भारत ने कभी मनमोहन सिंह की चुप्पी का मजाक उड़ाया था. अब उसे उनके उस जवाबदेही वाले दौर की कमी महसूस होती है, जिसके लिए वे जाने जाते थे
पिछले महीने जंतर-मंतर पर हुए युवाओं के प्रदर्शन में मनमोहन सिंह की थोड़ी सी झलक दिखाई दी. इस प्रदर्शन के बाद एक केंद्रीय मंत्री को पद छोड़ना पड़ा था. यह निस्संदेह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाली सरकार के सामने कई सालों में आई सबसे बड़ी चुनौती थी. पूर्व प्रधानमंत्री बार-बार लगाए गए “बुरे दिन वापस दो” के नारों में मौजूद थे. यह नरेंद्र मोदी के बड़े पैमाने पर किए गए “अच्छे दिन” के वादे पर तंज था.
वे उस व्यवहार में भी नज़र आए, जिसका प्रदर्शन कर रहे युवाओं को सामना करना पड़ा. यह उनके अपने उस रुख से बिल्कुल अलग था, जब 2005 में जेएनयू के छात्रों ने उन्हें काले झंडे दिखाए थे और उन्होंने उनके प्रति नरमी बरतने की अपील की थी. वे उन पोस्टरों में भी नज़र आए, जिनमें तीखे अंदाज़ में यह तारीख लिखी थी कि आखिरी बार कोई भारतीय प्रधानमंत्री कब प्रेस के सामने बैठा था और पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए थे—यानी 3 जनवरी 2014. वह पोस्टर एक ऐसे व्यक्ति ने उठाया हुआ था, जो उस समय बच्चा रहा होगा.
आज उस प्रेस कॉन्फ्रेंस को देखना यह समझने जैसा है कि भारत की राजनीतिक संस्कृति कितनी बदल गई है. सिंह शांत और संयमित नज़र आ रहे थे, हालांकि, शायद थोड़े दुखी भी थे. एक रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने 100 पत्रकारों के कम से कम 62 ऐसे सवालों के जवाब दिए थे, जो पहले से तय नहीं थे. उन्होंने अपने सरकार की नाकामियों को शालीनता से स्वीकार किया. साथ ही उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की ताकत और उसकी संस्थाओं की मजबूती की तारीफ की, जिन्होंने लोगों को एक अलग नेता चुनने का मौका दिया.
जब उनसे फिर पूछा गया कि क्या वे एक कमज़ोर प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने अपने मंत्रियों को मनमानी करने दी, तो उन्होंने मशहूर तौर पर कहा था, “मुझे नहीं लगता कि मैं एक कमज़ोर प्रधानमंत्री रहा हूं…मुझे सच में लगता है कि इतिहास मेरे साथ उस समय की मीडिया या संसद में विपक्षी पार्टियों की तुलना में ज्यादा नरमी से पेश आएगा.”
2024 में उनके निधन के बाद अपलोड किए गए उस वीडियो पर हर एक कमेंट में पुरानी यादों की हल्की सी झलक दिखाई देती है. लोगों के मन में उनके और उनकी नीतियों के लिए साफ लगाव दिखता है. साथ ही, उनके शासन के आखिरी दिनों के माहौल की कठोरता को लेकर पछतावे की भावना भी दिखाई देती है.
एक कमेंट में लिखा है: “शुरुआत में उनके रूप, उनके धैर्य और उनकी नीतियों को लेकर उन्हें ट्रोल करना और अब हर जगह ऐसे कमेंट देखना कि सभी उन्हें याद करेंगे—इसमें कहीं न कहीं एक तरह की कविता है. एक बात पर वे सही थे—2014 की उस समय की (गोद में बैठी) मीडिया के मुकाबले इतिहास उनके साथ ज्यादा नरमी से पेश आएगा.”
‘देश मुझे मेरी सज़ा दे सकता है’
29 जुलाई को छात्रों के आंदोलन के कारण तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के चार दिन बाद, सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों ने आखिरकार सिंह की बात से सहमति जताई.
