हर सियासी निज़ाम एक कल्पना पर टिका होता है, जिसे लगातार नया करते रहना पड़ता है, वरना वह मर जाता है. ज्यां-जाक रूसो ने इसे सामाजिक समझौता कहा था, और उन्होंने एहतियात से यह भी कहा था कि यह कोई दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि एक ज़हनियत है. आम इरादा तभी तक आम रहता है, जब तक हर फ़र्द उसे अपना ही इरादा मानकर अपने अंदर उतार लेता है
यही अंदर उतारना निजी नैतिकता है,ज़ाती अख़लाक़ है: कानून का पालन करना नहीं, बल्कि वह तरीका जिससे बाहर से आया सियासी इंतिज़ाम अंदर की हक़ीक़त बन जाता है, जो थोपा हुआ नहीं, बल्कि जायज़ महसूस होता है. नैतिकता सियासी निज़ाम और व्यक्ति के बीच की वह दीवार है जिस पर सारा बोझ टिका है. वह चीज़ जो समझौते को तब भी जायज़ बनाए रखती है, जब संस्थापक मर चुके हों और इंतज़ाम के पीछे की वजहें आदत में घुलकर धुंधली पड़ गई हों.
इसी वजह से टेक्नोलॉजी और सियासी इंक़लाब को एक चीज़ का दूसरी पर असर डालना मानकर नहीं समझा जा सकता, जैसे टेक्नोलॉजी कोई औज़ार हो और क्रांतिकारी उसे उठा ले जाते हों, और क्रांति टेक्नोलॉजी से पैदा हुई हो. हर नया टेक्नोलॉजी निज़ाम उन हालात को नए सिरे से गढ़ देता है जिनमें कहा जा सकता है कि कोई व्यक्ति रज़ामंद है भी या नहीं: वह क्या जान सकता है, किससे बात कर सकता है, किस तरह की जबरदस्ती उसे दिखाई देती है, और कौन-सी जबरदस्ती इतनी आम और आसपास की होती है कि उसकी तरफ ध्यान ही नहीं जाता. जब ये हालात बदलते हैं, तो पुरानी नैतिकता अपना काम करना बंद कर देती है. वह नागरिक को यह महसूस नहीं करा पाती कि सामान्य इच्छा उसकी अपनी है.
सियासी निज़ाम और व्यक्ति के बीच एक खाई खुल जाती है, और क्रांति इसी खाई में रहती है. जो क्रांति सियासी निज़ाम को तो बदल दे, लेकिन इस खाई को न भरे, उसने समझौते को नया नहीं किया. उसने बस संकट की जगह बदल दी है.
तीन मिसालें
प्रिंटिंग प्रेस ने यह काम एक बार किया था. उसने टेक्स्ट और ज्ञान पर चर्च की एकाधिकार वाली पकड़ को तोड़ दिया, आम लोगों की भाषाओं में धार्मिक किताबों और पर्चों की दलीलों को उन लोगों तक पहुंचा दिया जो पढ़ सकते थे, और ऐसी नैतिक भाषा को जन्म लेने पर मजबूर किया जो चर्च के बाद की व्यवस्था को जायज़ ठहरा सके: अंतरात्मा, निजी फ़ैसला, हर पढ़ने वाला व्यक्ति जो बिना किसी बिचौलिए के ख़ुदा के सामने जवाबदेह है. यह ज़बान इसलिए आई क्योंकि जिस पल प्रिंटिंग प्रेस ने पादरियों की मध्यस्थता को वैकल्पिक बना दिया, उसी पल वह काम करना बंद कर गई, और उस खाई को कुछ न कुछ भरना ही था.
कारख़ाने ने यह दोबारा किया, और ज़्यादा बेरहमी से. उसने एक ही झटके में एक औद्योगिक मज़दूर वर्ग बना दिया, और वे हालात भी बना दिए जिन्होंने इस वर्ग को बिखरे हुए मज़दूरों की आबादी की जगह एक सियासी हस्ती बना दिया: एक जगह जमा होना, साझा शिकायत, वक़्त की साझा पाबंदी. जो चीज़ उसने नहीं दी, वह थी वह नैतिक ज़बान जो समझा सके कि इस नई हस्ती का क्या हक़ बनता है. उदारवाद और समाजवाद एक सदी तक इसे लिखने के लिए आपस में होड़ करते रहे. एक तरफ़ शोषण के ख़िलाफ़ अधिकार, दूसरी तरफ़ मज़दूरी पर काम करने की व्यवस्था का ख़ात्मा, और दोनों ने रूसो वाली वही मेहनत करने की कोशिश की: एक औद्योगिक आबादी को यह महसूस कराना कि जिस निज़ाम के तहत वह रह रही है, वह उसकी अपनी सामान्य इच्छा है, न कि बस एक ऐसा सिस्टम जिसकी सेवा करने पर वह मजबूर है.
