक राजनीतिक प्रभुत्व बनाए रखने का सपना काफी हद तक उत्तर भारत की बड़ी आबादी पर आधारित है. यह वास्तविक राजनीतिक वर्चस्व नहीं, बल्कि आबादी और चुनावी गणित का असर है.

जख्मी है, मरे नहीं

इस बीच, विपक्ष के खत्म होने की खबरें काफी बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जा रही हैं. इंडिया गठबंधन को झटका ज़रूर लगा है, लेकिन वह खत्म नहीं हुआ है. वह गठबंधन की राजनीति के सबक फिर से सीख रहा है. सोमवार सुबह इंडिया गठबंधन की बैठक में नेताओं के बीच अच्छा तालमेल और अपनापन देखने को मिला. विपक्षी गठबंधन अब मजबूती से फिर खड़ा होने की प्रक्रिया में है. देशभर में कई मजबूत क्षेत्रीय नेता अब भी लोगों का समर्थन बनाए हुए हैं. अनुभवी नेता बड़े राज्यों की सरकारें चला रहे हैं. विपक्ष का संगठनात्मक ढांचा अभी भी काफी बड़ा है. 15 साल सत्ता में रहने के बाद भी ममता बनर्जी को बंगाल में लगभग 41 प्रतिशत वोट मिले.

2024 के लोकसभा चुनाव में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने अपनी सीटों की संख्या में लगभग 50 सीटों का इजाफा किया था, लेकिन शायद सबसे महत्वपूर्ण बदलाव औपचारिक राजनीति के बाहर हो रहा है. अब विपक्ष सिर्फ विपक्षी दलों तक सीमित नहीं रह गया है. परीक्षा पेपर लीक के मामलों से स्टूडेंट्स और पैरेंट्स नाराज़ हैं. युवाओं में असंतोष बढ़ रहा है. युवाओं के नेतृत्व वाली कॉकरोच जनता पार्टी ने हाल ही में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर बड़ा प्रदर्शन किया है.

किसान अब भी आंदोलन कर रहे हैं. नागरिक समाज के संगठन सक्रिय हैं. संवैधानिक अधिकारों के लिए काम करने वाले समूह भी लगातार सक्रिय हैं. उत्तर भारत के कई हिस्सों में नौकरियों, भर्ती परीक्षाओं और प्रशासनिक विफलताओं को लेकर प्रदर्शन हुए हैं. यह एक दिलचस्प स्थिति है. चुनावी नज़रिए से विपक्ष कमजोर दिख सकता है, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर विपक्ष का दायरा पहले से बड़ा हो गया है और लगातार बढ़ रहा है.

मोदी सरकार चुनाव जीत रही है, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर उसकी दलील लगातार कमजोर पड़ रही है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार अर्थव्यवस्था मजबूत दिखती है. हाल ही में सरकार ने जीडीपी में 7.7 प्रतिशत वृद्धि का आंकड़ा जारी किया, लेकिन इन आंकड़ों के पीछे कई चिंताजनक संकेत भी हैं. निजी निवेश की रफ्तार धीमी है. लोगों की खपत (कंजम्प्शन) समान रूप से नहीं बढ़ रही. रुपया लगातार कमज़ोर हो रहा है. विदेशी निवेश का प्रवाह अस्थिर बना हुआ है और विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारत से पैसा निकाल रहे हैं. रोजगार के पर्याप्त अवसर अब भी नहीं बन पा रहे हैं.

हाल ही में राजेश एक्सपोर्ट्स से जुड़ा कथित 15.5 लाख करोड़ रुपये की अनियमितताओं वाला मामला भी सामने आया है, जिसका ज़िक्र सेबी की अंतरिम रिपोर्ट में किया गया. सबसे चिंता की बात यह है कि लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, जिसमें करोड़ों भारतीयों की बचत निवेशित है, उसने भी राजेश एक्सपोर्ट्स में निवेश किया हुआ था.

सरकार के समर्थन में काम करने वाला शक्तिशाली मीडिया तंत्र लगातार मोदी की छवि को मजबूत करने और विपक्ष की हर कमजोरी को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने में लगा रहता है. मीडिया का बड़ा हिस्सा विपक्ष पर लगातार नज़र रखता है, जबकि सरकार की कमियों पर अपेक्षाकृत कम सवाल उठाता है. सरकार के पक्ष में खबरें बड़े पैमाने पर दिखाई जाती हैं, लेकिन मोदी समर्थक मीडिया का एक हिस्सा भी परीक्षा पेपर लीक, भीषण आग की घटनाओं, इमारतों के गिरने और प्रशासनिक विफलताओं जैसी घटनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर पाया है.

हकीकत आखिरकार प्रचार के बीच अपनी जगह बना ही लेती है.

इंदिरा गांधी के बायोग्राफर के तौर पर, मैं 2026 और 1972-73 के बीच की समानताओं से हैरान हूं. 1971 की जीत के बाद, इंदिरा गांधी राजनीतिक रूप से अजेय लग रही थीं. कांग्रेस ने नेशनल और असेंबली चुनावों में जीत हासिल की. ​​इंदिरा कल्ट पब्लिक लाइफ पर हावी हो गया.

लेकिन फिर 1973 का तेल संकट आया, जिसने दुनिया भर में आर्थिक मंदी पैदा कर दी. महंगाई तेज़ी से बढ़ी. आर्थिक परेशानियां गहराने लगीं. गुजरात के नव निर्माण आंदोलन से छात्र आंदोलन तेज़ हुए. बहुत कम समय में ऐसा लगा कि जो नेता अजेय दिखाई देती थीं, वह घिरती जा रही हैं. 1975 में, इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले ने इंदिरा राज को हिला दिया. 25 जून 2015 को इमरजेंसी घोषित की गई और सिर्फ दो साल बाद, 1977 में, नामुमकिन हुआ: इंदिरा गांधी हार गईं.

पोस्टर्स ने उन्हें नहीं बचाया. नारों ने उन्हें नहीं बचाया. पब्लिसिटी के चक्कर ने उन्हें नहीं बचाया. पर्सनैलिटी कल्ट ने उन्हें नहीं बचाया. इतिहास का सबसे पक्का सबक यह है कि कोई भी लीडर ऐसा नहीं है जिसे हराया न जा सके और कोई भी पॉलिटिकल सिस्टम हमेशा रहने वाला नहीं है.

अगले तीन साल भारत के लिए अहम होंगे. लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है. यही वजह है कि विपक्ष के लिए समय से पहले लिखे जा रहे मृत्युलेख कूड़ेदान में फेंक देने लायक हैं. सच्चाई यह है—विपक्ष जिंदा है. विपक्ष अभी भी पूरी ताकत के साथ मैदान में मौजूद है.

लेखिका अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सांसद (राज्यसभा) हैं. उनका एक्स हैंडल @sagarikaghose है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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