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Friday, 3 July, 2026
होममत-विमतभारत की मजबूत तैयारी: होर्मुज संकट के दौरान इसने घरेलू किचन को कैसे बचाया

भारत की मजबूत तैयारी: होर्मुज संकट के दौरान इसने घरेलू किचन को कैसे बचाया

जब हालात सामान्य होने लगे, तब भी कमर्शियल एलपीजी की सप्लाई तुरंत बहाल नहीं की गई. अगर ऐसा किया जाता, तो मांग अचानक बढ़ जाती और घरेलू एलपीजी सिलेंडर की डिलीवरी पर फिर से दबाव और लंबा इंतजार हो सकता था.

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28 फरवरी को दुनिया के ऊर्जा बाज़ारों में भारी उथल-पुथल मच गई. ईरान पर हुए हमलों के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज प्रभावी रूप से बंद हो गया. यह दुनिया में ऊर्जा व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता माना जाता है. भारत के लिए यह स्थिति बेहद गंभीर थी. उस समय देश अपने करीब 45 प्रतिशत कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) और लगभग 90 प्रतिशत एलपीजी आयात के लिए इसी रास्ते पर निर्भर था. करीब चार महीने तक खाड़ी क्षेत्र से आने वाले वे समुद्री रास्ते, जिनसे भारत की ऊर्जा व्यवस्था चलती थी, बुरी तरह प्रभावित रहे.

यह संकट इसलिए और भी गंभीर था, क्योंकि उस समय तक एलपीजी देश के करोड़ों घरों में इस्तेमाल होने वाला प्रमुख ईंधन बन चुका था. भारत में 33 करोड़ से ज्यादा एलपीजी कनेक्शन हैं. ऐसे में एलपीजी की कमी सिर्फ सप्लाई चेन की समस्या नहीं रही, बल्कि यह सीधे देश के घरों की रसोई और ऊर्जा सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गई.

इस अभूतपूर्व चुनौती का सामना करते हुए भारत ने एक साफ और अटल सिद्धांत अपनाया—सबसे पहले देश की घरेलू रसोइयों की सुरक्षा करनी है. इसके बाद सरकार ने पूरे सरकारी तंत्र के बेहतर तालमेल, रणनीतिक तरीके से एलपीजी की उपलब्धता बढ़ाने और मांग को नियंत्रित करने का ऐसा उदाहरण पेश किया, जिसे एक बड़ी सफलता माना गया.

बिना रुकावट सप्लाई कैसे बनी रही

इतने बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर रहने वाला भारत, चार महीने तक चले इस संकट के बावजूद बिना किसी घरेलू रसोई में एलपीजी खत्म हुए कैसे संभल गया? इसका जवाब है—सप्लाई बढ़ाने की मजबूत रणनीति और ऊर्जा के क्षेत्र में तेज कूटनीतिक प्रयास. सरकार ने तुरंत आपातकालीन कदम उठाए. रिफाइनरियों को निर्देश दिया गया कि वे प्रोपेन और ब्यूटेन का इस्तेमाल करके ज्यादा से ज्यादा एलपीजी का प्रोडक्शन करें. साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि इन पदार्थों का इस्तेमाल पेट्रोकेमिकल और दूसरे उद्योगों में कम से कम हो.

इस फैसले का असर यह हुआ कि देश में हर दिन होने वाला एलपीजी प्रोडक्शन 35 हजार मीट्रिक टन (टीएमटी) से बढ़कर 54 हज़ार मीट्रिक टन (टीएमटी) हो गया. सरकार की रणनीति का एक बड़ा हिस्सा यह भी था कि इस अतिरिक्त प्रोडक्शन को सबसे पहले सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs)—इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को दिया जाए, ताकि घरेलू उपभोक्ताओं तक एलपीजी की सप्लाई लगातार बनी रहे.

इसी दौरान भारत ने अपनी कूटनीतिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए एलपीजी आयात के स्रोत भी तेज़ी से बढ़ाए. खाड़ी देशों के अलावा अमेरिका, नॉर्वे, कनाडा, अल्जीरिया और रूस से भी तेज़ी से एलपीजी खरीदना शुरू किया गया.

भारत के एलपीजी भंडार का प्रबंधन

इतने बड़े संकट से निपटना किसी एक विभाग के बस की बात नहीं थी. इसके लिए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय, ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs), रिफाइनरियां, राज्य सरकारें, नागरिक आपूर्ति विभाग और एलपीजी वितरकों के बीच लगातार तालमेल बनाया गया. कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की तरह भारत के पास एलपीजी का बहुत बड़ा राष्ट्रीय रणनीतिक भंडार नहीं है. इसकी भंडारण क्षमता सीमित है.

