नई दिल्ली: जेल के बाहर हिरासत में लिए जाने की घटना को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू होने के करीब 15 साल बाद, कार्यकर्ता और वकील अरुण फरेरा ने उन्हें दिए गए 2 लाख रुपये के मुआवजे को “बहुत देर से और बहुत कम” बताया है. हालांकि, उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया कि पुलिस की कार्रवाई ने उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया था.
दिप्रिंट से बात करते हुए फरेरा ने कहा कि 2007 से उनके अनुभव में न्यायिक फैसलों में लंबी देरी “काफी आम” हो गई है. उन्होंने कहा कि 2011 में “जेल के गेट के बाहर से उनका अपहरण संविधान के अनुच्छेद 21 और 22(1) का उल्लंघन करने वाला गैरकानूनी कृत्य था.” उन्होंने यह भी कहा कि मुआवजे की रकम तय करते समय लंबे समय तक चली कानूनी लड़ाई को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए था.
फरेरा ने कहा, “मुआवजा बहुत देर से और बहुत कम दिया गया है. मुझे उम्मीद थी कि माननीय पीठ कम से कम लंबे समय तक चले मुकदमे के खर्च पर विचार करेगी.”
बॉम्बे हाई कोर्ट ने 27 अक्टूबर को महाराष्ट्र सरकार को फरेरा को 2 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था. अदालत ने पाया कि उनकी गिरफ्तारी के दौरान संविधान के तहत जरूरी सुरक्षा उपायों का पालन नहीं किया गया था. अदालत ने जोर देकर कहा कि जब पुलिसकर्मी खुद उस कानून का उल्लंघन करते हैं, जिसकी रक्षा करना उनकी जिम्मेदारी है, तो ऐसे मामलों में सजा भी उसी अनुपात में सख्त होनी चाहिए, ताकि इस तरह की हरकतों को रोका जा सके और लोगों का भरोसा बना रहे.
जस्टिस उर्मिला जे. फाल्के और राज डी. वाकोडे की खंडपीठ ने कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी की वजह बताना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है और आरोपों की गंभीरता के आधार पर इसमें कोई छूट नहीं दी जा सकती. अदालत ने कहा कि सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं या चरमपंथी गतिविधियों में कथित संलिप्तता अनुच्छेद 21 को दरकिनार नहीं कर सकती. यह अनुच्छेद जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है. वहीं, अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण बताना और उसे कानूनी मदद लेने का अधिकार देना जरूरी है.
क्या हुआ था
यह विवाद सितंबर 2011 का है. उस समय फरेरा 2007 से हिरासत में थे और उनके खिलाफ कई मामले दर्ज थे. इनमें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) और आर्म्स एक्ट के तहत आरोपों के साथ हत्या, हत्या की कोशिश और आपराधिक साजिश जैसे अपराध भी शामिल थे.
ट्रायल के बाद उन्हें आठ मामलों में बरी कर दिया गया और एक अन्य मामले में आरोपों से मुक्त कर दिया गया. सितंबर 2011 में आखिरी मामले में बरी होने और जरूरी जमानत बॉन्ड जमा करने के बाद उन्हें नागपुर सेंट्रल जेल से रिहा कर दिया गया.
इसके तुरंत बाद जो हुआ, वही इस संवैधानिक चुनौती का मुख्य मुद्दा बन गया.
फरेरा के मुताबिक, जेल से बाहर निकलते ही सादे कपड़ों में आए कुछ लोगों ने उन्हें पकड़ लिया, उनका मुंह बंद कर दिया और बिना नंबर प्लेट वाली गाड़ी में बैठाकर ले गए. बाद में इन लोगों की पहचान पुलिसकर्मियों के रूप में हुई, जिन्होंने उन्हें दो अन्य मामलों के सिलसिले में हिरासत में लिया था.
राज्य सरकार ने हिरासत का बचाव करते हुए कहा कि फरेरा दो अन्य मामलों में पूछताछ के लिए वांछित थे. सरकार ने कहा कि नक्सली समूह से उनके कथित संबंधों के कारण सार्वजनिक जगह पर उनकी गिरफ्तारी से सुरक्षा को खतरा हो सकता था. इसी वजह से पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में थे और गाड़ी की नंबर प्लेट कुछ समय के लिए हटा दी गई थी. सरकार ने यह भी दावा किया कि जब एक पुलिस अधिकारी उनके पास आया तो फरेरा ने भागने की कोशिश की.
फरेरा ने यह भी दलील दी कि उन्हें जरूरी 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया और ट्रांजिट वारंट के बिना नागपुर से बाहर ले जाया गया. जब उन्हें आखिरकार अदालत में पेश किया गया तो उन्होंने हिरासत में लिए जाने के तरीके पर शिकायत की और पुलिस के इस दावे को गलत बताया कि वह फरार थे. उन्होंने कहा कि उस दौरान वह जेल में थे. हालांकि, मजिस्ट्रेट ने उनकी अर्जी पर कोई कार्रवाई नहीं की और उन्हें पुलिस हिरासत में भेज दिया.
अदालत ने क्यों दिया यह फैसला
हाई कोर्ट ने सरकारी पक्ष की कहानी में गंभीर खामियां पाईं. पुलिस स्टेशन की डायरी या जनरल डायरी में ऐसी कोई एंट्री नहीं थी, जिसमें संबंधित अधिकारी की ड्यूटी दर्ज हो या इस दावे का समर्थन हो कि उसे फरेरा को हिरासत में लेने का निर्देश दिया गया था. अदालत ने कहा कि सामान्य प्रक्रिया के तहत पुलिसकर्मियों को सौंपी गई आधिकारिक ड्यूटी का रिकॉर्ड रखना जरूरी है. इससे भी अहम बात यह थी कि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं मिला, जिससे पता चले कि गिरफ्तारी के कारण फरेरा या उनके वकील को बताए गए थे.
