ड्रोन क्रांति का नया चरण शुरू हो गया है. हाल के दिनों में कई छोटी-छोटी घटनाओं के साथ सितंबर-अक्टूबर में जो तीन बड़ी घटनाएं हुईं वे भारत में ड्रोन युद्ध के मामले में महत्वपूर्ण सबक सिखाती हैं.
पहला सबक यह है कि यूक्रेन के ‘ऑपरेशन विवाल्दी’ ने दिखा दिया है कि ड्रोन से पटे युद्धक्षेत्र में भी आक्रमण की कार्रवाई की जा सकती है. दूसरे, अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने फोर स्टार ‘ऑटोनोमस वारफेयर कमांड’ (AutoWarCom) के साथ ‘प्रोजेक्ट मेरीडियन’ नामक एक अलग पहल की है. इस पहल के तहत एलन मस्क और पामर लुके सरीखे ‘टेक’ उद्यमियों की भागीदारी से भावी युद्ध के बारे में नये सिरे से विचार किया जाएगा. यूक्रेन में युद्धक्षेत्र कमांड तथा कंट्रोल और ड्रोन ऑपरेशन पर SpaceX के सैन्य ग्रेड वाले स्टारशील्ड उपग्रह संचार सेवा द्वारा लागू प्रतिबंधों का गंभीर प्रभाव पड़ा. इसने टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराने वाले विदेशी स्रोतों के फैसलों के आगे सैन्य ऑपरेशनों की बेबसी को उजागर कर दिया.
युद्ध लड़ने और साज-ओ-सामान के लिए मानव रहित जमीनी वाहन (UGVs) अब कोई नई खोज नहीं रह गए हैं. पिछले सप्ताह, यूक्रेन ने भारी वजन ढोने वाले ड्रोन की मदद से एक घायल सैनिक के बचाव का प्रदर्शन किया. 23 अक्टूबर को एनडीटीवी के विश्व शिखर सम्मेलन में, यूक्रेन युद्ध का आंखों देखा हाल बताते हुए जनरल डेविड पेत्राउस ने कहा कि ड्रोन ने युद्धकला में गहरा बदलाव ला दिया है. उन्होंने कहा कि स्वचालित सिस्टम्स के उभरने से ये बदलाव और ज्यादा बड़े हो जाएंगे. सेनाओं को केवल आधुनिकीकरण नहीं बल्कि संस्थागत बदलाव या परिवर्तन चाहिए.
ये कोई अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं. ये मिलकर उस बुनियादी परिवर्तन की ओर करती हैं कि सेनाओं को किस तरह सोचना, संगठित होना, लैस होना, प्रशिक्षित होना, लड़ना और खुद को मजबूत बनाना चाहिए. भारत के लिए असुविधाजनक सवाल यह है कि हम इस परिवर्तन की तैयारी कर रहे हैं या नहीं, या केवल ड्रोन के रूप में एक ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ के बूते आधुनिकीकरण करने की कोशिश कर रहे हैं.
ऑपरेशन विवाल्दी: जुगाड़ जारी है
ऑपरेशन विवाल्दी ड्रोन और पारंपरिक युद्ध के बीच के रिश्ते का शायद सबसे परिणामकारी प्रदर्शन है.
डोनबास में जवाबी हमले के बाद यूक्रेन का दावा है कि उसने 277 वर्ग किमी क्षेत्र तथा 16 बस्तियों पर फिर से कब्जा किया, अपने सुरक्षित गढ़ पर रूसी हमले को नाकाम किया. इस ऑपरेशन के लिए महीनों तक तैयारी की गई थी और रूसी ड्रोनों के टोही प्रयासों और हमलों का निरंतर मुक़ाबला किया गया. युद्ध में मौतों और उपलब्धियों के बारे में यूक्रेन के दावों पर संभलकर विश्वास करने की जरूरत है, लेकिन युद्धक्षेत्र के स्वतंत्र आकलनों में स्वीकार किया गया है कि जमीनी कब्जे के मामले में बढ़त ली गई है.