इसलिए इस संकट के दौरान सरकार ने अल्पकालिक रणनीति अपनाई. इसमें उपलब्ध एलपीजी का सावधानी से इस्तेमाल करना, देश में उत्पादन बढ़ाना, गैर-ज़रूरी क्षेत्रों से एलपीजी हटाकर ज़रूरी ज़रूरतों के लिए देना और आयात के नए स्रोत तलाशना शामिल था. सरकार ने ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को निर्देश दिया कि वे कम से कम 30 दिनों का एलपीजी स्टॉक बनाए रखने की योजना तैयार करें. इसके बाद लंबे समय के लिए भी मजबूत भंडारण योजना पर काम शुरू हुआ. रिफाइनरियों और बॉटलिंग प्लांट से लेकर हर एलपीजी वितरक तक स्टॉक पर लगातार नज़र रखी गई. इसका नतीजा यह रहा कि देश के सबसे दूर-दराज इलाकों में भी किसी डिस्ट्रीब्यूटर के यहां एलजीपी पूरी तरह खत्म होने की नौबत नहीं आई.

इस दौरान सबसे बड़ा खतरा लोगों में घबराहट का था. एलपीजी की कमी के डर से जो लोग पहले 55 दिन बाद नया सिलेंडर बुक कराते थे, वे सिर्फ 15 दिन में ही दोबारा बुकिंग कराने लगे. अगर ऐसा चलता रहता, तो असली कमी से ज्यादा कृत्रिम कमी पैदा हो जाती और हालात बहुत खराब हो सकते थे. इससे बचने के लिए सरकार ने सख्त नियम लागू किए.

शहरी इलाकों में सिलेंडर की अगली बुकिंग के बीच 25 दिन और ग्रामीण इलाकों में 45 दिन का अंतर तय किया गया. इस कदम से ज़रूरत से ज्यादा सिलेंडर जमा करने और कालाबाजारी पर रोक लगी. इसके साथ ही सरकार ने लगातार लोगों को भरोसा दिलाया कि घरेलू उपयोग के लिए 100 प्रतिशत एलपीजी की सप्लाई जारी रहेगी. सरकार के लगातार संदेश और इन उपायों की वजह से लोगों में घबराहट कम हुई और पूरे देश में एलपीजी का समान और नियमित वितरण सुनिश्चित किया जा सका.

कमर्शियल LPG की राशनिंग की ज़रूरत

सबसे मुश्किल लेकिन सबसे ज़रूरी फ़ैसलों में से एक कमर्शियल एलपीजी की तुरंत राशनिंग करना था. केंद्र ने OMCs द्वारा कमर्शियल एलपीजी सप्लाई पर 20 परसेंट (संकट से पहले के लेवल का) की लिमिट लगा दी.

कम सप्लाई के वक्त, कमर्शियल डिमांड को घर की खाना पकाने की ज़रूरतों के साथ बिना रोक-टोक के मुकाबला करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती थी. कमर्शियल एलपीजी एक डीरेगुलेटेड मार्केट में काम करता है जहां खरीदार बिना किसी सख्त बुकिंग ज़रूरत या डिजिटल ऑथेंटिकेशन के सिलेंडर खरीद सकते हैं. अगर इस आज़ादी पर रोक नहीं लगाई जाती, तो इससे सट्टेबाजी, जमाखोरी और बिचौलियों द्वारा कम रिसोर्स का बेहिसाब इस्तेमाल बढ़ जाता.

कमर्शियल सप्लाई पर लिमिट लगाकर, भारत ने तीन मुख्य लक्ष्य हासिल किए:

घरेलू सुरक्षा: घरेलू एलपीजी को खाना पकाने की ज़रूरत के तौर पर पूरी तरह से सुरक्षित किया गया

डिमांड में कमी: कम स्टॉक पर तुरंत दबाव कम किया गया.

एंटी-डायवर्जन कंट्रोल: कमर्शियल यूज़र्स के लिए ज़्यादा मात्रा में इस्तेमाल करने का मौका कम किया गया.

डिलीवरी ऑथेंटिकेशन कोड (डीएसी) अनिवार्य

जब किसी चीज़ की कमी होती है, तो घरेलू एलपीजी और कमर्शियल एलपीजी की कीमत और उपलब्धता में बड़ा फर्क आ जाता है. ऐसे समय में सब्सिडी वाले घरेलू सिलेंडरों को ब्लैक मार्केट में बेचकर कमर्शियल इस्तेमाल के लिए भेजने का खतरा बहुत बढ़ जाता है. इससे निपटने के लिए डिलीवरी ऑथेंटिकेशन कोड (डीएसी) को अनिवार्य कर दिया गया.

डीएसी सिर्फ एक डिजिटल प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि संकट से निपटने का एक अहम तरीका था. IVRS, SMS, ऑनलाइन भुगतान, आधार से पहचान की पुष्टि (ऑथेंटिकेशन) और डुप्लीकेट कनेक्शन हटाने जैसी व्यवस्थाओं के साथ डीएसी ने यह सुनिश्चित किया कि जिस असली घरेलू उपभोक्ता ने सिलेंडर बुक किया है, वही उसे प्राप्त करे और सिलेंडर बीच में कहीं दूसरी जगह न भेजा जाए.

