अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो 20 अक्टूबर को मुंबई पहुंचे और उन्होंने विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की. यह मुलाकात ऐसे समय हुई, जब अमेरिका में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की रूस नीति को लेकर बहस चल रही थी.
17 अक्टूबर को उज्बेकिस्तान और भारत के लिए रवाना होने से पहले रुबियो ने कहा, “मुझे लगता है कि राष्ट्रपति 60 दिनों का समय लेना चाहते हैं, ताकि यह समझा जा सके कि प्रतिबंध और टैरिफ लगाने से वैश्विक अर्थव्यवस्था और यहां तक कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा.”
3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव नजदीक आ रहे हैं. ऐसे में ट्रंप का डीजल समझौता और प्रतिबंधों में छूट देने का फैसला राष्ट्रपति के अधिकारों, कांग्रेस की शक्तियों और रिपब्लिकन पार्टी की प्राथमिकताओं को चर्चा के केंद्र में ले आया है.
9 अक्टूबर को अमेरिकी राष्ट्रपति ने घोषणा की कि रूस अमेरिका और दुनिया के दूसरे बाजारों में 3,00,000 मीट्रिक टन से ज्यादा डीजल की आपूर्ति करेगा और आगे भी इसकी आपूर्ति जारी रहेगी. इसके साथ ही, अमेरिका ने रूसी ईंधन पर लगे प्रतिबंधों में कुछ समय के लिए ढील दी. लागत कम होने से राजनीतिक फायदा मिल सकता है, लेकिन यह राहत लंबे समय तक बनी रहेगी या नहीं, यह अभी तय नहीं है. डीजल की कीमतें बढ़ने से खेती, माल ढुलाई और घरों का खर्च बढ़ जाता है. इसका असर चुनावों पर भी पड़ सकता है. ट्रंप ने कांग्रेस से नई अनुमति मांगने के बजाय पहले से मिले अधिकारों का इस्तेमाल किया है. 16 अक्टूबर के कार्यकारी आदेश में लिंडसे ओ. ग्राहम के रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून की धारा 115 का हवाला दिया गया है. यह धारा राष्ट्रपति को कुछ शर्तों के साथ प्रतिबंधों में छूट देने की अनुमति देती है. इसके लिए राष्ट्रपति को कांग्रेस को लिखित प्रमाण देना और कारणों को समझाने वाली एक रिपोर्ट पेश करना जरूरी है.
मौजूदा विवाद इस बात को लेकर है कि राष्ट्रपति को प्रतिबंधों में छूट देने का अधिकार कानून बनाने के पीछे कांग्रेस के मकसद को पूरा करता है या उसे कमजोर करता है. तुरंत आर्थिक राहत देने और किसी विरोधी देश को रियायत देने से लंबे समय में होने वाले नुकसान के बीच संतुलन कौन तय करेगा?
कार्यकारी फैसले और कांग्रेस के अधिकार
प्रतिबंधों के मामले में कांग्रेस की सख्ती और राष्ट्रपति की जरूरत के हिसाब से फैसले लेने की आजादी के बीच टकराव होता है. कांग्रेस प्रतिबंध लगाती है और जवाबदेही की मांग करती है. राष्ट्रपति बातचीत, बाजार में होने वाले बदलावों और सुरक्षा से जुड़ी अलग-अलग जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इन प्रतिबंधों को लागू करते हैं. प्रतिबंधों में छूट देने से नीति में बदलाव करना आसान हो जाता है, लेकिन इससे वह दबाव भी कमजोर पड़ सकता है जिसे बनाने के लिए कांग्रेस ने प्रतिबंध लगाए थे.
ट्रंप के रुख को देखने का एक तरीका यह है कि अमेरिकी विदेश नीति बनाते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उसकी कीमत आम अमेरिकियों को कितनी चुकानी पड़ रही है. रुबियो ने ऊर्जा की बढ़ती कीमतों को ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के युद्ध, सऊदी अरब पर हूती हमलों और रूस-यूक्रेन युद्ध से जोड़ा.
