नई दिल्ली: व्हाट्सऐप ने भारतीय साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) के साथ उन अकाउंट्स की जानकारी साझा करने पर सहमति जताई है जिन्हें उसने बैन किया है. साथ ही, वह कानून लागू करने वाली एजेंसियों के लोगो का अपना डेटाबेस भी साझा करेगा, जिसका इस्तेमाल फर्जी पुलिस या सरकारी अधिकारी बनकर लोगों को ठगने वालों की पहचान करने के लिए किया जाता है. हालांकि, व्हाट्सऐप ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाली समिति से कहा है कि डिजिटल अरेस्ट घोटालों में लंबे वीडियो कॉल को अपने आप बंद करने वाला ‘किल स्विच’ कोई प्रभावी समाधान नहीं है.
व्हाट्सऐप ने डिजिटल अरेस्ट घोटालों पर अपनी जांच की रिपोर्ट भी समिति को सौंपी. इसमें बताया गया कि ऐसे मामलों में “हर 3 में से करीब 1” पीड़ित खुद ही कॉल करता है.
ये सभी बातें I4C की चौथी स्टेटस रिपोर्ट का हिस्सा हैं, जो 3 अगस्त को डिजिटल अरेस्ट घोटालों पर चल रही स्वत: संज्ञान (Suo Motu) सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई. इनमें से कई दस्तावेज गोपनीय हैं. इनमें 13 मार्च 2026 को व्हाट्सऐप की लिखित प्रस्तुति और 1 मई व 22 मई की एक्शन टेकन रिपोर्ट भी शामिल हैं.
भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मंगलवार को इस मामले में नए निर्देश भी जारी किए.
व्हाट्सऐप ने समिति को बताया कि वह दिसंबर 2026 की समय सीमा से पहले सिम-बाइंडिंग सिस्टम लागू करने की दिशा में काम कर रहा है. यानी व्हाट्सऐप अकाउंट को एक सत्यापित सिम से जोड़ा जाएगा. कंपनी ने कहा कि संदिग्ध गतिविधियों की पहचान करने वाला डिवाइस आधारित रिस्क डिटेक्शन सिस्टम पहले से चालू है. साथ ही, वह बैन किए गए अकाउंट्स की जानकारी और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लोगो का अपना फोटो बैंक भी I4C के साथ साझा करेगी.
हालांकि, दो मुद्दों पर व्हाट्सऐप ने अपनी सीमाएं भी साफ कर दीं. सिंथेटिकली जनरेटेड इंफॉर्मेशन यानी डीपफेक कंटेंट की पहचान और लेबल लगाने वाले नियमों पर कंपनी ने कहा कि एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड कंटेंट पर इन्हें लागू करना संभव नहीं है. क्योंकि मैसेज और कॉल पूरी तरह निजी होते हैं और बातचीत में शामिल लोगों के अलावा कोई भी, यहां तक कि व्हाट्सऐप भी, उन्हें पढ़, सुन या साझा नहीं कर सकता. कंपनी ने कहा कि उसके सुरक्षा उपाय केवल उन हिस्सों पर लागू होते हैं जो एन्क्रिप्टेड नहीं हैं.
इसके बाद समिति ने व्हाट्सऐप से यह भी कहा कि अज्ञात नंबर से आने वाले वीडियो कॉल में कॉल करने वाले की लोकेशन दिखाने की तकनीकी संभावना, गोपनीयता और कानूनी पहलुओं पर एक नोट तैयार किया जाए.
समिति को दी गई जानकारी में व्हाट्सऐप ने बताया कि वह धोखाधड़ी पकड़ने के लिए तीन स्तर वाली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रणाली का इस्तेमाल करता है. पहले स्तर पर अकाउंट्स की तुलना पहले से मौजूद डेटाबेस से की जाती है, जिसमें धोखाधड़ी से जुड़े नाम, लोगो और तस्वीरें होती हैं. इसमें मुंबई पुलिस, दिल्ली पुलिस, सीबीआई जैसी एजेंसियों के बैज, वर्दी, कोर्ट की मुहर या भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों की पहचान का गलत इस्तेमाल करने वाले नाम शामिल हैं.
