“7 अक्टूबर 2023 के हमले ने इज़रायल को एक भयंकर युद्ध लड़ने के लिए मजबूर किया.” इजरायल के चुनाव से नौ दिन पहले बेंजामिन नेतन्याहू ने यह बात कही थी. उन्होंने देश की नेशनल सिक्योरिटी डायलॉग के बारे में जानकारी देते हुए यह बयान दिया था. हमास के नेतृत्व में हुए हमलों के बाद यह पहली बार था जब इज़रायल के प्रधानमंत्री ने सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर आमने-सामने जानकारी देने के लिए यरुशलम स्थित अपने कार्यालय में मीडिया को बुलाया था. नेतन्याहू ने भाषण दिया, नक्शे दिखाए और सिक्योरिटी के मोर्चे पर इज़रायल की सफलता का क्रेडिट अपने नेतृत्व को दिया. नेतन्याहू के लिए यह न तो कोई रूटीन प्रोग्राम था और न ही कोई एक्सेप्शन. वह आधिकारिक तौर पर उस नीति को सामने रख रहे थे, जिसे वह लंबे समय से अपना चुके हैं.
इज़रायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे नेतन्याहू के लिए यह चुनाव सिर्फ सत्ता में बने रहने का मामला नहीं था. यह उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा डायलॉग पर भी एक तरह का जनमत संग्रह था. खासकर 7 अक्टूबर के हमले और उसके बाद ‘इज़रायल के दुश्मनों’ के खिलाफ कई मोर्चों पर शुरू किए गए युद्धों के बाद.
चुनाव खत्म हो गया है. दोनों में से किसी भी गठबंधन ने जीत हासिल नहीं की. कोई हारा भी नहीं, लेकिन एक बात साफ है: नेतन्याहू विजेता हैं.
हो सकता है कि वह राजनीतिक रूप से और मजबूत होकर सामने नहीं आए हों, लेकिन उनके पास सेलिब्रेट करने की काफी वजहें हैं. उन्होंने एंटी-इनकंबेंसी का सामना किया, ज्यादातर चुनावी सर्वे को गलत साबित किया और अब उन्हें अपने मतदाताओं से आंशिक मंजूरी मिल गई है. सरकार का भविष्य अभी साफ नहीं है, लेकिन एक बात का जवाब साफ है: अब यह सिर्फ संभावना नहीं है, बल्कि कब होगा, यह समय की बात है. यह जनादेश उन्हें न सिर्फ हमास और हिज़्बुल्लाह के खिलाफ युद्ध जारी रखने, बल्कि ईरान पर एक और हमला करने के लिए भी काफी आत्मविश्वास देगा.
सरकार बनाने के जो भी हालात बनें, उनमें नेतन्याहू को फायदा होगा और इस बात की काफी संभावना है कि 77 साल के नेतन्याहू सत्ता में बने रहेंगे. देश की मुश्किल पॉलिटिक्स, चुनावी प्रोसेस और 7 अक्टूबर के हमास हमलों के बाद बढ़ी अरब-विरोधी भावना की वजह से, चुनाव के नतीजे चार तरह से सामने आ सकते हैं.
अगर एकता सरकार बनती है, जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप चाहते हैं, तो नेतन्याहू प्रधानमंत्री बने रहेंगे. गादी आइज़ेनकोट को ‘बदलाव वाले गठबंधन’ का नेतृत्व करने का अपना रुख छोड़ना पड़ेगा. यही वह मुख्य आधार था, जिस पर उन्होंने अपनी याशार पार्टी बनाई, गठबंधन तैयार किया और 48 सीटें जीतीं. इस सिनेरियो में, नेतन्याहू-विरोधी गुट उन वादों से पीछे हटता हुआ दिखेगा जिन पर उन्होंने अपने वोट हासिल किए थे.
दूसरी संभावना नए सिरे से चुनाव होने की है. नेतन्याहू न सिर्फ अगले कुछ महीनों तक सत्ता में बने रहेंगे, बल्कि उन्हें इसका फायदा भी मिलेगा. देश से बाहर रहने वाले वे इज़रायली, जो बदलाव के लिए वोट देने के लिए वापस आए थे, संभव है कि छह महीने बाद दोबारा इतनी बड़ी संख्या में लौटकर वोट न दें. विपक्षी गुट और अरब पार्टियां भी अक्टूबर के चुनाव में जैसी लामबंदी करने में सफल रही थीं, वैसी दोबारा करने की संभावना कम है.
