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Friday, 3 July, 2026
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परिसीमन बिल पास नहीं होने के बाद अमित शाह का ‘बदला’ है दलबदल की लहर: जयराम रमेश

दिप्रिंट को दिए एक खास इंटरव्यू में कांग्रेस के जयराम रमेश ने मोदी-ट्रंप, राम मंदिर चंदा चोरी विवाद, इंडिया ब्लॉक, थरूर और पार्टी के आगे के रोडमैप के बारे में भी बात की.

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नई दिल्ली: कांग्रेस के संचार प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने नरेंद्र मोदी सरकार पर भारत की वैश्विक स्थिति को कमजोर करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को लेकर सरकार का रवैया भारत की पारंपरिक स्वतंत्र विदेश नीति से अलग है.

दिप्रिंट को दिए एक खास इंटरव्यू में जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद सरकार ने पाकिस्तान को कूटनीतिक बढ़त हासिल करने का मौका दिया. उनका दावा है कि भारत ने 10 मई 2025 को ट्रंप के बाहरी दबाव में सैन्य कार्रवाई रोक दी थी.

पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर की ट्रंप से मुलाकात का ज़िक्र करते हुए रमेश ने कहा कि यह घटना भारत की लंबे समय से चली आ रही विदेश नीति से अलग है. उन्होंने यह भी कहा कि मोदी सरकार की इज़रायल के प्रति “अंधभक्ति” ने भारत की वैश्विक स्थिति को और कमजोर किया है.

जयराम रमेश ने दिप्रिंट से कहा, “अगर किसी एक व्यक्ति ने भारत की विदेश नीति पर बनी सहमति को तोड़ा है, तो वह श्री मोदी हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण इजराइल के प्रति हमारी अंधभक्ति है.”

उन्होंने आगे कहा, “ऑपरेशन सिंदूर निस्संदेह एक बड़ी सैन्य सफलता थी, लेकिन इसके बाद सरकार ने खुद को राष्ट्रपति ट्रंप के दबाव में आने दिया और 10 मई 2025 को सैन्य अभियान रोक दिया.”

राज्यसभा सांसद रमेश ने कहा, “इसका फायदा पाकिस्तान को मिला और ट्रंप ने दुनिया के सामने पाकिस्तान को गले लगाया. पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्थिति मजबूत हुई है. यह भारत की विदेश नीति के लिए बड़ा झटका है.”

रमेश ने बातचीत में भाजपा पर कथित तौर पर दलबदल कराने की कोशिश, ईवीएम पर कांग्रेस का रुख, इंडिया गठबंधन, परिसीमन, शशि थरूर के बयान, राहुल गांधी के शिक्षा अभियान और पार्टी की आगे की रणनीति पर भी बात की.

‘यह अमित शाह का बदला है’

रमेश ने भाजपा पर हाल में हुए कथित दलबदल को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के “बदले” से जोड़ते हुए कहा कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकार परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) पास कराने के लिए ज़रूरी संख्या जुटाने में विफल रही थी.

उनके मुताबिक, भाजपा को यह बिल पास कराने के लिए 352 वोटों की ज़रूरत थी, लेकिन उसे सिर्फ 298 वोट मिले. उन्होंने कहा कि पिछले 12 वर्षों में यह पहली बार था जब मोदी सरकार संसद में कोई विधेयक पास कराने में असफल रही.

रमेश ने कहा, “उन्हें जिस तरह की बेइज्जती झेलनी पड़ी, वह अभूतपूर्व थी…अब जो कुछ आप देख रहे हैं, वह उसी का बदला है. गृह मंत्री राजनीतिक दलों से बदला ले रहे हैं.”

उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना और आम आदमी पार्टी के खिलाफ भाजपा की कार्रवाई इसी रणनीति का हिस्सा है.

उन्होंने कहा, “पहले तृणमूल कांग्रेस पर सर्जिकल स्ट्राइक हुई, फिर शिवसेना पर सर्जिकल स्ट्राइक हुई. मुझे पूरा विश्वास है कि आम आदमी पार्टी पर भी सर्जिकल स्ट्राइक हुई.”