महत्वपूर्ण सिर्फ यह नहीं है कि यूक्रेन ने ड्रोनों का सफल उपयोग किया. दोनों पक्ष ने टोही अभियान, लक्ष्य पर कब्जा करने, हमले करने और ड्रोन हमलों के जवाब में ऑपरेशन चलाए. अहम सबक यह है कि ड्रोनों ने हमले के ऑपरेशनों को असंभव नहीं बनाया है. उन्होंने उन ऑपरेशनों को काफी कठिन, चुनौतीपूर्ण और गहन तैयारी पर निर्भर बनाया है.
2023 के बाद से ड्रोनों के लगातार इस्तेमाल, इलेक्ट्रोनिक युद्ध, बारूदी सुरंगों, और ‘सेंसर-टु-शूटर’ कार्रवाइयों ने यूक्रेन में आक्रामक कार्रवाई को धीमा, अधिक उजागर, और ज्यादा खर्चीला बना दिया है. अगस्त 2024 में यूक्रेन ने कुर्स्क पर जो हमला किया था उसे अपवाद मानें— जो कि ऑपरेशन विवाल्दी का परीक्षण स्थल था, बेशक कम गंभीर ड्रोन वाले माहौल में— तो वह मोर्चा प्रथम विश्वयुद्ध के खंदकों के जैसा था. युद्धक्षेत्र इस हद तक पारदर्शी हो गया है कि जिसकी कल्पना एक दशक पहले तक नहीं की जाती थी. छोटे ड्रोन गतिविधियों को पकड़ लेते हैं, फायरिंग के अड्डों, तोपों, आक्रमण करने वाले वाहनों, और सैनिकों की पहचान करते हैं. हमले की तैयारी कर रहे फोर्स द्वारा अपना लक्ष्य हासिल करने से पहले उसकी पहचान करना और उसे चुनौती देना इनका काम होता है.
लेकिन इसका जवाब कार्रवाई न करना या निष्कर्ष निकालना नहीं है कि मौजूदा कंबाइंड आर्म्स पुराने पड़ गए हैं. उनकी कार्रवाई के स्वरूप को बदलने की जरूरत है. सामरिक स्तर पर, ड्रोन कंबाइंड आर्म्स के प्रमुख अंग (शाखा/स्वरूप) बन गए. प्रवृत्ति यह उभरी कि रूसी टोही-आक्रामक ड्रोन सिस्टम का गहराई से मुक़ाबला किया जाए, स्थानीय जवाबी यूएएस और इलेक्ट्रोनिक युद्ध से सुरक्षा के कवच स्थापित किए जाएं, ज्यादा प्रकट कार्रवाइयों के लिए मानव रहित ग्राउंड सिस्टम्स का उपयोग किया जाए, और सैनिकों को उस अवधि के लिए रखा जाए जब उन कार्रवाइयों को जारी रखा जा सके. सार यह कि नेटवर्क से जुड़े रोबोटिक ओवरवाच (ड्रोन और जवाबी यूएएस) को कार्रवाई में लगी फोर्स के ऊपर रखा जाए. ड्रोन टार्गेट को नष्ट कर सकते हैं, साजोसामान को अस्तव्यस्त कर सकते हैं, और अस्वीकार्य नुकसान पहुंचा सकते हैं. वे अपने बूते जमीनी कब्जे को कायम नहीं रख सकते, आबादी पर नियंत्रण नहीं रख सकते, या कोई राजनीतिक नतीजा नहीं हासिल करा सकते.
भारतीय सेना के लिए सबसे अहम सबक यह है कि ड्रोन को कोई अतिरिक्त वेपन सिस्टम या फोर्स मल्टीप्लायर न माना जाए बल्कि उन्हें सेना के कंबाइंड आर्म्स के एक प्रमुख हिस्से के रूप में अपनाया जाए. ड्रोन के वर्चस्व की स्थापना भावी आक्रमण की कार्रवाइयों के लिए, या नियंत्रण रेखा अथवा वास्तविक नियंत्रण रेखा के इर्दगिर्द गतिशील टकराव को संभालने के लिए अनिवार्य है.