एटमी हथियारों ने कुछ अजीब किया. उन्होंने नई क़िस्म का नागरिक नहीं, बल्कि नई क़िस्म का सियासी तथ्य पैदा किया: पूरी सभ्यता के पैमाने पर आपसी ख़तरा, जिसके लिए न्यायसंगत युद्ध और राज्य के हित (raison d’état) की पुरानी ज़बान के पास कोई मिसाल नहीं थी. नतीजा यह हुआ कि दशकों तक जुगाड़ से नैतिक सिद्धांत गढ़े जाते रहे: डराकर रोकने की नैतिकता, परमाणु प्रसार रोकने को बाध्यकारी नियम मानना, और यह सिद्धांत कि कुछ हथियार इस तरह बनाए जाने चाहिए कि उनका इस्तेमाल कभी न हो. यह सब इसलिए गढ़ा गया क्योंकि टेक्नोलॉजी सियासी हिंसा को परखने की विरासत में मिली श्रेणियों से आगे निकल गई थी.
मौजूदा निज़ाम
डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर अभी यही कर रहा है, और राज्य के स्तर पर इसने टेक्नो-नेशनलिज़्म को जन्म दिया है. यह वह सिद्धांत है कि संप्रभुता को सेमीकंडक्टर, डेटा के बहाव, सैटेलाइट के समूहों और सबसे आगे के AI मॉडलों पर कंट्रोल के इर्द-गिर्द नए सिरे से तय करना होगा, इस तर्क पर कि जो मुल्क अपने कंप्यूटिंग के आधार का मालिक नहीं है, उसे अपनी सियासत का मालिक नहीं कहा जा सकता. वॉशिंगटन के चिप एक्सपोर्ट कंट्रोल, बीजिंग की देसी फ़ैब्रिकेशन की ओर कोशिश, ब्रसेल्स की डेटा संप्रभुता को कानून बनाकर हक़ीक़त बनाने की कोशिशें, और भारत का अपनी ही सेमीकंडक्टर क्षमता, लॉन्च सिस्टम और AI स्टैक की तरफ़ मुड़ना, एक ही कहानी हैं जो चार लहजों में कही जा रही है. हर कोई एक ही दावा करता है: किसी दूसरे राज्य के टेक्नोलॉजी आधार पर निर्भर रहना एक तरह की ग़ैर-आज़ादी है, क्योंकि इससे अपने सोच-विचार की शर्तें किसी और के हाथ में चली जाती हैं.
टेक्नो-नेशनलिज़्म एक नैतिक दावा है जिसने औद्योगिक रणनीति की भाषा पहन रखी है. वह कहता है कि जब तक किसी जनता की टेक्नोलॉजी का आधार कहीं और से किराए पर लिया हुआ है, तब तक वह अपना समझौता ख़ुद नहीं लिख सकती, और जो मुल्क ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर से चलता है जिस पर उसका कंट्रोल नहीं, उसकी रज़ामंदी उसके लिए गढ़ी जाती है. यह दावा जड़ से रूसो वाला है, और भारत वाले रूप को उसी नज़र से देखा जाना चाहिए, न कि इसे अपने उद्योग को बचाने की नीति या बड़ी ताक़तों की नक़ल वाली अकड़ कहकर टाल दिया जाए. जिस राज्य को, असल में, उन चिप्स के लिए इजाज़त मांगनी पड़े जो उसके चुनाव, बैंक और अस्पताल चलाती हैं, उसका सोच-विचार उस हाथ में जा सकता है जिसके पास इजाज़त है. इस ख़तरे को बंद करने की सहज इच्छा न तो बेतुकी है, न नई. यह वही सहज इच्छा है जिसने रूसो को यह ज़ोर देने पर मजबूर किया कि जो जनता अपने ही बने रहने की बुनियादी ज़रूरतों में किसी दूसरे की मर्ज़ी के अधीन है, उसने सियासी वजूद हासिल नहीं किया.