रमेश ने कहा कि हाल में हुए दलबदल के बाद भी भाजपा संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत से अभी काफी दूर है.

दलबदल ‘म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री की तरह’

रमेश ने दलबदल की हालिया लहर पर भी भाजपा पर कटाक्ष किया और कहा कि दल बदलने वाले नेताओं को अलग-अलग तरीकों से पुरस्कृत किया जाता है.

उन्होंने इसकी “म्यूचुअल फंड उद्योग” से तुलना करते हुए कहा, “कुछ को तुरंत पुरस्कृत किया जाता है. कुछ को स्थगित पुरस्कार मिलता है. कुछ पुरस्कार की प्रत्याशा में शामिल होते हैं. कुछ को प्रीपेड पुरस्कार मिलता है.”

उन्होंने कहा कि राजनीतिक पार्टी छोड़ने वाले किसी भी व्यक्ति को नया जनादेश मांगने से पहले उस पार्टी के चुनाव चिह्न पर जीती गई सीट से इस्तीफा देना चाहिए.

उन्होंने कहा, “यदि आप राज्यसभा के सदस्य हैं, तो इस्तीफा दे दें. यदि आप लोकसभा के सदस्य हैं, तो इस्तीफा दे दें. यदि आप विधायक हैं, तो इस्तीफा दे दें. उसके बाद, आप जो चाहें करें.”

उन्होंने वर्तमान प्रवृत्ति को दलबदल विरोधी कानून के अक्षरशः और भावना दोनों का उल्लंघन बताया.

‘शशि थरूर एक विद्वान व्यक्ति हैं’

वरिष्ठ कांग्रेस नेता शशि थरूर की टिप्पणियों और पार्टी के गर्म और ठंडे दृष्टिकोण के बारे में पूछे जाने पर, रमेश ने थरूर को “बहुत विद्वान”, “स्पष्ट” और “एक अद्भुत लेखक” बताया, और कहा कि दोनों ने एक लंबा रिश्ता साझा किया है.

साथ ही उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हर राजनीतिक दल अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी पर चलता है. उन्होंने कहा, “कांग्रेस पार्टी के संचार प्रभारी के रूप में, मुझे उम्मीद है कि हमारे सभी नेता सार्वजनिक टिप्पणी करते समय थोड़ा अधिक सावधान रहेंगे, क्योंकि वे सुर्खियां बनते हैं.”

‘मोदी ने ट्रंप को खुश कर लिया’

रमेश ने मोदी पर ट्रंप के साथ नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि भारत ने वाशिंगटन को मजबूत स्थिति में लाने के बजाय राजनयिक स्थान छोड़ दिया है.

यह पूछे जाने पर कि क्या कांग्रेस सरकार ने ट्रंप के साथ अलग तरीके से व्यवहार किया होगा, उन्होंने सवाल को काल्पनिक बताया, यह देखते हुए कि ट्रंप का वर्तमान कार्यकाल संवैधानिक रूप से सीमित है.

उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने परंपरागत रूप से नेताओं के बीच व्यक्तिगत समीकरणों के बजाय भारत के रणनीतिक हितों द्वारा निर्देशित एक स्वतंत्र विदेश नीति का पालन किया है.

उन्होंने कहा, “वास्तविक मुद्दा यह है कि मिस्टर मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप के साथ कोई डील नहीं की है. उन्होंने उन्हें खुश किया है. सबसे पहले, सितंबर 2019 में ‘हाउडी मोदी’ हुआ था. फिर फरवरी 2020 में अहमदाबाद में ‘नमस्ते ट्रंप’ हुआ था. मैं हाल ही में न्यूयॉर्क टाइम्स के दो पत्रकारों की एक किताब पढ़ रहा था, जिसका शीर्षक रिजीम चेंज था, जो ट्रंप के दूसरे प्रशासन के पहले वर्ष के बारे में है. इससे पता चलता है कि मिस्टर मोदी 2025 की शुरुआत में राष्ट्रपति ट्रंप से मिलने के लिए कितने उत्सुक थे.”

