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Sunday, 1 November, 2026
होममत-विमतनेतन्याहू को अरब विरोधी लहर से 53 सीटें लेकिन अब अरब पार्टियां ही बनीं असली किंगमेकर

नेतन्याहू को अरब विरोधी लहर से 53 सीटें लेकिन अब अरब पार्टियां ही बनीं असली किंगमेकर

इज़रायल के चुनाव में हर कोई जीत का दावा कर रहा है, लेकिन कोई नहीं जीता है.

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इज़रायल की राजनीति में शायद ही कभी कोई दिन नीरस होता है, क्योंकि यहां चुनावी समीकरण काफी मुश्किल है. इस चुनाव को देश की दिशा और सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे बेंजामिन नेतन्याहू के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनाव बताया गया था. इसके नतीजों से दो बड़ी बातें सामने आई हैं. पहली, नेतन्याहू विरोधी गुट की असली परीक्षा अब शुरू हुई है. दूसरी, इसने यह दिखाया है कि 7 अक्टूबर को हमास के नेतृत्व में हुए हमलों के बाद इज़रायल कैसे बंट गया है.

गादी आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाले नेतन्याहू विरोधी गठबंधन के सामने सरकार बनाने के लिए कुछ मुश्किल विकल्प हैं. ‘परिवर्तन के गुट’ की शुरुआत एक ही सोच के आधार पर हुई थी, जैसा कि इसके नाम से भी पता चलता है—नेतन्याहू को सत्ता से हटाना. चुनाव से पहले आइज़ेनकोट ने राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने की किसी भी संभावना को खारिज कर दिया था. उन्होंने कहा था कि वह नेतन्याहू के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल नहीं होंगे, यहां तक कि बारी-बारी से प्रधानमंत्री बनने की व्यवस्था में भी नहीं.

इस गठबंधन में शामिल तीन अन्य पार्टियों के नेताओं ने नेतन्याहू पर इज़रायल को बर्बाद करने का आरोप लगाया है. अगर यह गुट नेतन्याहू के साथ मिलकर एकता सरकार बनाता है, तो उसे सिर्फ अपना अहं नहीं, बल्कि मतदाताओं से किया गया अपना सबसे बड़ा वादा भी छोड़ना होगा.

हर कोई जीत का दावा कर रहा है, लेकिन कोई नहीं जीता है. यही वजह है कि इज़रायल का चुनाव ‘दिप्रिंट न्यूज़मेकर ऑफ द वीक’ है.

नेतन्याहू विरोधी गठबंधन की अग्निपरीक्षा

आइज़ेनकोट के पास नेतन्याहू विरोधी सरकार बनाने और अगला प्रधानमंत्री बनने के तीन रास्ते हैं. वह दो अरब पार्टियों—राम (8 सीट) और जॉइंट लिस्ट (11 सीट)—को साथ लेकर 67 सीटों का गठबंधन बना सकते हैं, लेकिन इसमें कई मुश्किलें हैं.

आइज़ेनकोट ने अपनी सरकार में किसी पार्टी के शामिल होने के लिए चार शर्तें रखी हैं. इनमें इज़रायल को यहूदी और लोकतांत्रिक देश मानना, उसके स्वतंत्रता घोषणापत्र को स्वीकार करना, सभी के लिए सैन्य या राष्ट्रीय सेवा अनिवार्य करना और हमास को एक आतंकवादी संगठन मानना शामिल है, जिसे खत्म किया जाना चाहिए.

अरब पार्टियों ने 7 अक्टूबर के हमले की निंदा ‘आतंकवादी हमला’ कहकर नहीं की है. ऐसे में आइज़ेनकोट की शर्तों को मानना उनके लिए लगभग असंभव लगता है. वहीं, नेतन्याहू विरोधी गुट की चार में से तीन पार्टियों ने वादा किया था कि वे अरब पार्टियों के साथ सरकार में शामिल नहीं होंगी.

इज़रायल में यहूदी-अरब सरकार बनाने की मांग भी उठ रही है. आज रात और विरोध प्रदर्शन होने की योजना है, लेकिन ऐसी सरकार बनने के लंबे समय तक असर होंगे. इसका असर अरब पार्टियों के साथ-साथ यहूदी गुट की कम से कम तीन पार्टियों—याशार, बी’याखद और यिसरायल बेतेनु पर भी पड़ेगा.

अल्पमत वाली सरकार आइज़ेनकोट के लिए सबसे व्यावहारिक विकल्प हो सकती है, लेकिन इसके बनने की संभावना बहुत कम है. ऐसी सरकार राम और ज्यादा रूढ़िवादी जॉइंट लिस्ट के वोटों पर निर्भर होगी. राम के प्रमुख मंसूर अब्बास ने कहा है कि ऐसी सरकार बनने की संभावना लगभग नहीं के बराबर है.