पीठ ने इस अंतर को बेहद अहम माना. किसी व्यक्ति को यह बताना कि किसी को गिरफ्तार किया गया है, उसे यह बताने के बराबर नहीं है कि गिरफ्तारी क्यों की गई है.
सुप्रीम कोर्ट के 1997 के डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले के फैसले का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने दोहराया कि गिरफ्तारी के कारण बताना केवल प्रक्रिया से जुड़ी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह अनुच्छेद 21 और 22 से मिलने वाली संवैधानिक सुरक्षा है.
अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 22(1) राज्य पर एक “अनिवार्य और बिना किसी अपवाद वाला कर्तव्य” डालता है कि वह गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण बताए. इससे वह व्यक्ति कानूनी सलाह ले सकता है और अपनी स्वतंत्रता छीने जाने को चुनौती दे सकता है.
पीठ ने जोर देकर कहा कि गंभीर अपराधों या आतंकवाद से निपटने की राज्य की जिम्मेदारी उसकी एजेंसियों को कानून से बाहर जाकर काम करने की इजाजत नहीं देती.
अदालत ने कहा, “समाज की यह अपेक्षा भी है कि पुलिस अपराधियों से कुशल और प्रभावी तरीके से निपटे और अपराध में शामिल लोगों को सजा दिलाए. लेकिन इसका इलाज बीमारी से भी ज्यादा खतरनाक नहीं हो सकता.”
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की उस चेतावनी का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था, “आतंकवाद की चुनौती का सामना नए विचारों और तरीकों से किया जाना चाहिए. आतंकवाद से लड़ने के लिए सरकारी आतंकवाद कोई जवाब नहीं है. सरकारी आतंकवाद केवल ‘आतंकवाद’ को वैधता देगा. यह राज्य, समाज और सबसे बढ़कर कानून के शासन के लिए बुरा होगा.”
अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी से जुड़े सुरक्षा उपायों का मकसद मनमानी कार्रवाई पर रोक लगाना और गिरफ्तारी की शक्ति के दुरुपयोग को रोकना है. इन जरूरतों को केवल औपचारिकता मानने से उस सुरक्षा का मकसद ही खत्म हो जाएगा, जो किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीने जाने पर उसे दी गई है.
इस तरह हाई कोर्ट ने माना कि फरेरा को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लिया गया था. अदालत ने पाया कि गिरफ्तारी से जुड़े सुरक्षा उपायों का “बिल्कुल भी पालन नहीं किया गया”. उसने कहा कि जिस तरीके से उन्हें हिरासत में लिया गया, उससे उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ. खास तौर पर इसलिए क्योंकि न तो उन्हें और न ही उनके परिवार को गिरफ्तारी के कारण बताए गए थे.
अदालत ने कहा, “जब पुलिसकर्मी ही उस कानून का उल्लंघन करते हैं, जिसकी रक्षा करना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है, तो ऐसे उल्लंघन के लिए सजा भी उसी अनुपात में सख्त होनी चाहिए, ताकि इसका असरदार डर पैदा हो और समाज का भरोसा बना रहे.”
अदालत ने इस बात पर भी विचार किया कि क्या इस मामले में शामिल पुलिसकर्मियों को अपनी निजी हैसियत से मुआवजा देना चाहिए या इसकी जिम्मेदारी राज्य की होनी चाहिए. आखिरकार अदालत ने सख्त दायित्व के सिद्धांत के आधार पर राज्य को फरेरा के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए मुआवजा देने का निर्देश दिया.
फरेरा ने 25 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी, जबकि हाई कोर्ट ने उन्हें 2 लाख रुपये देने का आदेश दिया और आगे के मुआवजे के लिए सिविल कोर्ट जाने की छूट दी.
यह पूछे जाने पर कि क्या वह ज्यादा मुआवजे के लिए आगे कानूनी कदम उठाने की योजना बना रहे हैं, फरेरा ने कहा कि वह अपने वकीलों से इस बारे में बात कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “अभी तक कुछ तय नहीं हुआ है.”
यह पूछे जाने पर कि क्या आर्थिक मुआवजा इस तरह के उल्लंघनों को रोक सकता है, फरेरा ने कहा कि “आर्थिक लागत आगे होने वाले उल्लंघनों को रोकने के लिए काफी नहीं है.” उन्होंने बताया कि 2011 की घटना के तुरंत बाद शिकायत दर्ज कराई गई थी. उन्होंने कहा कि उनके वकीलों ने हाई कोर्ट में पुलिस की जवाबदेही का मुद्दा भी उठाया था, हालांकि अदालत ने उनकी इन मांगों को स्वीकार नहीं किया.
आखिरकार, इस फैसले में आरोपों की प्रकृति के बजाय इस बात पर ध्यान दिया गया है कि राज्य ने गिरफ्तारी की अपनी शक्ति का इस्तेमाल कानून के मुताबिक किया या नहीं. आरोप कितना भी गंभीर क्यों न हो, फैसले में साफ किया गया है कि किसी व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता छीनने की प्रक्रिया संविधान के उन नियमों के दायरे में ही रहनी चाहिए, जिनके तहत उसे यह बताना जरूरी है कि राज्य ने उसकी स्वतंत्रता क्यों छीनी है.
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