21 जुलाई 2025 की शाम, संसद के मानसून सत्र के पहले दिन, उस समय के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने एक धमाका किया. वह राष्ट्रपति भवन गए और अपना इस्तीफा सौंप दिया. उन्होंने कहा कि वह “स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना” चाहते हैं. इसके बाद से कई तरह की अटकलें और साजिश की बातें चलती रही हैं. न तो धनखड़ ने और न ही सरकार ने इन बातों को साफ करने की कोशिश की. दोनों के बीच विदाई कड़वाहट भरी थी. इसका अंदाज़ा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक्स पर लिखे छोटे से संदेश से भी लगाया जा सकता है:
“श्री जगदीप धनखड़ जी को उपराष्ट्रपति समेत कई अलग-अलग पदों पर देश की सेवा करने के कई अवसर मिले. मैं उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूं.”
पांच हफ्ते बाद पूर्व उपराष्ट्रपति राजधानी में इंडियन नेशनल लोकदल (INLD) नेता अभय सिंह चौटाला के गढ़ाईपुर फार्महाउस में रहने चले गए और तब से वहीं रह रहे हैं. उन्हें टाइप VIII का बंगला मिलना चाहिए, लेकिन सरकार ने अभी तक उन्हें यह बंगला नहीं दिया है.
धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद छोड़ने के 15 महीने बाद अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिसने सबको चौंका दिया है. धनखड़ मंगलवार को संघ के वार्षिक विजयादशमी कार्यक्रम में मेहमान थे. इस कार्यक्रम को सरसंघचालक मोहन भागवत ने संबोधित किया.
यह पूर्व उपराष्ट्रपति की बड़ी वापसी है. धनखड़ को भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राजनीतिक दायरे से बाहर कर दिया गया था. इस्तीफा देने के बाद से बीजेपी का एक भी नेता उनसे मिलने नहीं गया. अब पार्टी के वैचारिक मार्गदर्शक आरएसएस ने साफ संदेश दिया है कि वह धनखड़ को अलग-थलग व्यक्ति नहीं मानता, भले ही प्रधानमंत्री मोदी और धनखड़ के बीच जो कुछ हुआ हो.
यह पहली बार नहीं है जब संघ ने ऐसा संदेश दिया है. धनखड़ के इस्तीफे के चार महीने बाद आरएसएस के संयुक्त महासचिव मनमोहन वैद्य ने उन्हें भोपाल में अपनी किताब ‘हम और ये विश्व’ के विमोचन के लिए बुलाया था.
पूर्व उपराष्ट्रपति के रूप में अपने पहले सार्वजनिक भाषण में धनखड़ ने कहा था कि वैद्य की किताब ने आरएसएस को अति-दक्षिणपंथी संगठन बताने वाले प्रचार को गलत साबित किया है.
जब उनके सहयोगियों ने उन्हें उनकी फ्लाइट के बारे में याद दिलाया तो धनखड़ ने वहां मौजूद लोगों से कहा, “मैं फ्लाइट पकड़ने की चिंता में अपने कर्तव्य को नहीं छोड़ सकता. दोस्तों, मेरा हाल का अतीत इसका सबूत है.”
यह पता नहीं कि जुलाई 2025 में कर्तव्य निभाने के लिए उन्हें कौन-सी फ्लाइट छोड़नी पड़ी थी.
यह कोई छिपी बात नहीं है कि आरएसएस पूर्व उपराष्ट्रपति को पसंद करता है. राज्यसभा के किसी भी सभापति ने आरएसएस का उतना लगातार और जोरदार बचाव नहीं किया, जितना धनखड़ ने किया. कोलकाता राजभवन में रहने वाले किसी व्यक्ति ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बंगाल में आरएसएस-बीजेपी के एजेंडे को उतनी खुलकर आगे नहीं बढ़ाया, जितना धनखड़ ने किया.
आरएसएस के पूर्व प्रचारक और प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनके मतभेद की वजह अब भी रहस्य बनी हुई है. यही वजह है कि धनखड़ को विजयादशमी कार्यक्रम में बुलाया जाना महत्वपूर्ण हो गया.
मोदी के लिए संकेत?
नागपुर से आए इस संदेश को तीन तरह से देखा जा सकता है.
मोदी के आलोचक इसे प्रधानमंत्री मोदी के लिए संकेत मान सकते हैं. उन्होंने आरएसएस प्रमुख के उस बयान को तुरंत पकड़ लिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि असली नेतृत्व का मतलब आगे आना, चुनाव जीतना और लोगों को भाषण देना नहीं है.
सूरज के उगने और डूबने को लेकर उनकी तुलना ने भी मोदी के आलोचकों को उत्साहित किया था, लेकिन उन्हें इस बात तक ही सीमित रहने दें.
भागवत संकेत देने के लिए नहीं जाने जाते. वह अपनी बात साफ-साफ कहते हैं. वह सीधे या परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री मोदी को कमज़ोर करने की कोशिश कभी नहीं करेंगे. आखिर, इस पूर्व प्रचारक की लोकप्रियता ने संघ को उस स्तर तक पहुंचाया है, जहां उसके आलोचकों को भी हिंदुत्व की विचारधारा को लेकर अपनी राजनीति पर दोबारा विचार करना पड़ता है. पिछले साल अगस्त में अपने व्याख्यानों की श्रृंखला के दौरान जब भागवत से आरएसएस-बीजेपी के बीच तालमेल को लेकर सवाल पूछा गया था, तो उन्होंने कहा था कि दोनों के बीच “मतभेद” हो सकते हैं, लेकिन “मनभेद” नहीं हैं.