उन्होंने कहा, “यहां तक ​​कि द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए हमने जिस रूपरेखा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, वह भी संयुक्त राज्य अमेरिका के पक्ष में झुका हुआ है. हम रियायत के बाद रियायतें दे रहे हैं, जबकि अमेरिकी केवल टैरिफ में कटौती का वादा कर रहे हैं जो अनिश्चित हैं. साथ ही, जब भी हम उनकी नीतिगत प्राथमिकताओं के अनुरूप नहीं होते हैं तो वे हमें अतिरिक्त टैरिफ की धमकी देते रहते हैं.”

उन्होंने कहा, “मिस्टर मोदी केवल मिस्टर ट्रंप से निपटे नहीं हैं, उन्होंने उन्हें खुश किया है और जितना अधिक उन्होंने उन्हें खुश किया है, उतना ही अधिक राष्ट्रपति ट्रंप ने फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को गले लगाया है.”

ईवीएम पर कांग्रेस का रुख

जयराम रमेश ने इस आरोप को खारिज किया कि कांग्रेस सिर्फ चुनाव हारने के बाद ही चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाती है. उन्होंने कहा कि पार्टी की चिंता सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) तक सीमित नहीं है.

उन्होंने कहा, “मामला सिर्फ ईवीएम का नहीं है. चुनावी मतदाता सूची (इलेक्टोरल रोल) भी बड़ा मुद्दा है.”

उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावों में लगातार “हेरफेर” किया जा रहा है. उन्होंने इसके लिए मतदाता सूची, परिसीमन और चुनाव आयोग के कामकाज का जिक्र किया.

उनका दावा था कि भाजपा ऐसी रणनीति सिर्फ उन राज्यों में अपनाती है, जहां उसका चुनावी मुकाबला कड़ा होता है.

हरियाणा, महाराष्ट्र, असम और पश्चिम बंगाल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से विपक्ष असल में “भाजपा और भारत निर्वाचन आयोग के गठबंधन” के खिलाफ लड़ रहा है.

लोकसभा में बेहतर प्रदर्शन विधानसभा चुनाव में क्यों नहीं दोहरा सके

जब उनसे पूछा गया कि लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद कांग्रेस बाद के विधानसभा चुनावों में उसी सफलता को क्यों नहीं दोहरा सकी, तो रमेश ने इस बात को खारिज कर दिया कि पार्टी की रफ्तार धीमी पड़ गई थी.

इसके बजाय उन्होंने आरोप लगाया कि 2024 के आम चुनाव के बाद भाजपा ने अपनी रणनीति बदल दी और बाद के विधानसभा चुनावों में हेरफेर किया.

उन्होंने हरियाणा, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल का ज़िक्र करते हुए आरोप लगाया कि मतदाता सूची और परिसीमन ने चुनाव नतीजों को तय करने में बड़ी भूमिका निभाई.

उन्होंने कहा, “उन्होंने चुनाव आयोग को फास्ट फॉरवर्ड मोड में डाल दिया.”

उन्होंने यह भी कहा कि 2002 में कांग्रेस के 16 मुख्यमंत्री थे, जबकि अब यह संख्या घटकर चार रह गई है.

कांग्रेस की वापसी की योजना

रमेश के मुताबिक, कांग्रेस की वापसी की शुरुआत ज़मीनी स्तर से होगी. उन्होंने कहा कि कांग्रेस को बूथ स्तर पर अपने संगठन को मजबूत करना होगा, स्थानीय स्तर पर अपनी मौजूदगी बढ़ानी होगी और सिर्फ राष्ट्रीय अभियानों पर निर्भर रहने के बजाय जमीनी कार्यकर्ताओं पर निवेश करना होगा.