जो लोग यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के आखिरी दौर के समय मौजूद नहीं थे, उनके लिए “कोलगेट” की गंभीरता को समझना मुश्किल है. यह उन कई घोटालों में से एक था, जिसने उस सरकार को लगातार परेशान किया. अगस्त 2012 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने संसद में एक रिपोर्ट रखी. इसमें आरोप लगाया गया कि 57 कोयला ब्लॉक निजी कंपनियों को बिना किसी साफ नियम के और एक ऐसी प्रक्रिया के जरिए दिए गए, जिसमें पारदर्शिता नहीं थी. जबकि कोयला मंत्रालय खुद इन्हें नीलाम करने की सलाह दे चुका था. CAG ने सरकारी खजाने को होने वाले अनुमानित नुकसान की रकम 1.86 लाख करोड़ रुपये बताई थी.
उस साल संसद का मानसून सत्र 19 दिन चला, लेकिन सिर्फ छह दिन ही काम हो सका. उस समय विपक्ष में रही बीजेपी ने बाकी 13 दिन सिंह के इस्तीफे की मांग करते हुए बिताए. सितंबर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ही आदेश में कोयला ब्लॉक के 214 आवंटन रद्द कर दिए.
इसके अलावा, एक मामला जो कोयला मंत्रालय का जिम्मा संभालने के कारण सीधे सिंह से जुड़ गया था, वह तलाबीरा-2 का आवंटन था. 2005 में 25वीं स्क्रीनिंग कमेटी ने तलाबीरा-2 को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन को देने की सिफारिश की थी. यह कंपनी 2,000 मेगावाट का बिजली संयंत्र लगाने की योजना बना रही थी. उस समय उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला ने प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर अपने मामले पर विचार करने की मांग की थी. कोयला सचिव पीसी पारख ने एक संयुक्त उपक्रम का प्रस्ताव दिया, जिसमें सरकारी कंपनियों के साथ बिड़ला की कंपनी हिंदाल्को को भी शामिल किया जा सकता था. प्रधानमंत्री कार्यालय के दो अधिकारियों की आपत्तियों के बावजूद सिंह ने फाइल पर हस्ताक्षर कर दिए.
मामला तुरंत सीबीआई को सौंप दिया गया. सीबीआई ने जांच की और उसे ऐसा कुछ नहीं मिला जिसके आधार पर मुकदमा चलाया जा सके. उसने अगस्त 2014 में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की और इसके बाद अक्टूबर 2014 में दूसरी रिपोर्ट दाखिल की. हालांकि, मार्च 2015 में विशेष जज भरत पाराशर ने सीबीआई की दोनों रिपोर्टों को मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने सिंह के साथ बिड़ला, पारख, हिंदाल्को और उसके दो अधिकारियों को भी अदालत में बुलाया.
सुप्रीम कोर्ट के इस मामले में शामिल होने के बाद भी यह मामला चलता रहा. इस दौरान दो लोकसभा चुनाव हो गए. दिसंबर 2024 में भी यह मामला लंबित था, जब 92 साल की उम्र में सिंह का निधन हुआ और अब—उनकी मौत के 19 महीने बाद, पीठ ने आखिरकार कहा, “हम संतुष्ट हैं कि विद्वान जज के पास सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करने और मामले का संज्ञान लेने की कोई वजह नहीं थी.”
2012 में ही सिंह ने कहा था कि अगर उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में जरा भी सच्चाई हुई, तो वह सार्वजनिक जीवन छोड़ देंगे. उन्होंने कहा था, “देश मुझे मेरी सज़ा दे सकता है.” आरोप साबित होने से पहले ही देश ने खुशी-खुशी उन्हें इसकी सज़ा दे दी.
कोयला आवंटन घोटाले ने दूसरे घोटालों से लगी बदनामी को और गहरा कर दिया. इनमें 2G स्पेक्ट्रम घोटाला भी था, जो 2009 में सामने आया था और जिसमें 1.76 लाख करोड़ रुपये के अनुमानित नुकसान की बात कही गई थी. 2010 का कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला भी था, जिसमें सरकारी खजाने को 70,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. इन सभी घटनाओं ने मिलकर एक “कमजोर” प्रधानमंत्री की छवि को जन्म दिया—एक ऐसे ईमानदार व्यक्ति की छवि, जिसे उसके सहयोगियों और अपनी ही कैबिनेट ने दबाव में रखा हुआ था.