कागज़ पर एक और विकल्प आइज़ेनकोट का अरब पार्टियों के साथ हाथ मिलाना है, लेकिन इसके सच होने की संभावना बहुत कम है. आखिरी संभावना यह है कि आइज़ेनकोट अरब पार्टियों के साथ समझौता करके माइनॉरिटी सरकार बना लें. ऐसी सरकार किसी भी देश में कमजोर होती है और गहरे मतभेद वाले देश में तो यह और भी कमजोर होगी. सत्ता में 19 साल रहने के दौरान नेतन्याहू ने सरकारें गिराई हैं, दोबारा चुनाव जीते हैं और अपने गठबंधन के साथियों को बदला है. वह कोई राजनीतिक नौसिखिया नहीं हैं.
बीबी के लिए हर स्थिति में फायदा
नेतन्याहू बहुमत हासिल करने में नाकाम रहे. उनके गठबंधन को 2022 के मुकाबले नौ सीटें कम मिलीं, लेकिन अगर इज़रायल के चुनाव में किसी एक नेता को फायदा हुआ है, तो वह नेतन्याहू हैं. अरब विरोधी भावना और नेशनल सिक्योरिटी को लेकर किए गए उनके वादों पर दांव का उन्हें फायदा मिला है. मतदान से पहले ज्यादातर सर्वे में जितना सपोर्ट दिखाया गया था, उससे ज्यादा मजबूत होकर वह सामने आए हैं. अब वह दूसरी पार्टियों के साथ ज्यादा मजबूत स्थिति से बातचीत करेंगे. यह वोट 7 अक्टूबर के हमलों और उसके बाद शुरू किए गए युद्धों के बाद अपनाई गई उनकी नेशनल सिक्योरिटी डायलॉग को मिली मंजूरी है.
लंबे समय से नेतन्याहू ने खुद को ऐसे एकमात्र लीडर के तौर पर पेश किया है जो इज़रायल और यहूदी लोगों की रक्षा कर सकते हैं. उन्होंने खुद को ‘मिस्टर सिक्योरिटी’ के रूप में पेश किया है. “अगर कोई तुम्हें मारने के लिए उठे, तो पहले उसे मार दो”—बेबीलोनियन तालमुद के एक प्राचीन यहूदी ग्रंथ की यह नेतन्याहू का पसंदीदा कोट है, खासकर 2023 के आतंकी हमलों के बाद. उन्होंने सितंबर 2024 में हिज़्बुल्लाह के तत्कालीन प्रमुख हसन नसरल्लाह को मार गिराए जाने के बाद यह बात कही थी. जून 2026 में अमेरिका और इज़रायल के ईरान पर हमलों के संदर्भ में आयोजित एक कार्यक्रम में भी उन्होंने यह बात कही थी और उसके बाद भी कई बार दोहराई है.
इस चुनाव से पहले नेतन्याहू ने अपने वादों और अपनी छवि पर और जोर दिया. उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को ‘लेफ्टिस्ट’ बताया और कहा कि वे इज़रायल की सुरक्षा को खतरे में डालेंगे. जैसे-जैसे मतदान का दिन करीब आया, सिक्योरिटी को लेकर उनके बयान और ज्यादा तेज़ हो गए. रविवार को, मतदान से 48 घंटे से भी कम समय पहले, नेतन्याहू ने एआई से बनाई गई न्यूक्लियर धमाके की एक तस्वीर पोस्ट की. इसमें ऐसा लग रहा था कि विस्फोट तेल अवीव में हुआ है. उन्होंने मतदाताओं को चेतावनी दी कि अगर उन्होंने ऐसा नेता नहीं चुना जो ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को रोक सके, तो इसका नतीजा ‘दूसरा होलोकॉस्ट’ हो सकता है.
उनके विरोधियों के कैंपेन का मुख्य मुद्दा 7 अक्टूबर के हमलों की जवाबदेही और उन्हें रोकने में नेतन्याहू की नाकामी था. वहीं इज़रायल के प्रधानमंत्री ने 7 अक्टूबर के बाद की गई कार्रवाइयों पर ध्यान दिया और उनके मतदाताओं ने उन्हें इसका समर्थन दिया. हो सकता है कि इस चुनाव में वह पिछले चुनाव जितने मजबूत होकर सामने नहीं आए हों, लेकिन बीबी के सामने ऐसी स्थिति है जिसमें हर तरफ से उन्हें फायदा है. उनकी नेशनल सिक्योरिटी डायलॉग को सही ठहराने की कई वजहें उनके पास हैं.
जानकी दवे दिप्रिंट में एडिटर (ऑपरेशंस) हैं. उनका एक्स हैंडल @Janki_H_Dave है. लेख में दिए गए विचार उनके निजी हैं.
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