जोधपुर: जोधपुर के पुराने शहर में कैरन रॉन्सले का पता किसी को पूछने की जरूरत नहीं पड़ती. अगर आप उस बुजुर्ग आयरिश व्यक्ति के बारे में पूछें जो शहर की सदियों पुरानी बावड़ियों की सफाई करता है, तो जिन लोगों को उसका नाम भी नहीं पता, वे भी रास्ता बता देंगे. कुछ लोग कहेंगे कि वह शायद तूरजी का झालरा की सीढ़ियों पर बैठा होगा. अगर वहां नहीं मिला, तो पास की चाय-ऑमलेट की दुकान पर होगा, या फिर सरदार मार्केट के घंटाघर के पास बने पुराने मंदिर में.
80 साल के रॉन्सले पिछले करीब एक दशक से जोधपुर की ऐतिहासिक बावड़ियों और झालरों से प्लास्टिक, गाद और कचरा निकालने का काम कर रहे हैं. शुरुआत में स्थानीय लोग उन्हें “पागल साहब” कहते थे, क्योंकि उन्हें समझ नहीं आता था कि लंदन से हजारों किलोमीटर दूर आया कोई व्यक्ति राजस्थान की भीषण गर्मी में अपनी रिटायरमेंट के दिन मध्यकालीन जलाशयों की सफाई में क्यों बिताएगा.
अब, यहां आए 10 साल से ज्यादा हो चुके हैं और वह शहर की पहचान का हिस्सा बन गए हैं. लोग उन्हें जोधपुर का “एक्वामैन” भी कहते हैं. ये बावड़ियां सिर्फ सजावट के लिए नहीं थीं. सदियों तक ये रेगिस्तानी शहर के लिए पानी का मुख्य स्रोत थीं. इनमें मानसून का पानी जमीन के अंदर जमा रहता था, जिससे वह जल्दी नहीं सूखता था. लेकिन जोधपुर की 134 बावड़ियों में से कई सालों तक कूड़ाघर और खुले शौचालय बन गई थीं. रॉन्सले इन्हें फिर से बचाने की कोशिश कर रहे हैं. एक-एक फावड़ा गंदगी निकालकर.
जो महिलाएं आमतौर पर परदे में रहती हैं और अनजान पुरुषों से बात नहीं करतीं, वे भी अब रॉन्सले को देखते ही नमस्ते करती हैं. जब वह उस गेस्टहाउस से बाहर निकलते हैं जिसे अब अपना घर कहते हैं, तो कुछ महिलाएं हाथ हिलाती हैं, कुछ टूटी-फूटी अंग्रेजी में उनसे बात करती हैं. रॉन्सले अपनी साफ विदेशी लहजे में कहते हैं, “राम राम.”
मुझे लगता है कि लोग मुझसे इसलिए प्रेरित होते हैं क्योंकि मैं भारत से नहीं हूं. अगर बाहर से आया कोई व्यक्ति इन बावड़ियों की अहमियत समझ सकता है, तो इससे दूसरों को भी इनकी देखभाल करने की प्रेरणा मिलती है.
– कैरन रॉन्सले
अब रॉन्सले का नाम और उनका “पागल साहब” वाला नाम जोधपुर से बाहर भी मशहूर हो चुका है. इस महीने की शुरुआत में उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने X पर “पागल साहब कैरन” की तारीफ करते हुए लिखा कि उन्हें जोधपुर से प्यार है और भारतीय विरासत के लिए उनका समर्पण और जुनून काबिल-ए-तारीफ है. उन्होंने यह भी कहा कि अब भारत की बावड़ियों को बचाने के लिए “पागल” या “विदेशी” होना जरूरी नहीं है.