डिजिटल तरीके से बुकिंग को लगभग 100 प्रतिशत तक पहुंचाकर भारत ने फर्जी और दूसरे के नाम पर होने वाली बुकिंग लगभग खत्म कर दी. अलग-अलग राज्यों में रीफिल सिलेंडर की डिलीवरी के दौरान डीएसी का पालन 95 प्रतिशत से 98.5 प्रतिशत तक पहुंच गया. इस मजबूत डिजिटल व्यवस्था ने घरेलू सिलेंडरों को कमर्शियल मार्केट में भेजे जाने पर रोक लगाने में मदद की और लोगों का भरोसा बनाए रखा कि घरेलू सिलेंडर सही उपभोक्ताओं तक पहुंच रहे हैं.

कमर्शियल एलपीजी की सप्लाई धीरे-धीरे बहाल की गई

जब हालात सामान्य होने लगे, तब भी कमर्शियल एलपीजी की सप्लाई एक साथ पूरी तरह शुरू नहीं की गई. अगर ऐसा किया जाता, तो अचानक मांग फिर से बढ़ जाती. इससे लोग दोबारा ज़रूरत से ज्यादा सिलेंडर जमा करने लगते, सप्लाई व्यवस्था बिगड़ जाती और घरेलू सिलेंडरों की डिलीवरी फिर से प्रभावित होती.

इसलिए सरकार ने चरणबद्ध तरीके से कमर्शियल एलपीजी की सप्लाई बहाल करने का फैसला किया.

पहला चरण: कमर्शियल एलपीजी की सप्लाई को 20 प्रतिशत तक सीमित रखा गया, ताकि पहले घरेलू ज़रूरतें पूरी हों और लोग ज़रूरत से ज्यादा सिलेंडर जमा न करें.

दूसरा चरण: बाद में यह सीमा बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दी गई. इस दौरान सबसे पहले रेस्तरां, ढाबे, सामुदायिक रसोई और प्रवासी मजदूरों के लिए इस्तेमाल होने वाले 5 किलो वाले एलपीजी सिलेंडरों को प्राथमिकता दी गई.

तीसरा चरण: इसके बाद सप्लाई की सीमा बढ़ाकर 70 प्रतिशत कर दी गई.

इस चरण में स्टील, कपड़ा, केमिकल और प्लास्टिक जैसे उन उद्योगों को प्राथमिकता दी गई, जहां प्राकृतिक गैस (पीएनजी) का इस्तेमाल संभव नहीं था. इससे रोजगार बनाए रखने में भी मदद मिली.

पूरी तरह सामान्य स्थिति: 25 जून 2026 को थोक (बल्क) सप्लाई पर लगी सभी पाबंदियां हटा दी गईं और पैक्ड कमर्शियल एलपीजी की सप्लाई संकट से पहले वाले स्तर पर वापस आ गई, क्योंकि तब तक सप्लाई पूरी तरह सामान्य हो चुकी थी.

इस चरणबद्ध रणनीति से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) को अपने ग्राहकों का मजबूत डेटा तैयार करने, ज़रूरी और गैर-ज़रूरी उपभोक्ताओं की पहचान करने और जिन कमर्शियल ग्राहकों के लिए संभव था, उन्हें पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) की ओर बढ़ाने का समय मिल गया.

मजबूत तैयारी का उदाहरण

2026 के मध्य-पूर्व संकट के वैश्विक असर को देखते हुए साफ दिखाई देता है कि भारत की रणनीति कितनी सफल रही.

जहां कई देशों में ईंधन की भारी कमी हो गई और खुदरा कीमतें बेकाबू हो गईं, वहीं भारत ने घरेलू एलपीजी की लगातार सप्लाई बनाए रखने और मांग को सही तरीके से नियंत्रित करके स्थिति को संभाल लिया. इतनी बड़ी चुनौती के बावजूद भारत के घरेलू उपभोक्ताओं पर कीमतों का असर बहुत कम पड़ा. यह भारत की मजबूत और विविध अर्थव्यवस्था का बड़ा उदाहरण है.

भारत की रणनीति ने साबित किया कि “घरेलू जरूरतों को सबसे पहले रखने वाला ऊर्जा सुरक्षा मॉडल” पूरी तरह सफल हो सकता है. गंभीर संकट के बावजूद सरकार ने देश में उत्पादन बढ़ाकर, आयात के नए स्रोत खोजकर और लोगों में घबराहट फैलने से रोककर एलपीजी की सप्लाई लगातार जारी रखी.

इस पूरे अनुभव ने सरकार के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को और मजबूत किया—कमर्शियल क्षेत्र को होने वाली असुविधा संभाली जा सकती है, लेकिन देश के घरों की रसोई में ईंधन की कमी किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जा सकती.

सुखमल जैन भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड के पूर्व डायरेक्टर (मार्केटिंग) हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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