उन्होंने कहा था, “मैं शाखाएं चलाने में विशेषज्ञ हूं. बीजेपी सरकार चलाने में विशेषज्ञ है. हम एक-दूसरे को सिर्फ सुझाव दे सकते हैं…भले ही कुर्सी पर बैठा व्यक्ति हमारे लिए 100 प्रतिशत हो, फिर भी उसे अपना काम करना है, लेकिन उसे पता है कि उसके सामने क्या मुश्किलें हैं. वह शायद इसे कर पाए. हमें उसे यह स्वतंत्रता देनी होगी. कहीं कोई झगड़ा नहीं है.”
इससे ज्यादा साफ तरीके से यह नहीं बताया जा सकता कि संघ मोदी सरकार के साथ अपने संबंधों को किस तरह देखता है.
विजयादशमी के अपने भाषण में भागवत, जिन्होंने पहले जेन-जी के साथ संवाद शुरू किया था, मोदी सरकार के खिलाफ इस समय प्रदर्शन कर रहे लोगों की काफी आलोचना करते दिखे.
उन्होंने कहा, “जब कोई आंदोलन राजनीति का जरिया बन जाता है, किसी व्यक्ति, समूह या विचारधारा के खिलाफ दुश्मनी रखता है, तो भारत को कमजोर करने वाली ताकतें इसका फायदा उठाती हैं.”
यहां उनके शब्दों पर ध्यान दें- किसी “व्यक्ति, समूह या विचारधारा” के खिलाफ दुश्मनी. अगर इन शब्दों को समझें तो ‘व्यक्ति’ से मतलब प्रधानमंत्री मोदी, ‘समूह’ से बीजेपी-आरएसएस और ‘विचारधारा’ से हिंदुत्व समझा जा सकता है. राहुल गांधी के नेतृत्व वाले विपक्ष के हमलों के बीच भागवत इससे बेहतर तरीके से प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में नहीं बोल सकते थे. इसलिए नहीं, विजयादशमी कार्यक्रम में धनखड़ को बुलाना प्रधानमंत्री मोदी के लिए कोई संकेत नहीं था.
सीधी पटकथा नहीं
इस निमंत्रण को देखने का दूसरा तरीका वह है, जिसे संघ परिवार के आलोचक ‘गुड कॉप बैड कॉप’ की रणनीति कहते हैं. इस मामले में अगर बीजेपी या केंद्र की उसकी सरकार किसी व्यक्ति या समूह को नुकसान पहुंचाती है, तो आरएसएस उसकी भरपाई करता है. विपक्ष ने भागवत के जेन-जी के साथ संपर्क को इसी तरह पेश करने की कोशिश की थी.
धनखड़ को विजयादशमी कार्यक्रम में बुलाने के फैसले को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है. खासकर तब, जब पूर्व उपराष्ट्रपति धनखड़ जनता दल और कांग्रेस में अपने शुरुआती राजनीतिक दौर के बावजूद आरएसएस के इतने मुखर समर्थक रहे हैं, लेकिन मैं इस परिकल्पना को भी नहीं मानता. ज़रूरत पड़ने पर बीजेपी और आरएसएस साथ मिलकर काम करते हैं, लेकिन वे किसी तय पटकथा के हिसाब से ऐसा नहीं करते.
यही हमें नागपुर से आए संदेश को देखने के तीसरे तरीके तक ले जाता है.
इसका सार यह है कि करीब 100 साल पुराना आरएसएस जो कुछ भी करता है, वह अपने लंबे समय के लक्ष्यों और मिशन को आगे बढ़ाने के लिए करता है. तत्काल संदर्भ में उसकी प्राथमिकता उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का तीसरा कार्यकाल सुनिश्चित करना है. प्रधानमंत्री मोदी और जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के बीच हुए कड़वे मतभेद के बाद बीजेपी की ओर से एक और प्रमुख जाट नेता जगदीप धनखड़ को अपमानित किए जाने की तस्वीर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है.
आरएसएस प्रमुख का सार्वजनिक रूप से पूर्व उपराष्ट्रपति के प्रति सम्मान और समर्थन दिखाना इन आहत भावनाओं को दूर करने में मदद कर सकता है. यह साफ है कि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की धनखड़ के बारे में चाहे जो राय हो, आरएसएस के मन में उनके लिए नरम रुख है.
संगठन ने इस चुनाव में योगी के पीछे अपनी पूरी ताकत लगा दी है. उसने जमीनी स्तर पर अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया है और विधानसभा चुनावों से पहले विकास और कानून-व्यवस्था को लेकर माहौल बनाने के लिए बीजेपी के साथ लगातार समन्वय बैठकें कर रहा है. अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव में आरएसएस योगी की जीत सुनिश्चित करने के लिए इतनी ताकत क्यों लगा रहा है, यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब देने का समय अभी नहीं आया है.
डीके सिंह दिप्रिंट में पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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