लेकिन संप्रभुता की भाषा में कहा गया नैतिक दावा अभी नैतिक क्रांति नहीं है, और इस दलील की ईमानदारी इन दोनों के बीच की दूरी में ही बसती है. टेक्नो-नेशनलिज़्म एक ज़्यादा काबिल राज्य बना सकता है और एक ज़्यादा नैतिक राज्य को पूरी तरह बिना बने छोड़ सकता है: वही पुराना ऊंच-नीच का ढांचा नए कपड़ों में, राष्ट्र-राज्य सिलिकॉन और सैटेलाइट के ज़रिए अपने आपको फिर से जताता हुआ, जबकि इस बात को छुआ तक नहीं जाता कि मुल्क के अंदर इस वापस पाई गई क्षमता से असल में फ़ायदा किसे होता है. फ़ैब्रिकेशन प्लांट अपने तर्क से अपने फ़ायदे नहीं बांटता. सैटेलाइट का समूह अपने आप यह फ़ैसला नहीं करता कि वह निगरानी के बजाय अकाल-राहत की सप्लाई का काम करे. ये फ़ैसले हैं, जो उन सियासी हस्तियों द्वारा लिए या टाले जाते हैं जिनकी नैतिकता उनकी मांग करती है या नहीं करती. औद्योगिक क्रांति की पहली सदी इसकी साफ़ मिसाल है: कई दशकों तक पैदावार की ज़बरदस्त नई क्षमता उस नैतिक निज़ाम के साथ चलती रही जो जिस आबादी पर टिका था, उसके ज़्यादातर हिस्से को वोट देने के भी मुश्किल से क़ाबिल मानता था, बढ़ी हुई दौलत में हिस्सा मांगना तो दूर की बात.
वह सवाल जिसे हम टालते रहते हैं
क्षमता और ज़िम्मेदारी के बीच की इस खाई का हमारे दौर में एक ख़ास नाम है: भूख. इसलिए टाला जा रहा सवाल सीधे पूछना पड़ेगा. क्या अब तक जमा हुई तकनीकी क्षमता एक पीढ़ी के अंदर बड़े पैमाने की ग़रीबी और भयंकर भूख को सचमुच ख़त्म कर सकती है? सटीक खेती, बायोमेट्रिक कैश-ट्रांसफ़र इंफ्रास्ट्रक्चर, टीकों की ठंडी सप्लाई-चेन, सैटेलाइट की मदद से आख़िरी छोर तक बँटवारा, समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाना, सूखा झेलने वाली फ़सलों की क़िस्में: इन सबको मिलाकर, क्या यह उस बीमारी को ख़त्म कर सकता है जिससे इंसानियत जूझ रही है?
ईमानदार जवाब है हां, और 50 साल पहले यह जवाब ईमानदार नहीं होता. यह बदलाव इस दौर की सबसे अहम बात है, और टेक्नोलॉजी और विकास पर ज़्यादातर सार्वजनिक बहस इसी को कहने से बचने के लिए बनाई गई है. हमारी हालत अब 1950 जैसी नहीं है, जब क़िल्लत कुछ हद तक पैदावार की ही सच्चाई थी: पैदावार सचमुच बहुत कम थी, ढुलाई के साधन बहुत पुराने थे, और कौन कहां ज़रूरतमंद है, इसकी जानकारी इतनी कमज़ोर थी कि वक़्त पर कुछ किया नहीं जा सकता था. हरित क्रांति के दौर का भारत सीधे इसी मजबूरी के अंदर जी रहा था. अब वह नहीं जी रहा. जो चीज़ अब भी कम है, वह कुल मिलाकर कैलोरी नहीं है, न उन्हें ढोने के साधन, न यह पहचानने के प्रशासनिक औज़ार कि किसे उनकी ज़रूरत है. भारत का अपना डायरेक्ट-बेनिफ़िट-ट्रांसफ़र ढाँचा इस बात का सबूत है कि राज्य की यह क्षमता कितनी आगे बढ़ चुकी है. जो चीज़ कम है, वह यह फ़ैसला है कि जोड़ी गई इस क्षमता का निशाना उस मक़सद पर लगाया जाए, किसी और पर नहीं.