महिंद्रा ने उन लोगों का भी जिक्र किया जो पहले से यह काम कर रहे हैं. जैसे राजेंद्र सिंह, जिन्होंने अलवर में पिछले 40 साल से तरुण भारत संघ के जरिए जोहड़ों को फिर से जीवित किया. कल्पना रमेश, जिन्होंने तेलंगाना में 25 बावड़ियों को पुनर्जीवित किया. और जयपुर की संस्था प्रोजेक्ट बावड़ी, जो राजस्थान के गांवों की बावड़ियों को फिर से ठीक कर रही है. लेकिन जोधपुर में इस काम के सबसे बड़े चेहरे कैरन रॉन्सले ही रहे हैं.
जुलाई 2026 में राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी ने जोधपुर दौरे के दौरान रॉन्सले से मुलाकात की. इस मुलाकात का एक वीडियो भी सामने आया, जिसमें उन्होंने रॉन्सले के काम की तारीफ की और कहा कि उनकी कोशिशें सरकार की पुरानी जल संरचनाओं को बचाने की योजना से मेल खाती हैं. जब दिया कुमारी ने उन्हें अपना देश छोड़कर भारत में काम करने के लिए धन्यवाद दिया, तो रॉन्सले मुस्कुराते हुए तुरंत बोले.
“मेरा देश भारत है. अब मैं भारत का ही हिस्सा हूं.”
जोधपुर तक पहुंचने का सफर
जहां रॉन्सले रहते हैं वहां तक पहुंचने के लिए करीब 100 मीटर की चढ़ाई चढ़नी पड़ती है. रास्ता संकरी और टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से होकर जाता है, जो हर मोड़ के साथ और कठिन हो जाती हैं. यह रास्ता इतना मुश्किल है कि ऑटो रिक्शा वाले भी वहां जाने से मना कर देते हैं.
वह एक साधारण से गेस्टहाउस के कमरे में रहते हैं. चारों तरफ चट्टानी इलाके में बने घर हैं. वहां से दूर मेहरानगढ़ किले की दीवारें साफ दिखाई देती हैं. वह बाहर गली में खड़े होकर चाय और रस्क खाते हुए आराम से बातें करते हैं. वह लंबे, बेहद दुबले हैं और उन्हें कहीं पहुंचने की कोई जल्दी नहीं दिखती.

रॉन्सले के लिए किसी दूसरे देश को अपना घर बनाना नई बात नहीं है. वह पहले इंग्लैंड के नॉरफोक में सिरेमिक कलाकार थे. 1989 में पाकिस्तान गए थे, जहां दो-तीन साल रहने का इरादा था, लेकिन 20 साल वहीं रहे. उन्होंने कराची में पढ़ाया और बाद में सिंध के अंदरूनी इलाकों में स्कूलों और पर्यावरण से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम किया. इसके बाद वह इंग्लैंड लौट गए.
उनके मुताबिक, उन्हें भारत उनकी मां यहां लेकर आईं.
“मैं अपनी मां के अतीत की तलाश में भारत आया था.”
उनकी मां का नाम एलेन था, हालांकि बाद में उन्होंने कैरोलिन नाम अपना लिया. उनका बचपन कश्मीर में बीता, जहां उनके पिता ब्रिटिश शासन के दौरान रेलवे अधिकारी थे.
“मेरी मां का बचपन कश्मीर में अपने माता-पिता के साथ बीता. वे बहुत अच्छे लोग थे. मेरी मां के रिश्तेदार जोधपुर में रहते थे. उन्होंने इस शहर में काफी समय बिताया था.” रॉन्सले ने कहा.
बड़ी होने के बाद कैरोलिन कई बार भारत लौटीं. बचपन का वह जुड़ाव उनके साथ हमेशा बना रहा.
मेरी बेटी और मेरे पोते-पोतियों ने मुझसे कहा कि यूरोप में अब जीवन की गुणवत्ता पहले जैसी नहीं रही. मुझे उम्मीद है कि मैं अपनी आखिरी सांस भारत में लूंगा.
– कैरन रॉन्सले
2014 में उनके बेटे ने भी मां के कदमों पर चलने का फैसला किया. रॉन्सले इंग्लैंड से जोधपुर आए ताकि उन जगहों को देख सकें, जिनका जिक्र उनकी मां बचपन की यादों में किया करती थीं. बावड़ियां, पुराना शहर और वहां की जिंदगी. वह शायद सिर्फ घूमने आए थे. लेकिन फिर कभी वापस नहीं गए.