उन्होंने कहा, “जमीन पर हमारी 24×7 मौजूदगी, खासकर बूथ स्तर पर, काफी बेहतर करनी होगी.” उन्होंने यह भी माना कि कांग्रेस को राज्यों में चुनाव जीतने होंगे और अपना वोट शेयर बढ़ाना होगा.

उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय स्तर पर हमारे पास करीब 21 प्रतिशत वोट हैं, जबकि भाजपा का वोट शेयर बढ़कर करीब 35 प्रतिशत हो गया है. इससे हमारे सामने मौजूद चुनौती का अंदाजा लगता है.”

उन्होंने आगे कहा, “हमें फिर से राज्यों में चुनाव जीतना शुरू करना होगा. आने वाले समय में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में चुनाव होंगे. इन सभी राज्यों में हमारे सामने बड़ी चुनौतियां हैं.”

‘INDIA गठबंधन कभी विधानसभा चुनाव के लिए नहीं बना था’

रमेश ने इस बात को खारिज किया कि विधानसभा चुनावों में सहयोगी दलों के एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने से इंडिया गठबंधन कमजोर या बिखरा हुआ दिखता है.

उन्होंने कहा, “इंडिया गठबंधन राष्ट्रीय चुनाव लड़ने के लिए बनाया गया था.” उन्होंने कहा कि राज्यों की राजनीति हमेशा अलग तरीके से चलती है.

उन्होंने कहा कि यही वजह है कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और केरल में सीपीआई (एम) के खिलाफ चुनाव लड़ती है, लेकिन संसद में राष्ट्रीय मुद्दों पर उन्हीं दलों के साथ मिलकर काम करती है.

जब उनसे पूछा गया कि क्या इंडिया गठबंधन कमजोर हो रहा है, तो रमेश ने कहा कि इसकी असली परीक्षा संसद के मानसून सत्र में होगी.

उन्होंने कहा, “इंतज़ार कीजिए. मानसून सत्र का इंतजार कीजिए. हो सकता है आपको हैरानी हो.” उन्होंने यह भी कहा कि वह विपक्षी दलों के लगातार संपर्क में हैं.

‘डीएमके का साथ छोड़ना गलती नहीं’

रमेश ने संसद में सीटों की व्यवस्था को लेकर डीएमके के साथ हाल में हुए मतभेद को ज्यादा महत्व नहीं दिया. उन्होंने कहा कि भाजपा विपक्ष में फूट दिखाने की कोशिश कर रही है.

उन्होंने इस बात से भी इनकार किया कि तमिलनाडु में कांग्रेस के टीवीके के साथ जाने के फैसले और उसके बाद संसद में सीटों की व्यवस्था को लेकर डीएमके की आपत्ति के कारण इंडिया गठबंधन में कोई दरार आई है.

उन्होंने कहा कि समय के साथ राजनीतिक गठबंधन बदलते रहते हैं. उन्होंने याद दिलाया कि कांग्रेस और डीएमके ने 2014 का लोकसभा चुनाव अलग-अलग लड़ा था, लेकिन बाद में फिर साथ आ गए थे.

तमिलनाडु में टीवीके सरकार में शामिल होने के कांग्रेस के फैसले का बचाव करते हुए रमेश ने कहा कि जो दल किसी सरकार का समर्थन करते हैं, उन्हें बाहर से समर्थन देने के बजाय सरकार का हिस्सा बनने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.

उन्होंने कहा कि कांग्रेस सभी विपक्षी दलों के लगातार संपर्क में है और मानसून सत्र यह साबित कर देगा कि गठबंधन अब भी मजबूत है.

परिसीमन और संविधान

रमेश ने कहा कि भाजपा की योजना सिर्फ परिसीमन विधेयक तक सीमित नहीं है. उनके मुताबिक, पार्टी का बड़ा लक्ष्य संविधान में संशोधन करने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल करना है.