दूसरे स्तर पर यह नहीं देखा जाता कि अकाउंट का नाम क्या है, बल्कि यह देखा जाता है कि उसका व्यवहार कैसा है. सिस्टम यह जांचता है कि शिकायतें कहां से आ रही हैं, क्या अकाउंट खुद को पुलिस या किसी एजेंसी के रूप में पेश कर रहा है, ठग कौन से आम शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं और जबरदस्ती या दबाव बनाने से जुड़े कौन से पैटर्न दिखाई दे रहे हैं. इससे ऐसे मामलों की भी पहचान हो जाती है जहां ठग अपना नाम, प्रोफाइल फोटो या मैसेज थोड़ा बदल देते हैं ताकि वे सिस्टम से बच सकें.
तीसरे स्तर पर भाषा मॉडल प्रोफाइल टेक्स्ट, तस्वीरों और रिपोर्ट किए गए मैसेज का विश्लेषण करते हैं. इससे ठगों की नई चालें, नकली लोगो और ऐसे बदले हुए शब्द पकड़ में आते हैं जो सामान्य कीवर्ड जांच से बच सकते हैं.
व्हाट्सऐप ने समिति को बताया कि वह तस्वीरों पर ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्निशन (OCR) के जरिए कीवर्ड मिलान भी करता है. साथ ही, वह “एनफोर्स अगेंस्ट द नेटवर्क” तरीका अपनाता है. यानी सरकार से मिली जानकारी और रिपोर्ट किए गए अकाउंट्स को आधार बनाकर पूरे ठगी नेटवर्क की पहचान कर उसे खत्म करने की कोशिश करता है, न कि सिर्फ एक-एक अकाउंट को बैन करता है.
कंपनी के मुताबिक, OCR कीवर्ड मिलान से अच्छे नतीजे मिले. जनवरी में धारा 79 के तहत हटाने के लिए भेजे गए करीब 3,800 अकाउंट्स में से 17 अकाउंट्स से जांच शुरू हुई. साझा IP एड्रेस के जरिए यह जांच बढ़कर करीब 9,400 अकाउंट्स तक पहुंची, जिनमें से कई का संबंध दक्षिण-पूर्व एशिया के स्कैम सेंटरों से था. इन सभी अकाउंट्स को 12 हफ्तों में बैन कर दिया गया.
व्हाट्सऐप ने बताया कि उसने “दिल्ली पुलिस मुख्यालय”, “CBI” और “ATS विभाग” जैसे बिजनेस नामों और “Emergency Portal 24/7” जैसे ‘About’ सेक्शन के शब्दों के जरिए भी फर्जी अकाउंट्स की पहचान की. कंपनी ने इस जानकारी को मालिकाना और गोपनीय बताया और कहा कि बिना उसकी अनुमति के इसे सार्वजनिक न किया जाए.
‘किल स्विच’ के मुद्दे पर व्हाट्सऐप अपने रुख पर कायम है. यह सुझाव सुप्रीम कोर्ट की एमिकस क्यूरी, वरिष्ठ वकील एन. एस. नप्पिनई ने दिया था. इसके तहत वीडियो कॉल की अधिकतम समय सीमा तय करने या उसे अपने आप बंद करने का प्रस्ताव था ताकि ठग पीड़ितों को लंबे समय तक कॉल पर रखकर डराने-धमकाने का मौका न पा सकें.
4 मई की बैठक में व्हाट्सऐप ने कहा था कि उसके पास ऐसा कोई फीचर नहीं है और न ही वह इसे बना रहा है. इसके बाद समिति ने कंपनी से 10 दिन के भीतर इसकी समयसीमा बताने को कहा. 22 मई की रिपोर्ट में व्हाट्सऐप ने अपना अंतिम पक्ष रखा. कंपनी ने कहा कि समय के आधार पर कॉल बंद करने वाला ‘किल स्विच’ असली समस्या का समाधान नहीं करता. यह सिर्फ कॉल को बीच में रोकता है.