अब रॉन्सले अपनी बचत और गेस्टहाउस में बेहद साधारण जिंदगी के सहारे जीवन बिता रहे हैं.
जब उनसे पूछा गया कि क्या वह इंग्लैंड लौटना चाहते हैं, तो उन्होंने बताया कि उनकी बेटी उन्हें ऐसा करने से मना करती है.
“मेरी बेटी और मेरे पोते-पोतियों ने मुझसे कहा कि यूरोप में जीवन की गुणवत्ता गिर रही है.”
जो सफर उनकी मां के अतीत की तलाश से शुरू हुआ था, वह अब उनके अपने भविष्य का फैसला बन चुका है.
“मुझे उम्मीद है कि मैं इस दुनिया को भारत में ही अलविदा कहूंगा.”
छिपे हुए इतिहास को सामने लाना
जोधपुर में बसने के साथ ही कैरोन रॉन्सले का ध्यान यहां की बावड़ियों की ओर गया.
उन्होंने देखा कि इनकी हालत बेहद खराब है. पत्थर टूट रहे थे, पानी गंदा और रुका हुआ था, और सालों से इनमें कचरा जमा था जिसे कोई साफ नहीं कर रहा था. उन्होंने नगर निगम के अधिकारियों से कई बार गुहार लगाई, लेकिन जब कोई खास मदद नहीं मिली तो उन्होंने खुद एक डंडा उठाया और बावड़ियों की सफाई शुरू कर दी.
उन्होंने सबसे पहले मायला बाग का झालरा साफ किया. द नोड मैगजीन में छपे एक लेख के मुताबिक, इस झालरे की हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि जोधपुर के कई लोगों को भी नहीं पता था कि यहां ऐसा कोई जलस्रोत है. इसकी सीढ़ियों पर हरी काई जमी थी और आसपास का इलाका कूड़ा फेंकने की जगह बन चुका था.

यह झालरा 1780 में गुलाब राय ने बनवाया था. गुलाब राय बचपन में गुलाम बनाकर बेच दी गई थीं, लेकिन बाद में वह राजघराने की बेहद प्रभावशाली महिला बनीं. जोधपुर आर्ट्स वीक 2025 के दौरान यहां इंस्टॉलेशन लगाने वाली कलाकार आयशा सिंह ने अपने ब्लॉग में लिखा कि गुलाब राय ने इसे लोगों की भलाई के लिए भी बनवाया था और इसलिए भी ताकि इतिहास में उनका नाम हमेशा दर्ज रहे.
रॉन्सले इसी भूले-बिसरे इतिहास को सामने ला रहे थे, हालांकि उन्हें खुद भी शुरुआत में इसका अंदाजा नहीं था. 2015 में उन्होंने इस झालरे को काफी हद तक उसकी पुरानी हालत में वापस ला दिया. बाद में इस काम को स्क्वेडिया फाउंडेशन ने आगे बढ़ाया. जब काई और कचरा हट गया तो पानी में फिर से आसमान के बादल दिखाई देने लगे.
इसके बाद के वर्षों में रॉन्सले ने शहर के 10 ऐतिहासिक जलस्रोतों को फिर से जीवित करने में मदद की. इनमें राम बावड़ी, गोविंदा बावड़ी, महामंदिर बावड़ी, मायला बाग का झालरा और गुलाब सागर शामिल हैं. समय के साथ दूसरे लोग भी उनके साथ जुड़ते गए. उन्हें कभी-कभी जोधपुर के पूर्व शाही परिवार द्वारा संचालित मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट का भी सहयोग मिला.

बावड़ियां क्यों जरूरी हैं
रॉन्सले के लिए ये सिर्फ विरासत नहीं बल्कि लोगों के लिए बेहद जरूरी सार्वजनिक जलस्रोत भी हैं. उनका कहना है कि उन्हें बावड़ियां इसलिए पसंद हैं क्योंकि यहां पानी के पास तापमान कम रहता है, छांव मिलती है और एक अलग तरह की शांति होती है.