उन्होंने दावा किया कि भाजपा नया संवैधानिक ढांचा तैयार करने की कोशिश कर रही है और चेतावनी दी कि आरक्षण भी खतरे में पड़ सकता है. हालांकि, रमेश ने कहा कि उन्हें “शांत लेकिन पूरा भरोसा” है कि विपक्ष एक बार फिर भाजपा को जरूरी संख्या हासिल करने से रोक देगा.

राम मंदिर ट्रस्ट विवाद

राम मंदिर दान विवाद को “बहुत बड़ा घोटाला” बताते हुए रमेश ने आरोप लगाया कि लोगों से दबाव डालकर चंदा लिया गया और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, “सच्चाई यह है कि आस्था के नाम पर हजारों करोड़ रुपये जुटाए गए. लोग श्रद्धा से मंदिरों में दान देते हैं. मैंने भी पहले दान दिया है, लेकिन यह निजी फैसला होता है. मैं इसका प्रचार नहीं करता. असली सवाल यह है कि यह चंदा कैसे जुटाया गया और उस पैसे का इस्तेमाल कैसे किया गया.”

उन्होंने आगे कहा, “एक ट्रस्ट है और इस सरकार द्वारा नियुक्त लोग, जो आरएसएस-भाजपा से जुड़े हैं, ऐसे कामों में शामिल रहे हैं जिन्हें मैं पूरी तरह अस्वीकार्य मानता हूं. काफी दबाव डालकर काम कराया गया है. जो हम देख रहे हैं, वह बहुत बड़ा घोटाला है.”

राहुल गांधी का शिक्षा अभियान

रमेश ने कहा कि राहुल गांधी का छात्रों से संवाद सिर्फ नीट विवाद तक सीमित नहीं है. यह अभियान शिक्षा व्यवस्था की गहरी समस्याओं—जैसे निजीकरण, व्यवसायीकरण और केंद्रीकरण—की ओर ध्यान दिलाने के लिए चलाया जा रहा है.

उन्होंने कोचिंग संस्थानों की तेज़ी से बढ़ती संख्या का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि आज परिवार निजी कोचिंग पर सरकार द्वारा सरकारी शिक्षा पर किए जाने वाले खर्च से ज्यादा पैसा खर्च कर रहे हैं.

रमेश ने कहा, “फिलहाल ध्यान परीक्षा सुधार पर है, क्योंकि यही हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है. लाखों युवाओं की उम्मीदें इससे जुड़ी हैं. लेकिन इससे भी बड़ा मुद्दा, जिसे राहुल गांधी उठाना चाहते हैं और जिसे उन्होंने कोटा में भी उठाया, वह पूरी शिक्षा व्यवस्था में सुधार का है.”

उन्होंने आगे कहा, “जब हम इस देश में सुधारों की बात करते हैं, तो व्यापार नीति, उद्योग या वित्तीय सुधारों की बात करते हैं, लेकिन शिक्षा क्षेत्र से जुड़े बुनियादी मुद्दे भी हैं. कोटा में मिस्टर गांधी ने एक अहम तुलना की थी. उन्होंने बताया कि निजी परिवार कोचिंग संस्थानों पर जितना खर्च करते हैं, उसकी तुलना में केंद्र सरकार शिक्षा पर बहुत कम खर्च करती है. दोनों की कोई तुलना ही नहीं है.”

कॉकरोच जनता पार्टी

कॉकरोच जनता पार्टी आंदोलन पर रमेश ने कहा कि उन्हें नागरिकों द्वारा चलाए जाने वाले अभियानों से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने इस आंदोलन को राजनीतिक समर्थन क्यों नहीं दिया, तो उन्होंने कहा कि स्थायी राजनीतिक बदलाव सिर्फ मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के जरिए ही आ सकता है.

उन्होंने कहा कि यह आंदोलन युवाओं की निराशा को दिखाता है, लेकिन शिक्षा सुधार जैसे मुद्दों को आखिरकार मुख्यधारा के राजनीतिक दलों को ही उठाना होगा और उन्हें संसद के अंदर और बाहर दोनों जगह आगे बढ़ाना होगा.

(इस इंटरव्यू को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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