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Wednesday, 5 August, 2026
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‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा कवच की समीक्षा के मूड में सरकार, सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही बढ़ सकती है

'सेफ़ हार्बर' एक कानूनी सिद्धांत है जिसके तहत किसी मध्यस्थ—यानी ऐसा प्लेटफ़ॉर्म जो अपने यूज़र्स द्वारा बनाए गए कंटेंट को होस्ट या ट्रांसमिट करता है—को उस थर्ड-पार्टी कंटेंट के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाता है.

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नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाली एक समिति को बताया है कि वह “सेफ हार्बर” सुरक्षा प्रावधान की समीक्षा कर रही है. यह वही कानूनी सुरक्षा है जो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को उनके यूजर्स द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए कानूनी जिम्मेदारी से बचाती है. सरकार इस बात पर भी विचार कर रही है कि कानून में साफ प्रावधान जोड़ा जाए ताकि अगर किसी प्लेटफॉर्म का गलत इस्तेमाल साइबर ठगी के लिए होता है, तो उसे भी जिम्मेदार ठहराया जा सके और पीड़ित मुआवजे की मांग कर सकें.

ये प्रस्ताव 14 जुलाई 2026 को हुई इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी (IDC) की पांचवीं बैठक की कार्यवाही में दर्ज हैं. यह कार्यवाही भारतीय साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) की चौथी स्टेटस रिपोर्ट के साथ 3 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी. यह रिपोर्ट डिजिटल अरेस्ट से जुड़े फर्जी दस्तावेजों के मामलों पर स्वत: संज्ञान याचिका के तहत दाखिल की गई थी. भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मंगलवार को इस मामले में नए निर्देश भी जारी किए.

सेफ हार्बर एक कानूनी सिद्धांत है. इसके तहत कोई भी इंटरमीडियरी यानी ऐसा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, जो अपने यूजर्स का बनाया हुआ कंटेंट होस्ट या ट्रांसमिट करता है, जैसे मैसेजिंग ऐप, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या ऑनलाइन मार्केटप्लेस, उसे उस कंटेंट के लिए जिम्मेदार नहीं माना जाता.

भारत में यह सुरक्षा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के तहत मिलती है. इसके मुताबिक, अगर कोई इंटरमीडियरी केवल जानकारी को स्टोर या आगे भेजता है, खुद कंटेंट शुरू या उसमें बदलाव नहीं करता और अपनी जिम्मेदारियां निभाते समय जरूरी सावधानी बरतता है, तो उसे कानूनी जिम्मेदारी से छूट मिलती है.

यह जरूरी सावधानी सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021 में तय की गई है. इन नियमों के तहत प्लेटफॉर्म्स को अदालत या सरकारी एजेंसी के निर्देश मिलने पर गैरकानूनी कंटेंट हटाना होता है. उन्हें शिकायत अधिकारी, अनुपालन अधिकारी नियुक्त करने होते हैं और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की मदद करनी होती है. अगर कोई प्लेटफॉर्म इन नियमों का पालन नहीं करता, तो वह यह कानूनी सुरक्षा खो सकता है.

डिजिटल अरेस्ट मामलों में सेफ हार्बर की समीक्षा की बात ऐसे समय सामने आई है जब संसद में भी इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया जा रहा है.

संसद की संचार और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति, जिसकी अध्यक्षता बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे कर रहे हैं, ने इस सप्ताह कहा कि अगर मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फेसबुक वीडियो अस्थायी रूप से हटाने के मामले में माफी नहीं मांगते, तो मेटा से धारा 79 के तहत मिलने वाली सेफ हार्बर सुरक्षा वापस ले ली जानी चाहिए. समिति ने यह भी कहा कि जो सोशल मीडिया कंपनियां भारतीय कानूनों का पालन नहीं करतीं, उनसे यह सुरक्षा वापस लेने की सिफारिश सर्वसम्मति से की गई है. समिति ने मेटा अधिकारियों से बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) समेत आपत्तिजनक कंटेंट की उपलब्धता पर भी सवाल पूछे.

हालांकि, कोई संसदीय समिति अपने आप सेफ हार्बर सुरक्षा खत्म नहीं कर सकती. धारा 79 कानून के तहत मिली सुरक्षा है और इसे बदलने या हटाने के लिए संसद में कानून में संशोधन करना होगा. इसके लिए सरकार को संशोधन विधेयक लाना पड़ेगा. समिति केवल जांच कर सकती है, अधिकारियों को बुला सकती है और सिफारिश कर सकती है. वहीं मौजूदा कानून के तहत अगर कोई प्लेटफॉर्म अदालत के आदेश या सरकार की सूचना पर कार्रवाई नहीं करता, तो वह धारा 79(3) के तहत यह सुरक्षा खो सकता है. लेकिन किसी मामले में ऐसा हुआ है या नहीं, इसका फैसला अदालत करेगी, समिति नहीं.