अगर ऐसी सरकार बन भी जाती है, तो वह ज्यादा कमजोर होगी और उसे मजबूत विपक्ष का सामना करना पड़ेगा. ऐसी सरकार के शुरू होते ही खत्म होने की स्थिति होगी.

सैद्धांतिक रूप से आइज़ेनकोट के नेतृत्व वाले गुट के पास एक और विकल्प है. वह अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स पार्टियों शास और यूनाइटेड टोरा यहूदी धर्म का समर्थन मांग सकता है. लेकिन इस गुट ने अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदियों को सैन्य सेवा से मिली छूट खत्म करना अपने चुनाव अभियान के मुख्य मुद्दों में रखा था. ऐसे में उनके साथ जाना फिर से मतदाताओं से किए गए एक बड़े वादे से पीछे हटना होगा.

आइजेनकोट को इजरायल का अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए अपने गठबंधन के अस्तित्व की बुनियादी वजहों में से किसी एक को छोड़ना होगा. यही बात दोनों अरब पार्टियों पर भी लागू होती है, जो इस चुनाव में किंगमेकर बनकर उभरी हैं.

असली एकता वाला गुट

हदाश, बलाद ताआल और राम से मिलकर बनी जॉइंट लिस्ट और अब्बास के नेतृत्व वाली राम में एक समानता है. उन्होंने भी मुख्य रूप से नेतन्याहू को सत्ता से हटाने और इज़रायल की अति-दक्षिणपंथी सरकार को खत्म करने के मुद्दे पर चुनाव लड़ा.

लेकिन इसके बाद दोनों के रास्ते अलग हो जाते हैं. दोनों अरब पार्टियों ने अपराध से लड़ने और इजरायल के अरब समुदायों के लिए निवेश लाने के वादे पर चुनाव लड़ा. हालांकि, इज़रायल के बड़े संघर्ष को लेकर उनका नजरिया अलग था.

चुनाव से पहले के महीनों में अब्बास ने यहूदी बहुमत वाली पार्टियों को संदेश दिया था कि वह सरकार में शामिल हो सकते हैं. उन्होंने योआव सेगलोवित्ज को अपने साथ जोड़ा, जो यहूदी हैं और पहले पुलिस अधिकारी रह चुके हैं. वह जल्द ही राम का प्रतिनिधित्व करेंगे.

दूसरी ओर, जॉइंट लिस्ट ने गाजा में इज़रायल के सैन्य अभियान को ‘नरसंहार’ बताया और ‘वेस्ट बैंक पर कब्जे’ की तुलना दक्षिण अफ्रीका में ‘रंगभेद’ से की.

दोनों पार्टियों को मिले समर्थन को देखकर लगता है कि दोनों तरीके काम कर गए. मंगलवार को इज़रायल के अरब लोगों ने बड़ी संख्या में मतदान किया. करीब 80 प्रतिशत लोगों ने वोट डाला.

उन्होंने दोनों अरब पार्टियों को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है कि इज़रायल की मुख्यधारा की यहूदी पार्टियां अब उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर सकतीं. 2022 के चुनाव के मुकाबले अरब पार्टियों की सीटें लगभग दोगुनी हो गई हैं. अब सरकार किस तरह की होगी, इस पर अंतिम फैसला भी उनके हाथ में हो सकता है.

अरब बहुल इलाकों में मतदान इतना ज्यादा हुआ कि यहूदी पार्टियों को अपने मतदाताओं से वोट डालने के लिए बाहर निकलने की अपील करनी पड़ी.

शिन बेट की जांच में विदेशी दखल और फंडिंग के आरोपों से कुछ सवाल जरूर उठे हैं, लेकिन इज़रायल की 21 प्रतिशत अरब आबादी ने एक स्पष्ट संदेश दिया है—वे असली एकता वाला गुट बनकर उभरे हैं.

सात अक्टूबर के हमलों के बाद अरब विरोधी लहर पर सवार होकर नेतन्याहू 53 सीटें हासिल करने में कामयाब रहे, लेकिन अरब पार्टियों की 19 सीटें यह दिखाती हैं कि नेतन्याहू सरकार की नीतियों से अरब नागरिकों में निराशा और अलगाव की भावना बढ़ी है.

जानकी दवे दिप्रिंट में एडिटर (ऑपरेशंस) हैं. लेख में दिए गए विचार उनके निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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