अमेरिका ने बनाया ऑटोनोमस वारफेयर कमांड
हेगसेथ ने 30 सितंबर को प्रस्तावित ‘ऑटोनोमस वारफेयर कमांड’ के गठन की घोषणा की. यह चार सितारों वाला क्रियाशील लड़ाकू कमांड है जिसका मकसद पूरी अमेरिकी संयुक्त फोर्स में स्वायत्त तथा रोबोटिक क्षमताओं को बढ़ाना है. यह कमांड अक्टूबर 2027 तक सक्रिय हो जाएगा. उम्मीद की जाती है कि इसमें ड्रोन, एआई, और कमांड-ऐंड कंट्रोल सिस्टम शामिल होंगे. पेंटागन ने ड्रोन और ड्रोन विरोधी टेक्नोलॉजी के लिए 74 अरब डॉलर का बजट प्रस्तावित किया है.
इस घोषणा के साथ एक अलग पहल, ‘प्रोजेक्ट मेरीडियन’ की भी घोषणा की गई जिससे मस्क, ‘एंडुरिल’ के संस्थापक लुके, और पूर्व अमेरिकी हाउस स्पीकर न्यूट गिंगरिख जुड़े होंगे. इस ग्रुप को यह विचार करने का काम सौंपा गया है कि भावी युद्धक्षेत्र कैसा होगा. इसे तेज विकास, टेस्टिंग और फील्डिंग के लिए टेक्नोलॉजी और समाधान की सिफ़ारिश करने का काम सौंपा गया है.
इसका महत्व इस बात में कम है कि एक और हेडक्वार्टर का निर्माण किया जा रहा है, बल्कि इस बात में ज्यादा है कि स्वायत्त युद्ध के लिए संस्थागत अधिकार के महत्व को कबूल किया गया है.
डिफेंस के लिए खरीद की पारंपरिक प्रक्रिया में खरीद का लंबा क्रम रखा जाता है, जरूरतों का विस्तृत ब्योरा होता है, ट्रायल होती है,और ख़र्चीले प्लेटफॉर्मों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम होती है. इसके विपरीत, ड्रोन वाले युद्ध तेज प्रयोगों, कम ख़र्चीले थोक उत्पादन, सॉफ्टवेयर में लगातार अपडेट, इलेक्ट्रोनिक युद्ध के हिसाब से बदलाव, और युद्ध में नष्ट हुए सिस्टम्स को बदलने की क्षमता की मांग करते हैं.
आज जो ड्रोन कारगर है, कल वह कमजोर साबित हो सकता है. फ्रिक्वेन्सी जाम हो सकती हैं, दिशा निर्देश के सिग्नल अस्तव्यस्त किए जा सकते हैं, कंट्रोल लिंक को जब्त किया जा सकता है, और सॉफ्टवेयर की काट तेजी से विकसित कीजा सकती है. इन सबका जवाब जनरल स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट या GSQR केंद्रित खरीफ के अगले चरण का इंतजार करना नहीं हो सकता. युद्धक्षेत्र से मिल रहे फीडबैक को समझकर साजोसामान और चालों में निरंतर परिवर्तन करना पड़ेगा.
अमेरिकी पहल में इस बात को भी कबूल किया गया है कि सेना खुद हर जरूरी टेक्नोलॉजी का विकास नहीं कर सकती. उसे व्यावसायिक आविष्कारों, सॉफ्टवेयर विशेषज्ञता, एआई, रोबोटिक्स, और औद्योगिक उत्पादन पर भी निर्भर रहना पड़ेगा. चुनौती यह है कि इन क्षमताओं को विश्वसनीय मिलिटरी सिस्टम्स में इस तरह कैसे इस्तेमाल किया जाए कि ऑपरेशनों के लिए जरूरत है वह व्यावसायिक प्राथमिकताओं से तय न हो.
भारत इस संस्थागत सबक को जरूर सीखे. हमारे पास सक्षम सरकारी प्रतिष्ठान, निजी डिफेंस कंपनियां, स्टार्टअप्स, अकादमिक संस्थान हैं, और टेक्नोलॉजी क्षेत्र में काम करने वालों की बड़ी फौज है. लेकिन ये सब सेना के लिए प्रभावी आविष्कार की व्यवस्था स्वतः मिलकर नहीं बना सकते. इन्हें जोड़ने के लिए ऐसे अधिकार संपन्न संगठन का अभाव है, जो इन सभी दावेदारों को जोड़ सके— सेना, ऑपरेशन के लिए निर्मित समूह, अनुसंधान संस्थान, उद्योग जगत, खरीदारी करने वाले अधिकारी आदि. और यह संगठन ऐसा हो जो युद्धक्षेत्र में सेना की क्षमता बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हो.