उन्होंने कहा, “दुनिया भर में चल रहे ये संघर्ष अब एक-दूसरे से टकराने लगे हैं.”
एक क्षेत्र में बढ़ने वाला दबाव दूसरे क्षेत्रों में भी लागत बढ़ा सकता है. रुबियो का यह तर्क कि रूसी डीजल बाजार में पहुंच ही जाता, रूसी तेल की उपलब्धता से जुड़े सवाल का जवाब देता है. लेकिन वॉशिंगटन को अब भी यह समझाना होगा कि रूस से बदले में क्या हासिल होना चाहिए, प्रतिबंधों में छूट से कूटनीतिक बातचीत को कैसे फायदा होगा और दबाव दोबारा कब बढ़ाया जाएगा. ऐसा न होने पर घरेलू राजनीति के कारण प्रतिबंधों का मकसद कमजोर पड़ सकता है. इस फैसले का विरोध दोनों पार्टियों में हुआ है. रिपब्लिकन सीनेटर रिक स्कॉट और थॉम टिलिस ने प्रतिबंधों में छूट की आलोचना की है, जबकि डेमोक्रेट्स ने इसे वापस लेने की मांग की है. हालांकि, चुनाव के दिन तक कांग्रेस का सत्र स्थगित रहने के कारण तुरंत कोई कानूनी कार्रवाई होने की संभावना कम है.
रुबियो की प्रस्तावित समीक्षा में 60 दिन लग सकते हैं. इस कारण मुश्किल फैसला मध्यावधि चुनावों के बाद तक टल सकता है. हालांकि, इससे यह साबित नहीं होता कि यह फैसला चुनावी फायदे के लिए लिया गया है. कार्यकारी आदेश में यह भी नहीं कहा गया है कि 60 दिन पूरे होते ही प्रतिबंध अपने आप दोबारा लागू हो जाएंगे. आर्थिक हालात की समीक्षा करना और प्रतिबंधों को दोबारा लागू करने के लिए कानूनी समय-सीमा तय करना दो अलग-अलग बातें हैं. यह देखना जरूरी है कि समीक्षा से स्पष्ट नियम बनते हैं या फैसला फिर से टाल दिया जाता है. केवल समीक्षा की अवधि से कंपनियों और साझेदार देशों को यह पता नहीं चल सकता कि प्रतिबंध कब वापस आएंगे या किन नतीजों के आधार पर उन्हें दोबारा लागू किया जाएगा. यह अनिश्चितता राष्ट्रपति की बातचीत करने की ताकत बढ़ा सकती है, लेकिन इससे योजना बनाना मुश्किल हो जाता है. कंपनियों को यह साफ जानकारी चाहिए कि कौन से लेन-देन की अनुमति है. साझेदार देशों को यह जानना है कि प्रतिबंधों में मिली छूट कितने समय तक बनी रहेगी. वहीं, कांग्रेस को यह समझना है कि समीक्षा का मतलब फैसले पर दोबारा विचार करना है या उसे टालना है. राष्ट्रपति को अपने अधिकारों का इस्तेमाल कैसे करना चाहिए, इसकी स्पष्ट जानकारी देना भी इन अधिकारों की अहमियत का एक हिस्सा है.
चुनावी राजनीति की कीमत और रणनीति
यह मुद्दा परखता है कि क्या अमेरिका को मजबूत बनाने के मामले में रिपब्लिकन पार्टी की सहमति इस बात पर भी लागू होती है कि उस ताकत का इस्तेमाल कैसे किया जाए. रूस पर दबाव बनाए रखना, आम लोगों के खर्च कम करना और राष्ट्रपति को बातचीत में ज्यादा आजादी देना, इन सभी को राष्ट्रीय हित में बताया जा सकता है. लेकिन इनसे नीतियां अलग-अलग दिशाओं में जा सकती हैं.