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) से जुड़े जिन मुद्दों पर कार्रवाई जरूरी बताई गई है, उनमें सेफ हार्बर प्रावधान की समीक्षा भी शामिल है. इसके साथ ही आईटी एक्ट में ऐसा स्पष्ट प्रावधान जोड़ने की जरूरत दोहराई गई है, जिससे अगर किसी प्लेटफॉर्म का गलत इस्तेमाल होता है तो उसे भी जिम्मेदार ठहराया जा सके और पीड़ित मुआवजे की मांग कर सकें. ऐसा बदलाव धारा 79 के तहत मिलने वाली मौजूदा कानूनी सुरक्षा को सीमित करेगा और इसके लिए कानून में संशोधन जरूरी होगा.

यह मांग ऐसे समय आई है जब समिति की पिछली बैठक में सरकार ने माना था कि कुछ प्लेटफॉर्म्स पर उसका नियंत्रण बहुत सीमित है.

MeitY ने समिति को बताया कि उसे सिग्नल प्लेटफॉर्म से संपर्क करने में दिक्कत हुई क्योंकि सिग्नल ने अपने शिकायत अधिकारी की संपर्क जानकारी सार्वजनिक नहीं की है. मंत्रालय ने यह भी कहा कि फिलहाल ऐसा कोई व्यापक सिस्टम नहीं है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी इंटरमीडियरी 2021 के आईटी नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं, और नियमों के उल्लंघन पर क्या कार्रवाई हो. समिति ने I4C से कहा कि वह सिग्नल के साथ समन्वय में आने वाली दिक्कतों पर MeitY को औपचारिक रिपोर्ट भेजे.

आईटी नियमों के तहत सभी इंटरमीडियरी को शिकायत अधिकारी, नोडल संपर्क अधिकारी और मुख्य अनुपालन अधिकारी नियुक्त करना और उनकी संपर्क जानकारी सार्वजनिक करना जरूरी है. इसी व्यवस्था के जरिए आम लोग और कानून लागू करने वाली एजेंसियां प्लेटफॉर्म से संपर्क करती हैं. कानून लागू करने वाली एजेंसियों को यह जानकारी हासिल करने में दिक्कत आने के बाद समिति ने सुझाव दिया कि भारत में काम करने वाले सभी इंटरमीडियरी के लिए एक राष्ट्रीय पंजीकरण प्रणाली बनाई जाए, जिसमें इन अधिकारियों की पूरी जानकारी दर्ज हो.

समिति ने डिजिटल विज्ञापनों को भी नियमों के दायरे में लाने की मांग की. समिति का कहना है कि साइबर अपराध करने के लिए डिजिटल विज्ञापनों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है. साथ ही आईटी एक्ट की धारा 67C के तहत इंटरमीडियरी द्वारा डेटा सुरक्षित रखने और साझा करने से जुड़े नियम जल्द अधिसूचित करने की भी मांग की गई.

प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारियों के मामले में समिति के सामने एन्क्रिप्शन का मुद्दा भी आया. रिपोर्ट के साथ लगी अपनी प्रस्तुति में व्हाट्सऐप ने कहा कि “सिंथेटिकली जनरेटेड इंफॉर्मेशन” यानी डीपफेक कंटेंट की पहचान और लेबल लगाने वाले नियम एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड कंटेंट पर लागू करना संभव नहीं है. कंपनी ने कहा कि बातचीत में शामिल लोगों के अलावा कोई भी, यहां तक कि व्हाट्सऐप भी, उन मैसेज या कॉल तक पहुंच नहीं सकता. इसलिए उसकी पहचान करने वाली तकनीक केवल उन हिस्सों पर काम करती है जो एन्क्रिप्टेड नहीं हैं.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि MeitY एक नया पोर्टल बना रहा है, जिसका नाम एडजुडिकेशन एंड कंप्लायंस डिजिटल सिस्टम (ACDS) है. यह एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म होगा जो आईटी एक्ट की धारा 46 के तहत होने वाली अर्ध-न्यायिक प्रक्रियाओं को पूरी तरह ऑनलाइन संचालित करेगा. इसमें शिकायतकर्ता, आरोपी पक्ष और निर्णय लेने वाले अधिकारी एक ही सिस्टम से जुड़े होंगे.

MeitY ने अपनी एक्शन टेकन रिपोर्ट में बताया कि पोर्टल तैयार हो चुका है, लेकिन मौजूदा कानूनी ढांचे से जुड़े कुछ कानूनी और प्रक्रियात्मक मुद्दों की जांच की जा रही है. समिति ने मंत्रालय से इस सिस्टम को जल्द शुरू करने को कहा.

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अपने आदेश में MeitY, दूरसंचार विभाग (DoT) और I4C को इंटरमीडियरी प्लेटफॉर्म्स के साथ मिलकर ऑडियो और वीडियो कॉल पर समय सीमा लगाने के प्रस्ताव की व्यवहारिकता, इस्तेमाल, सुरक्षा उपायों और दूसरे विकल्पों पर विचार करने और इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट अदालत में पेश करने का निर्देश दिया.

मामले की अगली सुनवाई 16 सितंबर को होगी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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