यही पूरे बयान की धुरी है. जिस पैमाने पर हम अब सक्षम हैं, वहां बँटवारा एक नैतिक और सियासी चुनाव है, कोई तकनीकी मजबूरी नहीं. यह वाक्य 1950 में ग़लत था. अब सही है, और इससे अनजान बनना ख़ुद एक नैतिक तौर पर बचकर निकलना है: यह इच्छा-शक्ति के सवाल को चुपके से क्षमता का सवाल बताकर पेश करने देता है, जिसके साथ जीना आसान है और जो अब सही नहीं रहा. भूखे किसी आविष्कार का इंतिज़ार नहीं कर रहे. वे एक फ़ैसले का इंतिज़ार कर रहे हैं.
जो दूसरा सवाल खड़ा करता है, ऐसा सवाल जिससे अपनी संप्रभु तकनीकी क्षमता बनाने वाला कोई भी मुल्क नहीं बच सकता, चाहे उसकी बयानबाज़ी कितनी भी इससे बचना चाहे. यह तय हो जाने के बाद कि वह कर सकता है, क्या वह करना चाहता है? टेक्नो-नेशनलिज़्म, अगर वह कंट्रोल के दावे पर ही रुक जाए, तो इसका जवाब चुपके से और बेईमानी से दे देता है. वह वापस पाई गई क्षमता को रणनीतिक आज़ादी, शान और डराकर रोकने की ताक़त की ओर मोड़ देता है, और भूख के ख़ात्मे को बचे-खुचे फ़ायदों की फ़ाइल में डाल देता है, जो मिल भी सकते हैं और नहीं भी, उस कसौटी की जगह नहीं जिस पर पूरी परियोजना की जायज़ियत परखी जानी चाहिए.
एक नैतिक क्रांति औचित्य का यह क्रम पलट देगी, और मांग करेगी कि वापस पाई गई क्षमता सबसे पहले उसी कसौटी पर जवाब दे. वह यह भी मांग करेगी कि सियासी हस्ती, सिर्फ़ राज्य या टेक्नोलॉजी बनाने वाला नहीं, इस बात पर अड़ी रहे कि टेक्नोलॉजी पर संप्रभुता का मतलब उस चीज़ की ज़िम्मेदारी भी है जो टेक्नोलॉजी कर सकती है और अभी नहीं कर रही.
जहां बीच की कड़ी अपना असली काम करती है
यहीं रूसो का बीच का माध्यम अपना असली काम करता है, और तर्क फिर वहीं लौट आता है जहां से शुरू हुआ था. एक सवाल का सीधे जवाब देना जरूरी है: जब राज्य अपनी नई क्षमता का इस्तेमाल भूख खत्म करने के लिए सीधे कर सकता है, तो फिर भूख खत्म करने की इच्छा व्यक्ति के अपने विश्वास से ही क्यों पैदा होनी चाहिए. आखिर राज्य बिना अपने नागरिकों में किसी नैतिक जागृति के भी भूख के खिलाफ काम करने का फैसला कर सकता है. इसका जवाब यह है कि अगर राज्य किसी अंदर से स्वीकार की गई सामूहिक इच्छा के बजाय सिर्फ रणनीतिक हिसाब-किताब से काम करता है, तो वह ठीक वही बची-खुची लाभ वाली स्थिति पैदा करता है जिसकी पहले ही पहचान की जा चुकी है. ऊपर से दी गई मदद, अगर प्रतिष्ठा या स्थिरता के लिए की जाए, तो अपने स्वभाव से ही मनमानी होती है. जब सुविधा हो तब दी जाती है और जब हिसाब बदल जाए तब वापस ले ली जाती है. और जब ऐसा होता है, तो किसी को इसका जवाब देना भी जरूरी नहीं होता. लेकिन जब लोगों के अंदर यह बात बैठ जाती है कि भूखों को खाना खिलाना उनकी संप्रभुता का मूल उद्देश्य था, तभी यह एक ऐसी जिम्मेदारी बनती है जिसे टाला नहीं जा सकता. तब सरकार के खिलाफ यह कहा जा सकता है कि उसने अपने लोगों के साथ किए गए समझौते को तोड़ा है, न कि सिर्फ यह कि उसने मदद करने से इनकार कर दिया. यही फर्क है उस लाभ में जो राज्य अपनी मर्जी से दे सकता है और उस कर्तव्य में जिसे जनता राज्य से पूरा करवा सकती है. पहली स्थिति में भूखे लोग सत्ता के मूड पर निर्भर रहते हैं. दूसरी स्थिति में उन्हें खाना खिलाना उस राजनीतिक समझौते की वैधता की शर्त बन जाता है.