स्टारशील्ड: टेक्नोलॉजी में निर्भरता के खतरे
रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण घटना यह हो सकती है कि स्टारशील्ड को यूक्रेन के लिए प्रतिबंधित किया जा रहा है. विदेशी टेक्नोलॉजी और संप्रभु सैन्य क्षमता के बीच का अंतर अचानक केवल अकादमिक बहस का हिस्सा नहीं रह गया है.
आधुनिक ड्रोन युद्ध सेंसरों, ऑपरेटरों, कमांडरों, और हथियारों को जोड़ने वाले संचार तंत्र पर ज्यादा से ज्यादा निर्भर है. उपग्रह से जुड़ाव के बूते नजर से दूर स्थानों पर भी नियंत्रण दिला सकता है और विशाल क्षेत्र में ऑपरेशन चलाने में मदद कर सकता है. लेकिन यह जुड़ाव अगर निजी स्रोत, विदेशी सरकार पर या विदेश नीति पर निर्भर हो, तब टेक्नोलॉजी के मामले में दुश्मन की कमजोरी राजनीतिक कमजोरी बन सकती है.
भारत के लिए सबक यह है कि महत्वपूर्ण सैन्य कार्रवाइयों के लिए भरोसेमंद विकल्प न हो तो किसी विदेशी स्रोत पर निर्भर न रहा जाए.
भारत को चाहिए— सुरक्षित तथा मजबूत सैन्य संचार तंत्र, देसी उपग्रह और जमीन पर नजर रखने वाला नेटवर्क, कई तरह से काम आने वाले टर्मिनल, वैकल्पिक नेविगेशन सिस्टम, और कनेक्टिविटी कमजोर या बंद किए जाने पर भी ऑपरेट करने की क्षमता. ड्रोन सिस्टम का डिजाइन ऐसा हो कि उपग्रह से दिशानिर्देश न मिले या रिमोट कंट्रोल अनुपलब्ध हो जाए तब भी वह उपयुक्त सुरक्षा तथा ऑपेरशन में बाधा के बावजूद काम लायक रहे. जब वैकल्पिक साधन लड़ने की क्षमता खो रहा हो तब अतिरिक्त साधन को फिजूल का दोहराव नहीं माना जा सकता.
भारत के लिए सबक क्या हैं
‘डिफेंस फोर्सेज़ विजन 2047’ में भारत की सेना में बदलाव का व्यापक स्वरूप बताया गया है, जिसमें तीनों सेनाओं के लिए ‘ड्रोन फोर्स’ के गठन का प्रस्ताव शामिल है. चुनौती इस ‘विजन’ को ऑपरेशन संबंधी ताकत में बदलने की है, न कि एक और दीर्घकालिक आकांक्षा बनाकर रखने की है.
सबसे पहले तो सीडीएस के अधीन तीनों सेनाओं के लिए ‘अनमैंड सिस्टम्स फोर्सेज़ कमांड’ का गठन किया जाए. पारंपरिक ड्रोन फोर्स से आगे जाकर इस फोर्स में हवाई, जमीनी, समुद्री सतह और उसके अंदर मानव रहित सिस्टम्स, रोबोटिक्स, एआई को शामिल किया जाए. रणनीति और ऑपरेशन स्तर की क्षमताओं का विकास करने के साथ तीनों सेनाओं और थिएटर कमांड्स के सामरिक ऑपरेशनों के लिए सुरक्षा छतरी भी बनाई जाए. सिद्धांत केन्द्रित क्षमता निर्माण, संयुक्त ऑपरेशन के लिए तालमेल, और विकेंद्रित सामरिक तैनाती पर आधारित हो. कमान के अधीन अपनी सेना, फंड और उसकी स्पष्ट जवाबदेही हो.