जो लोग मॉस्को पर लगातार दबाव बनाए रखने के पक्ष में हैं, उनका मानना है कि प्रतिबंधों में छूट देने से भविष्य में दी जाने वाली धमकियों का असर और भरोसेमंद होने की संभावना कम हो जाती है. वहीं, जो लोग चीजों को सस्ता रखने को प्राथमिकता देते हैं, उनके लिए प्रतिबंधों का बचाव करना मुश्किल हो जाता है, जब मतदाताओं को उनकी कीमत सीधे चुकानी पड़ती है.
राष्ट्रपति को ज्यादा आजादी देने के समर्थक इस बात पर जोर दे सकते हैं कि इससे बातचीत करने की ज्यादा गुंजाइश मिलती है. ये संभावित तर्क हैं, न कि पार्टी के भीतर बने हुए तय गुटों के विचार. इन विचारों में हमेशा टकराव होना जरूरी नहीं है, लेकिन कोई भी रियायत देने से पहले तुरंत मिलने वाले फायदे, कूटनीतिक लाभ की अनिश्चितता और लंबे समय में होने वाले रणनीतिक नुकसान के बीच संतुलन बनाना जरूरी है. रिपब्लिकन नेताओं ने प्रतिबंधों में व्यापक छूट दिए जाने से पहले ही डीजल समझौते की आलोचना शुरू कर दी थी. इससे पता चलता है कि मतभेद केवल कानून लागू करने के तरीके को लेकर नहीं, बल्कि नीति की दिशा को लेकर भी हैं. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मध्यावधि चुनावों से पहले ट्रंप की अपनी पार्टी में इस फैसले का विरोध बढ़ रहा है.
हालांकि, विरोध का मतलब यह नहीं है कि रिपब्लिकन नेताओं ने ट्रंप से अलग होने के लिए कोई संगठित मोर्चा बना लिया है. सांसद कुछ रियायतों का विरोध करते हुए भी ट्रंप के बड़े एजेंडे का समर्थन कर सकते हैं. असली परीक्षा यह होगी कि क्या वे पार्टी के चुनावी संदेश को नुकसान पहुंचने की आशंका के बावजूद राष्ट्रपति के अधिकारों पर रोक लगाने की कोशिश करेंगे. जब राष्ट्रपति के फैसलों की कीमत देश के लोगों को चुकानी पड़ती है, तो सिद्धांतों पर सहमति बनाए रखना मुश्किल हो जाता है. ट्रंप रूस के साथ हुए समझौते को इस बात के सबूत के रूप में पेश कर सकते हैं कि व्यक्तिगत बातचीत से फायदे मिलते हैं. रिपब्लिकन सांसद विदेश नीति से जुड़ी आपत्तियों और आर्थिक राहत रोकने के आरोपों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर सकते हैं. डेमोक्रेट्स को यह समझाना होगा कि रूस को रियायत देने का विरोध करने से आम अमेरिकियों की आर्थिक परेशानियों का समाधान कैसे होगा. कोई भी पार्टी रणनीतिक दबाव और उसकी घरेलू कीमत को आसानी से अलग नहीं कर सकती. हर पार्टी को यह समझाना होगा कि लोगों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ उसकी पसंद की नीति से कैसे जुड़ा है.
ईंधन की आपूर्ति की घोषणा कर देने से यह सुनिश्चित नहीं होता कि लोगों को लंबे समय तक सस्ता ईंधन मिलता रहेगा. कुछ समय के लिए मिलने वाली राहत की आलोचना हो सकती है कि वॉशिंगटन ने रूस को फायदा पहुंचाया, लेकिन बदले में आम अमेरिकियों को वादा किया गया लाभ नहीं दिया. इस समझौते का राजनीतिक फायदा शायद उसके आर्थिक और रणनीतिक नतीजे सामने आने से पहले ही मिल जाए. मध्यावधि चुनाव इस बात को प्रभावित कर सकते हैं कि सांसद राष्ट्रपति के फैसलों को चुनौती देने के लिए कितने तैयार हैं और ऐसा करने की उनकी क्षमता कितनी है. ये चुनाव संस्थागत प्राथमिकताओं और राष्ट्रपति की राजनीतिक गुंजाइश पर भी असर डाल सकते हैं. दूसरे देशों की सरकारें भी चुनाव के नतीजों को देखकर यह समझने की कोशिश करेंगी कि अमेरिकी नीति कितने समय तक बनी रह सकती है. किसी नीति की घोषणा करना और उसे लगातार लागू रखना दो अलग-अलग बातें हैं.