उन्होंने कहा, “रेगिस्तानी इलाकों में यहां का पानी बहुत अच्छा है. यह बहुत बढ़िया पानी है और साफ पानी मिलना बहुत खास बात है. पानी एक खजाना है.”
अब वैज्ञानिक भी इसी नतीजे पर पहुंचे हैं. 2024 में जियोहेरिटेज में प्रकाशित एक अध्ययन में जोधपुर की 134 बावड़ियों का सर्वे किया गया. इसमें कहा गया कि लापरवाही की वजह से ज्यादातर बावड़ियों की हालत बेहद खराब है.
अध्ययन में कहा गया कि ये भारत की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, वास्तुकला और इंजीनियरिंग विरासत की शानदार मिसाल हैं. इन्हें राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों जैसी सुरक्षा मिलनी चाहिए. साथ ही जागरूकता और हाइड्रो-जीयो टूरिज्म के जरिए इनका संरक्षण और इलाके का सामाजिक-आर्थिक विकास किया जा सकता है.
मैं जल्द ही एक ऐसा प्रोग्राम शुरू करने जा रही हूं जिसके ज़रिए युवाओं को उनके जीवन में पानी की अहमियत के बारे में जानकारी दी जाएगी… हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि ऐसे तोहफ़े को कभी ठुकराना नहीं चाहिए।
– कैरन रॉन्सली
2025 के एक अन्य अध्ययन में IIT जोधपुर की शोधकर्ताओं श्रेया बनर्जी और पूजा सोलंकी ने पाया कि शहर की बावड़ियां अपने आसपास के इलाके का तापमान स्वाभाविक रूप से कम करती हैं. उनका मानना है कि भविष्य में जलवायु के अनुकूल शहर बनाने में इनकी बड़ी भूमिका हो सकती है.
रॉन्सले चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी इस जिम्मेदारी को संभाले. वह जोधपुर के स्कूलों में जाकर बच्चों को पानी का महत्व बताना चाहते हैं और उन्हें बावड़ियों की सफाई से जोड़ना चाहते हैं.
उन्होंने कहा, “मैं जल्द ही एक ऐसा कार्यक्रम शुरू करने जा रहा हूं जिसके जरिए युवाओं को उनकी जिंदगी में पानी की अहमियत समझाई जाएगी. ताकि वे पानी को प्रकृति का अनमोल उपहार मानें. हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि प्रकृति के ऐसे उपहार की कभी अनदेखी नहीं करनी चाहिए.”

‘इससे दूसरों को भी प्रेरणा मिलती है’
समय के साथ रॉन्सले का काम और मुश्किल हो गया है. कुछ साल पहले उनका पैर टूट गया था. अब वह लकड़ी की छड़ी के सहारे चलते हैं और पहले जैसी फुर्ती नहीं रही. राजस्थान की भीषण गर्मी, जिसकी उन्हें आज तक पूरी आदत नहीं पड़ी, हर गर्मी के मौसम के बाद उनकी त्वचा पर दाने छोड़ जाती है.
वह हंसते हुए कहते हैं, “अब मैं अस्सी साल की उम्र में हूं. मुझे गर्मी बिल्कुल आसानी से नहीं झेली जाती.”
शारीरिक कमजोरी ही उनकी अकेली चुनौती नहीं है. इलाज के दौरान उनके साथ पूरे समय काम करने वाले दो लोग रिटायर हो गए और उनकी जगह कोई स्थायी व्यक्ति नहीं मिला. अब उनकी सफाई मुहिम ज्यादातर स्वयंसेवकों के भरोसे चलती है, जिनमें अधिकतर स्थानीय महिलाएं हैं.
उन्होंने कहा, “सफाई का ज्यादातर काम महिलाएं कर रही हैं. इस काम का श्रेय उन्हें मिलना चाहिए.”