इसलिए सामान्य इच्छा अपने आप यह फैसला नहीं कर सकती कि भूखों को खाना खिलाया जाए, और न ही कोई सैटेलाइट सिस्टम, कोई फैब्रिकेशन प्लांट या कोई संप्रभु AI मॉडल, चाहे वह कितना भी सक्षम क्यों न हो, यह काम अपने आप कर सकता है. सिर्फ वे लोग, जिन्होंने यह बात अपने अंदर स्वीकार कर ली है कि भूखों को खाना खिलाना उनकी संप्रभुता का मकसद था, राज्य को यह काम करने के लिए मजबूर कर सकते हैं. वे तकनीकी क्षमता को एक राजनीतिक जिम्मेदारी में बदल देते हैं और राष्ट्रीय उपलब्धि की उस हर सोच को मानने से इनकार करते हैं जिसमें सबसे गरीब लोगों को इस हिसाब से बाहर छोड़ दिया जाता है.
टेक्नोनैशनलिज्म नैतिक क्रांति की भौतिक संभावना पैदा करता है. यह असाधारण क्षमता को एक नए रूप में बने राजनीतिक नागरिक के हाथों में रखता है, ठीक वैसे ही जैसे छापाखाने, फैक्ट्री और बम ने अपने-अपने समय में किया था. लेकिन संभावना और इच्छा एक चीज नहीं हैं.
टेक्नोनैशनलिज्म खुद इच्छा पैदा नहीं करता, ठीक वैसे ही जैसे छापाखाने ने अंतरात्मा का सिद्धांत खुद नहीं बनाया था, या फैक्ट्री ने मजदूर आंदोलन खुद पैदा नहीं किया था. यह इच्छा वहीं से आनी है जहाँ से यह हमेशा आती रही है: व्यक्ति के अपने विश्वास से, जो मिलकर जनता की मांग बनता है, और यह मांग करता है कि इस समझौते को इस आधार पर परखा जाए कि वह उस सबसे गरीब पक्ष के लिए क्या करता है जो इस समझौते का हिस्सा है. और वह इस बात को मानने से इनकार करता है कि संप्रभुता अपने आप में ही अंतिम लक्ष्य है.
साधन उस नैतिकता से पहले आ गए हैं जिसकी जरूरत उन्हें सही दिशा में इस्तेमाल करने के लिए है. यही आज की असली स्थिति है. यह स्थिति टेक्नोनैशनलिस्ट सोच के उस जश्न से ज्यादा सटीक है जो हर चीज को जीत मानती है, और उस निराशावाद से भी ज्यादा सटीक है जो इसे सिर्फ दिखावा मानकर खारिज कर देता है. इसकी खासियत यह है कि हमारे पास ऐसी एक पीढ़ी हो सकती है जो मानव इतिहास में पहली पीढ़ी हो, जो चरम भूख को खत्म कर सकती है, जिसके पास इसके लिए जरूरी हर साधन मौजूद है, और जो बस इस फैसले का इंतजार कर रही है कि इन साधनों का इस्तेमाल इसके लिए किया जाए. क्या जरूरी नैतिकता समय रहते आएगी, इसका जवाब तकनीक नहीं दे सकती. और कोई राष्ट्र सिर्फ क्षमता बनाकर और यह घोषणा करके कि काम पूरा हो गया, इस सवाल से छुटकारा नहीं पा सकता. यह सवाल अब भी, जैसे हमेशा से रहा है, हमारा है और इसका जवाब भी हमें ही देना है.
प्रणव शर्मा विज्ञान के इतिहासकार हैं जो भारत के नई दिल्ली और भूटान के पारो में रहते हैं और लिखते हैं. विचार निजी हैं.
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