अमेरिका की विश्वसनीयता और रुबियो का भारत दौरा
अमेरिका के सहयोगी और साझेदार देश इस बात का आकलन करेंगे कि अमेरिकी नीतियों में बदलाव कैसे किए जाते हैं और उनके पीछे के कारण किस तरह समझाए जाते हैं. अमेरिका की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके लक्ष्य, दी जाने वाली रियायतें और उनसे मिलने वाले अपेक्षित नतीजे आपस में कितने स्पष्ट रूप से जुड़े हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि नीति में कभी बदलाव नहीं होना चाहिए. लेकिन जब बदलाव के पीछे के कारण अगले फैसले के बारे में बहुत कम जानकारी देते हैं, तो दूसरे देशों के लिए उन बदलावों को स्वीकार करना मुश्किल हो जाता है.
सीमित समय के लिए दी गई राहत बातचीत को आगे बढ़ाने या बड़े आर्थिक नुकसान को रोकने में मदद कर सकती है. लेकिन वॉशिंगटन यह कैसे तय करेगा कि ऐसी राहत उस व्यवहार को बढ़ावा देने के बराबर नहीं है, जिसे रोकने के लिए प्रतिबंध लगाए गए थे? यह समझौता बड़े मकसद को कैसे पूरा करता है? ताकत का मतलब केवल दूसरों पर लागत का बोझ डालना नहीं है, बल्कि ऐसी रणनीति को लगातार बनाए रखना भी है जिस पर दूसरे भरोसा कर सकें.
रुबियो की मुंबई में हुई बैठकों के दौरान ये सवाल भारत जैसे अहम साझेदार के साथ बातचीत का हिस्सा बने, जबकि अमेरिका के भीतर इस मुद्दे पर बहस अभी खत्म नहीं हुई है. जयशंकर के साथ उनकी बातचीत में ऊर्जा और रक्षा सहयोग पर चर्चा हुई. इसके अलावा, संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री अब्दुल्ला बिन जायद के साथ हुई तीन देशों की बैठक में क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा पर ध्यान दिया गया. इन चर्चाओं से यह परखा जा सकता है कि क्या वॉशिंगटन अपनी नीतियों में लचीलापन दिखाते हुए साझेदार देशों की आर्थिक मजबूरियों को भी समझ सकता है.
रुबियो ने माना कि भारत अपनी इच्छा से ऊर्जा के स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है और रूसी ऊर्जा की जगह दूसरे स्रोतों से आपूर्ति हासिल करना आसान नहीं है. उनका यह बयान ऊर्जा की उपलब्धता, परिवहन और लागत से जुड़ी मुश्किलों को स्वीकार करता है. लेकिन इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या अमेरिका की नीति एक जैसी है. अगर वॉशिंगटन रूसी ऊर्जा के मामले में आर्थिक मजबूरियों को ध्यान में रखकर रियायत देता है, तो वह दूसरे साझेदार देशों की ऐसी ही मजबूरियों को किस तरह देखता है? इन मुश्किलों को स्वीकार करने से कूटनीतिक उम्मीदों को ज्यादा व्यावहारिक बनाया जा सकता है, हालांकि कुछ समय के लिए दी गई छूट से पुराने मतभेद दूर नहीं हो सकते. रुबियो ने भारत को ऊर्जा की आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने के लिए अमेरिका से ज्यादा ऊर्जा खरीदने की सलाह भी दी. इसलिए अमेरिका से मिलने वाले व्यावसायिक विकल्पों का आकलन उन खरीद संबंधी मुश्किलों को ध्यान में रखकर करना होगा, जिन्हें रुबियो खुद स्वीकार कर चुके हैं.