लेकिन सिर्फ स्वयंसेवकों के भरोसे सब कुछ संभव नहीं है. रॉन्सले का कहना है कि संस्थागत सहयोग हमेशा कम रहा है.
उन्होंने कहा, “NGO और सरकारी संस्थाओं से पर्याप्त सहयोग नहीं मिलता. फंड की भी कमी है. मुझे लगता है कि जिस तरह के सहयोग की जरूरत है, वह हमें नहीं मिल रहा.”
सिर्फ सफाई करना एक बात है, लेकिन टूटी हुई संरचनाओं की मरम्मत दूसरी बात. जोधपुर की कई बावड़ियों और झालरों में पत्थरों की मरम्मत की तुरंत जरूरत है. यह काम सिर्फ डंडे लेकर उतरे स्वयंसेवक नहीं कर सकते.
उन्होंने कहा, “अगर सरकार थोड़ी रुचि दिखाए और कुछ फंड दे दे, तो यह काम किया जा सकता है.”
उन्होंने बताया कि फिलहाल मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट के पास भी इतने संसाधन नहीं हैं. जोधपुर में कचरा साफ करने वाली मशीनें तो हैं, लेकिन उनके इस्तेमाल का पूरा सिस्टम सही तरीके से काम नहीं करता.
उन्होंने कहा, “इसका असर पर्यटन पर भी पड़ रहा है. और काफी ज्यादा पड़ रहा है.”
इस समय नगर निगम मशीनों की मदद से गुलाब सागर और सती सागर की गाद निकाल रहा है. रॉन्सले का मानना है कि अगर यह काम मानसून के बाद किया जाता तो ज्यादा फायदेमंद होता. उनके मुताबिक, जोधपुर के वर्तमान महाराजा गज सिंह द्वितीय ने आने वाले कामों के लिए अपने पंप और तीन से पांच मजदूर देने की पेशकश की है.
रॉन्सले के लिए सबसे बड़ा दुश्मन प्लास्टिक है. हर मानसून में बहकर प्लास्टिक की बोतलें और थैलियां फिर से बावड़ियों में पहुंच जाती हैं.
उन्होंने बावड़ी में तैरती प्लास्टिक की थैलियों की ओर इशारा करते हुए कहा, “यह सच में बहुत खराब चीज है.”
प्रकृति के प्रति उनका लगाव सिर्फ जोधपुर की बावड़ियों तक सीमित नहीं है. हाल ही में वह जोधपुर के पास जवाई वन्यजीव क्षेत्र भी गए, जहां उन्होंने झील के किनारे मानसून में बहकर आए प्लास्टिक को हटाने में मदद की.
असल में वह खुद को सिर्फ “प्रकृति प्रेमी” मानते हैं. बहुत ज्यादा गर्मी वाले दिनों में वह मायला बाग के ठंडे पानी में तैरने चले जाते हैं. वह उत्साह से बताते हैं कि अब वहां कैटफिश भी पनप रही हैं. जब वह किसी बावड़ी पर काम नहीं कर रहे होते, तब किताबें पढ़ते हैं.
उन्होंने कहा, “मुझे पढ़ना बहुत पसंद है. मैं काफी पढ़ाकू इंसान हूं.”
लेकिन वह ज्यादा देर तक खाली नहीं बैठते. शरीर पर पड़ रहे असर के बावजूद वह हर दिन हाथ में लकड़ी की छड़ी लेकर जोधपुर की सदियों पुरानी बावड़ियों में उतर जाते हैं. उन्हें पता है कि वह अकेले सभी बावड़ियों को नहीं बचा सकते, लेकिन वह उदाहरण बनकर दिखाना चाहते हैं.
रॉन्सले ने कहा, “मुझे लगता है कि लोग मुझसे इसलिए प्रेरित होते हैं क्योंकि मैं भारत से नहीं हूं. अगर बाहर से आया कोई व्यक्ति इन बावड़ियों की अहमियत समझ सकता है, तो इससे दूसरों को भी उनकी देखभाल करने की प्रेरणा मिलती है.”
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