कंपनी का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति यह मान चुका है कि उसे तुरंत गिरफ्तार किया जाएगा, तो वह दोबारा कॉल करेगा या दूसरी कॉल उठा लेगा. अचानक कॉल कटने से वह और ज्यादा घबरा सकता है और खुद ही दोबारा कॉल कर सकता है.
व्हाट्सऐप ने अपने तर्क के समर्थन में बताया कि ठग शुरुआत में ही पीड़ितों को किसी भी हालत में कॉल न काटने की हिदायत देते हैं. वे कई अकाउंट्स का इस्तेमाल करते हैं ताकि कॉल कटने पर तुरंत दूसरे नंबर से दोबारा संपर्क कर सकें. उनके पास ऐसी स्क्रिप्ट भी होती है जो तकनीकी रुकावटों का पहले से जवाब देने के लिए तैयार रहती है.
कंपनी के विश्लेषण के अनुसार, एक घंटे से ज्यादा चली कॉल्स में, जिनमें बाद में पीड़ितों की पुष्टि हुई, 30 प्रतिशत से ज्यादा कॉल खुद पीड़ितों ने की थीं. इन तथ्यों के आधार पर व्हाट्सऐप ने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है कि 1-2 घंटे या उससे ज्यादा समय के बाद कॉल अपने आप बंद करने वाला ‘किल स्विच’ डिजिटल ठगी को प्रभावी तरीके से रोक पाएगा.
व्हाट्सऐप ने यह भी कहा कि एक घंटे से ज्यादा चलने वाली 99 प्रतिशत से अधिक कॉल पूरी तरह वैध होती हैं. अगर ‘किल स्विच’ लगाया गया तो तय समय के बाद हर वीडियो कॉल अपने आप कट जाएगी, चाहे वह किसी जरूरी काम के लिए ही क्यों न हो.
कंपनी ने ऐसे लोगों के उदाहरण भी दिए जो लंबी वीडियो कॉल पर निर्भर रहते हैं. जैसे रात की ड्यूटी करने वाली महिला टैक्सी ड्राइवर जो सुरक्षा के लिए परिवार से वीडियो कॉल पर जुड़ी रहती हैं. टेलीमेडिसिन और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मरीज. JEE, NEET और UPSC की तैयारी करने वाले छात्र जो रातभर पढ़ाई करते हैं. और विदेशों में रहने वाले भारतीय जो वीडियो कॉल के जरिए अपने बुजुर्ग माता-पिता का हालचाल लेते रहते हैं. वहीं, एमिकस क्यूरी का कहना था कि ऐसा सिस्टम पीड़ित की इच्छा पर निर्भर नहीं होना चाहिए क्योंकि डर के माहौल में फंसा व्यक्ति खुद कॉल खत्म नहीं कर पाता.
22 मई की रिपोर्ट के बावजूद समिति ने इस मुद्दे को बंद नहीं माना. 14 जुलाई को हुई पांचवीं बैठक की कार्यवाही में समिति ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से ऑडियो और वीडियो कॉल देने वाले प्लेटफॉर्म्स पर प्रस्तावित ‘किल स्विच’ व्यवस्था को लेकर लंबित एक्शन टेकन रिपोर्ट देने को कहा. यानी व्हाट्सऐप की रिपोर्ट के करीब दो महीने बाद भी इस पर अंतिम जवाब लंबित था.
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने निर्देश दिया है कि ऑडियो और वीडियो कॉल पर समय सीमा लगाने के प्रस्ताव की व्यवहारिकता, इस्तेमाल, सुरक्षा उपायों और दूसरे विकल्पों की जांच की जाए और इसकी रिपोर्ट अदालत के सामने पेश की जाए. मामले की अगली सुनवाई 16 सितंबर को होगी.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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