मुंबई में आयोजित स्वागत समारोह में रुबियो ने भारत-अमेरिका साझेदारी को 21वीं सदी को आकार देने का एक अवसर बताया. इस तरह की बड़ी महत्वाकांक्षा के कारण दोनों देशों के सहयोग की शर्तें और भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं. घरेलू राजनीतिक दबाव बदलने पर साझेदार देशों को यह समझना होगा कि व्यापक रणनीतिक वादे भरोसेमंद आर्थिक फैसलों में कैसे बदलेंगे.
भारत के लिए प्रतिबंधों में छूट मिलने से यह सवाल उठता है कि क्या भविष्य में फिर से दबाव बढ़ाया जा सकता है. किन लेन-देन की अनुमति बनी रहेगी? किन परिस्थितियों में प्रतिबंध दोबारा लगाए जा सकते हैं? और अगर मतभेद पैदा होते हैं, तो उन्हें कैसे सुलझाया जाएगा? राष्ट्रपति के विवेक से दी गई छूट से भविष्य के बारे में बहुत कम निश्चितता मिलती है. तुरंत मिलने वाली राहत रणनीतिक मतभेदों को खत्म नहीं कर सकती. नई दिल्ली को यह आकलन करना होगा कि वॉशिंगटन की घरेलू राजनीति जब ऊर्जा से जुड़े संबंधों को बदलती है, तो भारत अनिश्चितता से निपटने के लिए कितना तैयार है. इसलिए रुबियो के आश्वासनों को इस आधार पर भी परखना होगा कि क्या कांग्रेस और दूसरे संबंधित राजनीतिक पक्ष लंबे समय तक इस नीति को बनाए रखेंगे. इन आश्वासनों का टिके रहना राष्ट्रपति के अधिकारों, कांग्रेस की शक्तियों और राजनीतिक दबावों पर कुछ हद तक निर्भर करता है. केवल लचीलापन दिखाने से यह तय नहीं होता कि हालात बदलने पर भी इन आश्वासनों को राजनीतिक समर्थन मिलता रहेगा या नहीं.
इसलिए राजनीतिक चुनौती केवल यह नहीं है कि प्रशासन आज प्रतिबंधों में छूट देने के फैसले का बचाव कर सकता है या नहीं. असली चुनौती यह है कि वह स्पष्ट रूप से समझा सके कि भविष्य में फैसले किन कारणों के आधार पर लिए जाएंगे. साझेदार देशों को यह पता होना चाहिए कि आर्थिक हालात में बदलाव, कूटनीतिक बातचीत में प्रगति या कांग्रेस के विरोध से यह समझौता किस तरह प्रभावित हो सकता है. अगर ऐसा नहीं होता, तो नीतियों में लचीलापन सहयोग की शर्तों को लेकर अनिश्चितता बढ़ा सकता है. सांसदों के लिए भी यही सवाल महत्वपूर्ण है. उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि राष्ट्रपति प्रतिबंधों को लागू करते समय उन उद्देश्यों के प्रति जवाबदेह रहें, जिनके लिए कांग्रेस ने मूल रूप से प्रतिबंध लगाने की अनुमति दी थी.
ट्रंप का डीजल समझौता यह दिखाता है कि अमेरिका की ताकत पर घरेलू दबाव किस तरह असर डालते हैं. क्या कांग्रेस कानून बनाने के पीछे के मूल उद्देश्य को बनाए रखेगी? रिपब्लिकन पार्टी ट्रंप के प्रति वफादारी, मतदाताओं की सस्ती ऊर्जा की जरूरत और रणनीतिक सख्ती बनाए रखने के बीच संतुलन कैसे बनाएगी? क्या ट्रंप यह साबित कर पाएंगे कि तुरंत मिलने वाली राहत किसी बड़े लक्ष्य को हासिल करने में मदद करती है? अमेरिका की विश्वसनीयता कुछ हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी नीतियां कितनी स्पष्ट हैं और दूसरे देश उन पर कितना भरोसा कर सकते हैं कि वे आगे भी बनी रहेंगी.
मोनीष तौरंगबाम नई दिल्ली स्थित चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF) में फेलो हैं. विचार निजी हैं.
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