दुनिया में भारत की आर्थिक छवि काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि यहां टैक्स के नियम कितने साफ और तय हैं. जब कारोबारी और निवेशक भारत में पैसा लगाते हैं, तो वे इस भरोसे के साथ निवेश करते हैं कि यहां के नियम और टैक्स व्यवस्था पहले से साफ और तय हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले ने पिछली तारीख से टैक्स लगाने का पुराना डर फिर से पैदा कर दिया है. हमें लगा था कि वोडाफोन और केयर्न एनर्जी से जुड़े लंबे विवादों के बाद यह मामला खत्म हो गया था.
अक्टूबर 2023 में ऑनलाइन गेमिंग पर लागू किए गए नए जीएसटी नियमों को सुप्रीम कोर्ट ने सही माना और इन्हें पिछली तारीख से लागू करने की भी अनुमति दी. DGGI बनाम Gameskraft Technologies (2026) मामले के इस फैसले के बाद करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये की पुरानी टैक्स मांग सामने आई है.
यह साफ है कि गेमिंग सेक्टर में कुछ नियमों से जुड़ी समस्याएं हैं, जिन पर सरकार और कानून बनाने वालों को गंभीरता से ध्यान देने की ज़रूरत है, लेकिन यहां टैक्स का जो बुनियादी सवाल है, वह सिर्फ गेमिंग सेक्टर तक सीमित नहीं है. अगर लंबे समय से चल रही ऐसी टैक्स व्यवस्था, जिसे इंडस्ट्री और सरकारी एजेंसियां दोनों मानती रही हैं, उसे पीछे की तारीख से बदला जा सकता है और उस पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है, तो भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का कोई भी क्षेत्र सुरक्षित नहीं है. आज गेमिंग इंडस्ट्री है, कल कोई दूसरा क्षेत्र भी हो सकता है.
2020 से 2024 के बीच गेमिंग सेक्टर में उस समय लागू टैक्स नियमों को ध्यान में रखते हुए अरबों डॉलर का निवेश आया. अब अगर नियमों को पीछे की तारीख से बदल दिया जाता है, तो ये निवेश बेकार हो सकते हैं. इससे ऐसी कंपनियां भी दिवालिया हो सकती हैं, जो पहले ठीक चल रही थीं. युवा स्टार्टअप संस्थापकों पर भी निजी तौर पर जिम्मेदारी आ सकती है. इससे भी बड़ी चिंता यह है कि जो इंडस्ट्री लगभग बंद होने की स्थिति में है, उससे पिछली तारीख का टैक्स मांगने पर उस पैसे को वसूलना लगभग नामुमकिन होगा. ऐसी टैक्स मांग से सरकार को वास्तव में कोई कमाई नहीं होगी. लेकिन दुनिया की वेंचर कैपिटल कंपनियों को यह संदेश ज़रूर जाएगा कि भारत में नियमों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इसके अलावा, घरेलू गेमिंग इंडस्ट्री पर इतना टैक्स लगाना कि वह खत्म हो जाए, गेमिंग से जुड़ी सामाजिक समस्याओं को खत्म नहीं करेगा.
घरेलू कंपनियों का बाहर निकलना, विदेशी प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ने को बढ़ावा देता है
दुनिया और भारत के अनुभव से पता चलता है कि जब नियमों का पालन करने वाली और सरकारी निगरानी में काम करने वाली घरेलू कंपनियों को कारोबार बंद करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यूजर्स तुरंत विदेशी और गैरकानूनी जुआ वेबसाइटों पर जाने लगते हैं. तमिलनाडु में किए गए एक सर्वे के आधार पर पता चला कि घरेलू पाबंदियों के बाद सर्वे में शामिल 83% गेमर्स बिना सरकारी निगरानी वाली विदेशी बेटिंग साइटों पर चले गए.
ये विदेशी प्लेटफॉर्म वीपीएन, बिना पहचान वाले डिजिटल सिस्टम और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए काम करते हैं. इन पर भारतीय कानून लागू करने वाली एजेंसियों के लिए नजर रखना मुश्किल होता है. पिछली तारीख से टैक्स लगाने और प्रमोशन एंड रेगुलेशन ऑफ ऑनलाइन गेमिंग एक्ट (PROGA) जैसे सभी ऑनलाइन गेमिंग पर रोक लगाने वाले कानूनों के जरिए जब हम घरेलू गेमिंग व्यवस्था को कमजोर करते हैं, तो अनजाने में ऐसे विदेशी और गैरकानूनी नेटवर्क को मजबूत कर देते हैं, जो सरकारी नियमों के दायरे से बाहर हैं.
इस गैरकानूनी नेटवर्क में KYC के नियम बहुत कमजोर होते हैं. जिम्मेदारी के साथ गेमिंग के लिए ज़रूरी नियम नहीं होते. शिकायतों को दूर करने की कोई व्यवस्था नहीं होती और इसका इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग के लिए भी किया जा सकता है. दुख की बात यह है कि इसी गैरकानूनी और बिना निगरानी वाली व्यवस्था में भारतीय नागरिक आर्थिक धोखाधड़ी, बहुत ज्यादा आर्थिक नुकसान और जुए से जुड़ी आत्महत्याओं के सबसे ज्यादा खतरे में होते हैं.
सरकार अवैध और विदेशी प्लेटफॉर्म के खिलाफ कार्रवाई करने की कोशिश कर रही है, लेकिन इंटरनेट की दुनिया बहुत बड़ी है. ऐसे में कानून लागू करने वाली एजेंसियों के लिए हर जगह और हर समय नजर रखना हमेशा मुश्किल रहेगा. यह सरकार के लिए ऐसा रास्ता बनाने का एक महत्वपूर्ण मौका है, जिससे सरकार, अर्थव्यवस्था और नागरिकों—तीनों को फायदा हो. मकसद कारोबारियों के लिए नए बिजनेस के रास्ते खोलना नहीं होना चाहिए, बल्कि हमारे नागरिकों को अवैध और विदेशी गिरोहों की गलत गतिविधियों से मजबूती से बचाना होना चाहिए. सरकार को कुछ चुनिंदा ऑनलाइन मनी गेम्स के लिए सख्त और दुनिया में स्वीकार किए जाने वाले नियम लागू करने की व्यवस्था बनानी चाहिए.
ऐसा करके सरकार दो जरूरी लक्ष्य हासिल कर सकती है: पहला, भविष्य में होने वाली कमाई पर जीएसटी वसूलने की एक सही व्यवस्था बनाई जा सकती है और आगे मिलने वाले अतिरिक्त टैक्स को भी सुनिश्चित किया जा सकता है. दूसरा, कमजोर और जोखिम में रहने वाले लोगों को ऐसे घरेलू सिस्टम में रखा जा सकता है, जहां नियम और निगरानी हो. इससे उन्हें विदेशी ऑपरेटरों के भरोसे छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
टैक्स के साफ और स्थिर नियमों के साथ कड़े और सुरक्षा देने वाले नियम बनाना गेमिंग इंडस्ट्री को कोई छूट देना नहीं है. यह भारतीय उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए जरूरी है. साथ ही, यह भी जरूरी है कि भारत दुनिया के निवेशकों के लिए एक ऐसी जगह बना रहे, जहां नियम स्पष्ट हों और उन पर भरोसा किया जा सके.
कार्ति पी चिदंबरम शिवगंगा से सांसद और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य हैं. वे तमिलनाडु टेनिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष भी हैं. उनका सोशल मीडिया हैंडल @KartiPC है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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