दूसरे, ख़रीदारी की व्यवस्था में सुधार हो और औद्योगिक ताकत बढ़ाई जाए. खरीद का पारंपरिक चक्र तेजी से बदलती ड्रोन टेक्नोलॉजी के साथ कदम नहीं मिला सकता. भारत को चाहिए : खरीदारी की तेज प्रक्रिया, प्रतियोगी फील्ड ट्रायल, मॉडुलर डिजाइन, और युद्धक्षेत्र से फीडबैक पर आधारित निरंतर अपग्रेड. देसी उत्पादन को एसेंबलिंग से आगे बढ़कर अहम पुर्जों, सॉफ्टवेयर, संचारतंत्र, नेविगेशन सिस्टम्स तक जाना होगा. इसके साथ ही, मानव रहित फोर्सेस को ऐसा बनाना होगा कि वे कमजोर संचारतंत्र में बेकार नेटवर्क में भी ऑपरेट करे, और उपग्रह नेविगेशन का विकल्प भी तैयार करना पड़ेगा.
तीसरे, युद्धक्षेत्र में बदलाव को संस्थागत स्वरूप दें. यूक्रेन से मिले सबक को तेजी से सिद्धांत, ट्रेनिंग, फोर्स के ढांचे, और साजोसामान में शामिल व लागू किया जाए. हरेक सैन्य इकाई को ड्रोन, दुश्मन विरोधी मानव रहित सिस्टम्स, का इस्तेमाल करने की सुविधा हो, और वह तमाम टोही निगरानी और इलेक्ट्रोनिक युद्ध के बीच भी अपना ऑपरेशन चलाने में सक्षम हो. मानव रहित सिस्टम्स संयुक्त सेना का अभिन्न अंग बने, न कि संयुक्त सेना वाले युद्ध का तकनीकी विकल्प न बनकर रह जाए.
‘विजन 2047’ को राजनीतिक स्वीकार्यता, मापने योग्य पैमानों, और नियमित ऑडिट का समर्थन मिलना चाहिए. प्रस्तावित ‘अनमैंड सिस्टम्स फोर्सेस कमांड’ को इस परिवर्तन का केंद्रीय औज़ार बनाया जाए. और इसकी प्रगति इससे न आंकी जाए कि इसने कितने सिस्टम्स अधिग्रहीत किए बल्कि इससे आंकी जाए कि ऑपरेशन क्षमता कितनी बढ़ी.
‘विजन 2047’ की असली परीक्षा
युद्ध के व्यापक माहौल में ड्रोन केवल एक औज़ार है. आज के युद्धक्षेत्र में सफलता इस पर निर्भर है कि ऑटोनोमस सिस्टम्स को पारंपरिक सेना में किस हद तक समाहित किया जाता है ताकि कम लागत में व्यवस्था तैयार हो, टेक्नोलॉजी के मामले में मज़बूती हो, और बदलाव को दुश्मन के मुक़ाबले ज्यादा तेजी से अपनाया जाए.
भारत का ‘आर्म्ड फोर्सेज़ विजन 2047’ में आकांक्षाओं से ज्यादा संगठन और ऑपरेशन के स्वरूप में परिवर्तन पर ज़ोर दिया जाए. पर्याप्त अधिकारों से लैस ‘अनमैंड सिस्टम्स फोर्सेस कमांड’ संस्थागत गति प्रदान कर सकता है बशर्ते उसे एक और हेडक्वार्टर में न तब्दील किया जाए या संयुक्त आर्म्स वाले युद्ध को टुकड़ों में बंटने न दिया जाए.
अंतिम कसौटी यह नहीं है कि भारत ने 2047 तक कितने ड्रोन हासिल किए, बल्कि यह है कि अगले पांच साल में इसकी सेनाएं युद्ध लड़ने, कार्रवाई करने और निरंतर निगरानी, ऑटोनोमस सिस्टम्स और इलेक्ट्रोनिक युद्ध वाले युद्धक्षेत्र में टेक्नोलॉजी के मामले में मजबूत दुश्मन के खिलाफ मजबूत ऑपरेशन चलाने में अपनी क्षमता का कैसा प्रदर्शन करती हैं.
लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वह नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड में GOC थे. रिटायरमेंट के बाद वह आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. उनका एक्स हैंडल @rwac48 है. व्यक्त किए गए विचार निजी है.
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