‘कम कामयाब’ से ‘दुखद शख्सियत’ तक
यह सोच धीरे-धीरे बनी और शायद आज भी इसे पूरी तरह बदला नहीं जा सका है. जुलाई 2012 में TIME ने सिंह को अपने एशिया कवर पर जगह दी और उन्हें “The Underachiever” यानी “कम कामयाब” बताया. इस प्रोफाइल में कहा गया कि वह अपने मंत्रियों को नियंत्रित नहीं कर पा रहे थे और सुधारों पर खर्च करने के लिए तैयार नहीं थे. उसी साल बाद में वॉशिंगटन पोस्ट ने उन्हें “दुखद शख्सियत” बताया. उसने सिंह के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू के हवाले से लिखा कि वह सम्मान की नज़र से देखे जाने वाले व्यक्ति से मजाक का विषय बन गए थे.
भारत में मीडिया ने भी इन बातों को खूब उछाला. वहीं विपक्ष ने भी उनके लिए अपने नाम रख दिए—“मौनमोहन”, “नाइट वॉचमैन” या “भारत के अब तक के सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री”. इन बातों को इतनी बार दोहराया गया कि वे सच जैसी लगने लगीं.
वंशवाद पर चलने वाली और कमजोर नेताओं वाली एक पार्टी के खिलाफ लोगों में धीरे-धीरे बढ़ रहा गुस्सा 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनलों के स्टूडियो में भी जगह पा गया. साथ ही, खुद को राजनीति से दूर रखने वाला “इंडिया अगेंस्ट करप्शन” आंदोलन भी इसके साथ जुड़ गया, जिसमें अलग-अलग विचारधाराओं के लोग शामिल हुए. सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और साफ-सफाई की मांग को लेकर उनके हथियार भूख हड़ताल और मार्च थे. ये उस समय सामने आए बड़े-बड़े घोटालों के आंकड़ों से भी मेल खाते थे, जिन्हें समझना किसी के लिए आसान नहीं था.
ये आंकड़े इतने बड़े थे कि उन्हें समझाना मुश्किल था. बाद में CAG के अपने महानिदेशक ने इन्हें “ज्यादा से ज्यादा एक गणितीय अनुमान” कहा. सिंह का शांत और सभ्य अंदाज लोगों की सोच बदलने की लड़ाई में बहुत पीछे रह गया था. इसके काफी समय बाद 2G मामले में आरोपी बनाए गए सभी 17 लोगों को अदालत ने बरी कर दिया.
इसका यह मतलब नहीं है कि लोगों का गुस्सा गलत था. यूपीए-II एक कमजोर सरकार थी और उस पर की गई कई आलोचनाएं सही थीं. कई महीनों तक खाने-पीने की चीजों की महंगाई दो अंकों में रही. 9 प्रतिशत की लगातार आर्थिक विकास दर, जिसे कुछ हद तक भारत का हक माना जाता था, लगातार गिरती चली गई. अगस्त 2013 में रुपया गिरकर करीब 69 रुपये प्रति डॉलर हो गया था, जो आज पीछे मुड़कर देखने पर बहुत ज्यादा लगता है. नीतियां बनाने और फैसले लेने में असली रुकावट दिखाई दे रही थी और लोगों में बदलाव की इच्छा के बीच निराशा का माहौल था.
पिछले दो हफ्तों में हमने एक बार फिर उसी बदलाव की इच्छा को देखा है. ईमानदारी, सही आचरण, जवाबदेही…ये वे शब्द हैं जिनका सिंह के कार्यकाल में खुले तौर पर इस्तेमाल होता था, लेकिन अब भारतीय सार्वजनिक जीवन में इनका इस्तेमाल कम हो गया है. पिछले दो हफ्तों ने हमें यह याद दिलाया है कि सत्ता से सवाल पूछे जा सकते हैं और सत्ता को जवाब देने के लिए मजबूर किया जा सकता है.
हालांकि, इस उत्साह के बीच सिंह को मिली क्लीन चिट लगभग पूरी तरह नज़रअंदाज हो गई. सिंह की जो याद बची है, उसमें उनके लिए लोगों का लगाव है, जिसे आज भी याद करके हममें से कुछ लोगों को शर्मिंदगी हो सकती है और उसके साथ थोड़ा पछतावा भी है. उन दिनों किसी प्रधानमंत्री के बारे में हम सबसे खराब बात यही कह सकते थे कि वह बहुत शांत रहते हैं. इतिहास ने सच में उनके साथ ज्यादा नरमी बरती है, और यह हमारे बारे में नहीं कहा जा सकता.
करनजीत कौर एक पत्रकार, ‘Arré’ की पूर्व संपादक और ‘TWO Design’ में पार्टनर हैं. वह @Kaju_Katri पर ट्वीट करती हैं. विचार उनके निजी हैं.
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